भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

३२८ हर्षचरितम् न्यन्यं तेजस्विनं जडधियः । किं वा करोतु वराकः येनातिभीरुतया नित्यपराङ्मुखेन नतु दृष्टान्येव सर्वातिशायिशौर्यातिशयश्वयथुकपिलक- पोलपुलकपल्लवितकोपानलानि कुपितानां तेजस्विनां मुखानि । नासौ तपस्वी जानात्येवं यथाभिचारा इव विप्रकृताः सद्यः सकलकुलप्रलयमुपा- हरन्ति मनस्विन इति । जलेऽपि ज्वलन्ति ताडितास्तेजस्विनः । सकल- वीरगोष्ठीबाह्यस्य तस्यैवेदमुचितमनुत्तारनिरयनिपातनिपुणं कर्म । मन- स्विनां हि प्रधनप्रधानधने धनुषि ध्रियमाणे सति च कमलाकलहंसी- केलिकुवलयकानने कृपाणे कृपणोपायाः पयोधिमथनप्रभृतयोऽपि श्रीसमु- त्थानस्य किं पुनरीदृशाः । येषां च धात्रा धरित्रीं त्रातुं नियुक्ताः स्वयमसम- र्था इव कुलिशकर्कशभुजपरिघप्रहरणहेतोरुद्विरन्ति गिरयोऽपि लोहानि ते कथमिव बाहुशालिनो मनसापि विमलयशोबान्धवा ध्यायेयुरकार्यम् । स- दोषा अन्धतादयो विकारास्ते हि कामलाः कमलसंबन्धिनः । कमलानां दोषायां रात्रौ अन्धता संकोचः । तन्निवासश्च लक्ष्म्या अपि । स विकारश्चान्यं विप्रलभते । रागादयस्तैरन्धतेवान्धता सत्कार्यानालोचनम् । अथ च पाण्डू रोगभेदः । तेन शङ्खादौ पीतत्वादिज्ञानं तद्विकाराश्च रात्र्यन्धतादयो दोषा भवन्ति । सर्वातिशायिना शौर्यातिशयेन श्वयथुर्यैषां तानि । ततो विशेषणसमासः । विप्रकृता उपद्रुताः । विप्रैर्द्विजैः कृताः । जले तेऽपि ताडिता आहता वैद्युताश्च तेजस्विनोऽग्नयोऽपि । गोष्ठी बाह्यश्च न जानाति धर्मं वृद्धासेवित्वात् । प्रधनं रणः । गिरयो लोहान्युद्गि- संवर्धन से लाल कपोलों पर रोमांच के रूप में उत्पन्न होते हुए कोपानल वाले कुपित तेजस्वी पुरुषों का मुख बिलकुल नहीं देखा है। वह बेचारा जानता ही नहीं कि मारण मन्त्र के समान मनस्वी पुरुष तिरस्कृत होने पर शीघ्र ही सारे वंश का उच्चाटन कर डालते हैं। तेजस्वी लोग बिजली के समान आघात पाकर जल में भी प्रज्वलित रहते हैं। वीर- गोष्ठियों से बाहर उसके लिए उद्धार न पाने वाले नरक में गिरा देने वाला यह कर्म उचित ही है। मनस्वी पुरुष के द्वारा युद्ध के लिए धनुष धारण किये जाने पर और उनके पास लक्ष्मी रूपी कलहंसी की क्रीडा के लिए कुवलयवनरूपी कृपाण के विद्यमान रहने पर श्री को प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन प्रभृति उपाय भी तुच्छ हो जाते हैं तो ऐसे उपायों की क्या गणना ? वज्र के समान कर्कश जिनकी बाहु द्वारा परिघ नामक अस्त्र के प्रहार के लिए विधाता की आज्ञा पाकर स्वयं असमर्थ होकर पर्वत लोहा उत्पन्न करते हैं ऐसे बाहु-वीर्यशाली और निर्मल यश के प्रेमी मन से भी कैसे किसी अकार्य का ध्यान कर

सप्तम उच्छ्वास: सेना प्रयाण, विन्ध्य वन गमन व भण्डी मिलन

षष्ठ उच्छ्वासः ३२६ र्वग्रहाभिभवभास्वराणां हि सुभटकराणामग्रतो दिग्ग्रहणे पङ्गवः पतङ्गकराः। महामहिषशृङ्गतरङ्गभङ्गभङ्गुरभीषणान्तराला लोकप्रवादमात्रेण च दक्षिणाशा परमार्थतो भटभ्रुकुटिरधिवासो यमस्य। चित्रं च यदुन्मुक्तसिंहनादानां सहसा साहसरभसरसरोमाञ्चकण्टकनिकरेण सह न निर्यान्ति सटाः शूराणां रणेषु। द्वयमेव च चतुःसागरसंभृतस्य भूतिसंभारस्य भाजनं प्रतिपक्षदाहि दारुणं वडवामुखं वा महापुरुषहृदयं वा। तेजस्विनः सक- लाननवाप्य पयोराशिसहजस्य कुतो निवृत्तिरूष्मणः। वृथाविततविपुल- फणाभारो भुजङ्गानां भर्ता बिभर्ति यो भोगेन मृत्पिण्डमेव केवलम्। अप्रतिहतशासनाक्रान्त्युपभोगसुखरसं तु रसायां दिक्कुञ्जरकरभारभास्वर- प्रकोष्ठा वीरबाहव एव जानन्ति। रविरिवोन्मुखपद्माकरगृहीतपादपल्लवः सुखेनाखण्डिततेजा दिवसान्नयति शूरः। कातरस्य तु शशिन इव हरिण- हृदयस्य पाण्डुरपृष्ठस्य कुतो द्विरात्रमपि निश्चला लक्ष्मीः। अपरिमित- रन्ति गिरिभ्य एव लोहोत्पत्तेः। सर्वस्य वस्तुनो ग्रहोपहरणम्। ग्रहाश्चन्द्राद्याः। पतङ्गः सूर्यः। महामहिषशृङ्गयोस्तरङ्गवद्भङ्गुरा ये भङ्गास्तैर्भीषणमन्तरालं यस्याः सा। अन्यत्र,—महामहिषशृङ्गतुल्या। भूतिर्भस्मापि। तेजस्विनो वडवाग्नेरपि। मुखेन शोभनाकाशेनापि। शूरो रविरपि। हरिणहृदयस्याह्रस्रसत्त्वस्यापि पाण्डुर- सकते हैं ? सब ग्रहों के अभिभव करने में समर्थ (या सबका अपहरण करने वाले) सुभट लोगों के हाथों के सामने केवल दिशाओं के ग्रहण में सूर्य के कर (किरणें) पंगु हो जाते हैं। यह लोक प्रवाद मात्र है कि महामहिष की तरंगों के समान टेढ़ा सींगों से भयानक भीतरी भाग वाली दक्षिण दिशा यमराज का निवास स्थान है, परमार्थ रूप में महिष की सींग नहीं, बल्कि वहाँ योद्धाओं की भौहें न्यास हैं। आश्चर्य है कि संग्रामों में सिंहनाद करने वाले शूरवीरों के साहस रस के कारण उत्पन्न रोमांच के साथ ही सिंहों जैसी सटाएँ नहीं निकल जातीं। चारों समुद्रों से उत्पन्न होने वाले भूतिसम्भार (अर्थात् सम्पत्ति समूह अथवा भस्मसमूह) के योग्य स्थान दो ही हैं एक अपने प्रतिपक्ष (जल) को भस्म कर देने वाला (भस्मसमूह का योग्य स्थान) वडवानल और दूसरा (सम्पत्ति- समूह का योग्य स्थान) महापुरुष का हृदय। समुद्र में सहज उत्पन्न तेजस्वी बड़वानल के तीव्र तेज की निवृत्ति बिना सबको जलाए कैसे सम्भव है ? फणों का वृथा भार फैलाकर लादे हुए शेषनाग केवल मिट्टी का बोझ ही धारण कर रहे हैं। दिग्गज की सूंड़ के समान प्रकोष्ठ भागवाले वीरों के बाहु ही किसी प्रकार के विघ्न से रहित शासन द्वारा पृथिवी के उपभोगजनित आनन्द का अनुभव करते हैं। जैसे कमल (पद्माकर) सूर्य के किरणरूपी

यशःप्रकरवर्षी विकासी वीररसः। पुरःप्रवृत्तप्रतापप्रहृताः पन्थानः पौरुषस्य। शब्दविद्रुतविद्विषन्ति भवन्ति द्वाराणि दर्पस्य। शस्त्रालोक- प्रकाशिताः शून्या दिशः शौर्यस्य। रिपुरुधिरशीकरासारेण भूरिव श्रीर- प्यनुरज्यते। बहुनरपतिमुकुटमणिशिलाशाणकोणकषणेन चरणनखरा- जिरिव राजताप्युज्ज्वलीभवति। अनवरतशस्त्राभ्यासेन करतलानीव रिपु- मुखान्यपि श्यामीभवन्ति। विविधरणबद्धपट्टकशतैः शरीरमिव यशोऽपि धवलीभवति। कवचिशु रिपूरुःकवाटेषु पात्यमानाः पावकशिखामिव श्रियमपि वमन्ति निष्ठुरा निस्त्रिंशप्रहाराः। यश्चाहितहृतस्वजनो मनस्वि- जनो द्विषद्योषिदुरस्ताडनेन कथयति हृदयदुःखम् परुषासिलतानिपात- पवनेनोच्छ्वसिति निरुच्छ्वसितशत्रुशरीराश्रुधारापातेन रोदिति विपक्षवनि- पृष्टस्य देशभाषया निर्लज्जस्यापि। द्विरात्रमपीति। पौर्णमास्यामेव शशिनः सातिशयं शोभायुक्तत्वात्। लक्ष्मीः श्रीः, कान्तिश्च। शून्या अनावृताः। अनुरज्यतेऽनुरक्ता भवति, उपलिप्ता च भवति। उज्ज्वला रम्या, निर्मला च। श्यामानि कृष्णानि, विच्छा- पादपल्लव को उन्मुख होकर पकड़ते हैं उसी प्रकार अखण्डित तेज वाला वीर जिसके पैर पद्मा (लक्ष्मी) अपने हाथों से दबाती है, सुखपूर्वक दिन व्यतीत करता है। हरिण के समान भीरु हृदय वाला (हरिण से युक्त मण्डल वाला) और ऊपर से देखने में उज्ज्वल चन्द्रमा की भाँति कायर पुरुष की लक्ष्मी (शोभा या सम्पत्ति) दो रात भी नहीं ठहरती। वीररस अपरिमित यशसमूह बरसाने वाला एवं विकासशील होता है। पौरुष के मार्ग आगे- आगे चलने वाले प्रताप के द्वारा अभ्यस्त होते हैं। वीर के आवाज करते ही उसके दर्प के द्वार से शत्रु निकल भागते हैं। शौर्य के शस्त्र के आलोक से प्रकाशित दिशाएँ जन- रहित होती हैं। शत्रुओं की रुधिर की वर्षा से पृथिवी के समान श्री भी अनुरक्त (लालिमा से युक्त या प्रेमपूर्ण) हो जाती है। अनेक राजाओं के मुकुट की शिखामणि के घर्षण से चरणनख के समान साम्राज्य भी उज्ज्वल हो जाता है। शस्त्रों के हमेशा अभ्यास करने से करतल के समान शत्रुओं के मुख भी काले पड़ जाते हैं। व्रणों के ऊपर बाँधे गए वस्त्र के सैकड़ों टुकड़ों से शरीर की भाँति यश भी उज्ज्वल हो जाता है। कवच पहने शत्रु के चौड़े वक्ष पर पड़ते हुए कठोर खड्ग के प्रहार अग्नि शिखा के समान श्री (सम्पत्ति) को भी उगलते हैं। जो मनस्वी वीर पुरुष शत्रु के द्वारा आत्मीय- जन के मारे जाने पर अपने हृदय का दुःख उस शत्रु की पत्नियों के वक्षताडन से व्यक्त करता है, वेग से चलती हुई असिलता की हवा के रूप में उच्छ्वास लेता है, साँस तोड़ते हुए शत्रु के नेत्र से बहती हुई अश्रुधारा के रूप में रुदन करता है और शत्रु पत्नियों की

षष्ठ उच्छ्वासः ३३१ ताचक्षुषा ददाति जलं स श्रेयान्नेतरः । नच स्वप्नदृष्टनष्टेष्विव क्षणिकेषु शरीरेषु निबध्नन्ति बन्धुबुद्धिं प्रबुद्धाः । स्थायिनि यशसीव शरीरधीर्वी- राणाम् । अनवरतप्रज्वलिततेजःप्रसरभास्वरस्वभावं च मणिप्रदीपमिव कलुषः कज्जलमलो न स्पृशत्येवातितेजस्विनं शोकः । स त्वं सत्त्ववता- मग्रणीः प्राग्रहरः प्राज्ञानां प्रथमः समर्थानां प्रष्ठोऽभिजातानामग्रेसरस्ते- जस्विनामादिरसहिष्णूनाम् । एताश्च सततसंनिहितधूमायमानकोपाग्नयः सुलभासिधारातोयतृप्तयो विकटबाहुवनच्छायापगूढा धीरताया निवास- शिशिरभूमयः स्वायत्ताः सुभटानामुरःकवाटभित्तयः । यतः किं गौडा- धिपाधमैकेन । तथा कुरु यथा नान्योऽपि कश्चिदाचरत्येवं भूयः । सर्वो- र्वीश्रद्धाकामुकानामलीकविजिगीषूणां संचारय चामराण्यन्तःपुरपुरंध्रिनिः- श्वसितैः । उच्छिन्धि रुधिरगन्धान्धगृध्रमण्डलच्छादनैश्छत्रच्छायाव्यस- नानि । अपाकुरु कदुष्णशोणितोदकस्वेदैः कुलदमीकुलटाकटाक्षचक्षूरा- गरोगांन् । उपशमय निशितशरशिरावेधैरकार्यशौर्यश्वयथुन् । उन्मूलय यानि च । श्रेयान्प्रशंसनीयः । शिशिरभूमयोऽप्यमृतांयच्छायायुक्ता भवन्ति । स्वैर्देश्च आँखों से जलदान करता है, वही सबसे श्रेष्ठ है दूसरा नहीं । समझदार लोग देखते ही स्वप्न की तरह नष्ट हो जाने वाले क्षणभंगुर शरीर में आत्मीय भावना को स्थापित नहीं करते । वीर लोग स्थायी रहने वाले यश को ही अपना शरीर मानते हैं । मणि-प्रदीप के समान हमेशा प्रज्वलित रहने वाले अपने तेज से भास्वर स्वभाव के तेजस्वी को कज्जल के समान मलिन शोक नहीं छू पाता । तुम बलवानों में अग्रणी, बुद्धिमानों में प्रधान, सामर्थ्यवानों में प्रथम, कुलीनों में श्रेष्ठ, तेजस्वियों में अग्रसर, (शत्रु के पराक्रम को) न सहने वालों में मुख्य हो । योद्धाओं के वक्षरुपी कपाट की ये दीवारें, जिनमें हमेशा जलती हुई क्रोधाग्नि का धुआँ व्याप्त रहता है, जो असिधारा जल के सुलभ होने से तृप्त हैं, जिन पर उनके विशाल भुजवन की छाया पड़ती रहती है और जो धीरता के रहने से ठंढी हैं, अपने अधीन ही समझो । क्योकि अकेले उस अधम गौड़ाधिप की क्या बात है ? तुम ऐसा उपाय करो जिससे फिर कोई दूसरा ऐसा आचरण न करे । समस्त पृथिवी की चाह रखने वाले एवं अलीक विजय की इच्छा वाले राजाओं के लिए उनके अन्तःपुर की नवेलियों के निःश्वास के चँवर संचारित करो । रुधिर की दुर्गन्ध के लोलुप गीधों की छाया देकर उनके आतपत्र की छाया में रहने का शौक तोड़ो । कुत्सित लक्ष्मी रूपी कुलटा के कटाक्ष से उत्पन्न उनके चक्षुराग रूप रोगों को कुछ उष्ण रुधिर के विन्दुओं से दूर करो । अन्याय के कार्यों में बढ़े हुए उनके पराक्रम के शोथ को तीक्ष्ण बाणों के शिरावेध

३३२ हर्षचरितम् लोहनिगडापीडमालामलमहौषधैः पादपीठदोहददुर्ललितपादपटुमान्द्यानि। क्षपय तीक्ष्णाज्ञाक्षरक्षारपातैर्जयशब्दश्रवणकर्णकण्डूः । अपनय चरणनख- मरीचिचन्दनचर्चाललाटलेपैरनमितस्तिमितमस्तकस्तम्भविकारान् । उद्धर करदानसंदेशसंदंशैर्द्रविणदर्पोष्मायमाणदुःशीललीलाशल्यानि । भिन्धि मणिपादपीठदीधितिप्रदीपिकाभिः शुष्कसुभटाटोपभ्रुकुटिबन्धान्धका- रान् । जय चरणलङ्घनलाघवगलितशिरोगौरवारोग्यैर्मिथ्याभिमानमहास्रं- निपातान् । म्रदय सततसेवाञ्जलिमुकुलितकरसंपुटोष्मभिरिष्वासनगुणकि- णकार्कश्यानि । येनैव च ते गतः पिता पितामहः प्रपितामहो वा तमेव मा हासीस्त्रिभुवनस्पृहणीयं पन्थानम् । अपहाय कुपुरुषोचितां शुचं प्रतिपद्यस्व कुलक्रमागतां केसरीव कुरङ्गीं राजलक्ष्मीम् । देव ! देवभूयं गते नरेन्द्रे दुष्ट- गौडभुजङ्गजग्धजीविते च राज्यवर्धने वृत्तेऽस्मिन्महाप्रलये धरणी- नयनव्याध्युपशमो जायते, एवं निशितशरसिरावेधैरित्यादि बोद्धव्यम् । संदेशः शल्याञ्चनम् । सतताञ्जलिबन्धात्करयोरूष्मसंभवः । इष्वासनं धनुः । देवभूयं (इन्जेक्शन) से शान्त करो। लोहे की बेड़ी रूपी महौषध से पादपीठों पर विराजमान होने में चतुर उनके पैरों की बढ़ी हुई मन्दता को हटाओ। अपनी प्रतिज्ञा के खारे अक्षरों को जयशब्द सुनने वाले उनके कानों में डालकर उनकी खुजान मिटाओ। चन्दन के समान अपने चरण नख की किरणों का लेप लगाकर नहीं झुकने वाले और निश्चल उनके मस्तक के स्तम्भरोग को दूर करो। कर देने के संदेश रूपी संड़सी से धनमद की गर्मी को उगलते हुए उनके दुराचरण रूपी शल्यों को निकाल डालो। अपने मणिमय पादपीठ की किरणों की दीपिकाओं से योद्धाओं के नीरस आरोपजनित भ्रूभङ्ग के अन्धकार को मिटाओ। चरण के द्वारा लंघन करने से (अथवा भोजन न करने से) उनके सिर के गौरव (अथवा भारीपन) को मिटाने वाले औषध प्रयोग से उनके मिथ्या अभिमानरूपी महासन्निपात को पराजित करो। तुम ऐसा करो कि तुम्हारी सेवा में वे इस प्रकार हाथ जोड़े हमेशा खड़े रहें कि उनके करसम्पुट की गर्मी से धनुष के गुणों की रगड़ के कारण पड़े हुए घट्टे मुलायम हो जायें। जिस मार्ग से तुम्हारे पिता, पितामह, प्रपितामह गए हैं त्रिभुवन में श्लाघनीय उस मार्ग की हँसी मत उड़ाओ। कुपुरुषों के लिए उचित शोक को छोड़कर परम्परागत राजलक्ष्मी को उस प्रकार प्राप्त करो जैसे सिंह हिरनी को अपने कब्जे में कर लेता है। देव, महाराज के देवत्व प्राप्त करने पर एवं राज्यवर्धन के दुष्ट गौड़ाधिप रूपी सर्प द्वारा डंस लिए जाने से जो महाप्रलय का समय आया है इसमें तुम्हीं शेषनाग

धारणायाधुना त्वं शेषः । समाश्वासय अशरणाः प्रजाः । क्ष्मापतीनां शिरःसु शरत्सवितेव ललाटंतपान्प्रयच्छ पादन्यासान् । अहितानामभिन- वसेवादीक्षादुःखसंतप्रश्वासधूममण्डलैर्नखंपचैः प्रचलितचूडामणिचक्रवा- लबालातपैश्चायाहि कल्माषपादताम् । अपि च हृते पितर्यंकाकी तपस्व्रा मृगैः सह संवर्धितः सहजब्राह्मण्यमार्दवसुकुमारमनाः कृतनिश्चयश्चण्डचा- पवनाटनिंटंकारनादनिर्मदीकृतदिग्गजं गुञ्जज्ज्याजालजनितजगज्ज्वरं स- मप्रमुद्यतमेकविंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान्राजन्यकं परशुरामः, किं पुनर्नैसर्गिककायकार्कश्यकुलिशायमानमानसो मानिनां मूर्धन्यो देवः । तदद्यैव कृतप्रतिज्ञो गृहाण गौडाधिपाधमजीवितध्वस्तये जीवितसंकलना- कुलकालाकालदण्डयात्राचिह्नध्वजं धनुः । न ह्ययमरातिरक्तचन्दनचर्चा- शिशिरोपचारमन्तरेण शाम्यति परिभवानलपच्यमानदेहस्य देवस्य दुःख- दाहज्वरः सुदारुणः । निकारसंतापशान्त्युपायपरिक्षये हि हिडिम्बाचुम्ब- देवत्वम् । शेषोऽवशिष्टः, शेषभट्टारकश्च । ललाटंतपानिति प्रचण्डतोक्ता । कल्माप- पादतां चित्रचरणत्वम् । राजन्यकं क्षत्रियसमूहः । रामो भार्गवः । नैसर्गिकः स्वाभाविकः । मूर्धन्यो मुख्यः । परिभवो निकारः । हिडिम्बा राक्षसी । पवनात्मजेन की भाँति पृथिवी को धारण करने में समर्थ हो । आश्रयहीन प्रजा को आश्वासन दो । शरत्कालीन सूर्य के समान राजाओं के सिर पर ललाट को पीड़ित करने वाले अपने चरण रखो । शत्रुओं को सेवा की नवीन दीक्षा देने वाले दुःख के कारण संतप्त श्वास के धूम मण्डल से, एवं नख को पीड़ित करने वाले चूडामणियों के बालातप से अपने चरण को चित्रित करो । पिता के मर जाने से अकेले, मृगों के साथ पले हुए स्वाभाविक ब्राह्मणत्व के कारण मृदु और अतिकोमल मन वाले तपस्वी परशुराम ने प्रतिज्ञा करके प्रचंड बाण समूह के टंकार करने की ध्वनि से दिग्गजों को मदहीन बना देने वाले, गूँजती हुई धनुष की डोरियों की आवाज से संसार को ज्वरग्रस्त कर देने वाले, संग्राम के लिए उद्यत समस्त राजाओं के वंशों का इक्कीस बार उन्मूलन किया था । देव भी अपने शरीर की स्वाभाविक कठोरता और वज्रतुल्य मन से मानियों के मूर्धन्य हैं । तो प्रतिज्ञा करके उस अधम गौड़ाधिप के नाश के लिए प्राणों के संग्रह में लगे हुए यमराज के अचानक सैनिक कूच की सूचक झंडी के साथ धनुष उठा लीजिए । परिभव की अग्नि में पके जाते हुए शरीर वाले देव का दुःखजन्य दारुण ज्वर शत्रु के रक्त की चन्दन चर्चा के शिशिरोपचार के बिना शान्त नहीं हो सकता । परिभवजन्य सन्ताप की शान्ति के लिए शत्रु का विनाश एकमात्र उपाय है । भीम ने हिडिम्बाराक्षसी के चुम्बन के साथ

नास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतममन्दरोपायमपायि पवनात्मजेन। जामद- ग्न्येन च शाम्यन्मन्युशिखिशिखासंज्वरसुखायमानस्पर्शशीतलेषु क्षत्रिय- क्षतजह्रदेष्वस्नायि।' इत्युक्त्वा व्यरंसीत्। देवस्तु हर्षस्तं प्रत्यवादीत्—'करणीयमेवेदमभिहितं मान्येन। इत- रथा हि मे गृहीतभुवि भोगिनायेऽपि दायाददृष्टिरीर्ष्यालोर्भुजस्य। उपरि गच्छतीच्छति निग्रहाय ग्रहगणेऽपि भ्रूलता चलितुम्। अनमत्सु शैलेष्वपि कचग्रहमभिलषति दातुं करः। तेजोदुर्विदग्धानर्ककरानपि चामराणि ग्राह- यितुमीहते हृदयम्। राजशब्दरुषा मृगराजानामपि शिरांसि वाञ्छति पादः पादपीठीकर्तुम्। स्वच्छन्दलोकपालस्वेच्छागृहीतानामाच्छेपादेशाय दिशामपि स्फुरत्यधरः। किं पुनरीदृशे दुर्जाते जाते जातामर्षनिर्भरे च मनसि नास्त्येवावकाशः शोकक्रियाकरणस्य? अपि च हृदयविषमशल्ये भीमसेनेन। क्षतजह्रदेषु रक्ततडाकेषु। इतरथापीत्यन्यथा यदिदृशं दुर्जातं जातं नाभूत्तदादावेवमद्भुतं भुजस्य भोगि- नाथेऽपि दायाददृष्टिः। किं पुनरीदृशे दुर्जाते व्यसने जाते संपन्नं शत्रुवृद्धिर्भवेदिति योजना। एवमुपरि गच्छतीत्यादौ बोद्धव्यम्। आच्छेपोऽपहरणम्। रुधिर का जो आस्वाद पाया था वही मन्दर के द्वारा मथन के बिना ही प्राप्त शत्रु (दुःशासन) के रुधिर रूपी अमृत का पान करके प्राप्त किया। परशुराम ने शान्त होती हुई क्रोधाग्नि की शिखा के संताप के कारण स्पर्श से सुख पहुँचाने वाली शीतल क्षत्रियों के रुधिर-सरोवरों में स्नान किया।' यह कहकर सेनापति सिंहनाद चुप हो गया। देवहर्ष ने उत्तर दिया—'आर्य, आपने जो कहा है वह अवश्य ही करने योग्य है। अन्यथा पृथिवी का भार धारण करते हुए राजपद पर प्रतिष्ठित होने पर भी मेरे ईर्ष्यालु भुज की विरुद्ध दृष्टि बराबर बनी रहेगी। मेरी भ्रूलता आकाश में ऊपर चलते हुए तारों को पकड़ने के लिए चल पड़ने की इच्छा करती है। हाथ चाहता है कि सामने न झुकने वाले पर्वतों की बाबरी पकड़ कर झटक दें। तेज हो जाने से सूर्य के दुर्विनीत करों (हाथों अथवा किरणों) में चंवर पकड़ाने की इच्छा मेरे हृदय में उत्पन्न होती है। मृगराज नाम वाले शेरों के नाम में 'राज' शब्द के प्रति क्रोध के कारण मेरा पैर उनके मस्तक को अपना पाद पीठ बनाना चाहता है। स्वतन्त्र लोकपालों ने जिन दिशाओं को अपने अधीन कर रखा है उन्हें भी हर लेने की आज्ञा देने के लिए मेरा अधर स्फुरित होता है। जब कि इतना बड़ा व्यसन आ पड़ा है तो फिर क्या कहना ! क्रोध से भरे हुए मन में शोक का कोई स्थान ही नहीं। जब तक अधम, चंडाल, दुष्ट, पापी जगत् में निन्दा का

षष्ठ उच्छ्वासः ३३५ मुसल्ये जीवति जाल्मे जगद्विगर्हिते गौडाधिपाधमचण्डाले जिह्रेमि शुष्काधरपुटः पोटेव प्रतिकारशून्यं शुचा फूत्कर्तुम् । अकृतरिपुबलाबला- विलोललोचनोदकदुर्द्दिनस्य मे कुतः करयुगलस्य जलाञ्जलिदानम् । अदृष्टगौडाधमचिताधूममण्डलस्य च चक्षुषः स्वल्पमप्यश्रुसलिलम् । श्रूयतां मे प्रतिज्ञा - 'शपाम्यार्यस्यैव पादपांसुस्पर्शन, यदि परिगणितैरेव वासरैः सकलचापचापलदुर्ललितनरपतिचरणरणायमाननिगडां निर्गोडां गां न करोमि ततस्तनूनपाति पीतसर्पिषि पतङ्ग इव पातकी पातयाम्य- त्मानम्' इत्युक्त्वा च महासंधिविग्रहाधिकृतमवन्तिकमन्तिकस्थमादि- देश - 'लिख्यताम् । आ रविरथचक्रचीत्कारचकितचारणमिथुनमुक्तसानो- रुदयाचलात्, आ त्रिकूटकटककुट्टाकटङ्कलिखितकाकुत्स्थलङ्कालुण्ठनव्य- तिकरात्सुवेलात्, आ वारुणीमदस्खलितवरुणवरनारीनूपुररवमुखरकुहर- कुद्देरस्तगिरेः, आ गुह्यकगेहिनीपरिमलसुगन्धिगन्धपाषाणवासितगुहागृ- मुसलेन वध्यो मुसल्यः । तस्मिन् जाल्मे पापिष्ठे । पोटा नपुंसकम् । निगडो बन्धनशृङ्खला । तनूनपाद्वह्निः । चारणा गन्धर्वाः । काकुत्स्थो रामः । वारुणी सुरा । पात्र गौडाधिप जीवित रह कर मेरे हृदय में विषम काँट की तरह चुभता रहता है तब तक सूखे हुए अधर पुट वाले मेरे लिए बदला न लेने के कारण नपुंसक की भाँति रोना- धोना लज्जास्पद है। जब तक शत्रु की अबलाओं के चंचल नेत्रों के जल से दुर्द्दिन न कर लूं तब तक मेरे हाथों से जलांजलि कैसे दी जा सकती है ? जब तक गौडाधम की चिता से उठता हुआ धुवाँ में नहीं देखूं तब तक मेरे नेत्रों में आँसू कहाँ ? तो सुनिए मेरी प्रतिज्ञा - 'आर्य के ही पैरों की धूक लेकर प्रतिज्ञा करता हूं कि यदि कुछ ही दिनों में धनुष चलाने की चपलता के घमण्ड में भरे हुए समस्त उद्धत राजाओं के पैरों की बेड़ियों की झनकार से पूर्ण करके पृथिवी को गौड़ों से रहित न बना दूं तो घी से धधकती हुई आग में पतंगे की तरह पातकी अपने आप को जला दूंगा ।' यह कह कर उन्होंने अपने पास में बैठे महासन्धिविग्रहाधिकृत अवन्तिक को आज्ञा दी - 'लिखो, पूर्व में सूर्य के रथ के चक्रों की घर्घर आवाज से चकचिहाए गन्धर्व युगलों द्वारा छोड़े गए शिखर वाले उदयाचल तक, दक्षिण में त्रिकूट पर्वत तक जिसके मध्यभाग में कुट्टाक की टाँकी से राम के द्वारा लंकापुरी के लूटे जाने की घटना लिखी गई है, पश्चिम में मदिरा पीकर मतवाली वरुण की श्रेष्ठ सुन्दरियों के नूपुर की आवाज से जिसकी कन्दराएं भर रही हैं ऐसे अस्ताचल तक, उत्तर में यक्षिणियों के शरीर की सुगन्धि से सुवासित पाषाणों से युक्त गुहाओं वाले गन्धमादन तक सब राजा हाथ से कर दान के लिए तैयार हों या शस्त्रग्रहण

हाय गन्धमादनात्, सर्वेषा राज्ञां सज्जीक्रियन्तां कराः करदानाय शस्त्रग्र- हणाय वा, गृह्यन्तां दिशाश्चामराणि वा, नमन्तु शिरांसि धनूंषि वा, कर्णपूरीक्रियन्तामाज्ञा मौर्व्यो वा, शेखरीभवन्तु पादरजांसि शिरस्त्राणि वा, घटन्तामञ्जलयः करिघटाबन्धा वा, मुच्यन्तां भूमय इषवो वा, समा- लम्ब्यन्तां वेत्रयष्टयः कुन्तयष्टयो वा, सुदृष्टः क्रियतामात्मा मच्चरणनखेषु कृपाणदर्पणेषु वा। परागतोऽहम्। पङ्गोरिव मे कुतो निवृत्तिस्ताव- द्यावन्न कृतः सर्वद्वीपन्तरसंचारी सकलनरपतिमुकुटमणिशिलालोकमयः पादलेपः ।' इति कृतनिश्चयश्च मुक्तास्थानो विसर्जितराजलोकः स्नाना- रम्भाकाङ्क्षी सभामत्याक्षीत् । उत्थाय च स्वस्थवन्निःशेषमाह्निकमकार्षीत् । अगलच्च दर्पप्रसर इव श्रुतप्रतिज्ञस्य शाम्यद्यूष्मा दिवसस्त्रिभुवनस्य । ततश्च निजाधिकारापहारभीत इव भगवत्यपि क्वापि गते गत- कुक्षिवेंदिः । गुह्यका यक्षाः । पङ्गोर्गतिविकलस्य । ऊष्मा औष्ण्यम् । ततश्चेत्यादौ । प्रदोषास्थाने नातिचिरं तस्थाविति संबन्धः । शरा अपि शिली- करने के लिए, दिशाओं का ग्रहण करें या सेवा चामरों का, अपने मस्तक को नम्र करें या धनुष को, आज्ञा को कानों तक करें या धनुष की मौर्वी को, अपने सिर पर चरण की धूल धारण करें या शिरस्त्र (युद्ध के लिए टोप), प्रणाम के लिए अंजलि का संघटन करें या युद्ध के लिए हाथियों को जुटाएं, भूमि का त्याग करें या बाणों का, वेत्र यष्टि धारण करें या युद्ध के लिए बछियाँ लें, झुक कर मेरे चरण के नखों में अपना प्रतिबिम्ब देखें (अर्थात् प्रणाम के लिए तैयार हो जाँय) अथवा युद्ध के लिए उठाए गए कृपाण के दर्पणों में अपना रूप देखें। मैं अब आया। पंगु के समान मुझे तब तक कहाँ सुख मिलेगा जब तक उस प्रकार का अपने चरण में लेप नहीं लगाता जिसे लगाते ही सब द्वीपान्तरों में बिचरण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है और जो सब राजाओं की मुकुट मणियों में आलोक उत्पन्न करता है।' इस प्रकार निश्चय की घोषणा करके वे बाह्य आस्थान मण्डप से उठे, एवं सब राजाओं को विदा किया। स्नान करने की इच्छा से सभा छोड़ कर भीतर गए । स्वस्थ के समान उन्होंने वहाँ से उठ कर सारे दैनिक कार्य किए । दिन का तेज शान्त होने लगा, इस रूप में मानों हर्ष की प्रतिज्ञा सुन कर त्रिभुवन का अहंकार विगलित हो गया । तब अपने अधिकार के छिन जाने के डर से भगवान् सूर्य भी क्षीण तेज होकर कहीं चले गए । भौरों की आवाज से भरे तामरसवन भी मानों त्रास के कारण संकुचित होने

तेजस्यहिमभासि, तामरसवनेष्वपि निगूढशिलीमुखालापेषु त्रासा- दिव संकुचत्सु, विहगगणेष्वपि समुपसंहृतनिजपक्षविक्षेपनिश्चलेषु भियेवाप्रकटीभवत्सु, भुवनव्यापिनीं संध्यां प्रतिज्ञामिव मानयति नतशिरसि घटिताञ्जलिवने जने सकले, स्वपदच्युतिचकितदिक्पा- लदीयमानाभ्रंलिहलोहप्राकारवलयकलितास्विव बहलतिमिरमालातिरो- धीयमानासु दिक्षु प्रदोषस्थाने नातिचिरं तस्थौ । नपन्नृपलो- कलोलांशुकपवनकम्पितशिखैर्दीपिकाचक्रवालैरपि प्रणम्यमान इव प्राहिणोल्लोकं प्रतिषिद्धपरिजनप्रवेशश्च शयनगृहं प्राविशत् । उत्ता- नश्च मुमोचाङ्गानि शयनतले । दीपद्वितीयं च तमभिसर इव लब्धावसरस्तरसा भ्रातृशोको जग्राह । जीवन्तमिव हृदये निमी- लितलोचनो ददर्शाग्रजम् । उपर्युपरि भ्रातृजीवितान्वेषिण इव प्रसस्रुः श्वासाः । धवलांशुकपटान्तेनेव चाश्रुजलप्लवेन मुखमा- च्छाद्य निःशब्दमतिचिरं रुरोद । चकार च चेतसि कथं नामाकृते- स्तादृश्या युक्तः परिणामोऽयमीदृशः । पृथुशिलासंघातकर्कशकाय- मुखाः । सहाया अपि पक्षाः । अभिसराश्चौराः । लगे । पक्षी भी मानों डर के मारे अपने डैने सिकोड़ कर निश्चल भाव से छिप गए । सब लोग भुवन में व्याप्त संध्या को ही प्रतिज्ञा के समान मान कर सिर झुकाकर और हाथ जोड़ कर प्रणाम करने लगे । चारों ओर अंधकार से दिशाएँ तिरोहित होने लगीं, मानों दिक्पालों ने अपनी पदच्युति होने के डर से लोहे के आकाशचुम्बी प्राकार खड़े कर दिए हों । देव हर्ष प्रदोषोत्थान में थोड़ी देर बैठे । पवन से कम्पित दीपशिखा के समान उन्हें प्रणाम करते हुए राजाओं के अंशुक चंचल हो उठे । सब लोगों को भेज कर स्वयं वे परिजनों का प्रवेश रोक कर शयनगृह में गए । वहाँ शयनतल पर उत्तान हो अङ्गों को ढीले छोड़ पड़ रहे । वहाँ एक दीप जल रहा था और दूसरे वे थे । उसी समय भाई के शोक ने अवसर पाकर चोर के समान उन्हें वेग से पकड़ लिया । आँखें बन्द करके उन्होंने अपने हृदय में मानों जीते हुए अपने बड़े भाई राज्यवर्धन को देखा । मानों भाई के प्राणों को ढूँढ़ने के लिए उनके श्वास ऊपर-ऊपर बढ़ने लगे । आँसू से डबडबाए अपने मुँह को सफेद अंशुक के अग्रभाग से ढंक कर बहुत देर तक बिना शब्द के सिसक-सिसक कर रोने लगे । मन में सोचने लगे कि उस तरह की आकृति का भी यह नतीजा ठीक कैसे है ? पिताजी के शरीर की बनावट शिलासंघात जैसी थी और जैसे पर्वत से लोहा २२ ह० च०

३३८ हर्षचरितम् बन्धात्तातादचलादिव लोहधातुः कठिनतर आसीदार्यः। कथं चास्य मे हतहृदयस्यार्यविरहे सकृदपि युक्तं समुच्छ्वसितुम्। इयं सा प्रीतिर्भक्तिरनुवृत्तिर्वा। बालिशोऽपि कः संभावयेदार्यमरणे मज्जी- वितम्। तत्तादृशमैक्यमेकपद् एव क्वापि गतम्। अयत्नेनैव हत- विधिना पृथक्कृतोऽस्मि। दग्धरोषान्तरितशुचा सुचिरं रुदितमपि न मुक्तकण्ठं गतघृणेन मया। सर्वथा लूतातन्तुच्छटाच्छिदुरास्तु- च्छाः प्रीतयः प्राणिनाम्। लोकयात्रामात्रनिबन्धना बान्धवता यत्रा- हमपि नाम पर इवार्ये स्वर्गस्थे स्वस्थ इवासे। किंच दैवहतकेन फल- मासादितमीदृशि परस्परप्रीतिबन्धनिर्वृतहृदये सुखभाजि भ्रातृमिथुने विघटिते। तथा च चन्द्रमया इव जगदाह्लादिनो लोकान्तरीभूतस्य लग्न- चिताग्नय इवार्यस्य त एव दहन्ति गुणाः। इत्येतानि चान्यानि च हृदयेन -पर्यदेवत्। प्रभातायां च शर्वर्यां प्रातरेव प्रतीहारमादिदेशाशेषगजसाधना- ऽधिकृतं स्कन्दगुप्तं द्रष्टुमिच्छामीति।

लूता तन्तुच्छटा जालकारसूत्रजालम्। लोकयात्रा लोकाचारः। किं फलमासा- दितम्, न किंचिदित्यर्थः। पर्यदेवत् शुशोच।

और भी कठोर उत्पन्न होता है उसी प्रकार आर्य थे। कैसे मेरे इस मुष्ट हृदय का आर्य के विरह में एक बार भी सांस लेना ठीक है? यह क्या प्रीति है या भक्ति है या अनुवर्तन है? मूर्ख भी कौन होगा जो आर्य के मरने पर मेरे जीवित रहने की सम्भावना करे? उस प्रकार का वह अभिन्न साथ तत्काल ही कहीं चला गया। दुष्ट विधाता ने भाई से मुझे अनायास ही अलग कर दिया। रोष के कारण शोक के दब जाने से निर्दय मैं देर तक मुक्तकंठ से रो भी न सका। सर्वथा मकड़ी के जाले के समान प्राणियों का तुच्छ प्रेम थोड़े ही में टूट जाता है। सचमुच भाई-बन्धु का नाता लोकव्यवहार मात्र के लिए है, जहाँ मैं भी आर्य के स्वर्ग चले जाने पर पराये की भाँति स्वस्थ होकर पड़ा हूँ। परस्पर प्रेम-भरे सुखपूर्वक रहने वाले दो भाइयों के अलग हो जाने से दुष्ट दैव को क्या लाभ हुआ? आर्य के ही गुण जो चन्द्र की ज्योत्स्ना के समान संसार को आह्लादित करते थे, अब उनके लोकान्तर में चले जाने से चिता में लगी हुई अग्नि के समान दाह उत्पन्न कर रहे हैं।' इस प्रकार हृदय से वे रुदन करते रहे। रात बीतने पर प्रातःकाल ही उन्होंने प्रतीहार को आज्ञा दी—'मैं गजसाधनाधिकृत स्कन्दगुप्त से मिलना चाहता हूँ।'

अथ युगपत्प्रधावितबहुपुरुषपरम्पराहूयमानः, स्वमन्दिरादप्रतिपालित- करेणुश्चरणाभ्यामेव संभ्रान्तः, ससंभ्रमैर्दण्डिभिरुत्सार्यमाणजनपदः, पदे पदे प्रणमतः प्रतिदिशमभिषग्वरान्वारणानां विभावरीवार्ताः पृच्छन्नु- च्छ्रितशिखिपिच्छलाञ्छितवंशलतावनगहनगृहीतदिगायामैर्विन्ध्यवनैरिव वारणबन्धविमर्दोद्योगागतैः, पुरःप्रधावद्भिरनायत्तमण्डलैराधोरणगणैश्च मरकतहरितघासमुष्टीश्च दर्शयद्भिर्नवग्रहगजपतींश्च प्रार्थयमानैश्च लब्धाभि- मतमत्तमातङ्गमुदितमानसैश्च सुदूरमुपसृत्य नमस्यद्भिरात्मीयमातङ्गमदा- गमांश्च निवेदयद्भिः, डिण्डिमाधिरोहणाय च विज्ञापयद्भिः, प्रमादपति- तापराधापहृतद्विरददुःखधृतदीर्घश्मश्रुभिरमतो गच्छद्भिः, अभिनवोप- सूतैश्च कर्पटिभिर्वारणाप्तिसुखप्रत्याशया धावमानैः, गणिकाधिकारिगणे- श्चिरलब्धान्तरैरुच्छ्रितकरैः, कर्मण्यकरेणुकासंकथनाकुलैरुल्लासितपल्लव- चिह्नाभिररण्यपालपङ्क्तिभिश्च, निष्पादितनवग्रहनागनिवहनिवेदनोद्यताभि- रुत्तम्भिततुङ्गतोत्रवनाभिर्महामात्रपेटकैश्च प्रकटितकरिकर्मचर्मपुटैः, अभि- अथत्यादौ। स्कन्दगुप्त एतैरेतैः क्रियमाणकोलाहलो राजकुलं विवेशेति संब- न्धः। भिषग्वरान्वैद्योत्तमान्। बन्धो रोधनमपि। अनायत्ता हस्तिपार्श्वरक्षिणः। आधोरणा गजारोहाः। डिण्डिमः पटहः। गणिका गजानां प्रतिलोभनार्था हस्तिनी। कर्मण्यकरेणुका करिग्रहकुशला करिणी। तुदन्त्यनेनेति तोत्रं प्रेषणकम्। महामात्राः प्रधानहस्त्यारोहाः। तेषां पेटकैः समूहैः। करिणां कर्मार्थं युद्ध- आज्ञा पाते ही अनेक युवक स्कन्दगुप्त को ताबड़तोड़ बुलाने पहुंचे। वह अपने भवन से निजी हथिनी की प्रतीक्षा किए बिना पैदल ही झटपट राजकुल के लिए चल पड़ा। घबराए हुए दण्डधारी सैनिक उसके सामने से लोगों की भीड़ हटाने लगे। पद-पद पर चारों ओर से प्रणाम करते हुए हाथियों के बारे में चिकित्सकों से पूछता जाता था कि पिछली रात उनका क्या हाल रहा ? उसके चारों ओर गजकटक का शोर हो रहा था। विन्ध्याचल के वनों के समान ऊंचे बांस के सिरे पर मोर के पंख बांधे दिशाओं में व्याप्त होने वाले, हाथियों को हांका देकर पकड़ने के लिए दूर-दूर से बुलाए गए, हाथियों के पार्श्व- रक्षी लोग और महावत, जो मरकत के समान हरी-हरी घास की मूठ देकर नए पकड़ कर लाए गए हाथियों को परचा रहे थे और मतवाले हाथियों के बात मान लेने पर प्रसन्न हो रहे थे, दूर से दौड़ कर उसे प्रणाम करने लगे, अपने अपने हाथियों के यौवन के कारण मद फूट कर बहने की सूचना देने लगे । बड़ी अवस्था के हाथियों के डिंडिमाधिरोहण के लिए निवेदन करने लगे। कुछ महावत गिर जाने के अपराध के कारण हाथी के छिन जाने के

३४० हर्षचरितम्

नवगजसाधनसंचरणवार्तानिवेदनबिसर्जितैश्च नागवनवीथीपालदूतवृन्दैः, प्रतिक्षणप्रत्यवेक्षितकरिकवलकूटैश्च, कटभङ्गसंग्रहं ग्रामनगरनिगमेषु निवे- दयमानैः, कटककदम्बकैः क्रियमाणकोलाहलः, स्वामिप्रसादसंभृतेन महा- धिकाराविष्कारेण स्वाभाविकेन चावष्टम्भाभोगोनोदासीनोऽप्यादिशन्निव, असंख्यकरिकर्णशङ्खसंपत्संपादनाय समुद्रानाज्ञापयन्निव, शृङ्गारगैरिकप- ङ्करागसंग्रहाय गिरीन्मुष्णन्निव, दिग्गजाधिकारं ककुभामैरावतमिवाप- हरन्हरेर्हरपदभरनमितकैलासगिरिगुरुभिः पादन्यासैर्गुरुभारग्रहणगर्वमु- र्व्याः संहरन्निव, गतवशविलोलस्य चाजानुलम्बस्य बाहुदण्डद्वयस्य विक्षे- पैरालानशिलास्तम्भमालामिवोभयतो निखनन्नीषत्सुङ्गुलम्बेनाघरबिम्बे-

शिक्षायै । चर्मपुटः चर्मकृतो हस्त्याकारः । कटभङ्गः प्रत्यग्रम् । गोधूमादियवसम्, घास इत्यर्थः । निगमा वणिकपथाः । कटका हस्तिपटनियुक्ताः, अग्रेसरा वेत्रिण इत्यन्ये । गुणाः शौर्याद्याः, मौर्वी च गुणः ।

दुःख से लम्बी दाढ़ी बढ़ाए उसके आगे आगे चल रहे थे । बाहर से नये पहुंचे हुए सिर पर चीरा बांधे हाथियों के परिचारक हाथियों की सेवा के काम मिलने की प्रत्याशा में खुशी से दौड़ रहे थे । हाथियों को फंसाने के काम में फुसलात्रा देने वाली गणिका संज्ञक हथि- नियौँ के अधिकारी बहुत दिनों से आकर प्रतीक्षा कर रहे थे और अवसर पाकर काम में सिद्ध हथिनियों के करतब हाथ उठा कर सुनाने लगे । पल्लव के चिह्न वाले अरण्यपाल लोग नये पकड़े हुए गजयूथों को लेकर हाथ में ऊँचे अंकुश लिए कटक में उपस्थित थे । महामात्र लोग चमड़े का मरा हुआ हाथी का पुतला तैयार करके उसके द्वारा हाथियों को युद्ध की शिक्षा देते थे । नागवीथीपालों के भेजे हुए दूत अभिनव गजयूथ के संचरण की खबर देने के लिए आए हुए थे । कटक में एक एक क्षण हाथियों के लिए चारे की बाट देखने में नियुक्त झुण्ड के झुण्ड प्यादे हर गांव, नगर, मंडी में चारा संग्रह करके सूचना देते थे । स्वामी के प्रसाद से प्राप्त गजसाधनाधिकृत के पद की प्रतिष्ठा से एवं स्वाभाविक गर्वजनित गम्भीरता से वह चुपचाप होने पर आदेश देता हुआ सा लग रहा था । मानों समुद्रों को यह आज्ञा दे रहा था कि संख्यातीत हाथियों के कान में अलंकार के रूप में लटकाने के लिए शंख उत्पन्न करो। हाथियों के शृङ्गार के लिए गैरिक पंक के अंगराग के संग्रह के लिए पर्वतों को मानों लूट रहा था। दिशाओं के दिग्गजों के पद पर प्रतिष्ठित ऐरावत के अधिकार को मानों छीन रहा था। शिव के पदभार से झुके हुए कैलास पर्वत के समान भारी अपने पादन्यासों से वराहरूपधारी विष्णु के पृथिवी को उठाने से उत्पन्न गर्व को मानों कम कर रहा था । जानुभाग तक लम्बे उसके दोनों हाथ चलने से हिल रहे

षष्ठ उच्छ्वासः ३४१ नामृतरसस्वादुना नवपल्लवकोमलेन कवलेनेव श्रीकरेणुकां विलोभयन्नि- जनृपवंशदीर्घं नासावंशं दधानः, अतिस्निग्धमधुरधवलविशालतया पीत- क्षीरोदेनेव पिबन्नेक्षणयुग्मायामेन दिशामयामं मेरुतटादपि विकटवि- पुलालिकः, सततमविच्छिन्नच्छत्रच्छायाप्ररूढिवशादिव नितान्तायतनी- लकोमलच्छविसुभगेन स्वभावभङ्गुरण कुन्तलबालवल्लरीवेष्टितविलासिना लुनन्निव, लुप्तालोकानर्ककरान्बर्बरकेणारिपक्षपरिक्षयपरित्यक्तकार्मुकक- र्मोपि सकलदिगन्तश्रूयमाणगुरुगुणध्वनिः, आत्मस्थसमस्तमत्तमातङ्गसा- थे, मानों अपने दोनों ओर हाथियों को मारने के लिए पत्थर के आलानस्तम्भ गाड़ रहा था। अमृत के समान स्वादु, नवपल्लवसदृश कोमल, कुछ ऊँचे और लटके हुए अपने अधर से मानों वह श्रीकरेणुका (सिंगार-पटार से सजाई हुई हथिनी) को लुभा रहा था। उसका नासिकावंश अपने राजा के वंश के समान ही लम्बा था। मानों क्षीरसमुद्र को ही पी लेने के कारण उसकी आंखें अत्यन्त स्निग्ध, मधुर, धवल एवं विशाल थीं, जिनसे दिशाओं के आयाम को भी मानों पान करता जा रहा था। उसका ललाट मेरु के तट से भी कहीं अधिक विकट और फैला हुआ था। उसकी बबरी हमेशा छत्र की छाया में ही बढ़ते रहने से मानों अत्यन्त नील और कोमल हो गई थी। बालों के गुच्छे मजरी के समान घुमावदार थे, मानों वह उनसे सूर्यकिरणों के आलोक को भी मलिन कर रहा था। वह शत्रुओं के विनाश के लिए धनुष धारण करने का कर्म छोड़ चुका था, फिर भी समस्त दिशाओं में उसके गुणों की गम्भीर ध्वनि सुन पड़ती थी¹। मतवाले हाथियों की सेना उसके अधीन थी, फिर भी उसे मद छू भी न सका था²। वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था³। वह पार्थिव (राजा) और गुणमय था⁴। दान से भरे हाथियों पर जैसे वह १. विरोध पक्ष यह कि धनुष कर्म छोड़ देने पर दिशाओं में गुणों अर्थात् धनुष के तन्तुओं की टंकार कैसे सुन पड़ेगी ? समाहार पक्ष यह है कि उसके विनय आदि गुणों की सर्वत्र प्रसिद्धि हो गई थी। २. विरोध—मदवाले हाथी को अपने अधीन रखने पर उनके मद का स्पर्श होना स्वाभाविक है। परिहार पक्ष—मद अर्थात् गर्व ने उसका स्पर्शन नहीं किया था। ३. विरोध—जो भूतिमान् अर्थात् भस्मयुक्त है वह स्नेहमय कैसे हो सकता है ? परिहार—भूतिमान् अर्थात् वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था। ४. विरोध—पार्थिव अर्थात् घट के समान पृथिवी से जो उत्पन्न हो वह पट के समान गुणमय अर्थात् तन्तु से बना कैसे हो सकता है ? परिहार—पार्थिव अर्थात् राजा एवं गुणमय अर्थात् गुणवान् था।

३४२ हर्षचरितम् धनोऽप्यस्पृष्टो मदेन भूतिमानपि स्नेहमयः पार्थिवोऽपि गुणमयः करिणा- मिव दानवतामुपरि स्थितः, स्वामितामिव स्पृहणीयां भृत्यतामप्यपरिभू- तामुद्वहन्नेकभर्तृभक्तिनिश्चलां कुलाङ्गनामिवानन्यगम्यां प्रभुप्रसादभूमिमा- रूढः, निष्कारणबान्धवो विदग्धानाम् , अभृतभृत्यो भजताम् , अक्रीत- दासो विदुषाम् , स्कन्दगुप्तो विवेश राजकुलम् । दूरादेव चोभयकरकम- लावलम्बितं स्पृशन्मौलिना महीतलं नमस्कारमकरोत् । उपविष्टं च नातिनिकटे तं तदा जगाद देवो हर्षः—'श्रुतो विस्तर एवास्यार्यव्यतिकरस्यास्माच्चिकीर्षितस्य च । अतः शीघ्रं प्रवेश्यन्तां पचा- रनिर्गतानि गजसाधनानि । न क्षाम्यत्यतिस्वल्पमप्यार्यपरिभवपीडापावकः प्रयाणविलम्बम् ।' इत्येवमभिहितश्च प्रणम्य व्यज्ञापयत्—'कृतमवधारयतु स्वामी समादिष्टं किंतु स्वल्पं विज्ञाप्यमस्ति भर्तृभक्तेः । तदाकर्णयतु देवः । देवेन हि पुष्यभूतिवंशसंभूतस्याभिजनस्याभिजात्यस्य सहजस्य तेजसो मदो गर्वोऽपि । भूतिः संपत्, भस्म च। पार्थिवो राजा, पृथिव्यारब्धश्च । गुणास्तन्त- वोऽपि । नहि घटः पटो भवतीति विरोधः । दानं मदः, वितरणं च । प्रचारो भक्षणम् । गजसाधनानि करिसैन्यानि । अभिषङ्गा अभिभवाः । शासन करता था उसी प्रकार दानियों में भी सबसे ऊपर रहने वाला था। अपनी स्वामिता के समान स्पृहणीय और कभी अभिभूत न होने वाली भृत्यता को धारण कर रहा था। कुलांगना के समान एक ही पति में निश्चल भक्ति रखने वाली और किसी दूसरे का गमन न करनेवाली अपने स्वामी की प्रसन्नता उसे उपलब्ध थी। वह विदग्ध लोगों का अकारण बन्धु था, सेवा करने वालों का अवैतनिक भृत्य था, और विद्वानों का भी बिना वेतन का दास था। उसने दूर ही से अपने दोनों कर-कमलों का अवलम्बन लेकर मस्तक से पृथिवी का स्पर्श करते हुए नमस्कार किया। स्कन्दगुप्त सम्राट् के कुछ दूर बैठ गया। तब देव हर्ष ने उससे कहा—'आर्य के हत्याकाण्ड के बारे में तथा हमने जो निश्चय किया है वह आपने विस्तार से सुन लिया होगा। अतः शीघ्र ही चरने के लिए बाहर गई हुई गजसेना को स्कन्धावार में लौटने की आज्ञा दी जाय। आर्य की हत्या से उत्पन्न कष्ट के कारण मैं क्षण भर भी शत्रु पर धावा बोलने में विलम्ब सह नहीं सकता।' हर्ष के ऐसा कहने पर स्कन्दगुप्त ने प्रणाम करके निवेदन किया—'देव, आपने जो आज्ञा दी है उसे पूरी ही समझें, किन्तु स्वामी के प्रति भक्ति के कारण थोड़ा-सा मेरा निवेदन है। कृपया देव उसे सुनें। देव ने जो यह

षष्ठ उच्छ्वासः ३४३ दिक्करिकरप्रलम्बस्य बाहुयुगलस्यासाधारणस्य च सोदरस्नेहस्य सर्वं सह- शमुपक्रान्तम्। काकोदराभिधानाः कृपणाः कृमयोऽपि न मृष्यन्ति निकारं किमुत भवादृशास्तेजसां राशयः। केवलं देवराज्यवर्धनोदन्तेन कियदपि दृष्टमेव देवेन दुर्जनदौरात्म्यम्। ईदृशाः खलु लोकस्वभावाः प्रतिग्रामं प्रतिनगरं प्रतिदेशं प्रतिद्वीपं प्रतिदिशं च भिन्ना वेशाश्चाकाराश्चाहाराश्च ठ्याहाराश्च व्यवहाराश्च जनपदानाम्। तदियमात्मदेशाचारोचिता स्वभा- वसरलहृदयजा त्यज्यतां सर्वविश्वसिता। प्रमाददोषाभिषङ्गेषु श्रुतबहुवार्त एव प्रतिदिनं देवः। यथा नागकुलजन्मनः सारिकाश्रावितमन्त्रस्यासीन्नाशो नागसेनस्य पद्मावत्याम्। शुकश्रुतरहस्यस्य च श्रीरशोर्यत श्रुतवर्मणः श्रावस्त्याम्। स्त्रप्रायमानस्य च मन्त्रभेदोऽभून्मृत्यवे मृत्तिकावत्यां सुवर्ण- चूडस्य। चूडामणिगलम्लेखप्रतिबिम्बवाचिताक्षरा च चारुचामीकरचामर- प्रियममिति। उपक्रान्तं निदर्शयितुमाह-यथेति। अत्र कथा-नागसेननामा पद्मावत्यां राजा मन्त्रिणमर्धराज्यहरमपाकतुं शारिकासमक्षं मन्त्रमकरोत्। स चापि मन्त्री शारिकामुखाद्विज्ञाय विस्रम्भपूर्वकं तं दण्डेनावधीदिति। श्रावस्त्यां च श्रुतवर्मा पूर्ववच्छुकश्रावितमन्त्रो राज्याच्च्युत्याव। अनेन च गूढमन्त्रेण यत्ना- द्वाव्यमित्युक्तम्। मृत्तिकावत्यां सुवर्णचूडो नाम राजा कंचिद्विस्रम्भपूर्वकं जिघृक्षन्मन्त्रितवांस्तदेव तस्मै विललास। ततस्तत्पूर्वं तत्प्रयुक्तेन विश्वासिना शिरो- रक्षकेण स्वस्वामिप्रयुक्तेन व्यापादित इति। अनेन च कुलस्वभावाद्यपरीक्ष्य न उपक्रम किया है वह पुष्पभूति के वंश में उत्पन्न होने वाले आपके और परम्परागत आपके तेज के एवं दिग्गज को सूँड के समान लम्बी आपकी भुजाओं और सहोदर भाई के प्रति आपके असाधारण स्नेह के सर्वथा अनुकूल है। बेचारे साँप जैसे कीड़े भी जब अपना परिभव नहीं सहन कर पाते तो आपके जैसे तेजस्वियों की बात क्या ? केवल आपने देव राज्यवर्धन के इस वृत्तान्त से दुर्जनों के अत्याचार को कुछ ही देखा। निश्चय ही अब के लोगों के ऐसे स्वभाव हैं जो कि प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक नगर, प्रत्येक द्वीप और प्रत्येक दिशा में सारे जनपदों के भिन्न भिन्न आकार, भिन्न-भिन्न आहार, भिन्न- भिन्न बातचीत एवं व्यवहार हो गए हैं। अतः स्वभाव से ही सरल हृदय होने के कारण अपने देश के अनुकूल सब पर विश्वास कर लेने की भावना का परित्याग करें। प्रतिदिन देव ने प्रमाद दोष से राजाओं पर आने वाली विपत्तियों के सम्बन्ध में बहुत कुछ सुना ही है। जैसा कि पद्मावती नगरी के नागवंशी राजा का नाश सारिका के गुप्त विचार देने पर (उसी का आधा राज्य हड़प कर बैठे हुए मंत्री द्वारा) हो गया। श्रावस्ती के राजा

३४४ हर्षचरितम् ग्राहिणी यमतां ययौ यवनेश्वरस्य । लोभबहुलं च बहुलनिशि निधानमु- त्खनन्तमुत्खातखङ्गप्रमाथिनी ममन्थ माथुरं बृहद्रथं विदूरथवरूथिनी । नागवनविहारशीलं च मायामातङ्गाङ्गान्निर्गता महासेनसैनिका वत्सपतिं न्ययंसिषुः । अतिदयितलास्यस्य च शैलूषमध्यमध्यास्य मूर्धानमसिलतया मृणालमिवालुनादग्निमित्रात्मजस्य सुमित्रस्य मित्रदेवः । प्रियतन्त्रीवाद्य- स्यालाबुवीणाभ्यन्तरसुषिरनिहितनिशिततरवारयो गान्धर्वच्छलात्तच्छद्मानः कार्यों भृत्य इत्युक्तम् । यवनेश्वरः केनचिच्छत्रुणासाद्य व्यापादितुमिष्टः । स्वसुहृदा शत्रुप्रहितलेखेन बोधितः । लेखपृष्ठे च तेन लिखितम् 'स्वयं वाचयितव्यो लेख' इति । ततो यवनेश्वरस्य स्वयं वाचयतश्चूडामणिप्रतिबिम्बितान्यक्षराणि वाचयित्वा तत्प्रहिता चामरग्राहिणी प्रभवे निवेद्य तदाज्ञया तं जघानेति । अनेन सूक्ष्मोऽपि रहस्यभेदहेतू रक्षणीय इत्युक्तम् । विदूरथप्रयुक्तेन नरेन्द्रवृन्दप्रतारितो बृहद्रथो नाम राजा लोभवशात्खन्यवादे कृष्णनिशि प्रवृत्तस्तत्सेनया प्रहत इति । अतः प्रवर्तितव्यमित्युक्तम् । महासेनो नामोज्जयिनीपतिः स्वदुहितरं वासवदत्ता- ख्यामुदयनाय दित्सुः कपटजं नागं वीध्यां प्रसह्य छद्मप्रहितैः शरैर्नामगुणान्प्रख्या- श्रुतवर्मा का राज्य भी सुग्गे के द्वारा रहस्य की बात जान लेने पर हाथ से चला गया । मृत्तिकावती के राजा सुवर्णचूड़ का निद्रा की अवस्था में बड़बड़ाने से हुआ मंत्रभेद ही उसकी मृत्यु का कारण बना । शत्रु के द्वारा रहस्य जानने के लिए भेजी हुई चामरग्राहिणी बाचते समय चूड़ामणि में प्रतिबिम्बित मित्र का गुप्त लेख पढ़कर यम के रूप में यवनेश्वर की हत्या का कारण बन गई । राजाओं के बहकाने पर अँधेरी रात में जमीन से रत्न का खजाना उखाड़ते हुए अत्यन्त लोभी मथुरा के राजा बृहद्रथ को विदूरथ की सेना ने तलवार खींच कर मार डाला । उज्जयिनी के राजा महासेन के मायाहस्ती के शरीर में छिपे हुए सैनिकों ने वत्सराज को नागबन में बिहार के लिए छल से ले जाकर मार डाला । मित्रदेव ने नट का भेस बनाकर नृत्य के शौकीन अग्निमित्र के पुत्र सुमित्र का सिर मृणाल के समान कतर दिया । शत्रु के पुरुषों ने संगीत सीखने के बहाने कपट से शिष्य का भेस बनाकर संगीत के प्रेमी अश्मक के राजा शरभ का सिर वीणा के भीतर छिपाकर रखी हुई तलवारों से काट डाला । अनार्य सेनापति पुष्पमित्र ने सेना को देखने के बहाने सारे सैनिकों को मिलाकर प्रजा में दुर्बल अपने स्वामी मौर्य राजा बृहद्रथ को समाप्त कर डाला । नये आविष्कारों में कुतूहल रखने वाला चण्डीपति युद्ध में हारे यवनों के द्वारा निर्मित आकाश में उड़ने वाले यंत्रयान से जाने कहाँ पहुँचा दिया गया । अचरज की बातों में कुतूहल दिखाने वाला शिशु नागपुत्र काकवर्ण युद्ध में जीतकर आए हुए यवन से निर्मित

षष्ठ उच्छ्वासः ३४५ चिच्छिदुरश्मकेश्वरस्य शरभस्य शिरो रिपुपुरुषाः । प्रज्ञादुर्बलं च बल- दर्शनव्यपदेशदर्शिताशेषसैन्यः सेनानीरनार्यो मौर्यं बृहद्रथं पिपेष पुष्प- मित्रः स्वामिनम् । आश्चर्यकुतूहली च दण्डोपनतयवननिर्मितेन नभस्तलयायिना यन्त्रयानेनानीयत कापि काकवर्णः शैशुनागिश्च नगरो- पकण्ठे कण्ठे निचकृते निस्त्रिंशेन । अतिस्त्रीसङ्गरतमङ्गपरवशं शुङ्गम- मात्यो वसुदेवो देवभूतिदासीदुहित्रा देवीव्यञ्जनया वीतजीवितमकारयत् । असुरविवरव्यसनिनं चापजहुरपरिमितरमणीमणिनूपुरझणझणाह्लादरम्य- या मागधं गोधनगिरिसुरुङ्गया स्वविषयं मेकलाधिपमन्त्रिणः । महाकाल- महे च महामांसविक्रयवादवातूलं वेतालस्तालजङ्घो जघान जघन्यजं प्योदयनं लोभितवान्। सोऽप्यविचार्यैव गजग्रहग्राहिकया कतिपयाप्तपरिवारो घोषवतीं वीणामादाय तत्र गतः कपटकुञ्जरान्तर्गतैर्महासेन सैनिकैः संहृत इति । अतो नाल्पपरिवारैः संवीथ्य च विस्रब्धैर्भाव्यमित्युक्तम् । सुमित्रो राजा मित्र- व्यसनी स्त्रीजनपरिवार इव नटजने विस्रब्धो मित्रदेवेन नटत्वमाश्रित्य हतः । स च योगचूर्णार्वाच्चूर्णितस्तिरोहितो बभूवेति । अतो व्यसनिभिः प्रकृतलोक- विश्वासिभिश्च न भाव्यमित्युक्तम् । शरभोऽतिशयितान्वाद्यवतः प्रवेशमदादिति गुहायुद्धै रिपुपुरुषैर्हत इति । अतो मनागपि व्यसनं वर्जनीयमित्युक्तम् । अका- र्यमत्र परदारागमनादि । तरवारिरेकधारः खड्गः । प्रज्ञेत्यादि स्पष्टा कथा । अनेन च भृत्यबलदर्शनमसंनद्धैर्न कार्यमित्युक्तम् । मौर्यमिति गोत्रनाम । काकवर्णो यवनान्विजित्य तैश्च स्वपुरुषानुपायनीकृत्य यन्त्रयानैस्तद्दत्तैः परदारादीनाच्छुन्न्य- वनैरात्मदेशं प्रापय्य निहत इति । अतः शत्रुप्रामृतेषु भृत्येषु न विश्वसनीयमि- त्युक्तम् । देवीव्यञ्जनया महिषीव्याजया । मेकलाधिपमन्त्रिभिर्वांतिकच्छद्मभिरहि- विवरं साधितम् । तपसास्माभिरित्युक्त्वा मागधो गुहाद्वारप्रतिद्वारैर्बद्धोऽभूत् । गोधनगिरिः सूर्याख्यः पर्वतः । सुरुङ्गा विवरम् । मेकलो विन्ध्याद्रिः । मह आकाशगामी यंत्रयान में उड़ाकर कहीं दूर किसा नगर नामक राजधानी के बाहर ले जाया गया और वहाँ तलवार से उसका कंठ काट दिया गया । अमात्य वसुदेव ने स्त्रियों के साथ दिन-रात रहने वाले कामी राजा शुंग को देवभूत की दासी की पुत्री को रानी के भेष में भेजकर मरवा डाला । मेकलाधिप के सचिव पातालदर्शन के प्रेमी मगधराज को अनेक सुन्दरियों के मणिनूपुर की आवाज से गूंजते हुए गोवर्धन पर्वत के सुरंग मार्ग से अपने देश में हरकर ले गए । पुणिक के पुत्र प्रद्योत के छोटे भाई कुमारसेन को जब वह महाकाल के उत्सव में महामांस विक्रय के सम्बन्ध में वाद विवाद कर रहा था,

कोई OCR पाठ नहीं।

षष्ठ उच्छ्वासः ३४७ चन्द्रगुप्तः शकपतिमशातयदिति । प्रमत्तानां च प्रमदाकृता अपि प्रमादाः श्रुतिविषयमागता एव देवस्य । यथा मधुमोचितमधुरकसंलिप्तैर्लाजैः सुप्रभा पुत्रराज्यार्थं महासेनं काशिराजं जघान । व्याजजनितकंदर्पदर्पा च दर्प- णेन क्षुरधारापर्यन्तेनायोध्याधिपतिं परंतपं रत्नवती जारूध्यम् , विष- चूर्णचुम्बितमकरन्देन च कर्णेन्दीवरेण देवकी देवरानुरक्ता देवसेनं सौह्मथम्, योगपरागविरसवर्षिणा च मणिनूपुरेण वल्लभा सपत्नीरुषा वैरन्त्या रन्तिदेवम्, वेणीविनिगूढेन च शस्त्रेण बिन्दुमती वृष्णिं विदूर- थम्, रसदिग्धमध्येन च मेखलामणिना हंसवती सौवीरं वीरसेनम्, अदृश्यागदविलिप्तवदना च विषवारुणीगण्डूषपायनेन पौरवी पौरवेश्वरं सोमकम् ।' इत्युक्त्वा विरराम स्वाम्यादेशसंपादनाय च निर्जगाम । देवोऽपि हर्षः सकलराज्यस्थितीश्चकार । ततश्च तथा कृतप्रतिज्ञे प्रयाणं विजयाय दिशां समादिशति देवे हर्षे गतायुषां प्रतिसामन्ताना- इति । मधुरकं विषम् । परंतपं प्रतापवन्तम् । जारूध्यमिति जघानेति प्राक्तन्येव क्रियोत्तरत्र च । चूर्णो विषक्षोदः । मकरन्दः पुष्परसः । देवरः कनीयान्भ्राता भर्तुः । योगपरागोऽभिचारचूर्णम् । वैरन्ती नाम नगरी । रसदिग्धं विषोपलिप्तम् । अगदो विषहरद्रव्यसमूहः । वारुणी सुरा । उत्पन्न विपत्तियों के विषय में सुना ही है। जैसा कि सुप्रभा ने पुत्र को राज्य प्राप्त होने के लिए काशिराज महासेन को मध के साथ लावा में विष मिलाकर मार डाला। रत्नवती ने छल से कामवेग को उत्पन्न करके अयोध्या के प्रतापी राजा जारूध्य को छुरे की धार के समान चोखे दर्पण से मार डाला। देवर से फँसी हुई देवकी ने सुह्म के राजा देवसेन को कर्णोत्पल में मकरन्द के रूप में विष का चूर्ण मिलाकर मार डाला। वैरन्त के राजा रन्तिदेव को उसकी रानी ने सौत डाह के कारण अपने मणिनूपुर में जादू-टोना का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करके समाप्त कर दिया । बिन्दुमती ने अपने केशपाश में छिपाए शस्त्र के द्वारा वृष्णि विदूरथ की हत्या की। सौवीर के राजा वीरसेन को रानी हंसवती ने मेखला की मणियों में विष का लेप करके मार डाला। पौरव राजा सोमक को उसकी रानी ने पहले अपने मुँह में विष के प्रभाव को हर लेने वाले औषध को मुँह में लगाकर फिर अपने मदिरा के जहरीले गण्डूष से मार डाला।' यह कहकर स्कन्दगुप्त स्वामी के आदेश का विधिवत् सम्पादन करने के लिए उठकर बाहर चला गया। इधर देव हर्ष ने भी राज्य की सारी स्थिति ठीक की। जब देव हर्ष ने उस प्रकार कृतप्रतिज्ञ होकर फिर दिग्विजय के लिए सैनिक प्रयाण करने की आज्ञा दी, तभी काल से घिरे शत्रु-सामन्तों के घरों में दुर्निमित्त होने लगे। यमराज के दूतों की दृष्टि की तरह