भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 506 में से

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पृष्ठ 394

षष्ठ उच्छ्वासः ३४७ चन्द्रगुप्तः शकपतिमशातयदिति । प्रमत्तानां च प्रमदाकृता अपि प्रमादाः श्रुतिविषयमागता एव देवस्य । यथा मधुमोचितमधुरकसंलिप्तैर्लाजैः सुप्रभा पुत्रराज्यार्थं महासेनं काशिराजं जघान । व्याजजनितकंदर्पदर्पा च दर्प- णेन क्षुरधारापर्यन्तेनायोध्याधिपतिं परंतपं रत्नवती जारूध्यम् , विष- चूर्णचुम्बितमकरन्देन च कर्णेन्दीवरेण देवकी देवरानुरक्ता देवसेनं सौह्मथम्, योगपरागविरसवर्षिणा च मणिनूपुरेण वल्लभा सपत्नीरुषा वैरन्त्या रन्तिदेवम्, वेणीविनिगूढेन च शस्त्रेण बिन्दुमती वृष्णिं विदूर- थम्, रसदिग्धमध्येन च मेखलामणिना हंसवती सौवीरं वीरसेनम्, अदृश्यागदविलिप्तवदना च विषवारुणीगण्डूषपायनेन पौरवी पौरवेश्वरं सोमकम् ।' इत्युक्त्वा विरराम स्वाम्यादेशसंपादनाय च निर्जगाम । देवोऽपि हर्षः सकलराज्यस्थितीश्चकार । ततश्च तथा कृतप्रतिज्ञे प्रयाणं विजयाय दिशां समादिशति देवे हर्षे गतायुषां प्रतिसामन्ताना- इति । मधुरकं विषम् । परंतपं प्रतापवन्तम् । जारूध्यमिति जघानेति प्राक्तन्येव क्रियोत्तरत्र च । चूर्णो विषक्षोदः । मकरन्दः पुष्परसः । देवरः कनीयान्भ्राता भर्तुः । योगपरागोऽभिचारचूर्णम् । वैरन्ती नाम नगरी । रसदिग्धं विषोपलिप्तम् । अगदो विषहरद्रव्यसमूहः । वारुणी सुरा । उत्पन्न विपत्तियों के विषय में सुना ही है। जैसा कि सुप्रभा ने पुत्र को राज्य प्राप्त होने के लिए काशिराज महासेन को मध के साथ लावा में विष मिलाकर मार डाला। रत्नवती ने छल से कामवेग को उत्पन्न करके अयोध्या के प्रतापी राजा जारूध्य को छुरे की धार के समान चोखे दर्पण से मार डाला। देवर से फँसी हुई देवकी ने सुह्म के राजा देवसेन को कर्णोत्पल में मकरन्द के रूप में विष का चूर्ण मिलाकर मार डाला। वैरन्त के राजा रन्तिदेव को उसकी रानी ने सौत डाह के कारण अपने मणिनूपुर में जादू-टोना का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करके समाप्त कर दिया । बिन्दुमती ने अपने केशपाश में छिपाए शस्त्र के द्वारा वृष्णि विदूरथ की हत्या की। सौवीर के राजा वीरसेन को रानी हंसवती ने मेखला की मणियों में विष का लेप करके मार डाला। पौरव राजा सोमक को उसकी रानी ने पहले अपने मुँह में विष के प्रभाव को हर लेने वाले औषध को मुँह में लगाकर फिर अपने मदिरा के जहरीले गण्डूष से मार डाला।' यह कहकर स्कन्दगुप्त स्वामी के आदेश का विधिवत् सम्पादन करने के लिए उठकर बाहर चला गया। इधर देव हर्ष ने भी राज्य की सारी स्थिति ठीक की। जब देव हर्ष ने उस प्रकार कृतप्रतिज्ञ होकर फिर दिग्विजय के लिए सैनिक प्रयाण करने की आज्ञा दी, तभी काल से घिरे शत्रु-सामन्तों के घरों में दुर्निमित्त होने लगे। यमराज के दूतों की दृष्टि की तरह

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