भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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३४८ हर्षचरितम्

मुदवसितेषु बहुरूपाण्युपलिङ्गानि बितेनिरे । तथा ह्यविप्रकृष्टाः कालदूतदृ- ष्टय इवेतस्ततश्चेरुश्चटुलाः कृष्णशारश्रेणयः । प्रचलितलक्ष्मीनूपुरप्रणाद- प्रतिमा मधुसरघासंघातझंकारा जह्लादिरे । चिरं विवृतविकृतवदनविव- रविनिःसृतवह्नित्रिसरा वासरेऽपि विरसं विरेसुश्चिरमशिवार्यमशिवाः शिवाः । शवपिशितप्ररूढप्रसरा इव कपिपोतकपोलकपिलपक्षतयः कानन- कपोताः पेतुः । आमन्त्र्यमाणा इव दधुरकालकुसुमानि सममुपवनतरवः । तरलकरतलप्रहारप्रहतपयोधरा रुरुदुः प्रसभं सभाशालभञ्जिकाः । ददृशु- रासन्नकचग्रहभयोद्भ्रान्तोत्तमाङ्गभिवात्मानं कबन्धमात्रशोदर्येषु योधाः । चूडामणिषु चक्रशङ्खकमललक्ष्मणः प्रादुरभवन्पादन्यासा राजमहिषी- णाम् । चेटीचामराण्यकस्मादधावन्त पाणिपल्लवात् । प्रणयकलहेऽपि दत्तपृष्ठाश्चिरमभवन्भटाः पराङ्मुखा मानिनीनाम्, करिकपोलेषु व्यघ- टन्त मधुलिहां मधुमदिरापानगोष्ठ्यः । समाघ्रातयममहिषगन्धा इव ताम्यन्तः स्तम्बकरिमपि हरयो हरितं नवयवसं न चेरुः । चलवलयावली- वाचालबालिकातालिकातोद्यलालिता अपि न ननृतुर्मन्दा मन्दिरमयूराः । निशि निशि रजनिकरहरिणनिहितनयन इवोन्मुखस्तारमुपतोरणमकारण-

उदवसितेषु गृहेषु । उपलिङ्गान्यनिमित्तानि । सरघा मधुमक्षिकाः । कानन- कपोता गृध्राः । व्यघटन्त आसन् । स्तम्बकरिं बद्धस्तम्बम्, पक्वं वा । हरयो

काले-काले चंचल हिरन कुछ ही दूर पर इधर उधर मँडराने लगे । मधु मक्खियों चलती हुई लक्ष्मी के नूपुर की आवाज के समान भनभनाने लगीं। देर तक दिन में भी अमंगल सियारियों जिनके मुँह के फाड़ने से आग की चिनगारी निकलती रहती है, अशुभ और कटु आवाज में चिल्कारने लगीं। बन्दर के कपोल की तरह लाल पंखों वाले जंगली कबूतर मुर्दे के मांस की चाह से घरों पर बैठने लगे। उपवन के वृक्ष मानों परस्पर विचार करके असमय में पुष्प से भरने लगे। सभास्थान के खम्भों पर बनी हुई साल- भंजिकाएँ स्तनों पर हाथ पीट-पीटकर जोर से रोने लगीं। योद्धा लोग हर्ष के सैनिकों द्वारा निकट भविष्य में होने वाले कचग्रह के भय से सिर में उत्पन्न चक्कर के कारण दर्पण में अपना ही सिर धड़ से अलग होते हुए देखने लगे। राजमहिषियों की चूड़ामणि में हर्ष के शंख, चक्र और कमल के चिह्नों वाले पैर के निशान प्रकट होने लगे । चेटियों के हाथ से अकस्मात् चँवर छूट कर गिरने लगे। भट लोग प्रणय के कलह में भी मानिनियों के सामने पीठ दिखाकर देर तक पराङ्मुख हो गए। हाथियों के गण्डस्थल में भौरों का मदपान बन्द हो गया। घोड़ों ने मानों यमराज के महिष की गन्ध से हरे धान का खाना छोड़ दिया। झन-झन कंकण पहने हुए बालिकाओं के ताल देकर नाचने पर भी