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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

३४८ हर्षचरितम्

मुदवसितेषु बहुरूपाण्युपलिङ्गानि बितेनिरे । तथा ह्यविप्रकृष्टाः कालदूतदृ- ष्टय इवेतस्ततश्चेरुश्चटुलाः कृष्णशारश्रेणयः । प्रचलितलक्ष्मीनूपुरप्रणाद- प्रतिमा मधुसरघासंघातझंकारा जह्लादिरे । चिरं विवृतविकृतवदनविव- रविनिःसृतवह्नित्रिसरा वासरेऽपि विरसं विरेसुश्चिरमशिवार्यमशिवाः शिवाः । शवपिशितप्ररूढप्रसरा इव कपिपोतकपोलकपिलपक्षतयः कानन- कपोताः पेतुः । आमन्त्र्यमाणा इव दधुरकालकुसुमानि सममुपवनतरवः । तरलकरतलप्रहारप्रहतपयोधरा रुरुदुः प्रसभं सभाशालभञ्जिकाः । ददृशु- रासन्नकचग्रहभयोद्भ्रान्तोत्तमाङ्गभिवात्मानं कबन्धमात्रशोदर्येषु योधाः । चूडामणिषु चक्रशङ्खकमललक्ष्मणः प्रादुरभवन्पादन्यासा राजमहिषी- णाम् । चेटीचामराण्यकस्मादधावन्त पाणिपल्लवात् । प्रणयकलहेऽपि दत्तपृष्ठाश्चिरमभवन्भटाः पराङ्मुखा मानिनीनाम्, करिकपोलेषु व्यघ- टन्त मधुलिहां मधुमदिरापानगोष्ठ्यः । समाघ्रातयममहिषगन्धा इव ताम्यन्तः स्तम्बकरिमपि हरयो हरितं नवयवसं न चेरुः । चलवलयावली- वाचालबालिकातालिकातोद्यलालिता अपि न ननृतुर्मन्दा मन्दिरमयूराः । निशि निशि रजनिकरहरिणनिहितनयन इवोन्मुखस्तारमुपतोरणमकारण-

उदवसितेषु गृहेषु । उपलिङ्गान्यनिमित्तानि । सरघा मधुमक्षिकाः । कानन- कपोता गृध्राः । व्यघटन्त आसन् । स्तम्बकरिं बद्धस्तम्बम्, पक्वं वा । हरयो

काले-काले चंचल हिरन कुछ ही दूर पर इधर उधर मँडराने लगे । मधु मक्खियों चलती हुई लक्ष्मी के नूपुर की आवाज के समान भनभनाने लगीं। देर तक दिन में भी अमंगल सियारियों जिनके मुँह के फाड़ने से आग की चिनगारी निकलती रहती है, अशुभ और कटु आवाज में चिल्कारने लगीं। बन्दर के कपोल की तरह लाल पंखों वाले जंगली कबूतर मुर्दे के मांस की चाह से घरों पर बैठने लगे। उपवन के वृक्ष मानों परस्पर विचार करके असमय में पुष्प से भरने लगे। सभास्थान के खम्भों पर बनी हुई साल- भंजिकाएँ स्तनों पर हाथ पीट-पीटकर जोर से रोने लगीं। योद्धा लोग हर्ष के सैनिकों द्वारा निकट भविष्य में होने वाले कचग्रह के भय से सिर में उत्पन्न चक्कर के कारण दर्पण में अपना ही सिर धड़ से अलग होते हुए देखने लगे। राजमहिषियों की चूड़ामणि में हर्ष के शंख, चक्र और कमल के चिह्नों वाले पैर के निशान प्रकट होने लगे । चेटियों के हाथ से अकस्मात् चँवर छूट कर गिरने लगे। भट लोग प्रणय के कलह में भी मानिनियों के सामने पीठ दिखाकर देर तक पराङ्मुख हो गए। हाथियों के गण्डस्थल में भौरों का मदपान बन्द हो गया। घोड़ों ने मानों यमराज के महिष की गन्ध से हरे धान का खाना छोड़ दिया। झन-झन कंकण पहने हुए बालिकाओं के ताल देकर नाचने पर भी

षष्ठ उच्छ्वासः ३४६ मकार्णीत्कौलेयकगणः । गणयन्तीव गतायुषस्तर्जनतरलया तर्जन्या दिव- समाटवाटकेषु कोटवी । कुट्टिमेषु कुटिलहरिणखुरवेणीतरङ्गिण्यश्च शष्प- राजयोऽजायन्त । जनितवेणीबन्धामि निरञ्जनरोचनारोचींषि चषकमधुनि मुखकमलप्रतिबिम्बान्यदृश्यन्त भटीनाम् । समासन्नात्मापहारचकिता इव चकम्पिरे भूमयः । वध्यालंकाररक्तचन्दनरसच्छटा इवालक्ष्यन्त शूराणां पतिताः शरीरेषु विकसितबन्धूककुसुमशोणितशोचिषः शोणितवृष्टयः । पर्यग्नीकुर्वाणा इव विनश्वरीं श्रियमविरलस्फुरत्स्फुलिङ्गाङ्गारोद्गारदग्धतारा- गणा गणशः पतन्तः प्रज्वलन्तो न व्यरंसिषुरुल्कादण्डाः । प्रथममेव प्रति- हारीवापहरन्ती प्रतिभवनं चामरातपत्रव्यजनानि परुषा बभ्राम वात्येति । इति श्रीबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते राजप्रतिज्ञावर्णनं नाम षष्ठ उच्छ्वासः । हयाः । अकार्णीद्ध्वान । कौलेयकाः श्वानः । आट बभ्राम । कोटवी नग्ना स्त्री । शष्पं बालतृणम् । बन्धूकं बन्धुजीवः । अपरिगताग्निं परिगताग्निं कुर्वाणाः । अग्नौ समन्तात्क्षिपन्तः । व्यरंसिपुर्निववृतिरे ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते षष्ठ उच्छ्वासः । मन्दिरमयूरों ने नाचना छोड़ दिया। हर रात में मुंह उठाकर मानों चन्द्रमा के हिरन की ओर आँख लगाए कुत्ते तोरण के समीप बिना कारण ही जोर से रोने लगे। मार्गों में नंगी स्त्रो चंचल तर्जनी से मरने वालों की मानों गणना करती हुई चक्कर लगाती दिखाई पड़ी। राज भवन के कुट्टिमों में टेढ़े हरिण के खुर के समान तरङ्ग मरी घास लहराने लगी। योद्धाओं की स्त्रियों के मुख का जो प्रतिबिम्ब मधुपात्र में पड़ता था उसमें विधवाओं जैसी एक वेणी और अञ्जन से रहित गोगोचना के समान पीली आँखें दिखाई पड़ने लगीं। निकट में होने वाले अपने हरण से मानों चकित होकर भूमि काँपने लगी। वीरों के शरीर पर पड़े हुए खिले बन्धूकपुष्प के समान लाल खून के छींटे वधदण्ड प्राप्त होने पर लगाए गए चन्दन के समान दिखाई पड़ने लगे। दिशाओं में चारों ओर मानों नाशावस्था को प्राप्त श्री को घेर कर निरन्तर निकलती हुई चिनगारियों से तारों को जलाती हुई उल्काएँ बार-बार गिरने लगीं। भयंकर हवा प्रतीहारी के समान सबके चँवर, छत्र और व्यजन का अपहरण करती हुई प्रत्येक घर को झकझोरने लगी। हर्षचरित षष्ठ उच्छ्वास समाप्त।

सप्तम उच्छ्वासः अङ्गनवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम् । वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य ॥१॥ धृतधनुषि बाहुशालिनि शैला न नमन्ति यत्तदाश्चर्यम् । रिपुसंज्ञकेषु गणना कैव वराकेषु काकेषु ॥२॥ अथ व्यतीतेषु च केषुचिद्दिवसेषु मौहूर्तिकमण्डलेन शतशः सुगणिते सुप्रशस्तेऽहनि दत्ते चतसृणामपि दिशां विजययोग्ये दण्डयात्रालग्ने, सलिलमोक्षविशारदैः शारदैरिवाम्भोधरैः कालधौतैः शातकौम्भैश्च कुम्भैः स्नात्वा विरचय्य परमया भक्त्या भगवतो नीललोहितस्यार्चामुदर्चिषं हुत्वा प्रदक्षिणावर्तशिखाकलापमाशुशुक्षणिं, दत्त्वा द्विजेभ्यो रत्नवन्ति अङ्गनेत्यादिनोद्योगितां सूचयति । शूरा हि स्वशौर्यमात्रेणावर्जितत्रिभुवनाधि- पत्याः, नतु तेषां सामग्र्यन्तरप्रयोजनम् । तथा चाह—‘कृतप्रयत्नस्य वीरस्य सर्वा भूरङ्गनवेदी’त्यनःयासेनाक्रमणादनेनेदमपि प्रतिज्ञितम् । कदाचित्कश्चिद्ब्रूयादभि- मानान्मोहाद्वेत्यं हर्षेण प्रतिज्ञातम् । अन्यथा गिरिगुहादौ पलायितं हर्षः कथं परिभवेत् । कथं च बहुपालितामुर्वीमेको जयेदिति । तन्न । यतोऽङ्गनवेदीत्यादि । नन्वेवमपि तत्तुल्यो वीरो न भवेदित्याह—धृतेत्यादि । अथत्यादौ । भवनान्निर्जगामेति संबन्धः । मौहूर्तिका गणकाः । दण्डश्चतुरङ्ग- बलम् । तस्य यात्रा गमनम् । तत्र लग्नो मेषादिस्तस्मिन् । विशारदैः प्रवीणैः, शुक्लैश्र्व । कालधौतैः, कालवशेन धौतैश्च । शातकौम्भैः सौवर्णैः । नीललोहितोऽसि- जब वीर पुरुष प्रतिज्ञा कर लेता है तब उसके सामने पृथिवी क्या है ? आँगन की एक वेदी है, समुद्र क्या है ? एक पनाला मात्र है, पाताल क्या है ? एक स्थली है और सुमेरु क्या है ? मिट्टी का ( कीटनिर्मित ) एक टीला मात्र है । बाहुवीर्यशाली वीर के धनुष उठा लेने पर पर्वत जो नहीं झुक जाते यही आश्चर्य होता है, अन्यथा शत्रु नामधारी वराक कौवों की गणना ही क्या ? कुछ दिन बीत गए । हर्ष के ज्योतिषियों ने बड़ी मेहनत से गणना करके शुभ मुहूर्त निकाला और चारों दिशाओं की विजय के लिए दण्डयात्रा के योग्य लगन दे दिया । तब हर्ष ने शरत्कालीन मेघों के समान जल बरसाने वाले चाँदी और सोने के कुम्भों से स्नान किया । भगवान् शंकर की परम भक्ति से पूजा की । दक्षिणावर्त शिखाओं की प्रज्वलित अग्नि में हवन किया । रत्न से भरे हजारों चाँदी और सोने से भरे हजारों

सप्तम उच्छ्वासः ३५१ राजतानि जातरूपमयानि च सहस्रशस्तिलपात्राणि कनकपत्रलतालंकृत- शफशृङ्गशिखरा गाश्चार्बुदशः, समुपविश्य विततव्याघ्रचर्मणि भद्रासने विलिप्य प्रथमविलिप्तायुधो निजयशोधवलेनाचरणनश्चन्दनेन शरीरं, परिधाय राजहंसमिथुनलक्ष्मणी सदृशे दुकूले, परमेश्वरचिह्नभूतां शशि- कलामिव कल्पयित्वा सितकुसुममुण्डमालिकां शिरसि नीत्वा, कर्णाभरण- मरकतमयूखमिव कर्णगोचरतां गोरोचनाच्छुरितमभिनवं दूर्वापल्लवं विन्यस्य सह शासनवलयेन गमनमङ्गलप्रतिसरं प्रकोष्ठे परिपूजितप्रहृष्ट- पुरोहितकरप्रकीर्यमाणशान्तिसलिलसीकरनिकराभ्युक्षितशिराः संप्रेष्य म- हार्हाणि वाहनानि बहलरत्नालोककलितककुम्भि च भूषणानि भूभुजां संवि- भज्य क्लिष्टकार्पटिककुलपुत्रकलोकमोचितैः प्रसाददानैश्च विमुच्य बन्ध- नानि सकलानि नियुज्य तत्कालस्मरणस्फुरणेन कथितात्मानमिव चाष्टा- तरङ्गः । आशुशुक्षणिमग्निम् । राजतानि रौप्यानि । जातरूपं सुवर्णम् । पत्रलता पत्रभङ्गः । शफाः खुराः । अर्बुदं दशकोटयः । नृपासनं भद्रासनम् । उक्तं च— 'नृपासनं भद्रासनं, सिंहासनं तु तद्धैम'मिति । परमेश्वरो राजा, हरश्च । शासन- वलयेन मुद्राकटकेन । प्रतिसरं कङ्कणम् । तिलपात्र और सोने के पत्तरों में मढ़े खुर और सींगों वाला असंख्य गायें ब्राह्मणों को दान में दिया । व्याघ्रचर्म पर भद्रासन बिछा कर विराजमान हुए । पहले अपने आयुध में यश के समान धवल चन्दन लगाया और फिर अपने सिर से पैर तक उसका लेप किया । फिर कोनों पर छपे हंसमिथुन वाले दुकूल वस्त्रों का जोड़ा धारण किया । शिव के चिह्न के रूप में चन्द्रकला के समान श्वेत फूलों की मुण्डमालिका को सिर पर रखा । कानों में मरकत के कर्णाभरण सदृश, गोरोचनों से युक्त सुन्दर दूब का पल्लव धारण किया । हाथ के प्रकोष्ठ में मंगलप्रद कंकण पहना और मुद्राकटक (राजकीय मुद्रा से युक्त कड़ा) भी धारण किया । पूजा पाये पुरोहित ने उनके सिर पर शान्ति का जल छिड़का । तब उन्होंने सहयोगी राजाओं को कीमती सवारियाँ भेजीं और दिशाओं में आलोक फैलाने वाले रत्नजटित आभूषण बाँटे । राज्य में कार्पटिक (सिर पर चीरा बाँधने के अधिकारी राजकीय कर्मचारी) राजघरानों के सम्बन्धी कुलपुत्र और साधारण जन जो बन्दी थे वे छोड़ दिए गए और जो किसी कारणवश दण्डित या कृपा से वंचित हो गए थे वे फिर से सम्राट् के प्रसादपात्र बनाए गए । उसी समय अपने दाहिने भुजस्तम्भ को जो फरक कर अपने स्वरूप को व्यक्त कर रहा था, अट्ठारह द्वीपों पर विजय पाने के योग्य अधिकार में नियुक्त किया । सेवकों के समान सुनिमित्त एक पर एक सामने

३५२ हर्षचरितम् दशद्वीपजेतव्याधिकारे दक्षिणं भुजस्तम्भमहमहमिकया सेबकैरिव सनि- मित्तैरपि समग्रैरग्रतो भवद्भिः प्रमुदितप्रजाजन्यमानजयशब्दकोलाहलो हिरण्यगर्भ इव ब्रह्माण्डात्कृतयुगकरणाय भवनान्निर्जगाम। नातिदूरे च नगरादुपसरस्वति निर्मिते महति तृणमये, समुत्तम्भि- ततुङ्गतोरणे, वेदीविनिहितपल्लवलालामहेमकलशे, बद्धवनमालादाम्नि, धवलध्वजमालिनी, भ्रमच्छुक्लवाससि, पठद्द्विजन्मनि मन्दिरे प्रस्थानम- करोत्। तत्रस्थस्य चास्य ग्रामाक्षपटलिकः सकलकरणिपरिकरः 'करोतु देवो दिवसग्रहणमद्यैवाबन्ध्यशासनः शासनानाम्' इत्यभिधाय वृषाङ्काम- भिनवघटितां हाटकमयीं मुद्रां समुपनिन्थे। जग्राह च तां राजा। समु- पस्थापिते च प्रथमत एव मृत्पिण्डे परिभ्रश्य करकमलादधोमुखी महीतले पपात मुद्रा। मन्दाश्यानपङ्कपडले मृदुमृदि सरस्वतीतीरे परिस्फुटं व्यरा- जन्त राजयो वर्णानाम्। अमङ्गलाशङ्किनि च विषीदति परिजने नरपति- ललामं चिह्नम्। 'ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु'। वनमाला पुष्प- पत्रप्रतियोजिता स्रक्। अक्षाणां भूतानां। पटले समूहे नियुक्तोऽक्षपटलिकः। ग्रामा- णामक्षपटलिकः ग्रामाक्षपटलिकः। करणिर्लेख्यम्। कायस्थ इत्यन्ये। मुद्रा वालिका। मन्दार्यानमीषच्छुष्कम्। आने लगे। प्रजा के लोग प्रसन्न होकर उनका जयजयकार करने लगे। सतयुग की स्थापना के लिए ब्राह्मण से निकले हुए ब्रह्मा के समान हर्ष राजभवन से बाहर आए। नगर से थोड़ी दूर सरस्वती के किनारे घास-फूस छाकर एक बड़ा राजमन्दिर तैयार किया गया था। उसमें ऊँचा तोरण खड़ा किया गया था। वेदी पर पल्लवसहित हेमकलश रखा हुआ था, वनमालाएँ लटकाई गई थीं, श्वेत ध्वजाएं फहराई गई थीं। श्वेत वस्त्रों से चेलोत्क्षेप हो रहा था और ब्राह्मण लोग मंगलपाठ कर रहे थे। ऐसे मन्दिर में हर्ष ने प्रस्थान किया। वहाँ उनके ग्रामाक्षपटलिक (गाँव का मुख्य अर्थ-अधिकारी, पटवारो) ने अपने समस्त लेखकों के साथ निवेदन किया—'देव आपका शासन अव्यर्थ है, अत एव आज ही शासनदान का आरम्भ करें।' यह कह कर उसने नई बनी हुई एक सोने की मुद्रा जिस पर बैल का चिह्न बना था, हर्ष के हाथ में दी। राजा ने जैसे मुद्रा हाथ में ले ली और पहले से सामने रखे हुए मिट्टी के पिण्डे पर उसे लगाना चाहा कि वह हाथ से छूट कर गिर गई और सरस्वती के किनारे की गीली मुलायम मिट्टी पर उसके अक्षर स्पष्ट छप गए। परिजन लोग अमंगल की आशंका से खिन्न होने लगे, तब हर्ष ने मन में यह कहा—'सीधे-सादे लोगों की बुद्धि तत्त्व को नहीं समझ पाती। 'यह पृथिवी आपके

सप्तम उच्छ्वासः ३५३ रकरोन्मनस्येतत्—'अतत्त्वदर्शिन्यो हि भवन्त्यविदग्धानां धियः । तथा हि-एकशासनमुद्राङ्का भूर्भवतो भविष्यतीति निवेदितमपि निमित्तेनान्यथा गृह्णन्ति ग्राम्याः ।' इत्यभिनन्द्य मनसा महानिमित्त तत्सीरसहस्रसंमित- सीम्नां ग्रामाणां शतमदाद्द्विजेभ्यः । निनाय च तत्र तं दिवसम् । प्रतिप- न्नायां शर्वर्यां समानितसर्वराजलोकः सुष्वाप । अथ गलति तृतीये यामे सुप्तसमस्तसत्त्वनिःशब्दे दिक्कुञ्जरजृम्भमाण- गम्भीरध्वनिरताड्यत प्रयाणपटहः । अग्रतः स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः प्रयाणक्रोशसंख्यापकाः स्पष्टमष्टावदीयन्त प्रहाराः पटहे पटीयांसः । ततो रटत्पटहे, नन्दन्नान्दीके, गुञ्जत्गुञ्जे, कूजत्काहले, शब्दायमान- शङ्खे, क्रमोपचीयमानकटककलकले, परिजनोत्थापनव्यापृतव्यवहारिणि, द्रुतद्रुघणघातघट्यमानकोणिकाकीलकोलाहलकलितककुभि, बलाधिकृत- एकशासनमुद्रैवाङ्को यस्याः सा । सीरं हलम् । संमितं परिच्छिन्नम् । अष्टक्रोशा अद्य गन्तव्यमिति प्रायेण क्रोशसंख्यापकाः । तत इत्यादौ । एवंविधे प्रयाणसमये राजभिरापुपूरे राजद्वारमिति संबन्धः । नान्दी मङ्गलपटहः । गुञ्जासंज्ञः शङ्खभेदो यत्पृष्ठे जतु परिकलितं भवति । 'सन्ना' इति यस्य प्रसिद्धिः । शङ्खश्च मुण्डशङ्ख इति प्रसिद्धः । द्रुघणोऽयस्ताडनभाण्डम् । एक छत्र शासन की मुद्रा से अंकित होगी' इस प्रकार का निमित्त सूचित होने पर भी ये नासमझ कुछ और अर्थ लगा रहे हैं।' इस महानिमित्त का हर्ष ने मन में अभिनन्दन किया और सौ गाँव, जिनमें प्रत्येक का क्षेत्रफल एक सहस्र हल भूमि था, ब्राह्मणों को दान में दिए। वे दिन भर वहीं रहे। रात होने पर सब राजाओं के सम्मान के बाद शयन किया। जब रात का तीसरा याम समाप्त हो रहा था और सबके सो जाने से चारों ओर निसबद हो रहा था, तभी दिग्गज की जंभाई की तरह गम्भीर ध्वनि से कूच का नगाड़ा बजाया गया । कुछ ठहर कर आगे पहुँचे हुए सेना के ठहराव के लिए कोसों की सूचना देने वाले पुरुषों ने जोर-जोर से डंके की आठ चोटे मारीं। सैनिक प्रयाण के अवसर में नगाड़े बजने लगे। नान्दीक की आवाज होने लगी। गुंजा गूंजने लगा और काहल भी बजने लगे । शंखों के शब्द होने लगे । क्रम से पूरे कटक का शोरगुल बढ़ने लगा । झाडू देने वाले जमादार आकर नौकरों को जगाने लगे। मुंगरी की तड़ातड़ चोटों का (घड़ियाल पर उत्पन्न शब्द से) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ नुकीले पतले डंडों से बजाए जाते हुए नक्कारों का शब्द दिशाओं में भर गया। सैनिक २३ ह० च०

३५४ हर्षचरितम् बध्यमानपाटीपतिपेटके, जनज्वलितोल्कासहस्रालोकलुप्यमानत्रियामात- मसि, यामचेटीचरणचलनोत्थाप्यमानकामिमिथुने, कटुककटुकनिर्देशन- श्यन्निद्रोन्मिषन्निषादिनि, प्रबुद्धहास्तिकशून्यीक्रियमाणशय्यागृहे, सुप्तोत्थि- ताश्वीयविधूयमानसटे, रटकटकमुखरखनित्रखन्यमानक्षोणीपाशे, समु- त्कील्यमानकीलशिञ्जानशिञ्जीरे, उपनीयमाननिगडतालकलरवोत्तालतुरङ्ग- तरङ्गयमाणखुरपुटे, लेशिकमुच्यमानमदस्यन्दिदन्तिसंदानशृङ्खलाखनख- ननिनादनिर्भरभरितदशदिशि, घासपूलकप्रहारप्रमृष्टपांसुलकरिपृष्ठप्रसार्य- माणप्रस्फोटितप्रमृष्टचर्मणि, गृहचिन्तकचेटकसंवेष्ट्यमानपटकूटिकाण्डप- कोणिकाः पटहकुट्यादिकेषु याः कीलिकाः । पाटी बहुपरिवारपुरुषगृहीतो निवास- भूभागः, कुलपुत्रकसमूह इत्यन्ये । पेटकं तत्समूहः, 'पाठीपति' इति पाठे पाटीपतयः प्रतिनियतस्वस्थानपरिच्छिन्नः । उल्का दीपिका । यामचेटी प्रहरजागरणनियुक्ता । तत्क्षणं चरणचलनं पादेषु स्पर्शः । कटुकानां हस्तिपकयोक्त्राणाम् । यः कटुको रूक्षः । निर्देश आज्ञा । निषादिनां हस्त्यारोहाणाम् । हास्तिकं हस्तिसमूहः । अश्वी- यमश्ववृन्दम् । क्षोणीपाशो भूम्या निवन्धनम् । समुत्कील्यमानान्युत्खन्यमानानि । शिञ्जीरं लौही शृङ्खला । निगडार्थं तालकं तालपत्रं निगडतालकम् । लौह एवाध- बन्धनविशेष इत्यन्ये । तरङ्ग्यमाणाः कुटिलीक्रियमाणाः । लेशिकाः घासिकाः । संदानशृङ्खला बन्धनाद्याः । प्रस्फोटितं विस्फारितम् । प्रमृष्टं शोधितम् । पटकुट्यादयः स्कन्धावारसरणिप्रभेदाः । तथा च पटैः कुटी सूक्ष्मगृहम् । काण्डपटकं काण्डैः संगठन करने वाले बलाधिकृतों ने पाटीपतियों (सेना के निरीक्षकों) को इकट्ठा किया। चारों ओर मशालें जल उठीं और अन्धकार दूर हो गया। चौथे पहर पर आने वाली चेटियाँ पहुँच गईं और उनके पैरों की आहट से साथ सोए हुए स्त्री-पुरुष उठ बैठे। हाथीवान् प्यादों की कड़ी डांट से उठ कर आँखें मलने लगे। जगे हुए हाथी शयनगृह के बाहर आ गए। घोड़े भी उठकर अयाल झाड़ने लगे। हाँफने की आवाज करते हुए प्यादे कुदालों से तम्बुओं के धरती में गड़े फाँसेदार भाँकुड़ों को खोदने लगे। कीलों के उखाड़ने से लोहे की सींकदें आवाज करने लगीं। घोड़ों के पैरों में पड़े हुए खटकेदार कड़े जब खोले जाने लगे तो इन्होंने अपने खुर टेढ़े कर दिए। जब मतवाले हाथियों के पैरों में पड़ी बन्धनशृङ्खलाओं को लेशिक (चारा देने वाले घसियारे) खोलने लगे तो खनखन का शोर चारों ओर भर गया। धूल से भरी हाथियों की पीठें घास के लम्बे मुट्ठों से झाड़कर साफ की गईं और उन पर कमाये हुए चमड़े की खालें डाल दी गईं। डेरों के बनने- उखाड़ने की चिन्ता रखने वाले (गृहचिन्तक) नौकर-चाकर तम्बू, बड़े डेरे, कनात और

सप्तम उच्छ्वासः ३५५ ऽमण्डपपरिवस्त्रावितानके, कीलकलापापूर्यमाणचिपिटचर्मपुटे, संभाण्डाय- मानभाण्डागारिणि, भाण्डागारवहनसंवाह्यमानबहुनालीवाहिके, निषादिनि- श्चलानेकानेकपारोप्यमाणकोशकलशपीडापीडसंकटायमानसामन्तौकसि, दूरगतदक्षदासेरकक्षिप्तप्रक्षिप्यमाणोपकरणसंभारभ्रियमाणदुष्टदन्तिनि, ति- र्यगानमज्जाघनिककरकृच्छ्राकृष्टलम्बमानपरतन्त्रतुन्दिलचुन्दीजनजनितज- नहासे, पीड्यमानशारशारिवरत्रागुणप्राहितगात्रविहारबृंहद्बृहद्बृहदुन्मदक- रिणि, करिघटाघटमानघण्टाटंकारक्रियमाणकर्णज्वरे, पृष्ठप्रतिष्ठाप्यमानक- ण्ठालककदर्शितकूजत्करभे, अभिजातराजबुत्रप्रेष्यमाणकुप्ययुक्त्याकुलकुली- नकुलपुत्रकलत्रवाहने, गमनवेलाविप्रलब्धवारणाधोरणान्विष्यमाणवसे- पटैश्च गृहम् । परिवस्त्रा तिरस्करिणी । वितानको रक्तकः । चिपिटो ह्रस्वः । चर्म- पुटश्चर्मप्रसेवकः । संभाण्डायमानो भाण्डानि समाचिन्वन् । 'भाण्डात्समात्र्यने' इति णिच् । संवाह्यमानाः प्राप्यमाणाः । नालीवाहिकः करिणां घासग्रहण- नियुक्तो हस्तिपको मेण्ठाख्यः । चुन्दी कुट्टनी । शारिमञ्जरी । हस्तिपर्याणमित्यर्थः । त्त्सत्थैः पीड्यमानदामभिग्र्राहितेन गात्रविहारेण देहकम्पेन बृंहन्तः शब्दायमानाः शामियाने लपेटने में लग गए और खूँटों को चपटे चमड़े के थैलों में भरने लगे । भण्डारी बर्तनों को बटोरने लगे । हथियों के घसियारे भण्डार ढोने के लिए बुलाए जाने लगं । हाथीवानों ने सीधे हाथियों को लाकर चुपचाप खड़ा कर दिया और उन पर सामन्तों के डेरों में भरा हुआ सामान, प्याले और कलशों की पेटियों के समूह लादने लगे । जो दुष्ट हाथी थे उन पर सझे हुए ऊँट काठ-कबाड़, खाट-पीढ़े आदि उपकरण-सम्भार दूर से फेंक कर लदवाने लगे । दूसरे लोग मुटल्ली दासियों को, जो चल नहीं पा रही थीं, टेढ़ा झुक कर जोर से घसीटते ले जा रहे थे, यह देख कर कुछ लोग हँस रहे थे । रंग-बिरंगी मोटी रस्सियों के कसे जाने के कारण जिनके झूमने में बाधा पड़ रही थी, ऐसे विशालकाय मन-मौजी हाथी चिग्घाड़ रहे थे । हाथियों के घण्टे की टंकार से कान फटने लगे । पीठ पर लादी जाती हुई कंडालों के कष्ट से ऊँट बलबला रहे थे । अभिजात राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल जड़े वाहनों में कुलीन राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल-जड़े वाहनों में कुलीन कुलपुत्रों की आकुल स्त्रियां जा रही थीं । चलते समय इधर-उधर भटके हुए नये सेवकों को हाथियों के आधोरण ढूँढ़ रहे थे । प्रसाद पाये हुए पैदल राजवल्लभ घोड़ों को पकड़ कर ले चल रहे थे । सजी-धजी १. इस वाक्य में श्री अग्रवाल जी के अनुसार 'कुप्रयुक्त' के स्थान पर 'कुप्ययुक्त'- पाठ स्वीकृत है । (ह० सां० १४२-१४३) ।

३५६ हर्षचरितम् वके, प्रसादवित्तपत्तिनीयमाननरपतिवल्लभवारवाजिनि, चारुचाटभटसैन्य- न्यस्यमाननासीरमण्डलाडम्बरस्थूलस्थासके, स्थानपालपर्याणलम्बमान- लवणकलायीकिङ्किणीनालीसनाथसंकलिततलसारके, कुण्डलीकृतावरक्षणी- जालजटिलवल्लभपालाश्वघटानिवेश्यमानशाखामृगे, परिवर्धकाकृष्यमाणा- र्धजग्धप्राभातिकयोग्याशनप्रारोहके, व्याक्रोशीविजृम्भमाणघासिकघोषे, गमनसंभ्रमभ्रष्टभ्रमदुत्तुण्डतरुणतुरङ्गतन्यमानानेकमन्दुराविमर्दे, सज्जी- करिणो यत्र तस्मिन् । प्रसादेन वित्ताः पत्तयः । वारोऽवसरः । 'निवहावसरौ वारः' इत्यमरसिंहः । तत्र वाजिनो ये सेवकानां प्रत्यवसरं विसृज्यन्ते । 'वर' इति पाठः । चारुचारभटसैन्येन त्रस्यमाना आत्मन एव क्रियमाणाः । नासीरेन कूर्परेण । मण्डलाडम्बरार्थाः स्थूलाः स्थासकाश्चन्द्रका यत्र । अन्ये नासीरमग्रेसरमाहुः । स्थानपालानां पर्याणेषु लम्बमाना लवणकलायी किङ्किणी । नालीसनाथा संकलिता तलसारिका यत्र । स्थानपाला अश्वपालाः । अश्वभाण्डागारिका इत्यन्ये । लवण- कलायी मृगाकृतिरश्वानां दाहमयी क्रियते । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । नाली प्रधानार्थं वेणवी नाडिरुच्यते । तलसारकोऽश्वमुखपट्टिकोर्णादिसूत्रमयी । उरः- पट्टिकेत्यन्ये । कुण्डलीकृतैरवरक्षणीजालैर्जटिला वल्लभपाला यासु तास्वश्वघटासु निवेश्यमानाः शाखामृगा यासु । अवरक्षण्यश्वबन्धनरज्जुः । वल्लभपालोऽश्वपालः । अन्ये तु यो बलवान् । महाकारो ह्योपकरणम् । यवससण्डुलादि वहति स वल्लभपालोऽश्वपाल इत्याहुः । शाखामृगो वानरः । रक्षार्थमश्वानां परिवर्धकोऽश्व- पालः । प्रौढिको योग्याशनार्थं प्रसेवको यो 'बुकण' इति प्रसिद्धः । व्याक्रोशी चाटभट सेना के हरावल दस्ते चौड़े छोपे हुए निशानों वाले वेष से सजे थे । स्थानपालों के घोड़ों की प्लानें लटकती हुई लवणकलायीं, किंकिणी और नाली से सुशोभित थीं एवं ज़ेरबंद (तलसारक) से बंधी हुई थीं । राजवल्लभ घोटों के परिचारक घोड़ों के बांधने की अवरक्षणी रस्सी लपेट कर लिए हुए थे और साथ में (घोड़ों को रोग और छूत से बचाने के लिए) बन्दर ले चल रहे थे । सवारों के घोड़े प्रभातकालीन भोजन अभी आधा ही समाप्त कर चुके थे कि परिचारकों ने उनके तोबड़े उतार लिये । घसियारे परस्पर चिल्ला- चिल्ला कर शोर मचा रहे थे । चलने की हड़बड़ी में छूट कर भागे हुए तरुण घोड़े मुँह उठाकर दौड़ मारने लगे जिससे घुड़साल में खलबली मच गई । हथिनियाँ इधर-उधर सवारी के लिए सजकर तैयार हो गईं तो परिचारकों के पुकारने पर जल्दी से सुन्दरियों १. 'चारभट' के स्थान पर चाटभट किया गया है (हर्ष० सां० १४२-१४३)

सप्तम उच्छ्वासः ३५७ कृतकरेणुकारोहाह्वानसत्वरसुन्दरीदीयमानमुखालेपने, चलितमातङ्गतुरङ्ग- प्रधावितप्राकृतप्रातिवेशिकलोकलुण्ठ्यमाननिर्घाससस्यसंचये, संचरच्चेल- चक्राक्रान्तचक्रीबति, चक्रचीत्कारिगन्त्रीगणगृह्यमाणप्रहृतवर्त्मनि, अकाण्ड- कोड्डीयमानभाण्डभरितानडुहि, निकटघासलाभलुब्धल्लम्बमानप्रथमप्रसा- र्यमाणसारसौरभेये, प्रमुखप्रवर्त्यमानमहासीमन्तमहानसे, पुरःप्रधावद्ध्व- जवाहिनी, प्रियशतोपलभ्यमानसंकटकुटीरकान्तरालनिसरणे, करिचरण- दलितमठिकोत्थितलोकलोष्टहन्यमानमेण्ठक्रियमाणासन्नसाक्षिणि, संघट्ट- विघट्टमानव्याघ्रपल्लीपलायमानक्षुद्रकुटुम्बके, कलकलोपद्रवद्रवद्द्रविणब- लीवर्दविद्राणवणिजि, पुरःसरदीपिकालोकविरलायमानलोकोत्पीडाप्रस्थि- तान्तःपुरकरिणीकदम्बके, हयारोहाहूयमानलम्बितशुनि, सरभसचरणनि- परस्पराह्वानम् । उत्तुण्डा उत्प्रोथाः । मुखालेपनं सिन्दूरादिना करेणुकार्थमेव । प्रातिवेशिकलोकाः प्रत्यासन्ननिवासा जनाः । निर्घासो भुक्तशेषो घासः । चेलं वस्त्रम्, बालको वा चेलः । चक्रीवाग्गर्दभः, उष्ट्रो वा । गन्त्री शकटिका । गृह्यमाण- मधिष्ठीयमानम् । प्रहतं क्षुण्णम् । सर्वसेवितमित्यर्थः । लम्बमानो गर्दभदासः, वणिजां कर्मकरो वा । सारसौरभेयो बलवाननड्वान् । प्रमुखेऽग्रे । महानसं सूपकारशाला । कुटीरं मठिका, स्वल्पगृहम् । मेण्ठो जागरिकः । व्याघ्रपल्ली तृणकुटीभेदः । क्षुद्रमल्पम् । कुटुम्बकं परिवारः । विद्राणाः सशोकाः । लम्बितः मुखालेपन (हथिनियों के मुँह पर माडने-बनाने की सामग्री) लेकर आई । हाथी-घोड़े जब चल पड़े तब उनके पड़े हुए चारों को लूटने के लिए आसपास में छोटे कौम के लोग आ पहुँचे । छोकरे गदहों पर सवार होकर साथ चल पड़े । चलते हुए चक्रों की चरर- मरर आवाज करती हुई गाड़ियाँ मार्ग में लीक डालने लगीं । मांगने पर फौरन देने योग्य सामान बैलों पर लादा गया । रसद का सामान देने वाले बनियों के बैल पहले ही रवाना कर दिए गए थे, किन्तु वे (या उन्हें हांकने वाले नौकर) घास के लोभ में देर लगा रहे थे । महासामन्तों के रसोड़े आगे ही भेज दिए गए थे । पताका लेकर चलने वाले पुरुष आगे-आगे दौड़ रहे थे । भरे कुटीर के मध्य से निकलते हुए सैनिक अपने प्रिय जनों से मिल रहे थे । हाथियों ने रास्ते के छोटे-छोटे घरों को पैर से रौंद डाला । लोग उठ उठ कर हाथिवानों को ढेले से मारने लगे और वे बेचारे पास के लोगों को साक्षी बनाकर सन्तोष कर लेते थे । फूस की झोपड़ियाँ इसी धकमधक्के में तितर-बितर हो गई और उसमें रहने वाली छोटी गृहस्थियाँ जान लेकर भागीं । माल से लदे हुए बैल जब शोरगुल से बिदकने लगे तो बनियें सोच में पड़ गये । अन्तःपुर की स्त्रियाँ हथिनियों पर बैठ कर

३५८ हर्षचरितम् पतननिश्चलगमनसुखायमानखक्खटस्तूयमानतुङ्गतङ्गणगुणे, स्रस्तवेसर- विसंवादिसीदद्दाक्षिणात्यसादिनि, रजोजग्धजगति प्रयाणसमये, प्रतिदि- शमागच्छद्भिर्गजवधूसमारूढैराधोरणैरूर्ध्वध्रियमाणहेमपत्रभङ्गशारशाङ्गैः, अन्तरासनासीनान्तरङ्गगृहीतासिभिः, ताम्बूलिकविधूयमानचामरपल्लवैः, पश्चिमासनिकार्पितभस्त्राभरणभिन्दिपालपूलिकैः, पत्रलताकुटिलकलधौत- नलकपल्लवितपर्याणैः, पर्याणपक्षकपरिक्षेपपट्टिकाबन्धनिश्ञ्चलपट्टोपधानस्थि- रावधानैः, प्रचलपादफलिकास्फालनस्फायमानपदबन्धमणिशिलाशब्दैः, उच्चित्रनेत्रसुकुमारस्वस्थानस्थगितजङ्घाकाण्डैश्च कार्द्मिकपटकल्माषित- पिशङ्गपिङ्गैः, अलिनीलमसृणतुलासमुत्पादितसितसमायोगपरभागैश्चा-

पश्चात्खचितः। खक्खटा वृद्धाः। तुङ्गा उच्चाः, तङ्गणो देशः, तद्देशजोऽप्यश्वस्तङ्गणः। विसंवादः परिशीलनम्। दक्षिणापथे वेसरा न सन्तीत्यदृष्टदेशाः। सादिनोऽश्वारोहाः। भस्त्राभरणं तूणभेदः। भिन्दिपालः शरभेदः। तोमर इत्यन्ये। पक्षकः प्रान्तः, पार्श्वं वा। परिक्षेपो वेष्टनम्। पादफलिका उभयपार्श्वयोः पर्याणे या क्रियते। आगुल्फं पादत्राणमिरयन्ये। आस्फालनं चालनम्। स्फायमानो वर्धमानः। पाद- बन्धः पादकटकः। नेत्रं पटविशेषः। स्वस्थानं स्वस्थानेति यस्याः प्रसिद्धिः। कार्द्- मिकं कर्दमेन रक्तम्। कल्माषिताः शबलिताः। पिशङ्गा लोहिताः। पिङ्गा जङ्गिका।

निकलीं, उनके सामने मशाल लेकर लोग चलते थे जिसके संकेत से जनता मार्ग छोड़कर अलग हो जाती थी। घुड़सवार पीछे छूटे हुए अपने कुत्तों को पुकारने लगे। तंगण देश के ऊँचे घोड़े इस प्रकार तेज चल रहे थे कि उनकी पीठ बिलकुल नहीं हिल रही थी और उन पर सुख से सवार हुए खक्खट क्षत्रिय उनकी प्रशंसा कर रहे थे। खच्चरों पर तकलोफ से बैठे हुए दक्खिनी सवार फिसले पड़ते थे। चारों ओर धूल भर जाने से कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। हथिनियों पर सवार होकर देश-देश के राजा आने लगे। हाथीवानों द्वारा रखे गए हौदों की सोने की पत्ररचनाओं से उनके धनुष रंग-बिरंगे हो रहे थे। उनके पास बीच में तलवार पकड़े स्वजन लोग आसीन थे। ताम्बूलिक चँवर झल रहे थे। हाथियों के पीछे की ओर बैठे हुए परिचारक चमड़े के बने हुए विशेष प्रकार के तरकशों में भरे हुए छोटे हलके भालों के मुट्ठे लिए हुए थे। घुड़सवारों के पलानों में आगे- पीछे उठे हुए सोने के नलकों में पत्रलता के कटाव बने थे। पलान के पार्श्व भाग में लम्बी पट्टी से घुमा कर बंधे होने से निश्चल बिछे हुए पट्टोपधान पर उठंग कर वे बैठे थे। पलान के दोनों ओर लटकी हुई रकाबों में उनके पैर जब एक दूसरे से टकराते थे तो रकाबों का झनझन शब्द होने लगता था। नेत्र-संज्ञक रेशमी

वदातदेहवर्णविराजमानराजावर्तमेचकैः कञ्चुकैश्चापचितचीनचोलकैश्च तार- मुक्तास्तबकितस्तवरकवारबाणैश्च नानाकषायकर्बुरकूर्पासकैश्च शुकपिच्छ- च्छायाच्छादनकैश्च व्यायामोलुप्तपार्श्वप्रदेशप्रविष्टचारुशस्तैश्च गतिवशवे- ञ्जितहारलतागलल्लोलकुण्डलोन्मोचनप्रधावितपरिजनैः, चामीकरपत्राङ्कुर- कर्णपूरकविघट्टमानवाचालवालपाशैश्चोष्णीषपट्टावष्टब्धकर्णोत्पलनालैश्च कु- ङ्कुमरागकोमलोत्तरीयान्तरितोत्तमाङ्गैश्च चूडामणिखण्डखचितक्षौमखोलैश्च मायूरातपत्रायमाणशेखरषट्पदपटलैश्च मार्गागतशारिकशारिवाहवेग- दण्डैः, पुनश्चञ्चच्चामरकिर्मीरकार्दरङ्गचर्ममण्डलमण्डनोड्डीयमानचटुलडा- मरचारभटभरितभुवनान्तरैः, आस्कन्दत्काम्बोजवाजिशतशिक्षणजात रू- अन्ये जङ्घालेत्याहुः । सतुला अर्धजङ्घिका इत्यन्ये । अर्धजङ्घालेत्याहुः । समायौगो व्यापृतकेषु प्रसिद्धः । परभागो वर्णस्य वर्णान्तरेण शोभातिशयः । राजावर्तः कृष्ण- पाषाणः । मेचको बर्हिण्कण्ठवर्णः । 'कञ्चुको वारबाणोऽस्त्री' । अपचितं परिहितम् , पूजितं वा । 'चायृ पूजानिशामनयोः' इत्यस्यापचितश्चेति निपातनाद्रूपम् । ताराः शुद्धाः। स्तबकिताः संजातपुष्पनिकुरुम्बाकाराः । स्तवरको वस्त्रभेदः । वारबाणः कञ्चुकः । कर्बुरः कपोतकण्ठवर्णः । कूर्पासकाश्चोलकाः । पिच्छानि पक्षाः । आच्छादन- मुत्तरीयम् । उल्लुप्तस्तनूकृतः । शस्तं पट्टिकाडोरः । कटिसूत्रमित्यर्थः । वेष्टिताश्चा- ल्लिताः । कर्णाभरणभेदो वालपाशः । कोमलं संछाद्यम् । अन्तरितमाच्छादितम् । खोलः शिरस्त्रम् । मायूरातपत्रायमानम् । वेगदण्डस्तरुणो हस्ती । किर्मीराणि शबलानि । कार्दरङ्गकानि कार्दरङ्गदेशोद्भवानि । बहुसुवर्णसूत्ररचितानि चर्माणि । स्फोटकाः स्निग्धवर्णमांसस्फारणि कार्दरङ्गचर्माणि । डामरा उन्नटाः । चारभटाः वस्त्र के बने हुए फूल-पत्तोदार पजामों से उनकी जाँघें ढँकी थीं। कसंभ के रङ्ग से रङ्गी हुई कलछौंह लिए लाल वर्ण वाली उनकी लम्बी सलवार थी। भौंरे के समान गहरे नीले रंग के जांघिये, जिनमें सफेद पट्टियों का जोड़ डालने के कारण उनकी शोभा और बढ़ गई थी, पहने थे। कुछ राजा लाजवर्दी नीले रंग के कंचुक पहने हुए थे। कुछ ने चीन देश का कंचुक धारण किया था। कुछ ने बारबाण नामक कंचुक-जैसा पहनावा धारण किया था, जो सितारों से टँके मोतियों के गुच्छों से सुशोभित हो रहा था। कुछ नाना रंगों से रँगे जाने के कारण चितकबरे कूर्पासक पहने हुए थे। कुछ राजाओं के शरीर पर सुगापंखी रंग की झलक देने वाले आच्छादनक नामक वस्त्र थे। व्यायाम करने के कारण पतले उनके कटिप्रदेश में पटके बँधे हुए थे। तेज चाल से चलने के कारण डोलती हुई उनकी हारलताओं में चंचल कुंडल को फँसे देखकर छुड़ाने के लिए परिजन

३६० हर्षचरितम् पायानरवमुखरितदिङ्मुखैश्च निर्दयप्रहतलम्बापटहशतपटुरवबधिरीकृतश्रव- णविवरैः, उद्घोष्यमाणनामभिः, उन्मुखपादातप्रतिपाल्यमानाज्ञापातै राज- भिरापुपूरे राजद्वारम् । उदिते च भगवति दिनकृति राज्ञः समायोगग्रहणसमयशंसी सस्वान संज्ञाशङ्खो मुहुर्मुहुः । अथ न चिरादिव प्रथमप्रयाण एव दिग्विजय्याय दिग्गजसमागममिव गमनविलोलकर्णतालदोलाविलासैः कुर्वाणया करेणु- कया सिद्धयात्रयोद्गमानः, वैदूर्यदण्डविकटेनोपरि प्रत्युप्तपद्मरागखण्डमयू- खखचिततया सूर्योदयदर्शनकोपादिव लोहितायतया ध्रियमाणेन मङ्गला-


शूराः । आस्कन्दन्तश्चलन्तः । काम्बोजा बाह्लीकदेशजाः । आयानमश्वभूषणम् । लम्बापटहाः पटहभेदाः । 'तथिला' इति प्रसिद्धाः । संज्ञा संकेत: । अथेत्यादौ । दिग्विजय्याय निर्जगाम नरपतिरिति संबन्धः । मङ्गलातपत्रेण कञ्चुकेन । ननूत्प्रेक्ष्यते द्वितीय इव भोगिनामीश इति योजना । यद्वा


दौड़ पड़ते थे। सुवर्ण के पत्राङ्कुरों वाले उनके कर्णपूर से कानों का बाला टकरा कर आवाज करती थी । उन्होंने पगड़ियों में अपने कर्णोत्पल के नाल खोंस लिये थे। कुछ के सिर केसरिया रङ्ग के कोमल उत्तरीय से ढँके थे, जिनमें चूड़ामणि के खण्ड टँके हुये थे। मोरपङ्ख से बने उनके सिर के शेखर पर भौरे मँडरा रहे थे । रङ्ग बिरंगी झूलों से ढँके हुए जवान हाथी पर सवार होकर राजा पहुँचे हुए थे । उद्धट शूर-वीर हाथों में चमचमाती हुई छोटी-छोटी चौरियों से युक्त कार्दरङ्ग चमड़े से बने हुये ढाल लिये हुये भुवनमाग को भरने लगे। सैकड़ों काम्बोज घोड़ों के दुलकती चाल में चलने के कारण उनके झनकारते हुए आयान नामक गहने दिशाओं को मुखरित कर रहे थे। सैकड़ों तड़ातड़ बजाये जाने वाले नगाड़ों की तीखी आवाज कानों को फोड़े डालती थी । राजाओं के नाम पुकारे जा रहे थे। पैदल सैनिक (हाथी पर सवार) राजाओं की आज्ञा को उन्मुख होकर सुनते थे और पालन में लग जाते थे। इस प्रकार राजाओं से राजद्वार भरा हुआ था । सूर्योदय हो जाने पर बार-बार शंखध्वनि होने लगी जो इस बात की सूचक थी कि राजा समायोग-ग्रहण (सेना का व्यूहबद्ध प्रदर्शन) करेंगे। संज्ञाशंख की ध्वनि के कुछ ही देर बाद दिग्विजय के लिये पहली बार सैनिक प्रयाण के अवसर पर निकली हुई हथिनी पर, जो चलते हुए कर्णतालों के विलास से मानों दिग्गज के साथ समागम कर रही थी, सवार होकर राजभवन से बाहर आये । उनके सिर पर वैडूर्य के दण्डवाला, जड़े हुए पद्मराग की किरणों से खचित मङ्गलातपत्र ऐसा लग रहा था मानों सूर्य का उदय देखकर कोप से तमतमा उठा हो । केले के गाभे से भी अधिक मुलायम रेशम (नेत्र)

सप्तम उच्छ्वासः ३६१ ॰तपत्रेण कदलीगर्भाभ्यधिकम्लदिम्ना नवनेत्रनिर्मितेन द्वितीय इव भोगिना- मधिपतिरङ्गलग्नेन कञ्चुकेनामृतमथनदिवस इव क्षीरोदफेनपटलधवला- म्बरवाही, बाल एव पारिजातपादप इवाखण्डलभूमिमारूढः, विधूयमान- चामरमरुद्विधूतकर्णपूरकुसुममञ्जरीरजसा सकलभुवनवशीकरणचूर्णेनेव दिशश्छुरयन्नभिमुखचूडामणिघटमानपाटलप्रतिबिम्बमुदयमानं सवितार- मपि पिबन्निव तेजसा बहलताम्बूलसिन्दूरच्छुरितया विलभमान इव द्वीपा- न्तराण्योषमुद्रयानुरागस्य स्फुरन्महाहारमरीचिचक्रवालानि चामराणीव दिशोऽपि ग्राहयन्, राजकेक्षणोत्क्षिप्तत्रिभागया त्रीनपि लोकान्करदाना- याज्ञापयन्निव सविभ्रमं भ्रूलतया द्राघीयसा बाहुप्राकारेण परिक्षिपन्निव रिरक्षया सप्तापि सागरमहाखातानखिलमिव च क्षीरोदमाधुर्यमादायोद्गतया लक्ष्म्या समुपगूढः, गाढममृतमय इव पीयमानः कुतूहलोत्तानकटकलोक- लोचनसहस्रैः स्नेहार्द्रेषु राज्ञां हृदयेषु गुणगौरवेण मज्जन्निव, लिम्पन्निव मज्जामपि सौभाग्यद्रवेण द्रष्टॄणाममरपतिरिवाप्रजवधकलङ्कप्रक्षालनाकुलः, मङ्गलातपत्रेणेति इत्थंभूतलक्षणे तृतीया । अम्बरं वस्त्रम्, नभश्च । विलभमानोऽ- र्थिसात्कुर्वन् । मुद्रया हि ससिन्दूरया विलभ्यते । परिक्षिपन्वेष्टयन् । अग्रजो का बना हुआ कंचुक पहने हुए सम्राट् दूसरे शेष नाग के समान लग रहे थे। क्षीरोदक नाम का सफेद वस्त्र पहने हुए वे अमृतमथन के दिवस के समान प्रतीत होते थे । पारिजात नामक वृक्ष के समान कम आयु में ही वे इन्द्र पदवी पर आसीन हो गये थे । सारे संसार को वश में करने वाले ( वशीकरण ) चूर्ण के समान, कर्णपूर के रूप में उनके कान में लगी हुई पुष्पमञ्जरी का पराग झले जाते हुये चँवर की हवा से दिशाओं में उड़ने लगा । उदय होते हुए सूर्य को जिसका लाल मण्डल सामने उनकी चूडामणि में प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वे अपने तेज से पीते जा रहे थे । ताम्बूल चबाने से टहाका लाल अपनी ओष्ठ मुद्रा से मानों वे द्वीपान्तरों को लुभा रहे थे। उनके लम्बे हार की किरणें फैल रही थीं, मानों अपने झलने के लिये दिशाओं के हाथ में चँवर पकड़ा रहे थे । राजसमूह को देखने के लिये तिरछी हुई अपनी भौहों से वे मानों तीनों लोकों को करदान का आदेश दे रहे थे। अपने भुजदण्डों से मानों उन्होंने सप्त समुद्रों की रक्षा के लिये ऊँचा परकोटा खींच दिया था । क्षीरसमुद्र की सारी मधुरिमा को लेकर मानों निकली हुई लक्ष्मी उनका आलिङ्गन कर रही थी । कटक के लोगों की कुतूहल से उठी हुई हजारों आँखें अमृततुल्य उनके रूप का पान कर रही थीं । स्नेह से राजाओं के हृदय में अपने गुणों की गरिमा से मानों मज्जन कर रहे थे। देखने वालों के अङ्गों में मानों सौभाग्य के द्रव का

३६२ हर्षचरितम् पृथुरिव पृथिवीपरिशोधनावधानसंकलितसकलमहीभृत्समुत्सारणः, पुरः- सरैरालोककारकैः सहस्रसंख्यैरर्क इव किरणैरधिकारचातुर्यचञ्चलचरणैर्व्य- वस्थास्थापननिष्ठुरैः भयपलायमानलोकोत्पीडान्तरिता दशापि दिशो ग्राहयद्भिरिव, चलितकदलिकासंपातपीतप्रचारं पवनमपि विनये स्थाप- यद्भिरिव, द्रुतचरणोद्धतधूलिपटलावधूतान्दिनकरकिरणानप्युत्सारयद्भिरिव, कनकवेत्रलतालोकविक्षिप्यमाणं दिनमपि दूरीकुर्वद्भिरिव, दण्डिभिरितस्ततः समुत्सार्यमाणजनसमूहो निर्जगाम नरपतिः । अवनमति च विनयनमितवपुषि, भयचकितमनसि, चलनशिथिल- मणिकनकमुकुटकिरणनिकरपरिकरुचिरशिरसि, विलुलितकुसुमशेखरर- जसि राजचक्रे, प्रभामुचां चूडामणीनामवाञ्चस्तिर्यञ्च उदञ्चश्च चञ्चन्तो मरीचयश्चापराशय इव सुशकुनसंपादनाय चेलुः । मेघायमानेरेणुमेदुरं ज्येष्ठः, राज्यवर्धनः, द्विजश्च । पुरा ब्रह्मणः किल सुतोऽसुरपक्षपाती त्रिशिरास्त- द्भ्राता च वृत्रस्तौ तपस्यन्तौ शक्रेण हताविति प्रथा। महीभृतो राजानः, पर्वताश्च । पृथुना ह्यद्रयो भूमिमास्तीर्य स्थिताश्चापकोट्या समुत्सार्यन्त प्रथिताः। लोका इत्येवं ये वदन्ति ते आलोककारकाः, तैः; अन्यत्रालोकः प्रकाशः। पुरःसरैः सहस्रसंख्यैरिति च साधारणम् । दिशो ग्राहयद्भिः पर्यन्तेषु च विसर्जयद्भिः। उदञ्च ऊर्ध्वप्रसारिणः । चापराशय इवेत्याद्युत्प्रेक्षात्रयं समीचीनम् । उड्डीयन्तः लेप कर रहे थे । बड़े भाई के वध के कारण उत्पन्न शोक को मिटाने के लिये इन्द्र के समान व्याकुल थे (अग्रज अर्थात् ब्राह्मण का वध करने से इन्द्र कलंकित थे)। पृथु के समान उनके चारों ओर अवकाशमण्डल बनाने के काम में लगे हुए राजा लोग भीड़ को हटा रहे थे (पृथिवी को छेक कर पड़े हुये पर्वतों को पृथु ने चापकोटि से उठाकर दूर फेंक दिया) । जैसे हजारों किरणें सूर्य के आगे-आगे आलोक करती हुई चलती हैं उसी प्रकार सम्राट् के आगे-आगे आलोक शब्द (जय शब्द) का उच्चारण करते हुये दण्डधर पुरुष जनसमूह को हटाते हुये चल रहे थे । अधिकार मिलने से उत्पन्न चतुराई के कारण उनमें तेजी आ गई थी । व्यवस्था करने में कड़ाई से काम लेते थे । भय के कारण भागे हुए लोगों से छिपी हुई दिशाओं को भी मानों पकड़वा लेते थे । फहराती हुई पताकाओं को गिरा देने से अवरुद्ध गति वाले वायु को भी मानों विनय की सीख देते थे । पैरों से धूल उड़ाकर सूर्य की किरणों का भी तिरस्कार के साथ उत्सारण करते थे । सोने की वेत्र- लताओं के आलोक से दिन को भी दूर फेंक दे रहे थे । सम्राट् के बाहर आते ही राजा लोग प्रणाम करने लगे । विनय के कारण उनका

सप्तम उच्छ्वासः ३६३ मन्दिरशिखण्डिन इव खमुड्डीयमानाः कोमलकल्पपादपपल्लववन्दनमाला- कलापा इवाबध्यन्त दिग्द्वारेषु दिक्पालैः। प्रणम्यमानश्च नेत्रविभागैश्च कटाक्षैश्च समप्रेक्षितैर्भ्रूवञ्चितैश्चार्धस्मितैश्च परिहासैश्च छेकालापैश्च कुशल- प्रश्नैश्च प्रतिप्रणामैश्चोन्मत्तभ्रूविक्षितैश्चाज्ञादानैश्चाक्रीणन्निव मानमयान्प्राणा- न्प्रणयदानैः प्रवीराणां वीरो यथानुरूपं विभभाज राजकम्। अथ प्रस्थिते राजनि बहलकलकलत्रस्तदिङ्नागशूत्काररव इवेतस्तत- स्तस्तार तारतरतूर्याणां प्रतिध्वनिराशातटेषु। दिग्गजेभ्यः प्रकुपितानां त्रिप्रस्रुतानां करिणां मदप्रस्रवणवीथीभिरलिकुलकालीभिः कालिन्दीवेणि- प्रसूताः कटाक्षैरपाङ्गदृष्टेः। भ्रूवञ्चितैर्भ्रूचलितैः। 'ध्रुवाञ्चितैः' इति पाठे उन्नतैक- भृचितैरित्यर्थः। छेकालापैर्वक्रोक्तिभिः छेकान्तराप्तरा वा। तस्तारेति । विस्तृतोऽभवत् । त्रिप्रस्रुतानां त्रिषु गण्डादिषु मदमुचाम्। शरीर झुक गया। उनके मन में आश्चर्य और भय दोनों व्याप्त हो गये। झुकने से सुवर्ण के मुकुट की खिसकती हुई मणियों की किरणें चारों तरफ उनके सिर पर फैलने लगीं। उनके सिर के कुसुमशेखर से पराग झड़ने लगा। चूड़ामणियों की नीचे, अगल-बगल में और ऊपर की ओर फैलती हुई किरणें बाणों के रूप में पहले-पहल सगुन करने के लिये चल पड़ीं। मेघ के समान मँडराती हुई धूल से भरे आकाश में गृहमयूरों के समान उड़ी हुई चूड़ामणियों की रश्मियाँ मानों दिशाओं के द्वारों पर कल्प वृक्ष के पल्लव की बन्दनवार के रूप में बँध गई। सम्राट् ने प्रणाम करते हुये किसी को तिहाई खुले हुए नेत्रों की दृष्टि से, किसी को कटाक्ष या अपांग दृष्टि से, किसी को समग्र दृष्टि या भरपूर आँखों से देखकर, किसी को और भी अधिक ध्यान से देखते हुए जिसमें भौहें खिंच जाती हैं, किसी को हल्की मुस्कुराहट से किसी को और अधिक मुख की प्रसन्नता से, किसी को चतुराई भरे एक दो शब्दों से, किसी को कुशल-प्रश्न पूछकर, किसी को प्रणाम के उत्तर में स्वयं प्रणाम करके, किसी को अत्यन्त बढ़े हुए भ्रूविलाश और वीक्षणरुचि से और किसी को आज्ञा देकर सम्मानित किया। इन-इन रूपों में अपने प्रणय का दान करके उनके मानधनी प्राणों को मानों सम्राट् मोल ले रहे थे। इस प्रकार वीरों में वीर सम्राट् ने राजसमूह को योग्यता के अनुसार विभक्त किया। देव हर्ष के प्रस्थान करने पर सेना के शोरगुल से मानों डरे हुए दिग्गजों की चिग्घाड़ हो, ऐसी तूर्य संज्ञक वाद्यों की ऊँची प्रतिध्वनि इधर-उधर दिशाओं में फैल गई। मतवाले हाथियों के कुम्भ, कपोल एवं सूँड़ से लुढ़कते हुए भौरों से काली मदधारायें बहने-

३६४ हर्षचरितम् कासहस्राणीव सस्यन्दिरे । सिन्दूररेणुराशिभिररुणायमानबिम्बे रवाव- स्तमयसमयं शशङ्किरे शकुनयः । करिणां षट्पदकोलाहलमांसलैः कर्ण- तालनिःस्वनैस्तिरोदधिरे दुन्दुभिस्वनयः । दोधूयमानश्च सचराचरमाच- चाम चामरसंघातो विश्वम् । अश्वीयश्वासविक्षिप्तैः शिश्विन्दे सितसिन्धु- वारदामशुचिभिर्निरन्तरमन्तरिक्षं फेनपिण्डैः । पिण्डीभूततगरस्तबकपा- ण्डुराणि पपुरिव परस्परसंघट्टनष्टाष्टदिशं दिवसमुच्चचामीकरदण्डान्यातप- त्रवनानि । रजौरजनीनिमीलितो मुकुटमणिशिलावलीबालातपेन विच- कास वासरः । राजतैर्हिरण्मयैश्च मण्डनकभाण्डमण्डलह्रादमानैर्हरीती- कृताः परिह्रादा हरितो बधिरतां दधुः । अरिप्रतापानलनिर्मूलनायेव मदो- ष्मशीकरैः शिशिकिरे करिणः ककुभां चक्रम् । चक्षुषामुन्मेषं मुमुषुस्तडि- च्चञ्चलानि चूडामणीनामर्चीषि । स्वयमपि विसिष्मिये बलानां भूपालः सर्वतोविक्षिप्तचक्षुश्चाद्राक्षीदावासस्थानसकाशात्प्रतिष्ठमानं स्कन्धावारम्, अधोक्षजकुक्षेरिव युगादौ निष्पतन्तं जीवलोकम्, अम्भानिधिमिव कुम्भ- शकुनयोऽत्र चक्रवाकाः। मण्डनकमायान्नम्। 'स्याद्भाण्डमश्वाभरणे'। अधोक्षजो हरि- लगीं, मानो यमुना की हजारों सोतें फूट पड़ी हों। हाथियों के मस्तक की सिन्दूर-धूलि सूर्यबिम्ब को लाल बनाने लगी जिसे देखकर पक्षी सायंकाल की शंका करने लगे। मद पीने के लिए बैठते हुए भौरों की गुंजार से भरी हाथियों के कर्णतालों की फट-फट आवाज ने दुन्दुभिध्वनि को तिरोहित कर दिया। चामर-समूह इस प्रकार झले जाने लगे कि चराचर के साथ सारा विश्व ही ढँक लिया गया। घोड़ों की श्वास से उड़े हुए उजले सिन्धुवार- पुष्प की मालाओं के समान मुख के फेन आकाश को सफेद बनाने लगे। एकत्र किए गए तगर के फूलों की भांति उज्ज्वल, ऊँचे सुवर्णदण्ड से शोभित छत्र एक में एक लग कर दिशाओं को इस प्रकार ढँक रहे थे मानों दिन का ही पान कर लिया हो। धूल की रात्रि के कारण छिपा हुआ दिन राजाओं के मुकुटों की मणियों के बालतातप से खिल उठा। घोड़ों के रुपहले और सुनहले साजों की खनखनाहट से दिशाएँ बधिर हो गईं। हाथियों ने शत्रु के फैले हुए प्रतापानल को मानों बुझाने के लिए अपने मदजल के फुहारों से दिशाओं को सींच दिया। बिजली के समान चंचल चूडामणियों की चमकक किरणें पलक उठाने नहीं देती थीं। चारों ओर दृष्टि फेंक कर सम्राट् ने जब अपनी सेना को देखा और युगारम्भ में विष्णु की कुक्षि से निकलते हुए जीव लोक के समान, अगस्त्य के मुख से संसार को प्लावित करने वाले समुद्र के समान और सहस्रार्जुन की भुजाओं से छूटकर हजारों रूपों में बहते हुए नर्मदा के प्रवाह के समान राजद्वार के समीप प्रस्थान करते हुए स्कन्धावार को देखकर

सप्तम उच्छ्वासः ३६५ भुवो वदनात्प्लावितभुवनमुद्गवन्तम्, अर्जुनबाहुदण्डसहस्रसंपिण्डितोन्मु- क्तमिव सहस्रधा प्रवर्तमानं प्रवाहं नर्मदायाः । 'प्रसर तात । भाव, किं विलम्बसे ? लङ्गति तुरङ्गमः । भद्र, भग्नचरण इव संचरसि यावदमी पुरः- सराः सरभसमुपरि पतन्ति । वाहयसि किमुष्ट्रम् ? न पश्यसि निर्दय, निःशूकशिशुकं शयानम् ? वत्स रामिल, रजसि यथा न नश्यसि तथा समीपे भव, किं न पश्यसि गलति सक्तुप्रसेवकः ? किमेवमित्त्वर, त्वरसे । सौरभेय सरणिमपहाय हयमध्यं धावसि ? धीवरि, विशसि । गन्तुकामा मातङ्गि, मातङ्गमार्गम् । अङ्ग, गलति तिरश्चीना चणकगोणी । गणयसि न मामारटन्तम् ? अवटमवटेनावतरसि । सुखमास्स्व स्वैरिणि । सौवी- रक, कुम्भो भग्नः । मन्थरक, खादिष्यसि गतः सन्निक्षून् । उक्षाणं प्रसा- दय । कियच्चिरमुञ्चिनोषि चेट, बदराणि ? दूरं गन्तव्यम् । किमद्यैव विद्रासि द्रोणक, द्राघीयसि दण्डयात्रा त्रिनैकेन निष्ठुरकेन निष्क्रेयमस्मा- कम् । अग्रतः पन्थाः स्थपुटक, स्थावरक, यथा न भनक्षि फाणितस्थालीं कुम्भभवोऽगस्त्यश्च । प्लावितभुवनं स्कन्धावारम् , नर्मदाप्रवाहं च । पूर्वं कार्त्तवीर्ये- णान्तःपुरैः सह रेवातीरे विहरता तच्छ्रोतो भुजसहस्रेणोभयतो वृत्वा त्यक्तमभूत् । प्रसरतेत्येवमादिप्रवर्तमाननानेकसंलापनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । तातेति । भावे- ति च । मान्यामन्त्रणम् । लसति गलति । प्रसेवको भस्त्राभरणमित्यन्ये । इत्वरो गमनशीलः । सौरभेयो दान्तः । अङ्गेति इष्टामन्त्रणम् । अवटं श्वभ्रम् । अतटेनामा- र्गेण । स्वैरिणि स्वतन्त्रे । 'स्वादीरेरिणोः' इति वृद्धिः। सौवीरिकं काञ्जिकम् । विद्रासि लङ्घसि । निष्ठा श्लेषः । स्थपुटो निम्नोन्नतः, विषम इत्यन्ये । फाणितमिक्षुविकारः, स्वयं भी आश्चर्य में डूब गए । चलते हुए कटक में अनेक संलाप सुनाई पड़ रहे थे—'आगे बढ़ो; भाई, देर क्यों लगा रहे हो ? अरे, घोड़ा लंगड़ाकर चल रहा है; भले मानस, अभी पाँव टूटे की तरह रेंग रहे हो, और ये आगे वाले लोग हमारे ऊपर गिरे पड़ते हैं; अरे निर्दय, ऊँट को मत चला, देखता नहीं बच्चा आगे सोया पड़ा है ? वत्स रामिल, धूल में कहीं गायब न हो जाओ, मेरे समीप ही रहो; अरे देखते नहीं कि फटे थैले से सत्तू कैसे गिर रहे हैं ? अरे चालू, ऐसी हड़बड़ी ही क्या है ? अबे, बैल की लीक छोड़कर घोड़ों के बीच भागा जाता है ? अरी धीवरी, कहाँ घुसी पड़ती है ? अरी हथिनी की बच्ची, हाथियों में जाना चाहती है; वाह, चने की बोरी टेढ़ी होकर झर रही है; अरे, मैं कब से चिल्ला रहा हूँ, फिर भी तू नहीं सुनता; अरे, गड्ढे में गिरेगा क्या ?; अरे मनमौजी, चुपचाप बैठ; अरे सौवीरक, तेरा घड़ा तो फूट गया; अरे मन्थरक, पड़ाव पर ही पहुंचकर गन्ना

३६६ हर्षचरितम् गरीयानगडकतण्डुलभारको न निर्वहति दम्यः । दासक, माषीणादमुतो द्राग्दात्रेण मुखघासपूलकं लुनीहि । को जानाति यवसगतं गतानाम् । धव, वारय बलीवर्दाम् । वाहीकरक्षितं क्षेत्रमिदम् । लम्बिता शकटी । शाकरं धुरंधरं धुरि धवलं नियुङ्क्ष्व । यक्षपालित, प्रमदाः पिनक्षि । अक्षिणी किं ते स्फुटिते । हत हस्तिपक नेदीयसि करिकरदण्डे समदः संमर्दकर्दमे स्खलसि । भ्रातर्भावविधुरबन्धो, उद्धर पङ्कादनड्वाहम् । इत एहि माणवक, घनेभगटासंघट्टसंकटे नास्ति निस्तरणसरणिः ।' इत्येवमा- दिप्रवर्तमाननानेकसंलापं क्वचित्स्वेच्छामृदितोद्दामसस्यघासविघससुखसं- गुड इति प्रसिद्धः । दम्यो दान्तः । माषाणां भवनं क्षेत्रम् । 'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्' । किञ्चिन्मात्रं बुभुक्षानिवृत्तये । घासो मुखघासः । यवसं घासः । उक्तं च 'शष्पं बालतृणं घासो यवसम्' इति । धवः पुरुषः । वाहीकः काष्ठकः, परिपालक इत्यन्ये, गोरक्षक इति चान्ये । लम्बिता मार्गमाक्रान्तुं न शक्नोति । शाकरं शूरम् । तरुणं वा । धवलं महोक्षम् । नेदीयसि करदण्डेऽन्यहस्तसंबन्धिनि सति । करी समदोऽर्थात्संपन्नः । स्वेच्छयानायासेन । मृदितानि क्षुण्णानि । उद्दामानि प्रभूतानि सस्यानि । घासो यवसम् । तथा घासो विघसं, तथा विघसो भृत्याद्युपयुक्तशेष- चूस लेना, बिगड़े बैल को सम्हाल, कबतक बेर बीनता रहेगा ? चल, दूर जाना है; द्रोणक, आज ही क्यों ऊब गए, अभी तो सेना की यात्रा लम्बी पड़ी है; स्थपुटुक, आगे और भी मार्ग है; स्थावरक, खांड़ की हांड़ी को फोड़ न देना; चावलों का बोरा भारी है बैल के मान का नहीं; अबे टहलुवे, सामने उड़द के खेतों में से बैलों के लिए एक पूली तो दरांत से जल्दी काट ले; कौन जाने, यात्रा में चारे का क्या प्रबन्ध होगा ? यार, बैलों को अलगाए रहो, इस खेत में रखवाले हैं; सग्गड़ गाड़ी में ओलार पड़ता है, तगड़ा धौला बैल उसमें जोतो; ऐ पगले, स्त्रियों को रौंद डालेगा ? तेरी आँखें क्या फूट गई हैं ? धत्तेरे हस्तिपक की, मेरे हाथी की सूँड़ पर चढ़ा हुआ खिलवाड़ कर रहा है; ओ, धक्कामक्की खाकर कीचड़ में गिर रहा है । ऐ भाई, दुखियों के साथी कीचड़ में फँसे बैल को निकाल लो; छोकरे, इधर भाग आ, हाथियों के भीड़-भड़क्के में अगर गया तो फिर जीता बच निकलने का उपाय नहीं।' कहीं पर कटवा कर ढेर की ढेर काई गई हरी घासों को मीड़ कर मनचाहा आहार प्राप्त कर वे लोग सुख से फूल रहे थे और आपस में हँसी-मजाक करते हुए खिलखिला कर हँस रहे थे । ये लोग नौकर-चाकर थे, जैसे मेठ (हाथियों की झाड़-पोंछ करने वाला ), बंठ (कुंवारे जवान पट्ठे जो डंडा लिए हाथी से भिड़ आते थे ), वल्लर (उमड्ड ), कञ्चन ( गदहे की तरह काम लेने योग्य कह्लू नौकर ), केलिक ( घोड़ों

सप्तम उच्छ्वासः ३६७ पन्नान्नपुष्टैः केलिकलैः कित्किलायमानैर्मेण्ठबण्ठवठरलम्बनलेशिकलुण्ठ- कचेटशाटचण्डालमण्डलैरान्डीरैः स्तूयमानम्, क्वचिदसहायेः क्लेशाज्जि- तकुपामकुटुम्बिसंपादितसीदत्सौरभेयशम्बलसंवाहनायासावेगागतसंयोगैः स्वयंगृहीतगृहोपस्करैः 'इयमेका कथंचिद्दण्डयात्रा यातु । यातु पाताल- तलं तृष्णाभूतेरभवनिः । भवतु शिवम् । सेवां करोतु । स्वस्ति सर्वदुःख- कूटाय कटकाय' इति दुर्विधवृद्धकुलपुत्रकैर्निन्द्यमानम्, क्वचिदतीतीक्ष्णस- लिलस्रोतःपातिनौगतैरिव ग्रथितैरिव पङ्क्तिभूतैर्जनैरतिद्रुतम्, द्रवद्भिः कृष्ण- कठिनस्कन्धगुरुलगुडैर्गृहीतसौवर्णपादपीठीकरङ्ककलशपतद्ग्रहावग्राहैः प्र- त्यासन्नपार्थिवोपकरणग्रहणगर्वदुवारैः सर्वमेव बहिः कार्यद्भिर्भूपतिभृतक- मन्नम्, परस्परलुण्ठनं वा, तैः सुखेन संपन्नं यदन्नं तेन सुपुष्टैः । केलिकलाः प्रहसनाः, बहुभाषिणो वा । मेण्ठा हस्तिजागरिकाः । वण्ठाः अकृतविवाहास्तरुणाः, ये दण्ड- मादाय हस्तिनां दर्पमाकर्षयन्ति, पत्तय इत्यन्ये । वठरा मूर्खाः । लम्बाना गर्दभ- दासाः । लेशिका जनपरिचारकाः । लुण्ठकाश्चौराः । चेटा दासाः । शाटा धूर्ताः । चण्डाला अश्वपालाः । आण्डीराः प्रगल्भाः । यद्वा राण्डीराः रण्डापुत्राः । संपादितो दत्तः । सीदन्नसमर्थो यः सौरभेयस्तेन शम्बलसंवाहनाय य आयासो योगस्तेन । गतसंयोगैरुत्पन्नचित्तक्षोभैरिति समासः । अभवनिरिति 'आक्रोशे नञ्यनिः'। दुर्विधा दरिद्राः । वृद्धाः स्थविराः । कुलपुत्राः कुलक्रमागाताः सेवकास्तैर्निन्द्यमानमिति स्कन्धावारविशेषणम् । क्वचिच्च भूपङ्गाधिकारिकर्महानसोपकरणवाहिभिश्च समुत्सार्य- माणपुरोवर्तिजनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । अतिशीष्णं वेगवत् । ग्रन्थिविद्यते येषां तैः । करकस्ताम्बूलाधारः । पतद्ग्रहो निष्ठीवनपात्रम् । अवग्राहः स्नानद्रोणी । के घसियरे ), लुंठक ( लूट-पाट करने वाले ), चेट ( छोटे नौकर-चाकर ), शाट ( धूर्त या शठ ), चंडाल ( अश्वपाल ), आण्डीर ( प्रगल्भ )—ये सब यात्रा की प्रशंसा करते थे । कहीं पर बेचारे असहाय वृद्ध कुलपुत्र जो किसी तरह गाँवों से मिले हुए मरियल बैलों पर सामान लादकर और स्वयं अपने ऊपर सामान लादकर घिसट रहे थे बुरी तरह घबड़ा कर कोसने लगे—'बस यह यात्रा किसी तरह पूरी हो जाय, तृष्णा पाताल चली जाय, धन का सत्यानाश हो, भगवान् बचाय इस नौकरी से । सब दुःखों की जड़ इस कटक को हाथ जोड़ता हूँ।' कहीं तेजी से बहते हुए जल के प्रवाह में नावों की भांति पंक्तिबद्ध होकर एक में-एक गुथे हुए ऐसे लोग चल रहे थे । राजाओं के अन्न-पान को ढोने वाले कर्मचारी बाहर निकाल रहे थे, वे अपने काले कठोर कंधों पर भारी लट्ठ रखे हुए थे, सोने का पाद- पीठ, पानदान, पानी का कलसा, पीकदान, नहाने की द्रोणी आदि राजाओं की निजी