भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

३५२ हर्षचरितम् दशद्वीपजेतव्याधिकारे दक्षिणं भुजस्तम्भमहमहमिकया सेबकैरिव सनि- मित्तैरपि समग्रैरग्रतो भवद्भिः प्रमुदितप्रजाजन्यमानजयशब्दकोलाहलो हिरण्यगर्भ इव ब्रह्माण्डात्कृतयुगकरणाय भवनान्निर्जगाम। नातिदूरे च नगरादुपसरस्वति निर्मिते महति तृणमये, समुत्तम्भि- ततुङ्गतोरणे, वेदीविनिहितपल्लवलालामहेमकलशे, बद्धवनमालादाम्नि, धवलध्वजमालिनी, भ्रमच्छुक्लवाससि, पठद्द्विजन्मनि मन्दिरे प्रस्थानम- करोत्। तत्रस्थस्य चास्य ग्रामाक्षपटलिकः सकलकरणिपरिकरः 'करोतु देवो दिवसग्रहणमद्यैवाबन्ध्यशासनः शासनानाम्' इत्यभिधाय वृषाङ्काम- भिनवघटितां हाटकमयीं मुद्रां समुपनिन्थे। जग्राह च तां राजा। समु- पस्थापिते च प्रथमत एव मृत्पिण्डे परिभ्रश्य करकमलादधोमुखी महीतले पपात मुद्रा। मन्दाश्यानपङ्कपडले मृदुमृदि सरस्वतीतीरे परिस्फुटं व्यरा- जन्त राजयो वर्णानाम्। अमङ्गलाशङ्किनि च विषीदति परिजने नरपति- ललामं चिह्नम्। 'ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु'। वनमाला पुष्प- पत्रप्रतियोजिता स्रक्। अक्षाणां भूतानां। पटले समूहे नियुक्तोऽक्षपटलिकः। ग्रामा- णामक्षपटलिकः ग्रामाक्षपटलिकः। करणिर्लेख्यम्। कायस्थ इत्यन्ये। मुद्रा वालिका। मन्दार्यानमीषच्छुष्कम्। आने लगे। प्रजा के लोग प्रसन्न होकर उनका जयजयकार करने लगे। सतयुग की स्थापना के लिए ब्राह्मण से निकले हुए ब्रह्मा के समान हर्ष राजभवन से बाहर आए। नगर से थोड़ी दूर सरस्वती के किनारे घास-फूस छाकर एक बड़ा राजमन्दिर तैयार किया गया था। उसमें ऊँचा तोरण खड़ा किया गया था। वेदी पर पल्लवसहित हेमकलश रखा हुआ था, वनमालाएँ लटकाई गई थीं, श्वेत ध्वजाएं फहराई गई थीं। श्वेत वस्त्रों से चेलोत्क्षेप हो रहा था और ब्राह्मण लोग मंगलपाठ कर रहे थे। ऐसे मन्दिर में हर्ष ने प्रस्थान किया। वहाँ उनके ग्रामाक्षपटलिक (गाँव का मुख्य अर्थ-अधिकारी, पटवारो) ने अपने समस्त लेखकों के साथ निवेदन किया—'देव आपका शासन अव्यर्थ है, अत एव आज ही शासनदान का आरम्भ करें।' यह कह कर उसने नई बनी हुई एक सोने की मुद्रा जिस पर बैल का चिह्न बना था, हर्ष के हाथ में दी। राजा ने जैसे मुद्रा हाथ में ले ली और पहले से सामने रखे हुए मिट्टी के पिण्डे पर उसे लगाना चाहा कि वह हाथ से छूट कर गिर गई और सरस्वती के किनारे की गीली मुलायम मिट्टी पर उसके अक्षर स्पष्ट छप गए। परिजन लोग अमंगल की आशंका से खिन्न होने लगे, तब हर्ष ने मन में यह कहा—'सीधे-सादे लोगों की बुद्धि तत्त्व को नहीं समझ पाती। 'यह पृथिवी आपके

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 399, कुल 506 में से · BharatKosha