भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 506 में से

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पृष्ठ 400

सप्तम उच्छ्वासः ३५३ रकरोन्मनस्येतत्—'अतत्त्वदर्शिन्यो हि भवन्त्यविदग्धानां धियः । तथा हि-एकशासनमुद्राङ्का भूर्भवतो भविष्यतीति निवेदितमपि निमित्तेनान्यथा गृह्णन्ति ग्राम्याः ।' इत्यभिनन्द्य मनसा महानिमित्त तत्सीरसहस्रसंमित- सीम्नां ग्रामाणां शतमदाद्द्विजेभ्यः । निनाय च तत्र तं दिवसम् । प्रतिप- न्नायां शर्वर्यां समानितसर्वराजलोकः सुष्वाप । अथ गलति तृतीये यामे सुप्तसमस्तसत्त्वनिःशब्दे दिक्कुञ्जरजृम्भमाण- गम्भीरध्वनिरताड्यत प्रयाणपटहः । अग्रतः स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः प्रयाणक्रोशसंख्यापकाः स्पष्टमष्टावदीयन्त प्रहाराः पटहे पटीयांसः । ततो रटत्पटहे, नन्दन्नान्दीके, गुञ्जत्गुञ्जे, कूजत्काहले, शब्दायमान- शङ्खे, क्रमोपचीयमानकटककलकले, परिजनोत्थापनव्यापृतव्यवहारिणि, द्रुतद्रुघणघातघट्यमानकोणिकाकीलकोलाहलकलितककुभि, बलाधिकृत- एकशासनमुद्रैवाङ्को यस्याः सा । सीरं हलम् । संमितं परिच्छिन्नम् । अष्टक्रोशा अद्य गन्तव्यमिति प्रायेण क्रोशसंख्यापकाः । तत इत्यादौ । एवंविधे प्रयाणसमये राजभिरापुपूरे राजद्वारमिति संबन्धः । नान्दी मङ्गलपटहः । गुञ्जासंज्ञः शङ्खभेदो यत्पृष्ठे जतु परिकलितं भवति । 'सन्ना' इति यस्य प्रसिद्धिः । शङ्खश्च मुण्डशङ्ख इति प्रसिद्धः । द्रुघणोऽयस्ताडनभाण्डम् । एक छत्र शासन की मुद्रा से अंकित होगी' इस प्रकार का निमित्त सूचित होने पर भी ये नासमझ कुछ और अर्थ लगा रहे हैं।' इस महानिमित्त का हर्ष ने मन में अभिनन्दन किया और सौ गाँव, जिनमें प्रत्येक का क्षेत्रफल एक सहस्र हल भूमि था, ब्राह्मणों को दान में दिए। वे दिन भर वहीं रहे। रात होने पर सब राजाओं के सम्मान के बाद शयन किया। जब रात का तीसरा याम समाप्त हो रहा था और सबके सो जाने से चारों ओर निसबद हो रहा था, तभी दिग्गज की जंभाई की तरह गम्भीर ध्वनि से कूच का नगाड़ा बजाया गया । कुछ ठहर कर आगे पहुँचे हुए सेना के ठहराव के लिए कोसों की सूचना देने वाले पुरुषों ने जोर-जोर से डंके की आठ चोटे मारीं। सैनिक प्रयाण के अवसर में नगाड़े बजने लगे। नान्दीक की आवाज होने लगी। गुंजा गूंजने लगा और काहल भी बजने लगे । शंखों के शब्द होने लगे । क्रम से पूरे कटक का शोरगुल बढ़ने लगा । झाडू देने वाले जमादार आकर नौकरों को जगाने लगे। मुंगरी की तड़ातड़ चोटों का (घड़ियाल पर उत्पन्न शब्द से) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ नुकीले पतले डंडों से बजाए जाते हुए नक्कारों का शब्द दिशाओं में भर गया। सैनिक २३ ह० च०