हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ हर्षचरितम् बध्यमानपाटीपतिपेटके, जनज्वलितोल्कासहस्रालोकलुप्यमानत्रियामात- मसि, यामचेटीचरणचलनोत्थाप्यमानकामिमिथुने, कटुककटुकनिर्देशन- श्यन्निद्रोन्मिषन्निषादिनि, प्रबुद्धहास्तिकशून्यीक्रियमाणशय्यागृहे, सुप्तोत्थि- ताश्वीयविधूयमानसटे, रटकटकमुखरखनित्रखन्यमानक्षोणीपाशे, समु- त्कील्यमानकीलशिञ्जानशिञ्जीरे, उपनीयमाननिगडतालकलरवोत्तालतुरङ्ग- तरङ्गयमाणखुरपुटे, लेशिकमुच्यमानमदस्यन्दिदन्तिसंदानशृङ्खलाखनख- ननिनादनिर्भरभरितदशदिशि, घासपूलकप्रहारप्रमृष्टपांसुलकरिपृष्ठप्रसार्य- माणप्रस्फोटितप्रमृष्टचर्मणि, गृहचिन्तकचेटकसंवेष्ट्यमानपटकूटिकाण्डप- कोणिकाः पटहकुट्यादिकेषु याः कीलिकाः । पाटी बहुपरिवारपुरुषगृहीतो निवास- भूभागः, कुलपुत्रकसमूह इत्यन्ये । पेटकं तत्समूहः, 'पाठीपति' इति पाठे पाटीपतयः प्रतिनियतस्वस्थानपरिच्छिन्नः । उल्का दीपिका । यामचेटी प्रहरजागरणनियुक्ता । तत्क्षणं चरणचलनं पादेषु स्पर्शः । कटुकानां हस्तिपकयोक्त्राणाम् । यः कटुको रूक्षः । निर्देश आज्ञा । निषादिनां हस्त्यारोहाणाम् । हास्तिकं हस्तिसमूहः । अश्वी- यमश्ववृन्दम् । क्षोणीपाशो भूम्या निवन्धनम् । समुत्कील्यमानान्युत्खन्यमानानि । शिञ्जीरं लौही शृङ्खला । निगडार्थं तालकं तालपत्रं निगडतालकम् । लौह एवाध- बन्धनविशेष इत्यन्ये । तरङ्ग्यमाणाः कुटिलीक्रियमाणाः । लेशिकाः घासिकाः । संदानशृङ्खला बन्धनाद्याः । प्रस्फोटितं विस्फारितम् । प्रमृष्टं शोधितम् । पटकुट्यादयः स्कन्धावारसरणिप्रभेदाः । तथा च पटैः कुटी सूक्ष्मगृहम् । काण्डपटकं काण्डैः संगठन करने वाले बलाधिकृतों ने पाटीपतियों (सेना के निरीक्षकों) को इकट्ठा किया। चारों ओर मशालें जल उठीं और अन्धकार दूर हो गया। चौथे पहर पर आने वाली चेटियाँ पहुँच गईं और उनके पैरों की आहट से साथ सोए हुए स्त्री-पुरुष उठ बैठे। हाथीवान् प्यादों की कड़ी डांट से उठ कर आँखें मलने लगे। जगे हुए हाथी शयनगृह के बाहर आ गए। घोड़े भी उठकर अयाल झाड़ने लगे। हाँफने की आवाज करते हुए प्यादे कुदालों से तम्बुओं के धरती में गड़े फाँसेदार भाँकुड़ों को खोदने लगे। कीलों के उखाड़ने से लोहे की सींकदें आवाज करने लगीं। घोड़ों के पैरों में पड़े हुए खटकेदार कड़े जब खोले जाने लगे तो इन्होंने अपने खुर टेढ़े कर दिए। जब मतवाले हाथियों के पैरों में पड़ी बन्धनशृङ्खलाओं को लेशिक (चारा देने वाले घसियारे) खोलने लगे तो खनखन का शोर चारों ओर भर गया। धूल से भरी हाथियों की पीठें घास के लम्बे मुट्ठों से झाड़कर साफ की गईं और उन पर कमाये हुए चमड़े की खालें डाल दी गईं। डेरों के बनने- उखाड़ने की चिन्ता रखने वाले (गृहचिन्तक) नौकर-चाकर तम्बू, बड़े डेरे, कनात और