भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402

सप्तम उच्छ्वासः ३५५ ऽमण्डपपरिवस्त्रावितानके, कीलकलापापूर्यमाणचिपिटचर्मपुटे, संभाण्डाय- मानभाण्डागारिणि, भाण्डागारवहनसंवाह्यमानबहुनालीवाहिके, निषादिनि- श्चलानेकानेकपारोप्यमाणकोशकलशपीडापीडसंकटायमानसामन्तौकसि, दूरगतदक्षदासेरकक्षिप्तप्रक्षिप्यमाणोपकरणसंभारभ्रियमाणदुष्टदन्तिनि, ति- र्यगानमज्जाघनिककरकृच्छ्राकृष्टलम्बमानपरतन्त्रतुन्दिलचुन्दीजनजनितज- नहासे, पीड्यमानशारशारिवरत्रागुणप्राहितगात्रविहारबृंहद्बृहद्बृहदुन्मदक- रिणि, करिघटाघटमानघण्टाटंकारक्रियमाणकर्णज्वरे, पृष्ठप्रतिष्ठाप्यमानक- ण्ठालककदर्शितकूजत्करभे, अभिजातराजबुत्रप्रेष्यमाणकुप्ययुक्त्याकुलकुली- नकुलपुत्रकलत्रवाहने, गमनवेलाविप्रलब्धवारणाधोरणान्विष्यमाणवसे- पटैश्च गृहम् । परिवस्त्रा तिरस्करिणी । वितानको रक्तकः । चिपिटो ह्रस्वः । चर्म- पुटश्चर्मप्रसेवकः । संभाण्डायमानो भाण्डानि समाचिन्वन् । 'भाण्डात्समात्र्यने' इति णिच् । संवाह्यमानाः प्राप्यमाणाः । नालीवाहिकः करिणां घासग्रहण- नियुक्तो हस्तिपको मेण्ठाख्यः । चुन्दी कुट्टनी । शारिमञ्जरी । हस्तिपर्याणमित्यर्थः । त्त्सत्थैः पीड्यमानदामभिग्र्राहितेन गात्रविहारेण देहकम्पेन बृंहन्तः शब्दायमानाः शामियाने लपेटने में लग गए और खूँटों को चपटे चमड़े के थैलों में भरने लगे । भण्डारी बर्तनों को बटोरने लगे । हथियों के घसियारे भण्डार ढोने के लिए बुलाए जाने लगं । हाथीवानों ने सीधे हाथियों को लाकर चुपचाप खड़ा कर दिया और उन पर सामन्तों के डेरों में भरा हुआ सामान, प्याले और कलशों की पेटियों के समूह लादने लगे । जो दुष्ट हाथी थे उन पर सझे हुए ऊँट काठ-कबाड़, खाट-पीढ़े आदि उपकरण-सम्भार दूर से फेंक कर लदवाने लगे । दूसरे लोग मुटल्ली दासियों को, जो चल नहीं पा रही थीं, टेढ़ा झुक कर जोर से घसीटते ले जा रहे थे, यह देख कर कुछ लोग हँस रहे थे । रंग-बिरंगी मोटी रस्सियों के कसे जाने के कारण जिनके झूमने में बाधा पड़ रही थी, ऐसे विशालकाय मन-मौजी हाथी चिग्घाड़ रहे थे । हाथियों के घण्टे की टंकार से कान फटने लगे । पीठ पर लादी जाती हुई कंडालों के कष्ट से ऊँट बलबला रहे थे । अभिजात राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल जड़े वाहनों में कुलीन राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल-जड़े वाहनों में कुलीन कुलपुत्रों की आकुल स्त्रियां जा रही थीं । चलते समय इधर-उधर भटके हुए नये सेवकों को हाथियों के आधोरण ढूँढ़ रहे थे । प्रसाद पाये हुए पैदल राजवल्लभ घोड़ों को पकड़ कर ले चल रहे थे । सजी-धजी १. इस वाक्य में श्री अग्रवाल जी के अनुसार 'कुप्रयुक्त' के स्थान पर 'कुप्ययुक्त'- पाठ स्वीकृत है । (ह० सां० १४२-१४३) ।