हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ हर्षचरितम् वके, प्रसादवित्तपत्तिनीयमाननरपतिवल्लभवारवाजिनि, चारुचाटभटसैन्य- न्यस्यमाननासीरमण्डलाडम्बरस्थूलस्थासके, स्थानपालपर्याणलम्बमान- लवणकलायीकिङ्किणीनालीसनाथसंकलिततलसारके, कुण्डलीकृतावरक्षणी- जालजटिलवल्लभपालाश्वघटानिवेश्यमानशाखामृगे, परिवर्धकाकृष्यमाणा- र्धजग्धप्राभातिकयोग्याशनप्रारोहके, व्याक्रोशीविजृम्भमाणघासिकघोषे, गमनसंभ्रमभ्रष्टभ्रमदुत्तुण्डतरुणतुरङ्गतन्यमानानेकमन्दुराविमर्दे, सज्जी- करिणो यत्र तस्मिन् । प्रसादेन वित्ताः पत्तयः । वारोऽवसरः । 'निवहावसरौ वारः' इत्यमरसिंहः । तत्र वाजिनो ये सेवकानां प्रत्यवसरं विसृज्यन्ते । 'वर' इति पाठः । चारुचारभटसैन्येन त्रस्यमाना आत्मन एव क्रियमाणाः । नासीरेन कूर्परेण । मण्डलाडम्बरार्थाः स्थूलाः स्थासकाश्चन्द्रका यत्र । अन्ये नासीरमग्रेसरमाहुः । स्थानपालानां पर्याणेषु लम्बमाना लवणकलायी किङ्किणी । नालीसनाथा संकलिता तलसारिका यत्र । स्थानपाला अश्वपालाः । अश्वभाण्डागारिका इत्यन्ये । लवण- कलायी मृगाकृतिरश्वानां दाहमयी क्रियते । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । नाली प्रधानार्थं वेणवी नाडिरुच्यते । तलसारकोऽश्वमुखपट्टिकोर्णादिसूत्रमयी । उरः- पट्टिकेत्यन्ये । कुण्डलीकृतैरवरक्षणीजालैर्जटिला वल्लभपाला यासु तास्वश्वघटासु निवेश्यमानाः शाखामृगा यासु । अवरक्षण्यश्वबन्धनरज्जुः । वल्लभपालोऽश्वपालः । अन्ये तु यो बलवान् । महाकारो ह्योपकरणम् । यवससण्डुलादि वहति स वल्लभपालोऽश्वपाल इत्याहुः । शाखामृगो वानरः । रक्षार्थमश्वानां परिवर्धकोऽश्व- पालः । प्रौढिको योग्याशनार्थं प्रसेवको यो 'बुकण' इति प्रसिद्धः । व्याक्रोशी चाटभट सेना के हरावल दस्ते चौड़े छोपे हुए निशानों वाले वेष से सजे थे । स्थानपालों के घोड़ों की प्लानें लटकती हुई लवणकलायीं, किंकिणी और नाली से सुशोभित थीं एवं ज़ेरबंद (तलसारक) से बंधी हुई थीं । राजवल्लभ घोटों के परिचारक घोड़ों के बांधने की अवरक्षणी रस्सी लपेट कर लिए हुए थे और साथ में (घोड़ों को रोग और छूत से बचाने के लिए) बन्दर ले चल रहे थे । सवारों के घोड़े प्रभातकालीन भोजन अभी आधा ही समाप्त कर चुके थे कि परिचारकों ने उनके तोबड़े उतार लिये । घसियारे परस्पर चिल्ला- चिल्ला कर शोर मचा रहे थे । चलने की हड़बड़ी में छूट कर भागे हुए तरुण घोड़े मुँह उठाकर दौड़ मारने लगे जिससे घुड़साल में खलबली मच गई । हथिनियाँ इधर-उधर सवारी के लिए सजकर तैयार हो गईं तो परिचारकों के पुकारने पर जल्दी से सुन्दरियों १. 'चारभट' के स्थान पर चाटभट किया गया है (हर्ष० सां० १४२-१४३)