हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३५७ कृतकरेणुकारोहाह्वानसत्वरसुन्दरीदीयमानमुखालेपने, चलितमातङ्गतुरङ्ग- प्रधावितप्राकृतप्रातिवेशिकलोकलुण्ठ्यमाननिर्घाससस्यसंचये, संचरच्चेल- चक्राक्रान्तचक्रीबति, चक्रचीत्कारिगन्त्रीगणगृह्यमाणप्रहृतवर्त्मनि, अकाण्ड- कोड्डीयमानभाण्डभरितानडुहि, निकटघासलाभलुब्धल्लम्बमानप्रथमप्रसा- र्यमाणसारसौरभेये, प्रमुखप्रवर्त्यमानमहासीमन्तमहानसे, पुरःप्रधावद्ध्व- जवाहिनी, प्रियशतोपलभ्यमानसंकटकुटीरकान्तरालनिसरणे, करिचरण- दलितमठिकोत्थितलोकलोष्टहन्यमानमेण्ठक्रियमाणासन्नसाक्षिणि, संघट्ट- विघट्टमानव्याघ्रपल्लीपलायमानक्षुद्रकुटुम्बके, कलकलोपद्रवद्रवद्द्रविणब- लीवर्दविद्राणवणिजि, पुरःसरदीपिकालोकविरलायमानलोकोत्पीडाप्रस्थि- तान्तःपुरकरिणीकदम्बके, हयारोहाहूयमानलम्बितशुनि, सरभसचरणनि- परस्पराह्वानम् । उत्तुण्डा उत्प्रोथाः । मुखालेपनं सिन्दूरादिना करेणुकार्थमेव । प्रातिवेशिकलोकाः प्रत्यासन्ननिवासा जनाः । निर्घासो भुक्तशेषो घासः । चेलं वस्त्रम्, बालको वा चेलः । चक्रीवाग्गर्दभः, उष्ट्रो वा । गन्त्री शकटिका । गृह्यमाण- मधिष्ठीयमानम् । प्रहतं क्षुण्णम् । सर्वसेवितमित्यर्थः । लम्बमानो गर्दभदासः, वणिजां कर्मकरो वा । सारसौरभेयो बलवाननड्वान् । प्रमुखेऽग्रे । महानसं सूपकारशाला । कुटीरं मठिका, स्वल्पगृहम् । मेण्ठो जागरिकः । व्याघ्रपल्ली तृणकुटीभेदः । क्षुद्रमल्पम् । कुटुम्बकं परिवारः । विद्राणाः सशोकाः । लम्बितः मुखालेपन (हथिनियों के मुँह पर माडने-बनाने की सामग्री) लेकर आई । हाथी-घोड़े जब चल पड़े तब उनके पड़े हुए चारों को लूटने के लिए आसपास में छोटे कौम के लोग आ पहुँचे । छोकरे गदहों पर सवार होकर साथ चल पड़े । चलते हुए चक्रों की चरर- मरर आवाज करती हुई गाड़ियाँ मार्ग में लीक डालने लगीं । मांगने पर फौरन देने योग्य सामान बैलों पर लादा गया । रसद का सामान देने वाले बनियों के बैल पहले ही रवाना कर दिए गए थे, किन्तु वे (या उन्हें हांकने वाले नौकर) घास के लोभ में देर लगा रहे थे । महासामन्तों के रसोड़े आगे ही भेज दिए गए थे । पताका लेकर चलने वाले पुरुष आगे-आगे दौड़ रहे थे । भरे कुटीर के मध्य से निकलते हुए सैनिक अपने प्रिय जनों से मिल रहे थे । हाथियों ने रास्ते के छोटे-छोटे घरों को पैर से रौंद डाला । लोग उठ उठ कर हाथिवानों को ढेले से मारने लगे और वे बेचारे पास के लोगों को साक्षी बनाकर सन्तोष कर लेते थे । फूस की झोपड़ियाँ इसी धकमधक्के में तितर-बितर हो गई और उसमें रहने वाली छोटी गृहस्थियाँ जान लेकर भागीं । माल से लदे हुए बैल जब शोरगुल से बिदकने लगे तो बनियें सोच में पड़ गये । अन्तःपुर की स्त्रियाँ हथिनियों पर बैठ कर