हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ हर्षचरितम् पतननिश्चलगमनसुखायमानखक्खटस्तूयमानतुङ्गतङ्गणगुणे, स्रस्तवेसर- विसंवादिसीदद्दाक्षिणात्यसादिनि, रजोजग्धजगति प्रयाणसमये, प्रतिदि- शमागच्छद्भिर्गजवधूसमारूढैराधोरणैरूर्ध्वध्रियमाणहेमपत्रभङ्गशारशाङ्गैः, अन्तरासनासीनान्तरङ्गगृहीतासिभिः, ताम्बूलिकविधूयमानचामरपल्लवैः, पश्चिमासनिकार्पितभस्त्राभरणभिन्दिपालपूलिकैः, पत्रलताकुटिलकलधौत- नलकपल्लवितपर्याणैः, पर्याणपक्षकपरिक्षेपपट्टिकाबन्धनिश्ञ्चलपट्टोपधानस्थि- रावधानैः, प्रचलपादफलिकास्फालनस्फायमानपदबन्धमणिशिलाशब्दैः, उच्चित्रनेत्रसुकुमारस्वस्थानस्थगितजङ्घाकाण्डैश्च कार्द्मिकपटकल्माषित- पिशङ्गपिङ्गैः, अलिनीलमसृणतुलासमुत्पादितसितसमायोगपरभागैश्चा-
पश्चात्खचितः। खक्खटा वृद्धाः। तुङ्गा उच्चाः, तङ्गणो देशः, तद्देशजोऽप्यश्वस्तङ्गणः। विसंवादः परिशीलनम्। दक्षिणापथे वेसरा न सन्तीत्यदृष्टदेशाः। सादिनोऽश्वारोहाः। भस्त्राभरणं तूणभेदः। भिन्दिपालः शरभेदः। तोमर इत्यन्ये। पक्षकः प्रान्तः, पार्श्वं वा। परिक्षेपो वेष्टनम्। पादफलिका उभयपार्श्वयोः पर्याणे या क्रियते। आगुल्फं पादत्राणमिरयन्ये। आस्फालनं चालनम्। स्फायमानो वर्धमानः। पाद- बन्धः पादकटकः। नेत्रं पटविशेषः। स्वस्थानं स्वस्थानेति यस्याः प्रसिद्धिः। कार्द्- मिकं कर्दमेन रक्तम्। कल्माषिताः शबलिताः। पिशङ्गा लोहिताः। पिङ्गा जङ्गिका।
निकलीं, उनके सामने मशाल लेकर लोग चलते थे जिसके संकेत से जनता मार्ग छोड़कर अलग हो जाती थी। घुड़सवार पीछे छूटे हुए अपने कुत्तों को पुकारने लगे। तंगण देश के ऊँचे घोड़े इस प्रकार तेज चल रहे थे कि उनकी पीठ बिलकुल नहीं हिल रही थी और उन पर सुख से सवार हुए खक्खट क्षत्रिय उनकी प्रशंसा कर रहे थे। खच्चरों पर तकलोफ से बैठे हुए दक्खिनी सवार फिसले पड़ते थे। चारों ओर धूल भर जाने से कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। हथिनियों पर सवार होकर देश-देश के राजा आने लगे। हाथीवानों द्वारा रखे गए हौदों की सोने की पत्ररचनाओं से उनके धनुष रंग-बिरंगे हो रहे थे। उनके पास बीच में तलवार पकड़े स्वजन लोग आसीन थे। ताम्बूलिक चँवर झल रहे थे। हाथियों के पीछे की ओर बैठे हुए परिचारक चमड़े के बने हुए विशेष प्रकार के तरकशों में भरे हुए छोटे हलके भालों के मुट्ठे लिए हुए थे। घुड़सवारों के पलानों में आगे- पीछे उठे हुए सोने के नलकों में पत्रलता के कटाव बने थे। पलान के पार्श्व भाग में लम्बी पट्टी से घुमा कर बंधे होने से निश्चल बिछे हुए पट्टोपधान पर उठंग कर वे बैठे थे। पलान के दोनों ओर लटकी हुई रकाबों में उनके पैर जब एक दूसरे से टकराते थे तो रकाबों का झनझन शब्द होने लगता था। नेत्र-संज्ञक रेशमी