हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवदातदेहवर्णविराजमानराजावर्तमेचकैः कञ्चुकैश्चापचितचीनचोलकैश्च तार- मुक्तास्तबकितस्तवरकवारबाणैश्च नानाकषायकर्बुरकूर्पासकैश्च शुकपिच्छ- च्छायाच्छादनकैश्च व्यायामोलुप्तपार्श्वप्रदेशप्रविष्टचारुशस्तैश्च गतिवशवे- ञ्जितहारलतागलल्लोलकुण्डलोन्मोचनप्रधावितपरिजनैः, चामीकरपत्राङ्कुर- कर्णपूरकविघट्टमानवाचालवालपाशैश्चोष्णीषपट्टावष्टब्धकर्णोत्पलनालैश्च कु- ङ्कुमरागकोमलोत्तरीयान्तरितोत्तमाङ्गैश्च चूडामणिखण्डखचितक्षौमखोलैश्च मायूरातपत्रायमाणशेखरषट्पदपटलैश्च मार्गागतशारिकशारिवाहवेग- दण्डैः, पुनश्चञ्चच्चामरकिर्मीरकार्दरङ्गचर्ममण्डलमण्डनोड्डीयमानचटुलडा- मरचारभटभरितभुवनान्तरैः, आस्कन्दत्काम्बोजवाजिशतशिक्षणजात रू- अन्ये जङ्घालेत्याहुः । सतुला अर्धजङ्घिका इत्यन्ये । अर्धजङ्घालेत्याहुः । समायौगो व्यापृतकेषु प्रसिद्धः । परभागो वर्णस्य वर्णान्तरेण शोभातिशयः । राजावर्तः कृष्ण- पाषाणः । मेचको बर्हिण्कण्ठवर्णः । 'कञ्चुको वारबाणोऽस्त्री' । अपचितं परिहितम् , पूजितं वा । 'चायृ पूजानिशामनयोः' इत्यस्यापचितश्चेति निपातनाद्रूपम् । ताराः शुद्धाः। स्तबकिताः संजातपुष्पनिकुरुम्बाकाराः । स्तवरको वस्त्रभेदः । वारबाणः कञ्चुकः । कर्बुरः कपोतकण्ठवर्णः । कूर्पासकाश्चोलकाः । पिच्छानि पक्षाः । आच्छादन- मुत्तरीयम् । उल्लुप्तस्तनूकृतः । शस्तं पट्टिकाडोरः । कटिसूत्रमित्यर्थः । वेष्टिताश्चा- ल्लिताः । कर्णाभरणभेदो वालपाशः । कोमलं संछाद्यम् । अन्तरितमाच्छादितम् । खोलः शिरस्त्रम् । मायूरातपत्रायमानम् । वेगदण्डस्तरुणो हस्ती । किर्मीराणि शबलानि । कार्दरङ्गकानि कार्दरङ्गदेशोद्भवानि । बहुसुवर्णसूत्ररचितानि चर्माणि । स्फोटकाः स्निग्धवर्णमांसस्फारणि कार्दरङ्गचर्माणि । डामरा उन्नटाः । चारभटाः वस्त्र के बने हुए फूल-पत्तोदार पजामों से उनकी जाँघें ढँकी थीं। कसंभ के रङ्ग से रङ्गी हुई कलछौंह लिए लाल वर्ण वाली उनकी लम्बी सलवार थी। भौंरे के समान गहरे नीले रंग के जांघिये, जिनमें सफेद पट्टियों का जोड़ डालने के कारण उनकी शोभा और बढ़ गई थी, पहने थे। कुछ राजा लाजवर्दी नीले रंग के कंचुक पहने हुए थे। कुछ ने चीन देश का कंचुक धारण किया था। कुछ ने बारबाण नामक कंचुक-जैसा पहनावा धारण किया था, जो सितारों से टँके मोतियों के गुच्छों से सुशोभित हो रहा था। कुछ नाना रंगों से रँगे जाने के कारण चितकबरे कूर्पासक पहने हुए थे। कुछ राजाओं के शरीर पर सुगापंखी रंग की झलक देने वाले आच्छादनक नामक वस्त्र थे। व्यायाम करने के कारण पतले उनके कटिप्रदेश में पटके बँधे हुए थे। तेज चाल से चलने के कारण डोलती हुई उनकी हारलताओं में चंचल कुंडल को फँसे देखकर छुड़ाने के लिए परिजन