भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 506 में से

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पृष्ठ 407

३६० हर्षचरितम् पायानरवमुखरितदिङ्मुखैश्च निर्दयप्रहतलम्बापटहशतपटुरवबधिरीकृतश्रव- णविवरैः, उद्घोष्यमाणनामभिः, उन्मुखपादातप्रतिपाल्यमानाज्ञापातै राज- भिरापुपूरे राजद्वारम् । उदिते च भगवति दिनकृति राज्ञः समायोगग्रहणसमयशंसी सस्वान संज्ञाशङ्खो मुहुर्मुहुः । अथ न चिरादिव प्रथमप्रयाण एव दिग्विजय्याय दिग्गजसमागममिव गमनविलोलकर्णतालदोलाविलासैः कुर्वाणया करेणु- कया सिद्धयात्रयोद्गमानः, वैदूर्यदण्डविकटेनोपरि प्रत्युप्तपद्मरागखण्डमयू- खखचिततया सूर्योदयदर्शनकोपादिव लोहितायतया ध्रियमाणेन मङ्गला-


शूराः । आस्कन्दन्तश्चलन्तः । काम्बोजा बाह्लीकदेशजाः । आयानमश्वभूषणम् । लम्बापटहाः पटहभेदाः । 'तथिला' इति प्रसिद्धाः । संज्ञा संकेत: । अथेत्यादौ । दिग्विजय्याय निर्जगाम नरपतिरिति संबन्धः । मङ्गलातपत्रेण कञ्चुकेन । ननूत्प्रेक्ष्यते द्वितीय इव भोगिनामीश इति योजना । यद्वा


दौड़ पड़ते थे। सुवर्ण के पत्राङ्कुरों वाले उनके कर्णपूर से कानों का बाला टकरा कर आवाज करती थी । उन्होंने पगड़ियों में अपने कर्णोत्पल के नाल खोंस लिये थे। कुछ के सिर केसरिया रङ्ग के कोमल उत्तरीय से ढँके थे, जिनमें चूड़ामणि के खण्ड टँके हुये थे। मोरपङ्ख से बने उनके सिर के शेखर पर भौरे मँडरा रहे थे । रङ्ग बिरंगी झूलों से ढँके हुए जवान हाथी पर सवार होकर राजा पहुँचे हुए थे । उद्धट शूर-वीर हाथों में चमचमाती हुई छोटी-छोटी चौरियों से युक्त कार्दरङ्ग चमड़े से बने हुये ढाल लिये हुये भुवनमाग को भरने लगे। सैकड़ों काम्बोज घोड़ों के दुलकती चाल में चलने के कारण उनके झनकारते हुए आयान नामक गहने दिशाओं को मुखरित कर रहे थे। सैकड़ों तड़ातड़ बजाये जाने वाले नगाड़ों की तीखी आवाज कानों को फोड़े डालती थी । राजाओं के नाम पुकारे जा रहे थे। पैदल सैनिक (हाथी पर सवार) राजाओं की आज्ञा को उन्मुख होकर सुनते थे और पालन में लग जाते थे। इस प्रकार राजाओं से राजद्वार भरा हुआ था । सूर्योदय हो जाने पर बार-बार शंखध्वनि होने लगी जो इस बात की सूचक थी कि राजा समायोग-ग्रहण (सेना का व्यूहबद्ध प्रदर्शन) करेंगे। संज्ञाशंख की ध्वनि के कुछ ही देर बाद दिग्विजय के लिये पहली बार सैनिक प्रयाण के अवसर पर निकली हुई हथिनी पर, जो चलते हुए कर्णतालों के विलास से मानों दिग्गज के साथ समागम कर रही थी, सवार होकर राजभवन से बाहर आये । उनके सिर पर वैडूर्य के दण्डवाला, जड़े हुए पद्मराग की किरणों से खचित मङ्गलातपत्र ऐसा लग रहा था मानों सूर्य का उदय देखकर कोप से तमतमा उठा हो । केले के गाभे से भी अधिक मुलायम रेशम (नेत्र)

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