भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

सप्तम उच्छ्वासः ३६१ ॰तपत्रेण कदलीगर्भाभ्यधिकम्लदिम्ना नवनेत्रनिर्मितेन द्वितीय इव भोगिना- मधिपतिरङ्गलग्नेन कञ्चुकेनामृतमथनदिवस इव क्षीरोदफेनपटलधवला- म्बरवाही, बाल एव पारिजातपादप इवाखण्डलभूमिमारूढः, विधूयमान- चामरमरुद्विधूतकर्णपूरकुसुममञ्जरीरजसा सकलभुवनवशीकरणचूर्णेनेव दिशश्छुरयन्नभिमुखचूडामणिघटमानपाटलप्रतिबिम्बमुदयमानं सवितार- मपि पिबन्निव तेजसा बहलताम्बूलसिन्दूरच्छुरितया विलभमान इव द्वीपा- न्तराण्योषमुद्रयानुरागस्य स्फुरन्महाहारमरीचिचक्रवालानि चामराणीव दिशोऽपि ग्राहयन्, राजकेक्षणोत्क्षिप्तत्रिभागया त्रीनपि लोकान्करदाना- याज्ञापयन्निव सविभ्रमं भ्रूलतया द्राघीयसा बाहुप्राकारेण परिक्षिपन्निव रिरक्षया सप्तापि सागरमहाखातानखिलमिव च क्षीरोदमाधुर्यमादायोद्गतया लक्ष्म्या समुपगूढः, गाढममृतमय इव पीयमानः कुतूहलोत्तानकटकलोक- लोचनसहस्रैः स्नेहार्द्रेषु राज्ञां हृदयेषु गुणगौरवेण मज्जन्निव, लिम्पन्निव मज्जामपि सौभाग्यद्रवेण द्रष्टॄणाममरपतिरिवाप्रजवधकलङ्कप्रक्षालनाकुलः, मङ्गलातपत्रेणेति इत्थंभूतलक्षणे तृतीया । अम्बरं वस्त्रम्, नभश्च । विलभमानोऽ- र्थिसात्कुर्वन् । मुद्रया हि ससिन्दूरया विलभ्यते । परिक्षिपन्वेष्टयन् । अग्रजो का बना हुआ कंचुक पहने हुए सम्राट् दूसरे शेष नाग के समान लग रहे थे। क्षीरोदक नाम का सफेद वस्त्र पहने हुए वे अमृतमथन के दिवस के समान प्रतीत होते थे । पारिजात नामक वृक्ष के समान कम आयु में ही वे इन्द्र पदवी पर आसीन हो गये थे । सारे संसार को वश में करने वाले ( वशीकरण ) चूर्ण के समान, कर्णपूर के रूप में उनके कान में लगी हुई पुष्पमञ्जरी का पराग झले जाते हुये चँवर की हवा से दिशाओं में उड़ने लगा । उदय होते हुए सूर्य को जिसका लाल मण्डल सामने उनकी चूडामणि में प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वे अपने तेज से पीते जा रहे थे । ताम्बूल चबाने से टहाका लाल अपनी ओष्ठ मुद्रा से मानों वे द्वीपान्तरों को लुभा रहे थे। उनके लम्बे हार की किरणें फैल रही थीं, मानों अपने झलने के लिये दिशाओं के हाथ में चँवर पकड़ा रहे थे । राजसमूह को देखने के लिये तिरछी हुई अपनी भौहों से वे मानों तीनों लोकों को करदान का आदेश दे रहे थे। अपने भुजदण्डों से मानों उन्होंने सप्त समुद्रों की रक्षा के लिये ऊँचा परकोटा खींच दिया था । क्षीरसमुद्र की सारी मधुरिमा को लेकर मानों निकली हुई लक्ष्मी उनका आलिङ्गन कर रही थी । कटक के लोगों की कुतूहल से उठी हुई हजारों आँखें अमृततुल्य उनके रूप का पान कर रही थीं । स्नेह से राजाओं के हृदय में अपने गुणों की गरिमा से मानों मज्जन कर रहे थे। देखने वालों के अङ्गों में मानों सौभाग्य के द्रव का