भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

३६२ हर्षचरितम् पृथुरिव पृथिवीपरिशोधनावधानसंकलितसकलमहीभृत्समुत्सारणः, पुरः- सरैरालोककारकैः सहस्रसंख्यैरर्क इव किरणैरधिकारचातुर्यचञ्चलचरणैर्व्य- वस्थास्थापननिष्ठुरैः भयपलायमानलोकोत्पीडान्तरिता दशापि दिशो ग्राहयद्भिरिव, चलितकदलिकासंपातपीतप्रचारं पवनमपि विनये स्थाप- यद्भिरिव, द्रुतचरणोद्धतधूलिपटलावधूतान्दिनकरकिरणानप्युत्सारयद्भिरिव, कनकवेत्रलतालोकविक्षिप्यमाणं दिनमपि दूरीकुर्वद्भिरिव, दण्डिभिरितस्ततः समुत्सार्यमाणजनसमूहो निर्जगाम नरपतिः । अवनमति च विनयनमितवपुषि, भयचकितमनसि, चलनशिथिल- मणिकनकमुकुटकिरणनिकरपरिकरुचिरशिरसि, विलुलितकुसुमशेखरर- जसि राजचक्रे, प्रभामुचां चूडामणीनामवाञ्चस्तिर्यञ्च उदञ्चश्च चञ्चन्तो मरीचयश्चापराशय इव सुशकुनसंपादनाय चेलुः । मेघायमानेरेणुमेदुरं ज्येष्ठः, राज्यवर्धनः, द्विजश्च । पुरा ब्रह्मणः किल सुतोऽसुरपक्षपाती त्रिशिरास्त- द्भ्राता च वृत्रस्तौ तपस्यन्तौ शक्रेण हताविति प्रथा। महीभृतो राजानः, पर्वताश्च । पृथुना ह्यद्रयो भूमिमास्तीर्य स्थिताश्चापकोट्या समुत्सार्यन्त प्रथिताः। लोका इत्येवं ये वदन्ति ते आलोककारकाः, तैः; अन्यत्रालोकः प्रकाशः। पुरःसरैः सहस्रसंख्यैरिति च साधारणम् । दिशो ग्राहयद्भिः पर्यन्तेषु च विसर्जयद्भिः। उदञ्च ऊर्ध्वप्रसारिणः । चापराशय इवेत्याद्युत्प्रेक्षात्रयं समीचीनम् । उड्डीयन्तः लेप कर रहे थे । बड़े भाई के वध के कारण उत्पन्न शोक को मिटाने के लिये इन्द्र के समान व्याकुल थे (अग्रज अर्थात् ब्राह्मण का वध करने से इन्द्र कलंकित थे)। पृथु के समान उनके चारों ओर अवकाशमण्डल बनाने के काम में लगे हुए राजा लोग भीड़ को हटा रहे थे (पृथिवी को छेक कर पड़े हुये पर्वतों को पृथु ने चापकोटि से उठाकर दूर फेंक दिया) । जैसे हजारों किरणें सूर्य के आगे-आगे आलोक करती हुई चलती हैं उसी प्रकार सम्राट् के आगे-आगे आलोक शब्द (जय शब्द) का उच्चारण करते हुये दण्डधर पुरुष जनसमूह को हटाते हुये चल रहे थे । अधिकार मिलने से उत्पन्न चतुराई के कारण उनमें तेजी आ गई थी । व्यवस्था करने में कड़ाई से काम लेते थे । भय के कारण भागे हुए लोगों से छिपी हुई दिशाओं को भी मानों पकड़वा लेते थे । फहराती हुई पताकाओं को गिरा देने से अवरुद्ध गति वाले वायु को भी मानों विनय की सीख देते थे । पैरों से धूल उड़ाकर सूर्य की किरणों का भी तिरस्कार के साथ उत्सारण करते थे । सोने की वेत्र- लताओं के आलोक से दिन को भी दूर फेंक दे रहे थे । सम्राट् के बाहर आते ही राजा लोग प्रणाम करने लगे । विनय के कारण उनका