भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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सप्तम उच्छ्वासः ३६३ मन्दिरशिखण्डिन इव खमुड्डीयमानाः कोमलकल्पपादपपल्लववन्दनमाला- कलापा इवाबध्यन्त दिग्द्वारेषु दिक्पालैः। प्रणम्यमानश्च नेत्रविभागैश्च कटाक्षैश्च समप्रेक्षितैर्भ्रूवञ्चितैश्चार्धस्मितैश्च परिहासैश्च छेकालापैश्च कुशल- प्रश्नैश्च प्रतिप्रणामैश्चोन्मत्तभ्रूविक्षितैश्चाज्ञादानैश्चाक्रीणन्निव मानमयान्प्राणा- न्प्रणयदानैः प्रवीराणां वीरो यथानुरूपं विभभाज राजकम्। अथ प्रस्थिते राजनि बहलकलकलत्रस्तदिङ्नागशूत्काररव इवेतस्तत- स्तस्तार तारतरतूर्याणां प्रतिध्वनिराशातटेषु। दिग्गजेभ्यः प्रकुपितानां त्रिप्रस्रुतानां करिणां मदप्रस्रवणवीथीभिरलिकुलकालीभिः कालिन्दीवेणि- प्रसूताः कटाक्षैरपाङ्गदृष्टेः। भ्रूवञ्चितैर्भ्रूचलितैः। 'ध्रुवाञ्चितैः' इति पाठे उन्नतैक- भृचितैरित्यर्थः। छेकालापैर्वक्रोक्तिभिः छेकान्तराप्तरा वा। तस्तारेति । विस्तृतोऽभवत् । त्रिप्रस्रुतानां त्रिषु गण्डादिषु मदमुचाम्। शरीर झुक गया। उनके मन में आश्चर्य और भय दोनों व्याप्त हो गये। झुकने से सुवर्ण के मुकुट की खिसकती हुई मणियों की किरणें चारों तरफ उनके सिर पर फैलने लगीं। उनके सिर के कुसुमशेखर से पराग झड़ने लगा। चूड़ामणियों की नीचे, अगल-बगल में और ऊपर की ओर फैलती हुई किरणें बाणों के रूप में पहले-पहल सगुन करने के लिये चल पड़ीं। मेघ के समान मँडराती हुई धूल से भरे आकाश में गृहमयूरों के समान उड़ी हुई चूड़ामणियों की रश्मियाँ मानों दिशाओं के द्वारों पर कल्प वृक्ष के पल्लव की बन्दनवार के रूप में बँध गई। सम्राट् ने प्रणाम करते हुये किसी को तिहाई खुले हुए नेत्रों की दृष्टि से, किसी को कटाक्ष या अपांग दृष्टि से, किसी को समग्र दृष्टि या भरपूर आँखों से देखकर, किसी को और भी अधिक ध्यान से देखते हुए जिसमें भौहें खिंच जाती हैं, किसी को हल्की मुस्कुराहट से किसी को और अधिक मुख की प्रसन्नता से, किसी को चतुराई भरे एक दो शब्दों से, किसी को कुशल-प्रश्न पूछकर, किसी को प्रणाम के उत्तर में स्वयं प्रणाम करके, किसी को अत्यन्त बढ़े हुए भ्रूविलाश और वीक्षणरुचि से और किसी को आज्ञा देकर सम्मानित किया। इन-इन रूपों में अपने प्रणय का दान करके उनके मानधनी प्राणों को मानों सम्राट् मोल ले रहे थे। इस प्रकार वीरों में वीर सम्राट् ने राजसमूह को योग्यता के अनुसार विभक्त किया। देव हर्ष के प्रस्थान करने पर सेना के शोरगुल से मानों डरे हुए दिग्गजों की चिग्घाड़ हो, ऐसी तूर्य संज्ञक वाद्यों की ऊँची प्रतिध्वनि इधर-उधर दिशाओं में फैल गई। मतवाले हाथियों के कुम्भ, कपोल एवं सूँड़ से लुढ़कते हुए भौरों से काली मदधारायें बहने-