हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ हर्षचरितम् कासहस्राणीव सस्यन्दिरे । सिन्दूररेणुराशिभिररुणायमानबिम्बे रवाव- स्तमयसमयं शशङ्किरे शकुनयः । करिणां षट्पदकोलाहलमांसलैः कर्ण- तालनिःस्वनैस्तिरोदधिरे दुन्दुभिस्वनयः । दोधूयमानश्च सचराचरमाच- चाम चामरसंघातो विश्वम् । अश्वीयश्वासविक्षिप्तैः शिश्विन्दे सितसिन्धु- वारदामशुचिभिर्निरन्तरमन्तरिक्षं फेनपिण्डैः । पिण्डीभूततगरस्तबकपा- ण्डुराणि पपुरिव परस्परसंघट्टनष्टाष्टदिशं दिवसमुच्चचामीकरदण्डान्यातप- त्रवनानि । रजौरजनीनिमीलितो मुकुटमणिशिलावलीबालातपेन विच- कास वासरः । राजतैर्हिरण्मयैश्च मण्डनकभाण्डमण्डलह्रादमानैर्हरीती- कृताः परिह्रादा हरितो बधिरतां दधुः । अरिप्रतापानलनिर्मूलनायेव मदो- ष्मशीकरैः शिशिकिरे करिणः ककुभां चक्रम् । चक्षुषामुन्मेषं मुमुषुस्तडि- च्चञ्चलानि चूडामणीनामर्चीषि । स्वयमपि विसिष्मिये बलानां भूपालः सर्वतोविक्षिप्तचक्षुश्चाद्राक्षीदावासस्थानसकाशात्प्रतिष्ठमानं स्कन्धावारम्, अधोक्षजकुक्षेरिव युगादौ निष्पतन्तं जीवलोकम्, अम्भानिधिमिव कुम्भ- शकुनयोऽत्र चक्रवाकाः। मण्डनकमायान्नम्। 'स्याद्भाण्डमश्वाभरणे'। अधोक्षजो हरि- लगीं, मानो यमुना की हजारों सोतें फूट पड़ी हों। हाथियों के मस्तक की सिन्दूर-धूलि सूर्यबिम्ब को लाल बनाने लगी जिसे देखकर पक्षी सायंकाल की शंका करने लगे। मद पीने के लिए बैठते हुए भौरों की गुंजार से भरी हाथियों के कर्णतालों की फट-फट आवाज ने दुन्दुभिध्वनि को तिरोहित कर दिया। चामर-समूह इस प्रकार झले जाने लगे कि चराचर के साथ सारा विश्व ही ढँक लिया गया। घोड़ों की श्वास से उड़े हुए उजले सिन्धुवार- पुष्प की मालाओं के समान मुख के फेन आकाश को सफेद बनाने लगे। एकत्र किए गए तगर के फूलों की भांति उज्ज्वल, ऊँचे सुवर्णदण्ड से शोभित छत्र एक में एक लग कर दिशाओं को इस प्रकार ढँक रहे थे मानों दिन का ही पान कर लिया हो। धूल की रात्रि के कारण छिपा हुआ दिन राजाओं के मुकुटों की मणियों के बालतातप से खिल उठा। घोड़ों के रुपहले और सुनहले साजों की खनखनाहट से दिशाएँ बधिर हो गईं। हाथियों ने शत्रु के फैले हुए प्रतापानल को मानों बुझाने के लिए अपने मदजल के फुहारों से दिशाओं को सींच दिया। बिजली के समान चंचल चूडामणियों की चमकक किरणें पलक उठाने नहीं देती थीं। चारों ओर दृष्टि फेंक कर सम्राट् ने जब अपनी सेना को देखा और युगारम्भ में विष्णु की कुक्षि से निकलते हुए जीव लोक के समान, अगस्त्य के मुख से संसार को प्लावित करने वाले समुद्र के समान और सहस्रार्जुन की भुजाओं से छूटकर हजारों रूपों में बहते हुए नर्मदा के प्रवाह के समान राजद्वार के समीप प्रस्थान करते हुए स्कन्धावार को देखकर