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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

सप्तम उच्छ्वासः ३६३ मन्दिरशिखण्डिन इव खमुड्डीयमानाः कोमलकल्पपादपपल्लववन्दनमाला- कलापा इवाबध्यन्त दिग्द्वारेषु दिक्पालैः। प्रणम्यमानश्च नेत्रविभागैश्च कटाक्षैश्च समप्रेक्षितैर्भ्रूवञ्चितैश्चार्धस्मितैश्च परिहासैश्च छेकालापैश्च कुशल- प्रश्नैश्च प्रतिप्रणामैश्चोन्मत्तभ्रूविक्षितैश्चाज्ञादानैश्चाक्रीणन्निव मानमयान्प्राणा- न्प्रणयदानैः प्रवीराणां वीरो यथानुरूपं विभभाज राजकम्। अथ प्रस्थिते राजनि बहलकलकलत्रस्तदिङ्नागशूत्काररव इवेतस्तत- स्तस्तार तारतरतूर्याणां प्रतिध्वनिराशातटेषु। दिग्गजेभ्यः प्रकुपितानां त्रिप्रस्रुतानां करिणां मदप्रस्रवणवीथीभिरलिकुलकालीभिः कालिन्दीवेणि- प्रसूताः कटाक्षैरपाङ्गदृष्टेः। भ्रूवञ्चितैर्भ्रूचलितैः। 'ध्रुवाञ्चितैः' इति पाठे उन्नतैक- भृचितैरित्यर्थः। छेकालापैर्वक्रोक्तिभिः छेकान्तराप्तरा वा। तस्तारेति । विस्तृतोऽभवत् । त्रिप्रस्रुतानां त्रिषु गण्डादिषु मदमुचाम्। शरीर झुक गया। उनके मन में आश्चर्य और भय दोनों व्याप्त हो गये। झुकने से सुवर्ण के मुकुट की खिसकती हुई मणियों की किरणें चारों तरफ उनके सिर पर फैलने लगीं। उनके सिर के कुसुमशेखर से पराग झड़ने लगा। चूड़ामणियों की नीचे, अगल-बगल में और ऊपर की ओर फैलती हुई किरणें बाणों के रूप में पहले-पहल सगुन करने के लिये चल पड़ीं। मेघ के समान मँडराती हुई धूल से भरे आकाश में गृहमयूरों के समान उड़ी हुई चूड़ामणियों की रश्मियाँ मानों दिशाओं के द्वारों पर कल्प वृक्ष के पल्लव की बन्दनवार के रूप में बँध गई। सम्राट् ने प्रणाम करते हुये किसी को तिहाई खुले हुए नेत्रों की दृष्टि से, किसी को कटाक्ष या अपांग दृष्टि से, किसी को समग्र दृष्टि या भरपूर आँखों से देखकर, किसी को और भी अधिक ध्यान से देखते हुए जिसमें भौहें खिंच जाती हैं, किसी को हल्की मुस्कुराहट से किसी को और अधिक मुख की प्रसन्नता से, किसी को चतुराई भरे एक दो शब्दों से, किसी को कुशल-प्रश्न पूछकर, किसी को प्रणाम के उत्तर में स्वयं प्रणाम करके, किसी को अत्यन्त बढ़े हुए भ्रूविलाश और वीक्षणरुचि से और किसी को आज्ञा देकर सम्मानित किया। इन-इन रूपों में अपने प्रणय का दान करके उनके मानधनी प्राणों को मानों सम्राट् मोल ले रहे थे। इस प्रकार वीरों में वीर सम्राट् ने राजसमूह को योग्यता के अनुसार विभक्त किया। देव हर्ष के प्रस्थान करने पर सेना के शोरगुल से मानों डरे हुए दिग्गजों की चिग्घाड़ हो, ऐसी तूर्य संज्ञक वाद्यों की ऊँची प्रतिध्वनि इधर-उधर दिशाओं में फैल गई। मतवाले हाथियों के कुम्भ, कपोल एवं सूँड़ से लुढ़कते हुए भौरों से काली मदधारायें बहने-

३६४ हर्षचरितम् कासहस्राणीव सस्यन्दिरे । सिन्दूररेणुराशिभिररुणायमानबिम्बे रवाव- स्तमयसमयं शशङ्किरे शकुनयः । करिणां षट्पदकोलाहलमांसलैः कर्ण- तालनिःस्वनैस्तिरोदधिरे दुन्दुभिस्वनयः । दोधूयमानश्च सचराचरमाच- चाम चामरसंघातो विश्वम् । अश्वीयश्वासविक्षिप्तैः शिश्विन्दे सितसिन्धु- वारदामशुचिभिर्निरन्तरमन्तरिक्षं फेनपिण्डैः । पिण्डीभूततगरस्तबकपा- ण्डुराणि पपुरिव परस्परसंघट्टनष्टाष्टदिशं दिवसमुच्चचामीकरदण्डान्यातप- त्रवनानि । रजौरजनीनिमीलितो मुकुटमणिशिलावलीबालातपेन विच- कास वासरः । राजतैर्हिरण्मयैश्च मण्डनकभाण्डमण्डलह्रादमानैर्हरीती- कृताः परिह्रादा हरितो बधिरतां दधुः । अरिप्रतापानलनिर्मूलनायेव मदो- ष्मशीकरैः शिशिकिरे करिणः ककुभां चक्रम् । चक्षुषामुन्मेषं मुमुषुस्तडि- च्चञ्चलानि चूडामणीनामर्चीषि । स्वयमपि विसिष्मिये बलानां भूपालः सर्वतोविक्षिप्तचक्षुश्चाद्राक्षीदावासस्थानसकाशात्प्रतिष्ठमानं स्कन्धावारम्, अधोक्षजकुक्षेरिव युगादौ निष्पतन्तं जीवलोकम्, अम्भानिधिमिव कुम्भ- शकुनयोऽत्र चक्रवाकाः। मण्डनकमायान्नम्। 'स्याद्भाण्डमश्वाभरणे'। अधोक्षजो हरि- लगीं, मानो यमुना की हजारों सोतें फूट पड़ी हों। हाथियों के मस्तक की सिन्दूर-धूलि सूर्यबिम्ब को लाल बनाने लगी जिसे देखकर पक्षी सायंकाल की शंका करने लगे। मद पीने के लिए बैठते हुए भौरों की गुंजार से भरी हाथियों के कर्णतालों की फट-फट आवाज ने दुन्दुभिध्वनि को तिरोहित कर दिया। चामर-समूह इस प्रकार झले जाने लगे कि चराचर के साथ सारा विश्व ही ढँक लिया गया। घोड़ों की श्वास से उड़े हुए उजले सिन्धुवार- पुष्प की मालाओं के समान मुख के फेन आकाश को सफेद बनाने लगे। एकत्र किए गए तगर के फूलों की भांति उज्ज्वल, ऊँचे सुवर्णदण्ड से शोभित छत्र एक में एक लग कर दिशाओं को इस प्रकार ढँक रहे थे मानों दिन का ही पान कर लिया हो। धूल की रात्रि के कारण छिपा हुआ दिन राजाओं के मुकुटों की मणियों के बालतातप से खिल उठा। घोड़ों के रुपहले और सुनहले साजों की खनखनाहट से दिशाएँ बधिर हो गईं। हाथियों ने शत्रु के फैले हुए प्रतापानल को मानों बुझाने के लिए अपने मदजल के फुहारों से दिशाओं को सींच दिया। बिजली के समान चंचल चूडामणियों की चमकक किरणें पलक उठाने नहीं देती थीं। चारों ओर दृष्टि फेंक कर सम्राट् ने जब अपनी सेना को देखा और युगारम्भ में विष्णु की कुक्षि से निकलते हुए जीव लोक के समान, अगस्त्य के मुख से संसार को प्लावित करने वाले समुद्र के समान और सहस्रार्जुन की भुजाओं से छूटकर हजारों रूपों में बहते हुए नर्मदा के प्रवाह के समान राजद्वार के समीप प्रस्थान करते हुए स्कन्धावार को देखकर

सप्तम उच्छ्वासः ३६५ भुवो वदनात्प्लावितभुवनमुद्गवन्तम्, अर्जुनबाहुदण्डसहस्रसंपिण्डितोन्मु- क्तमिव सहस्रधा प्रवर्तमानं प्रवाहं नर्मदायाः । 'प्रसर तात । भाव, किं विलम्बसे ? लङ्गति तुरङ्गमः । भद्र, भग्नचरण इव संचरसि यावदमी पुरः- सराः सरभसमुपरि पतन्ति । वाहयसि किमुष्ट्रम् ? न पश्यसि निर्दय, निःशूकशिशुकं शयानम् ? वत्स रामिल, रजसि यथा न नश्यसि तथा समीपे भव, किं न पश्यसि गलति सक्तुप्रसेवकः ? किमेवमित्त्वर, त्वरसे । सौरभेय सरणिमपहाय हयमध्यं धावसि ? धीवरि, विशसि । गन्तुकामा मातङ्गि, मातङ्गमार्गम् । अङ्ग, गलति तिरश्चीना चणकगोणी । गणयसि न मामारटन्तम् ? अवटमवटेनावतरसि । सुखमास्स्व स्वैरिणि । सौवी- रक, कुम्भो भग्नः । मन्थरक, खादिष्यसि गतः सन्निक्षून् । उक्षाणं प्रसा- दय । कियच्चिरमुञ्चिनोषि चेट, बदराणि ? दूरं गन्तव्यम् । किमद्यैव विद्रासि द्रोणक, द्राघीयसि दण्डयात्रा त्रिनैकेन निष्ठुरकेन निष्क्रेयमस्मा- कम् । अग्रतः पन्थाः स्थपुटक, स्थावरक, यथा न भनक्षि फाणितस्थालीं कुम्भभवोऽगस्त्यश्च । प्लावितभुवनं स्कन्धावारम् , नर्मदाप्रवाहं च । पूर्वं कार्त्तवीर्ये- णान्तःपुरैः सह रेवातीरे विहरता तच्छ्रोतो भुजसहस्रेणोभयतो वृत्वा त्यक्तमभूत् । प्रसरतेत्येवमादिप्रवर्तमाननानेकसंलापनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । तातेति । भावे- ति च । मान्यामन्त्रणम् । लसति गलति । प्रसेवको भस्त्राभरणमित्यन्ये । इत्वरो गमनशीलः । सौरभेयो दान्तः । अङ्गेति इष्टामन्त्रणम् । अवटं श्वभ्रम् । अतटेनामा- र्गेण । स्वैरिणि स्वतन्त्रे । 'स्वादीरेरिणोः' इति वृद्धिः। सौवीरिकं काञ्जिकम् । विद्रासि लङ्घसि । निष्ठा श्लेषः । स्थपुटो निम्नोन्नतः, विषम इत्यन्ये । फाणितमिक्षुविकारः, स्वयं भी आश्चर्य में डूब गए । चलते हुए कटक में अनेक संलाप सुनाई पड़ रहे थे—'आगे बढ़ो; भाई, देर क्यों लगा रहे हो ? अरे, घोड़ा लंगड़ाकर चल रहा है; भले मानस, अभी पाँव टूटे की तरह रेंग रहे हो, और ये आगे वाले लोग हमारे ऊपर गिरे पड़ते हैं; अरे निर्दय, ऊँट को मत चला, देखता नहीं बच्चा आगे सोया पड़ा है ? वत्स रामिल, धूल में कहीं गायब न हो जाओ, मेरे समीप ही रहो; अरे देखते नहीं कि फटे थैले से सत्तू कैसे गिर रहे हैं ? अरे चालू, ऐसी हड़बड़ी ही क्या है ? अबे, बैल की लीक छोड़कर घोड़ों के बीच भागा जाता है ? अरी धीवरी, कहाँ घुसी पड़ती है ? अरी हथिनी की बच्ची, हाथियों में जाना चाहती है; वाह, चने की बोरी टेढ़ी होकर झर रही है; अरे, मैं कब से चिल्ला रहा हूँ, फिर भी तू नहीं सुनता; अरे, गड्ढे में गिरेगा क्या ?; अरे मनमौजी, चुपचाप बैठ; अरे सौवीरक, तेरा घड़ा तो फूट गया; अरे मन्थरक, पड़ाव पर ही पहुंचकर गन्ना

३६६ हर्षचरितम् गरीयानगडकतण्डुलभारको न निर्वहति दम्यः । दासक, माषीणादमुतो द्राग्दात्रेण मुखघासपूलकं लुनीहि । को जानाति यवसगतं गतानाम् । धव, वारय बलीवर्दाम् । वाहीकरक्षितं क्षेत्रमिदम् । लम्बिता शकटी । शाकरं धुरंधरं धुरि धवलं नियुङ्क्ष्व । यक्षपालित, प्रमदाः पिनक्षि । अक्षिणी किं ते स्फुटिते । हत हस्तिपक नेदीयसि करिकरदण्डे समदः संमर्दकर्दमे स्खलसि । भ्रातर्भावविधुरबन्धो, उद्धर पङ्कादनड्वाहम् । इत एहि माणवक, घनेभगटासंघट्टसंकटे नास्ति निस्तरणसरणिः ।' इत्येवमा- दिप्रवर्तमाननानेकसंलापं क्वचित्स्वेच्छामृदितोद्दामसस्यघासविघससुखसं- गुड इति प्रसिद्धः । दम्यो दान्तः । माषाणां भवनं क्षेत्रम् । 'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्' । किञ्चिन्मात्रं बुभुक्षानिवृत्तये । घासो मुखघासः । यवसं घासः । उक्तं च 'शष्पं बालतृणं घासो यवसम्' इति । धवः पुरुषः । वाहीकः काष्ठकः, परिपालक इत्यन्ये, गोरक्षक इति चान्ये । लम्बिता मार्गमाक्रान्तुं न शक्नोति । शाकरं शूरम् । तरुणं वा । धवलं महोक्षम् । नेदीयसि करदण्डेऽन्यहस्तसंबन्धिनि सति । करी समदोऽर्थात्संपन्नः । स्वेच्छयानायासेन । मृदितानि क्षुण्णानि । उद्दामानि प्रभूतानि सस्यानि । घासो यवसम् । तथा घासो विघसं, तथा विघसो भृत्याद्युपयुक्तशेष- चूस लेना, बिगड़े बैल को सम्हाल, कबतक बेर बीनता रहेगा ? चल, दूर जाना है; द्रोणक, आज ही क्यों ऊब गए, अभी तो सेना की यात्रा लम्बी पड़ी है; स्थपुटुक, आगे और भी मार्ग है; स्थावरक, खांड़ की हांड़ी को फोड़ न देना; चावलों का बोरा भारी है बैल के मान का नहीं; अबे टहलुवे, सामने उड़द के खेतों में से बैलों के लिए एक पूली तो दरांत से जल्दी काट ले; कौन जाने, यात्रा में चारे का क्या प्रबन्ध होगा ? यार, बैलों को अलगाए रहो, इस खेत में रखवाले हैं; सग्गड़ गाड़ी में ओलार पड़ता है, तगड़ा धौला बैल उसमें जोतो; ऐ पगले, स्त्रियों को रौंद डालेगा ? तेरी आँखें क्या फूट गई हैं ? धत्तेरे हस्तिपक की, मेरे हाथी की सूँड़ पर चढ़ा हुआ खिलवाड़ कर रहा है; ओ, धक्कामक्की खाकर कीचड़ में गिर रहा है । ऐ भाई, दुखियों के साथी कीचड़ में फँसे बैल को निकाल लो; छोकरे, इधर भाग आ, हाथियों के भीड़-भड़क्के में अगर गया तो फिर जीता बच निकलने का उपाय नहीं।' कहीं पर कटवा कर ढेर की ढेर काई गई हरी घासों को मीड़ कर मनचाहा आहार प्राप्त कर वे लोग सुख से फूल रहे थे और आपस में हँसी-मजाक करते हुए खिलखिला कर हँस रहे थे । ये लोग नौकर-चाकर थे, जैसे मेठ (हाथियों की झाड़-पोंछ करने वाला ), बंठ (कुंवारे जवान पट्ठे जो डंडा लिए हाथी से भिड़ आते थे ), वल्लर (उमड्ड ), कञ्चन ( गदहे की तरह काम लेने योग्य कह्लू नौकर ), केलिक ( घोड़ों

सप्तम उच्छ्वासः ३६७ पन्नान्नपुष्टैः केलिकलैः कित्किलायमानैर्मेण्ठबण्ठवठरलम्बनलेशिकलुण्ठ- कचेटशाटचण्डालमण्डलैरान्डीरैः स्तूयमानम्, क्वचिदसहायेः क्लेशाज्जि- तकुपामकुटुम्बिसंपादितसीदत्सौरभेयशम्बलसंवाहनायासावेगागतसंयोगैः स्वयंगृहीतगृहोपस्करैः 'इयमेका कथंचिद्दण्डयात्रा यातु । यातु पाताल- तलं तृष्णाभूतेरभवनिः । भवतु शिवम् । सेवां करोतु । स्वस्ति सर्वदुःख- कूटाय कटकाय' इति दुर्विधवृद्धकुलपुत्रकैर्निन्द्यमानम्, क्वचिदतीतीक्ष्णस- लिलस्रोतःपातिनौगतैरिव ग्रथितैरिव पङ्क्तिभूतैर्जनैरतिद्रुतम्, द्रवद्भिः कृष्ण- कठिनस्कन्धगुरुलगुडैर्गृहीतसौवर्णपादपीठीकरङ्ककलशपतद्ग्रहावग्राहैः प्र- त्यासन्नपार्थिवोपकरणग्रहणगर्वदुवारैः सर्वमेव बहिः कार्यद्भिर्भूपतिभृतक- मन्नम्, परस्परलुण्ठनं वा, तैः सुखेन संपन्नं यदन्नं तेन सुपुष्टैः । केलिकलाः प्रहसनाः, बहुभाषिणो वा । मेण्ठा हस्तिजागरिकाः । वण्ठाः अकृतविवाहास्तरुणाः, ये दण्ड- मादाय हस्तिनां दर्पमाकर्षयन्ति, पत्तय इत्यन्ये । वठरा मूर्खाः । लम्बाना गर्दभ- दासाः । लेशिका जनपरिचारकाः । लुण्ठकाश्चौराः । चेटा दासाः । शाटा धूर्ताः । चण्डाला अश्वपालाः । आण्डीराः प्रगल्भाः । यद्वा राण्डीराः रण्डापुत्राः । संपादितो दत्तः । सीदन्नसमर्थो यः सौरभेयस्तेन शम्बलसंवाहनाय य आयासो योगस्तेन । गतसंयोगैरुत्पन्नचित्तक्षोभैरिति समासः । अभवनिरिति 'आक्रोशे नञ्यनिः'। दुर्विधा दरिद्राः । वृद्धाः स्थविराः । कुलपुत्राः कुलक्रमागाताः सेवकास्तैर्निन्द्यमानमिति स्कन्धावारविशेषणम् । क्वचिच्च भूपङ्गाधिकारिकर्महानसोपकरणवाहिभिश्च समुत्सार्य- माणपुरोवर्तिजनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । अतिशीष्णं वेगवत् । ग्रन्थिविद्यते येषां तैः । करकस्ताम्बूलाधारः । पतद्ग्रहो निष्ठीवनपात्रम् । अवग्राहः स्नानद्रोणी । के घसियरे ), लुंठक ( लूट-पाट करने वाले ), चेट ( छोटे नौकर-चाकर ), शाट ( धूर्त या शठ ), चंडाल ( अश्वपाल ), आण्डीर ( प्रगल्भ )—ये सब यात्रा की प्रशंसा करते थे । कहीं पर बेचारे असहाय वृद्ध कुलपुत्र जो किसी तरह गाँवों से मिले हुए मरियल बैलों पर सामान लादकर और स्वयं अपने ऊपर सामान लादकर घिसट रहे थे बुरी तरह घबड़ा कर कोसने लगे—'बस यह यात्रा किसी तरह पूरी हो जाय, तृष्णा पाताल चली जाय, धन का सत्यानाश हो, भगवान् बचाय इस नौकरी से । सब दुःखों की जड़ इस कटक को हाथ जोड़ता हूँ।' कहीं तेजी से बहते हुए जल के प्रवाह में नावों की भांति पंक्तिबद्ध होकर एक में-एक गुथे हुए ऐसे लोग चल रहे थे । राजाओं के अन्न-पान को ढोने वाले कर्मचारी बाहर निकाल रहे थे, वे अपने काले कठोर कंधों पर भारी लट्ठ रखे हुए थे, सोने का पाद- पीठ, पानदान, पानी का कलसा, पीकदान, नहाने की द्रोणी आदि राजाओं की निजी

भारिकैर्महानसोपकरणवाहिभिश्च बद्धवराहवध्रैर्वार्ध्रीणसैलम्बमानहरिणच- टुकचटकजूटजटिलैः शिशुशशकशाकपत्रवेत्राग्रसंग्रहसंग्राहिभिः शुक्लकपँ- टप्रावृतमुखैकदेशदत्तार्द्रमुद्रायुप्तगोरसभाण्डैस्तलकतापकतापिकाहस्तकता- म्रचरुककटाहसंकटपिटकभारिकैः समुत्सार्यमाणपुरोवर्तिजनम्, क्वचित् ‘क्लेशोऽस्माकम् । फलकालेऽन्य एव विटाः समुपस्थास्यन्ते' इति मुखरैः पदे पदे पततां दुर्बलबलीवर्दानां नियुक्तैः स्खलने खलचेटकैः खेद्यमा- नासंविभक्तकुलपुत्रलोकम्, क्वचिन्नरपतिदर्शनकुतूहलादुभयतः प्रजविप्र- धावितग्रामेयकजनपदम्, मार्गग्रामनिर्गतेराग्रहारिकजाल्मैश्च पुरःसरज- रन्महत्तरोत्तम्भिताम्भःकुम्भैरुपायनीकृतदधिगुडखण्डकुसुमकरण्डकैर्घटि- तपेटकैः सरभसं समुत्सर्पद्भिः प्रकुपितप्रचण्डदण्डिवित्रासनविद्रुतैर्दू रग- बहिःकारयद्भिर्निरस्यद्भिः । महानसा सूपकारशाला । वराहवध्रं सूकरचर्म । सूकर- पाठेति प्रसिद्धम् । वार्ध्रीणसा यज्ञियाश्छागविशेषाः । हरिणानां च चटुकाः पूर्व- भागाः । जूटः संघः । वेत्राग्राणि वंशाङ्कुराः । तलकोऽग्निशकटिका । तापकोऽपूपादि- करणस्थानम् । तापिका काकपालिका । यत्र तैलादिना भक्ष्याः पच्यन्ते । हस्तकः शूलम् । पिटका भाण्डानि । विटा धूर्ताः । समुपस्थास्यन्ति ढौकयिष्यन्ति । पततां स्खलताम् । स्खलने प्रेरणे । नियुक्तैः स्थापितैः । असंविभक्ता अकृतविभागाः । ग्रामे भवा ग्रामेयकाः । 'ग्रामाद्यत्खञौ' । आग्रहारिकजाल्मैर्मृग्यमाणसस्यसंरक्षण- मिति संगतिः । जाल्मा मूर्खाः । उत्तम्भिता ऊर्ध्वीकृताः । अम्भःकुम्भा जलपूर्ण- कलशाः । खण्ड इक्षुविकारः । समुत्सर्पद्भिर्ढौकमानैः । वित्रासनं भयोत्पादनम् । सामग्री को हँकड़ी में इठलाते हुए ले चल रहे थे। रसोई के सामान ढोने वाले भारिक भी आगे पड़ने वाले लोगों को हटाते हुए चलते थे, वे सूअर के चमड़े की बदियों में बकरे लटकाए चल रहे थे, कुछ हिरनों के अग्रभाग और चिड़ियों के ठट्ट के ठट्ट लटकाए चल रहे थे। कुछ लोग खरगोश के छोटे बच्चे, साग-पात, बांस के नरम अंकुर रसोई के लिए लेकर चले जा रहे थे; कुछ दूध-दही के इंडे लिए थे; सफेद कपड़े से जिनके मुंह ढंक कर और एक तरफ गीली मिट्टी पर मोहर लगा दी गई थी। सामान ढोने वाले अंगीठी, तवा, तई, सलखें, रांधने के लिए तांबे के बने बर्तन, कड़ाही आदि बर्तनों से भरे टोकरे लेकर चल रहे थे। कमजोर बैलों को हांकने के लिए देहाती नौकर कुलपुत्रों पर ताना कसते हुए कह रहे थे-'मेहनत तो हम करेंगे, लेकिन फल लेने के लिए भंटुए टपक पड़ेंगे।' कहीं सम्राट के देखने की उत्कण्ठा से गांव के लोग दोनों ओर वेग से दौड़े आ रहे थे। मार्ग के गांव से निकले हुए अनपढ़ आग्रहारिक लोग (खेती-बारी की देखभाल करने वाले) आगे-आगे मंगल के लिए गांव के तीन बड़े-बड़े वृद्धों के हाथों में जलकुम्भ उठाए

सप्तम उच्छ्वासः ३६६ तैरपि स्खलद्भिरपि पतद्भिरपि नरेन्द्रनिहितदृष्टिभिरसतोऽपि पूर्वभोगपति- दोषानुद्भावयद्भिरधिक्रान्तायुक्तकशतानि च शंसद्भिश्चिरंतनचाटापराधां- श्वाभिदधानैरुद्धूयमानधूलिपटलम्, क्वचिदेकान्तप्रवृत्ताश्ववारचक्रचर्च्य- माणागामिगौडमृग्यमाणसस्यसंरक्षणम्, अपरैरादिष्टपरिपालकपुरुषफ- रितुष्टैः 'धर्मः प्रत्यक्षो देवः' इति स्तुतीरातन्वद्भिः, अपरैर्लूयमाननिष्पन्न- सस्यप्रकटितविषादैः क्षेत्रशुचा सकुदुम्बकैरैव निर्गतैः प्ररूढप्राणच्छेदैः परितापत्याजितभयैः 'क्व राजा, कुतो राजा । कीदृशो वा राजा ?' इति प्रारब्धनरनाथनिन्दम्, शशकैश्च कैश्चित्पदे पदे प्रजविप्रचण्डदण्डपाणिपे- टकानुबद्धैर्गिरिगुडकैरिव हन्यमानैरितस्ततः संचरद्भिः, अपरैर्युगपत्पराप- तितमहाजनग्रस्तैस्तिलशो विलुप्यमानैरनेकजन्तुजङ्घान्तरालनिस्रणकुश- लिभिः कुटिलिकाव्यंसितसादिबहुश्वभिः पतल्लोष्टलगुडकोणकुठारकीलकु-

आयुक्तका व्यापृतकाः । चाटा धूर्ताः । अपरैराग्रहारिकजाल्मैरुपलक्षितमपरैः । प्रारब्ध- नरनाथनिन्दमिति योजना । निष्पन्नानि पक्वानि । सकुदुम्बैः सदारैः । शशकैः कृत- कलकलमित्यन्वयः । अनुबद्धा अनुसृताः । गिरिगुडकैर्लोष्टैः । कुटिलिकया वक्र- गमनेन । व्यंसिता वञ्चिताः सादिनामश्ववाराणां बहवः श्वानो यैः । कोणो वादन-

आ रहे थे। कुछ लोग दही, गुड़, शक्कर और पुष्पों की करंडियां पेटियों में बन्द करके जल्दी से ला रहे थे। कुछ लोग क्रोधित कठोर दंडधरों के डराने-धमकाने से दूर भागते हुए गिरते-पड़ते भी राजा पर ही दृष्टि गड़ाए थे। वे पहले के भोगपतियों की झूठी निन्दा कर रहे थे और पहले के कर्मचारियों की सराहना कर रहे थे और धूर्तों के अपराधों को कह-सुन रहे थे। इनकी दौड़-धूप से चारों ओर धूल भर रही थी। दूसरे कुछ लोग सरकारी कर्मचारियों से सन्तुष्ट होकर 'सम्राट् साक्षात् धर्म के अवतार हैं' इस प्रकार स्तुति कर रहे थे। दूसरे कुछ लोग जिनकी तैयार फसल सेना के लिए काट ली गई थी, विषाद प्रकट करते हुए उसके शोक में अपने गृहस्थी के साथ बाहर निकल कर प्राणों को हथेली पर रक्खे निडर होकर कह रहे थे—'कहां है राजा ! किसका राजा ? कैसा राजा ?' इस प्रकार राजा को बाहर निकल कर बोली मार रहे थे। झाड़ियों में छिपे हुए झुण्ड के झुण्ड खरगोश सेना की कल-कल ध्वनि से इधर-उधर उचकने लगे, बस डंडा लिए हुए तेजी से लोग उनपर टूट पड़े और जैसे खेत के ढेले तोड़े जाते हैं ऐसे उन्हें मारने लगे। कुछ खरगोश एकाएक टूट पड़े लोगों के बीच में पड़ जाने से बोटी-बोटी नुच गए। कुछ खरहे पशुओं की टांगों के बीच से घुस कर भाग निकले और अपनी टेढ़ी-मेढ़ी २४ ह० च०

हालखनित्रदात्रयष्टिवृष्टिभिरपि निःसरद्भिरायुषो बलात्कृतकलकलम् , अन्यत्र संघशो घासिकैर्बुसधूलिधूसरितघासजालजालकितजघनैश्च पुराण- पर्याणैकदेशदोलायमानदात्रैश्च शीर्णोर्णाशकलशिथिलमलिनमलकुथैश्च प्रभुप्रसादीकृतपाटितपटच्चरचलबोलकधारिभिश्च धावमानैरुद्धूयमानधूलि- पटलम्, क्वचिदेकान्तप्रवृत्ताश्ववारचक्रचर्च्यमाणागामिगौडविग्रहम्, क्व- चित्पङ्किलप्रदेशपूरणादेशाकुलसकललोकलूयमानतृणपूलकम्, क्वचित्तल- वर्तिवेत्रिवेत्रवित्रास्यमानशाखिशिखरगतविकोशद्विर्वाग्दग्धाब्राह्मणम्, क्वचि- त्कुलुण्ठकपाशविवेष्ट्यमानग्रामीणप्रामाकृष्टकौलेयकम्, क्वचिदन्योन्यविभ- वस्पर्धोद्धुरराजपुत्रवाह्यमानवाजिसंघट्टमण्डितम्, अनेकवृत्तान्ततया कौतु- कजननम्, प्रलयजलधिमिव जगद्ग्रासग्रहणाय प्रवृत्तम्, पातालमिव भाण्डम् । अन्यत्र घासिकैः उद्धूयमानधूलीपट्लमिति संबन्धः । संघशो बहुशः । घासे नियुक्ता घासिकाः । घासजालं घाससंघातः । एकदेशः पश्चिमा दिक् । 'मलकुथैः' इति पाठः । मलकुथा मलपट्टी । छुविरित्यर्थः । अंसोपरिवासं इत्यन्ये । पटच्चरं जीर्णवस्त्रम् । कुलुण्ठकाः शुनां बन्धनलगुडाः । उद्धुरा उद्दामप्रसराः । जगतो चाल से दौड़ कर घुड़सवारों के कुत्तों को झांसा देने लगे । यद्यपि उनपर चारों ओर से ढेले, डंडे, टेढ़ी छड़ी, कुठार, कील, कुदाल, फडुभा, दरांती, लाठी की बरसा होती रहती थी, तथापि आयु के बल से बच निकलते थे । एक ओर घसियारे धूल-धक्कड़ करते दौड़ रहे थे, उनकी जांघों पर भूसों की धूल से मिली हुई घास भर आई थी, घोड़े पर कसी हुई पुरानी काठी के पीछे की ओर उनके दरांत लटक रहे थे । रद्दी ऊन के टुकड़ों से जमाए हुए गुदगुदे और मैले नमदे उनके घोड़ों की पीठ पर पड़े हुए थे, प्रभु के प्रसाद के रूप में फटे हुए कपड़े का फीता उनके सिर से बंधा हिल रहा था । एक तरफ सवारों की टुकड़ी आने वाले गौड़युद्ध के विषय में चर्चा कर रही थी । कहीं पांक वाली जमीन पर पुआल की आँटियाँ बिछाने में लोग जुट जाते थे । कहीं नीचे खड़े दण्डधर सैनिकों के डंडे के डर से उजड्ड ब्राह्मण झट पेड़ों पर चढ़कर गाली-गलौज कर रहे थे । कहीं गांव के लोग कुत्तों को घसीट कर ला रहे थे और कुलुण्ठक ( कुत्ते पालने वाले ) उन्हें अपने फांसों में बांध रहे थे । कहीं परस्पर ऐश्वर्य की स्पर्धा से राजपुत्र घुड़दौड़ मचा रहे थे । नाना प्रकार के वृत्तान्तों से भरे चलते हुए कटक को देखकर कौतुक उत्पन्न होता था । मानों वह कटक प्रलयकाल में समुद्र के समान संसार को गड़प लेने के लिए चल पड़ा था । महाभोगी ( धनिकों, सर्पों ) की रक्षा के लिए पाताल का रूप मानों धारण कर रहा था । परमेश्वर ( सम्राट् , शंकर ) के निवास के लिए कैलास बन गया था । प्रजापतियों के

सप्तम उच्छ्वासः ३७१ ःमहाभोगिनां गुप्तये समुत्पादितम् , कैलासमिव परमेश्वरवसतये सृष्टम् , ःदृश्यमानसकलप्राणिपर्यायं चतुर्युगसर्गकोशमिव प्रजापतीनां क्लेशबहु- लमपि तपःकरणमिव क्रमकारिणं कल्याणानाम् , एवं च वीक्ष्यमाणः कटकं जगाम । आसन्नवर्तिनां च 'तत्रभवता मांधात्रा प्रवर्तिताः पन्थानो दिग्बिज- याय । अप्रतिहतरथरंहसा रघुणा लघुनैव कालेनाकारि ककुभां प्रसाद- नम् । शरासनद्वितीयः करदीचकार चक्रं क्रमागतभुजबलाभिजनधनमदा- वलिप्तानां भूभुजां पाण्डुः । पाण्डवः सव्यसाची चीनविषयमतिक्रम्य राजसूयसंपदे क्रुध्यद्गन्धर्वधनुष्कोटिटांकारकूजितकुञ्जं हेमकूटपर्वतं परा- जैष्ट । संकल्पान्तरितो विजयस्तरस्विनाम् । सहिमहिमवद्व्यवहितोऽप्यु- वाह बाहुबलव्यतिकरकातरः करं कौरवेश्वरस्य किङ्कर इवाकृती द्रुमः । नातिजिगीषवः खलु पूर्वे येनाल्प एव भूभागे भूयांसो भगदत्तदन्तवक्र- ग्रहणं स्वीकरणम्, प्लावनं च । भोगिनो भोगवन्तः, सर्पाश्च । परमेश्वरो हरोऽपि । परितः समन्तादायः । आगमनं पर्यायः । आसन्नेत्यादौ । पार्थिवसुतानामित्येवंप्रायानालापाञ्शृण्वन्नेवाससादावासमिति संबन्धः । तत्रभवता पूज्येन । सव्यसाची अर्जुनः । पराजैष्ट जिगाय । तरस्विनां पराक्रमवताम् । कौरवेश्वरो दुर्योधनः । अकृती अकृतार्थः । द्रुमाख्यः किन्नरराजः । चारों युगों की सृष्टि के कोश की भाँति सारा प्राणिवर्ग उसमें दिखाई पड़ रहा था । यद्यपि उसमें क्लेश ही क्लेश था लेकिन तपस्या की भांति अन्त में कल्याण ही करने वाला था । सम्राट् ऐसे कटक को देखते हुए चले । समीप में रहने वाले पराक्रमी राजपुत्रों ने बातचीत के द्वारा इस प्रकार का प्रोत्साहन दिया—'मान्धाता ने दिग्विजय का मार्ग दिखाया । उसी मार्ग पर चलकर अप्रतिहत रथ, वेग से रघु ने थोड़े समय में दिशाओं को शान्त कर दिया । धनुर्धारी पाण्डु ने वंश- परम्परागत भुजबल के मद में चूर अभिमानी राजाओं को अपना करद बना दिया । पाण्डुपुत्र अर्जुन ने राजसूय यज्ञ के समय चीन देश को पार करके हेमकूट पर्वत के वनों में क्रोधित होकर धनुष की टङ्कार करने वाले गन्धर्वों को जीत लिया । एकमात्र अपने ही सङ्कल्प के अभाव से वीरों की विजय में बाधा होती है। जैसे किन्नरराज द्रुम बरफ से ढँका हिमालय जैसा रक्षक पाकर भी बल के अभाव में कृतार्थ न होकर दुर्योधन का किंकर हो गया । निश्चय ही पहले के राजा विजय के इच्छुक न थे, क्योंकि थोड़ी ही जमीन के

३७२ हर्षचरितम्

क्वाथकर्णकौरवशिशुपालसाल्वजरासंधसिन्धुराजप्रभृतयोऽभवन्भूपतयः । संतुष्टो राजा युधिष्ठिरो यो ह्यसहत समीप एव धनंजयजयजनितजग- त्कम्पः किंपुरुषाणां राज्यम् । अलसश्चण्डकोशो यो न प्राविक्षत्तद्मां जित्वा स्त्रीराज्यम् । ह्रसीय एवान्तरं तुषारगिरिगन्धमादनयोः उत्साहिनः । किष्कुः तुरुष्कविषयाः । प्रादेशः पारसीकदेशः । शशपदं शकस्थानम् । अदृ- श्यमानप्रतिप्रहारे परियात्रे यात्रैव शिथिला । शौर्यशुल्कः सुलभो दक्षिण- पथः । दक्षिणार्णवकल्लोलानिलचलितचन्दनलतासौरभसुन्दरीकृतदरीम- न्दिराद्दर्दुरादद्रेर्नेदीयसि मलयो मलयलग्न एव च महेन्द्रः ।' इत्येवंप्राया- नुद्योगद्योतकानामालापान्पार्थिवकुमाराणां बाहुशालिनां शृण्वन्नेवाससा- दावासम् । मन्दिरद्वारि चोभयतः सबहुमानं भ्रूलताभ्यां विसर्जितराज- लोकः प्रविश्य चावततार बाह्यास्थानमण्डपस्थापितमासनमाचक्राम । अपास्तसमायोगश्च क्षणमासिष्ट ।

सिन्धुनाथो जयद्रथः । ह्रसीयो ह्रस्वतरम् । साङ्गुष्ठया प्रदेशिन्या प्रादेशः । 'प्रादेश- ताळगोकर्णस्तर्जन्यादियुते तते । अङ्गुष्ठे सकनिष्ठे स्याद्वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलः ॥' इत्यमरसिंहः । शौर्यकृतः शुल्कः पणो यत्र स शौर्यशुल्कः । अतिशयेनान्तिकं नेदीयः । 'अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ' इति ।

टुकड़े में एक साथ भगदत्त, दन्तवक्र, रुक्मि, कर्ण, दुर्योधन, शिशुपाल, साल्व, जरासंध, जयद्रथ आदि बहुत से राजा राज्य करते थे । राजा युधिष्ठिर कैसे सन्तोषी थे जिन्होंने दिग्विजय द्वारा जगत् को कम्पित कर देने वाले अर्जुन के रहते भी समीप ही किंपुरुषों के राज्य को सह लिया । चण्डकोश कितना आलसी था जिसने पृथिवी को जीत लेने पर भी स्त्रीराज्य में प्रवेश नहीं किया । उत्साही के लिए हिमालय और गन्धमादन पर्वतों में अंतर ही कितना है । तुरुष्कों के देश हाथ भर हैं । पारसिकों का प्रदेश एक बित्ता भर है। शकों का देश खरहे के पैर भर है । परियात्र में सेना की यात्रा ही व्यर्थ है, क्योंकि मुकाबले के लिये कोई दीखता नहीं । दक्षिणापथ शौर्य के धनी के लिए सुलभ है । जिस दर्दुर पर्वत के गुफामन्दिर दक्षिणसमुद्र के कल्लोल की हवा से हिलती हुई चन्दनलताओं की सौरभ-सुगन्धि से भर जाते हैं उसी के निकट ही तो मलयाचल है, एवं मलयाचल से मिला हुआ ही महेन्द्र पर्वत है।' राजपुत्रों की इन बातों को सुनते हुए हर्ष अपने निवास- स्थान में पहुँचे । जब मन्दिर के द्वार पर आये तो अगल-बगल में खड़े राजाओं को आदर- पूर्वक भौंह के संकेत से विदा करके अन्दर प्रवेश किया और महल के बाह्य आस्थानमण्डप

सप्तम उच्छ्वासः ३७३ अथ तत्र प्रतीहारः पृथ्वीपृष्ठप्रतिष्ठापितपाणिपल्लवो विज्ञापितवान्— 'देव ! प्राग्ज्योतिषेश्वरेण कुमारेण प्रहितो हंसवेगनामा दूतोऽन्तरङ्गस्तो- रणमध्यास्ते' इति । राजा तु 'तमाशु प्रवेशय' इति सादरमादिदेश । अथ दक्षतया क्षितिपालादराच्च प्रतीहारः स्वयमेव निरगात् । अनन्तरं च हंसवेगः सविनयमाकृत्यैव नयनानन्दसंपादनसुभगाभोगभद्रतया समुल्ल- ङ्घ्यमानगुणगरिमा प्रभूतप्राभृतभृतां पुरुषाणां समूहेन महतानुगम्यमानः प्रविवेश राजमन्दिरम् । आरादेव पञ्चाङ्गालिङ्गिताङ्गनः प्रणाममकरोत् । 'एह्येहि' इति सबहुमानमाहूतश्च प्रधावितोऽपसृतः पादपीठलुलितललाट- लेखो न्यस्तहस्तः पृष्ठे पार्थिवेनोपसृत्य भूयो नमश्चक्रे । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्ट्या निर्दिष्टमविप्रकृष्टं स प्रदेशमध्यास्त । ततो राजा तिरश्चीं तनुमीषदिव दधानश्चामरग्राहिणीमन्तरालवर्तिनीं समुत्सार्य संमुखीनस्तं सप्रश्रयं पप्रच्छ—'हंसवेग ! श्रीमान्कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । स तमन्ववा- दीत्—'अद्य कुशली येनैवं स्नेहरस्रपितया सौहार्दद्रवार्द्रया सगौरवं गिरा पृच्छति देवः' इति । प्राग्ज्योतिषं कामरूपाख्यो देशः । समुल्लङ्घ्यमानो नीयमानः । संमुखीनौऽभिमुखः भोगः पालनम् । में स्थापित आसन पर विराजमान हुए । वहाँ से समायौग ( फौजी परेड ) के बर्खास्त होने की सूचना देकर क्षण भर वहीं ठहरे । इसी समय वहाँ आकर प्रतिहार ने जमीन पर हाथ टेक कर सूचना दी—'देव, प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार द्वारा भेजा हुआ हंसवेग नाम का अन्तरंग दूत राजद्वार पर खड़ा है ।' राजा ने 'शीघ्र उसे बुलाओ' यह आदरपूर्वक आज्ञा दी । तब बात समझ जाने वाला प्रतीहार राजा के आदर से स्वयं बाहर निकल गया । तत्पश्चात् हंसवेग ने भेंट की। सामग्री लाने वाले अनेक पुरुषों के साथ विनयपूर्वक राजमन्दिर में प्रवेश किया । आँखों को आनन्दित करने वाली वह अपनी सुभग और भद्र आकृति से ही गुणों का गौरव प्राप्त कर रहा था । दूर ही से उसने अपने पाँच अंगों से पृथिवी को छूते हुए राजा को प्रणाम किया । राजा ने 'आओ आओ' कहकर उसे आदर के साथ बुलाया । वह दौड़कर उनके पास आकर पादपीठ पर सिर रगड़ने लगा । तब राजा ने उसकी पीठ पर अपना हाथ रखा । उसने फिर उन्हें प्रणाम किया । राजा ने स्नेहभरी दृष्टि से उसे बैठने के लिए संकेत किया । तब वह थोड़ी दूर पर बैठ गया । तब राजा ने कुछ तिरछे होकर शरीर को झुकाते हुए चामरग्राहिणी को बीच से हटाकर दूत की ओर मुँह करके प्रेमपूर्वक पूछा—'हंसबेग, श्रीमान् कुमार तो कुशल से हैं ?' उसने उत्तर दिया—'जब इतने स्नेह से सनी और

३७४ हर्षचरितम् स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः स चतुरमुवाच- 'चतुरम्भोधिभोगभूति- भाजनभूतस्य देवस्य सद्भावगर्भमपहाय हृदयमेकमन्यदनुरूपं प्राभृतमेव दुर्लभं लोके तथाप्यस्मत्स्वामिना संदेशमशून्यतां नयता पूर्वजोपार्जितं वारुणातपत्रमाभोगाख्यमनुरूपस्थानन्यासेन कृतार्थीकृतमेतत् । अस्य च कुतूहलकृन्ति बहून्याश्चर्याणि दृश्यन्ते । तथा हि-प्रतिदिवसं प्रविशति शैत्यहेतोश्छायायाः किरणसहस्रादेकैकः सोमस्य रश्मिरस्मिन् । यस्मिन्प्र- विष्टे प्रध्यानानन्तरं स्वादवो दन्तवीणोपदेशाचार्याश्च्योतन्ति चन्द्रभासा- मम्भसां मणिशलाकाभ्यो यावदिच्छमच्छा धाराः । प्रचेता इव यश्चतु- र्णमर्णवानामधिपतिर्भूतो भावी वा तमिदमनुगृह्णाति च्छायया नेतरम् । इदं च न सप्ताचिर्दहति, न पृषदश्वो हरति, नोदकमार्द्रयति, न रजांसि मलिनयन्ति, न जरा जर्जरयतीति । एतत्तावदनुगृह्णातु दृशा देवः संदेश- मपि विस्रब्धं श्रोष्यति ।' इत्येवमभिधाय विवृत्यात्मीयं पुरुषमभ्यधात्- 'उत्तिष्ठ । दर्शय देवस्य' इति । शीतोद्भवो दन्तानामन्योन्याघातो दन्तवीणा । सप्ताचि॑रग्निः । पृषदश्वो वायुः । विवृत्य स्थित्वा । सौहार्द से आई अपनी वाणी से गौरव के साथ देव पूछ रहे हैं तो वे आज सब प्रकार कुशली हुए । कुछ देर बाद उसने फिर निपुणता के साथ कहा- 'चारों समुद्र की लक्ष्मी के भाजन देव को देने योग्य सद्भाव से भरे एक हृदय को छोड़कर लोक में और दूसरा उपहार क्या है ? फिर भी हमारे स्वामी ने पूर्वजों द्वारा उपार्जित आभोग नामक यह वारुण आतपत्र सन्देश के साथ सेवा में भेजकर योग्य स्थान में रखने से इसे कृतार्थ कर दिया । इसके अनेक कुतूहलजनक आश्चर्य देखे गये हैं । छाया की ठण्डक पाने के लिए प्रतिदिन चन्द्रमा की एक-एक किरण इसमें प्रवेश करती है। उसके प्रवेश करने पर चन्द्र के समान मणिशलाकाओं से मधुर, स्वच्छ और दाँतो को खटखटा देने वाली धारा निकलने लगती है । वरुण के समान जो चारों समुद्रों का अधिपति हुआ है अथवा होगा उसी पर इस छत्र की छाया पड़ेगी दूसरे पर नहीं। इस छत्र को अग्नि नहीं जला सकती, हवा नहीं उड़ा सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, धूल मलिन नहीं कर सकती, एवं जरा इसे जर्जर नहीं बना सकती । देव इस पर दृष्टिपात करने का अनुग्रह करें, फिर एकान्त में संदेश भी सुनें ।' यह कह कर वह पीछे मुड़ कर अपने नौकर से बोला- 'उठो, देव के सामने वह छत्र दिखाओ ।'

[Header] सप्तम उच्छ्वासः ३७५

स च वचनान्तरमुत्थाय पुमानूर्ध्वंचकार तद्धौतदुकूलकल्पिताच्च निचोलकादकोषीत् । आकृष्यमाण एव च यस्मिन्नतिसितमहसि सरभस- महासीव हरेण रसातलादुदलासीव शेषफणिफणामण्डलेन, अस्था- यीव चक्रीभूयान्तरिक्षे क्षीरोदेन, अघटीव गगनाङ्गने गोष्ठीबन्धः शारदेन बलाहकव्यूहेन, विश्रान्तमिव विततपक्षतिना वियति पितामहविमानहंस- यूथेन, अत्रिनेत्रनिर्गतस्य धवलधाममण्डलममनोहरो दृष्ट इव जनेन जन्म- दिवसः कुमुदबन्धोः, प्रत्यक्षीकृत इवोद्गमनक्षणो नारायणनाभिपूण्डरीकस्य, आहितेव कौमुदी प्रदोषदर्शनानन्दतृप्तिरदृणाम्, उद्माङ्क्षीदिव मन्दाकिनी- पुलिनमण्डलं महदम्बरोदरे, परिवर्तित इव दिवसः पौर्णमासीनिशया मन्दमन्दमिन्दूद्यसंदेहदूयमानमानसैर्विघटितं घटमानचञ्चुच्युतमृणाल- कोटिभिरासन्नकमलिनीचक्रवाकमिथुनैः शरज्जलधरपटलाशङ्कासंकोचित- केकारवमूकमुखपुटैः पराङ्मुखीभूतं भवनशिखण्डिमण्डलैः, प्रबुद्धमाबद्ध- चन्दान्ब्दोद्दामोल्लहलपुट्टाट्टहासविशदं कुमुदषण्डैः ।

निचोलकादाच्छादनप्रसेवकात् । अकोषीन्निष्कासितवान् । उदलास्युल्लसितम् । अस्थायि स्थितम् । अघटि घटितम् । विश्रान्तं व्यश्रमत । उद्गमनक्षण उत्पत्ति- समयः । उदमाङ्क्षीदुन्मग्नम् । परिवर्तितः स्वरूपः कृतः ।

उसके कहने पर उसने उठ कर छत्र को ऊँचा किया और सफेद दुकूल के बने हुए खोल में से उसे निकाला । उस छत्र के बाहर खींचे जाते ही अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश भर गया, मानों शिव ने जोर से अट्टहास किया हो या पाताल से होकर शेषनाग का फणामण्डल निकल आया हो, या चक्राकार क्षीरसमुद्र आकाश में स्थिर हो गया हो, या शरत्कालीन मेघसमूह आकाश के प्राङ्गण में सभा करने बैठा हो, या ब्रह्माजी के विमान का हंसयूथ आकाश में पंख फैला कर विश्राम लेने लगा हो । मानों लोगों ने अत्रि के नेत्र से निकले हुए उज्ज्वल धाममंडल से मनोहर चन्द्रमा का जन्मदिन देख लिया । विष्णु के नाभिकमल का उद्भवकाल प्रत्यक्ष देखने में आया । आँखों को कौमुदी- महोत्सव के देखने का आनन्द पूर्ण मिल गया । विशाल आकाश के मध्य में मन्दाकिनी की रेत मानों ऊपर उठ आई हो । दिन ही मानों पूनम की रात के रूप में बदल गया । समीप के कमलिनी-बनों में रहने वाले जोड़े चक्रवाक जो परस्पर मृणाल का आदान- प्रदान कर रहे थे, मन्द-मन्द उदित होते हुए चन्द्रमा के संदेह से दुखी होकर विघटित हो गए । उनके चंचु से मृणाल छूट कर गिर गए । भवन के मयूरों ने उसे शरत्क.क

३७६ हर्षचरितम्

चित्रीयमाणचेताश्च सराजको राजा दण्डानुसाराधिरोहिण्या दृष्टया सादरमैक्षिष्ट तत्तिलकमिव त्रिभुवनस्य, शैशवमिव श्वेतद्वीपस्य, अंशा- वतारमिव शरदिन्दोः, हृदयमिव धर्मस्य, निवेशमिव शशिलोकस्य, दन्त- मण्डलद्युतिधवलं मुखमिव चक्रवर्तित्वस्य, मौक्तिकजालपरिकरसितं सीमन्तचक्रमिव दिवः, बहलज्योत्स्नाशुक्लोदरमैन्दवमिव परिवेषवलयं शौक्ल्यापहसितशङ्खश्रीकं श्रवणमण्डलमिव निश्चलतां गतमैरावतस्य श्वेतगङ्गावर्तपाण्डुरं पदमिव त्रिभुवनवन्दनीयं त्रिविक्रमस्य, प्रचेतसचूडा- मणिमरीचिशिखाभिरिव श्लिष्टाभिर्मानसबिसतन्तुमयीभिश्चामरिकावली- भिर्विरचितपरिवेषम्, उपरि चक्रवर्तिलक्ष्मीनूपुरस्वनश्रवणदोहदनिश्चलेनेव लक्ष्मणा विततपत्रेण हंसेन सनाधीकृतशिखरम्, स्पर्शवता च प्रभावस्त- म्भितेन मन्दाकिनीमृणालेन मुकुलितफणेन वासुकिनेव नीतेन दण्डतां द्योतमानम्, धवलिम्ना क्षालयदिव नक्षत्रपथम्, प्रभाप्रवाहप्रथिम्ना प्रावृण्व-


निवेशं स्थानम् । दन्तमण्डलकं दशनकृतं चक्रवालम्, दशनसमूहश्च । मुख- मारम्भः, वक्त्रं च । परिकरः परिवेष्टनम् । परिवेषवलयं परिधिकटकम् । 'स्यादा- वर्तोऽम्भसां भ्रमः' । आवर्त्तनमावर्त्तः । प्रावृण्वदाच्छादयत् ।

का मेघ समझ कर केका की आवाज बन्द कर दी और पराङ्मुख हो गए। कुमुद चन्द्र के प्रति स्नेह के कारण अपने दलों को विकसित करके अट्टहास के साथ जग पड़े। अन्य राजाओं के साथ देव हर्ष ने विस्मय-विमुग्ध होकर दण्ड के अनुसार दृष्टि को ऊपर उठाते हुए उस अद्भुत महत् छत्र को ध्यानपूर्वक देखा। वह छत्र मानों त्रिभुवन का तिलक, श्वेतद्वीप का शैशव, शरत्काल के चन्द्रमा का अंशावतार, धर्म का हृदय, चन्द्रलोक का आयतन था, और मानों दाँतों की चमक से उज्ज्वल चक्रवर्तित्व का मुख था । उसके चारों ओर मोतियों के जालक लटक रहे थे, मानों स्वर्गलोक का केश-विन्यास हो । उसके मध्यभाग में चाँदनी छिटक रही थी, मानों चन्द्रमा के मंडल का घेरा हो । अपनी सफेदी से वह शंख की श्री को हँस रहा था, मानों ऐरावत का चंचलता से रहित श्रवणमण्डल हो। वह गंगा की भँवरियों के समान उज्ज्वल था, मानों विष्णु का त्रिभुवनवन्दनीय चरण हो। मानसरोवर के बिसतन्तुओं से मानों बनी हुई छोटी-छोटी चौरियाँ उसके चारों ओर लटक रही थीं, मानों वरुण की चूड़ामणि की किरणें हों। उसके शिखर पर पंख फैलाए हंस का चिह्न बना था, जो मानों चक्रवर्ती की लक्ष्मी के नूपुर की आवाज सुनने के आनन्द में निश्चल था। स्पर्श से सुख देने वाला मन्दाकिनी का मृणाल या प्रभाव से स्तम्भित होकर फनों को सिकोड़ते हुए वासुकिनाग ही उसका

सप्तम उच्छ्वासः ३७७ दिव दिवसम्, समुच्छ्रायेणाधःकुर्वन्निव दिवम्, उपरिस्थितमिव सर्व- मङ्गलानाम्, श्वेतमण्डपमिव श्रियः, स्तबकमिव ब्रह्मस्तम्बस्य, नाभिम- ण्डलमिव ज्योत्स्नायाः, विशदहासमिव कीर्त्तेः, फेनराशिमिव खड्गधारा- जलानाम्, यशःपटलमिव शौर्यशालितायाः, त्रैलोक्याद्भुतं महच्छत्रम् । दृष्टे च तस्मिन्द्राज्ञा प्रथमे शेषमपि प्राभृतं प्रकाशयांचक्रुः क्रमेण कार्माः । तद्यथा परार्घ्यरत्नांशुशोणीकृतदिग्भागान्, भगदत्तप्रभृतिख्यात- पार्थिवपरंपरागतानाहृतलक्षणानलंकारान्, प्रभालेपिनां च चूडामणीनां समुत्कर्षान्, क्षीरोदधेर्धवलताहेतूनीव हारान्, अनेकरागरुचिरवेत्रकरण्ड- कुण्डलीकृतानि शरच्चन्द्रमरीचिरुचीनि शौचक्षमाणि क्षौमाणि, कुशलशि- ल्पिलोकोल्लिखितानां च शुक्तिशङ्खगल्वर्कप्रमुखानां पानभाजनानां निच- यान्, निचोलकरक्षितरुचां च रुचिरकाञ्चनपत्रभङ्गभङ्गुराणामतिबन्धुर- परिवेशानां कार्दरङ्गचर्मणां संभारान्, भूर्जत्वक्कोमलाः स्पर्शवतीर्जातिर- कार्मा भृतकाः । आहतलक्षणान्गुणैः प्रसिद्धान् । उक्तं च—'गुणैः प्रतीते तु कृतलक्षणाहतलक्षणौ' इति । समुत्कर्षानतिशयान् गल्वर्को मसाराख्यो मणिभेदः, चन्द्रकान्त इत्यन्ये । शौचो धावनम् । कार्दरङ्गचर्मणां कार्दरङ्गदेशभवानां स्फोटका- दण्ड बन गए हों । वह मानों अपनी सफेदी से आकाश को धो रहा था। प्रभा के बढ़े हुए प्रभाव से दिन को ढँक रहा था। अपनी ऊँचाई से आकाश को नीचा कर रहा था। सब मंगलों के वह मानों ऊपर स्थित था। छत्र क्या था, मानों लक्ष्मी का श्वेतमंडप (चाँदनी में विहार करने के लिए ऐसा मंडप जिसकी सजावट श्वेत रंग की हो) था; श्वेतद्वीप का बाल रूप था; ज्योत्स्ना का नाभिमण्डल था; कीर्ति का विशद हस्त था; खड्ग के धाराजल की फेनराशि था और शूरता का यशःपटल था । देव हर्ष जब छत्र को देख चुके तब भृत्यों ने बचे हुए अन्य उपहारों को भी उघाड़ कर दिखाया । वे इस प्रकार थे—आभूषण जो जड़े हुए बहुमूल्य रत्नों की किरणों से दिग्भाग को रंगीन कर रहे थे, जो भगदत्त आदि प्रसिद्ध राजाओं के समय से कुल में चले आ रहे थे, जिन पर भाँति-भाँति के लक्षण या चिह्न ठप्पे से बनाए गये थे । चूडामणि या शिरोभूषण, जिनमें बहुत चमक थी। हार, जो क्षीरसमुद्र को भी धवलता के मानों कारण थे । क्षौम वस्त्र, जो शरत्कालीन चन्द्रमा की तरह चिट्टे रङ्ग के थे और जो धुलाई सह सकने वाले थे और नाना वर्ण की रङ्ग-बिरंगी बेंत की करंडियों (झाँपियों) में कुण्डलित करके रखे गए थे। अनेक प्रकार के पान-भाजन या मधुपान करने के चषक, जो सीप, शंख, गल्वर्क के बने हुए थे और जिनपर चतुर कारीगरों ने भाँति-भाँति की

३७८ हर्षचरितम् पट्टिकाः, चित्रपटानां च श्रदीयसां समूरूकोपधानादीन्विकारान्, प्रियङ्गु- प्रसवपिङ्गलत्वञ्चि चासनानि वेत्रमयान्यगुरुवल्कलकल्पितसंचयानि च सुभाषितभाञ्जि पुस्तकानि, परिणतपाटलपटोलत्विषि च तरुणहारीतह- रिन्ति क्षीरक्षारीणि च पूगानां पल्लवावलम्बीनि सरसानि फलानि, सह- कारलतारसानां च कृष्णागुरुतैलस्य च कुपितकपिकपोलकपिलकापोति- कापलाशकोशीकवचिताङ्गीः स्थवीयसीर्वेणवीनार्डीश्च, पट्टसूत्रप्रसेवकार्पि- तांश्च भिन्नाञ्जनवर्णस्य कृष्णागुरुणो गुरुपरितापमुषश्च गोशीर्षचन्दनस्य, तुषारशिलाशकलशिशिरस्वच्छसितस्य च कर्पूरस्य, कस्तूरिकाकोशकानां च पक्वफलजूटजटिलानां च कक्कोलपल्लवानाम्, लवङ्गपुष्पमञ्जरीणां जातीफलस्तबकानां च राशीन्, अतिमधुरमधुरसामोदनिर्हारिणी- नाम् । जातिपट्टिकाः श्रेष्ठानि जघनग्रन्थनानि । संचयाः पत्रसमूहाः । पटोलस्तिक्तक ओषधिभेदः । उक्तं च - 'अथ कुलकं पटोलस्तिक्तकः पटुः' इति । कापोतिका ओषधिभेदः । गोशीर्षचन्दनस्य चन्दनभेदस्य । कोशका नाभयः । अंतिमधुरं मधुरसाया इवामोदानि हरन्ति मुञ्चन्ति यास्ताः । मधुरसा द्राक्षा । उक्तं च- 'मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा माध्वी मधुरसेति च' इति । अन्ये मधुरसं मकरन्दं द्रव- नक्काशी का काम किया था। कार्दरङ्ग द्वीप से आइ हुई ढालें जिनपर आव की रक्षा के लिए खोल चढ़े थे, इनके काले चमड़े पर सुनहली फूल-पत्तियों के कटाव खचित थे और इनकी गोलाई ऊंची-नीची थी। मोजपत्र की तरह मुलायम स्पर्श से सुख देने वाली जाती-पट्टिकाएँ या कटिप्रदेश में बाँधने के काम में आने वाले एक प्रकार के बढ़ियाँ पटके। नरम चित्रपटों (जामदानी) के बने हुए तकिये जिनके भीतर समूर या पक्षियों के बाल या रोँए भरे थे। बेंत के बुने हुए आसन, जिनका रङ्ग प्रियंगुमजरी की तरह ललछौँही पीली झलक का था। सुभाषितों से भरी पुस्तकें जिनके पन्ने (संचय) अगुरु को पीट कर बनाए गए थे। हरी सुपारियों के झुग्गे, जिनमें पल्लवों के साथ सरस फल झूम रहे थे, इनका रङ्ग पके हुए लाल परवल की तरह ललछौँह और हरियल पक्षी की तरह हरि- याली लिए था, इनसे दूध टपक रहा था। सहकार लताओं के रस से भरी हुई मोटी बाँस की नलियाँ, जिनके चारों ओर क्रोधित बन्दर के कपोल की भाँति कपोतिका के लाल-पीले पत्ते बँधे हुए थे। काले अगुरु का तेल भी इसी प्रकार की मोटी बाँस की नलियों में भर कर और पत्तों में लपेट कर लाया गया था। पटसन के बने हुए बोरों में भर कर काले अगुरु के ढेर लगाए गए थे, जिनका रङ्ग छूटे हुए अंजन की तरह था। गरमी में ठंडक पहुँचाने वाले गोशीर्ष नामक चन्दन की राशियाँ बरफ के शिखाखण्ड की

सप्तम उच्छ्वासः ३७५ श्रोल्लक्ककलशीः सितासितस्य च चामरजातस्य निचयान्, अवलम्बमान- तूलिकालाबुकांश्च लिखितानेकलेख्यफलकसंपुटान्, कुतूहलकृन्ति च कनकश्शृङ्खलानियमितग्रीवाणां किंनराणां च वनमानुषाणां च जीवञ्जीव- कानां च जलमानुषाणां च मिथुनानि, परिमलामोदितककुभश्च कस्तूरि- काकुरङ्गान्, गेहपरिसरणपरिचिताश्च चमरीः, चामीकररसचित्रवेत्रपञ्जरा- न्तर्गतांश्च बहुसुभाषितजल्पाकजिह्वांश्च^१ शुकशारिकाप्रभृतीन्पक्षिणः, प्रवा- लपञ्जरगतांश्च चकोरान्, जलहस्तिनामुद्रकुम्भमुक्ताफलदामदन्तुराणि च दन्तकाण्डकुण्डलानि । राजा तु छत्रदर्शनात्प्रहृष्टहृदयः प्रथमप्रयाणे शोभननिमित्तमिति मनसा जग्राह । हंसवेगं च प्रीयमाणो बभाषे—'भद्र ! सकलरत्नधाम्नः परमेश्वरशिरोधारणार्हस्यास्य महातपत्रस्य महार्णवादिव कुमुदबान्धवस्य माहुः । उल्लकः सुगन्धिफलविशेषरसः । आसवभेद इत्यन्ये । तूलिका ऊर्जिका । यया चित्रं क्रियते । अलाब्यस्तुम्ब्यः । प्रवालो विद्रुमः । उक्तं च—'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुंनपुंसकम्' इति । 'नीहारो मिहिका चाथ' । तरह ठंडे सफेद और साफ कपूर के डले, कस्तूरी के नाफे (थैली) जो कस्तूरी मृगों की नाभि से निकलते हैं। कक्कोल के पक्के फलों से युक्त कक्कोलपल्लव । लवंगपुष्पों की मंजरियाँ, जायफल के गुच्छे, जस्ते की कपड़े चढ़ी कलसी या सुराहियाँ, जिनमें अत्यन्त मीठा मधुरस भर कर लाया गया था, जिनकी भीनी सुगन्धि बाहर फैल रही थी। चित्र- फलों के जोड़े, जिनमें भीतर की ओर चित्र लिखे थे और उनके एक ओर तूलिका एवं रङ्ग रखने के लिए छोटी अलाबू की कुप्पियाँ लटक रही थीं। कुतूहल उत्पन्न करने वाले भाँति-भाँति के पशु-पक्षी जैसे सोने की श्रृंखलाओं से गर्दन में बँधे हुए किन्नर, वन- मानुस, जीवंजीवक, जलमानुषों के जोड़े, दिशाओं में सुगन्धि फैलाते हुए कस्तूरीहिरन, घरों में विचरने वाली विश्वासभरी चँवरी गाय, सुनहले रंग से बेंत के पिंजरों में अनेक प्रकार के सुभाषित पाठ करने वाले शुकसारिका प्रभृति पक्षी-मूँगे के पिंजरों में बैठे हुए चकोर, जलहस्तियों के मस्तक से निकलने वाले मुक्ताफल से जड़े हुए हाथीदाँत के कुण्डल। छत्र देखते ही राजा का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उसने पहले प्रस्थान के समय मन में उसे शुभ निमित्त समझ कर स्वीकार किया। उन्होंने स्नेहपूर्वक हंसवेग से कहा— 'भद्र, सब प्रकार के रत्नों से भरे हुए सम्राट् के सिर पर धारण करने योग्य इस महाछत्र १. जातीः कौशिकशुक ।

३८० हर्षचरितम् कुमाराल्लाभो न विस्मयाय । बालविद्याः खलु महतामुपकृतयः' इति । अपनीते च तस्मात्प्रदेशात्प्राभृतसंभारे क्षणमिव स्थित्वा 'हंसवेग ! विश्रम्यताम्' इति प्रतीहारभवनं विसर्जयांबभूव । स्वयमप्युत्थाय स्नात्वा मङ्गलाकाङ्क्षी प्राङ्मुखः प्राविशदाभोगस्य छायाम् । अथ विशत एवास्य छायाजन्मना जडिम्ना चूडामणितामनीयतेव शशिबिम्बमम्बुबिन्दुमुचश्चुम्बुरिव चन्द्रकान्तमणयो ललाटतटं कर्पूररे- णव इव व्यलीयन्त लोचनयुगले गले गलत्तुहिनकणनिकरकृतनीहारा हारा इवावबध्यन्त हरिचन्दनरसासारेणेवापाति संततमुरसि कुमुदमयमिव हृदयमभवदतिशिशिरमन्तर्हितहिमशिलेव विलीयमाना व्यलिम्पदङ्गानि । जातविस्मयश्चाकरोन्मनसि एकमजर्यं संगतमपहाय काऽस्त्यन्या प्रतिकौ- शलिकेति । आहारकाले च हंसवेगाय धवलकर्पटप्रावृतधौतनालिकेर- परिगृहीतं विलेपशेषं चन्दनमङ्गस्पृष्टे च वाससी शरत्तारकाकारतारमुक्ता- स्तबकितपदं परिवेशं नाम कटिसूत्रकम् अतिमहार्हपद्मरागालोकलोहि- का कुमार से लाभ होना उस प्रकार आश्चर्यजनक नहीं, जिस प्रकार क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा का उद्भव होना । महापुरुष लोग उपकार के लड़कों की खेल की विद्या की तरह पहले से ही जान जाते हैं । प्राभृत की सामग्री के वहाँ से हटा लिए जाने पर क्षणभर के बाद हंसवेग को 'तुम विश्राम करो' यह कह कर प्रतिहार-भवन में भेजा । स्वयं उठकर स्नान करके मंगल की आकांक्षा से प्राङ्मुख होकर आभोग नामक उस छत्र के नीचे छाया में बैठ गए । जब हर्ष ने छत्र की छाया में प्रवेश किया तब उसकी ठंडक से मानों चन्द्र की किरणें ही घनीभूत होकर उसकी चूड़ामणि बन गईं । चन्द्रकान्तमणियाँ पसीजने लगीं और जलकण उनके ललाट पर छा गए । उनकी आँखों में कपूर का आँजन मानों लग गया । गले में बरफ के टुकड़ों के छोटे-छोटे फुहारे हार के समान कतार से बँध गए । उनके वक्षपर मानों हरिचन्दन रस बरसने लगा । हृदय मानों कुमुदों से भर कर अत्यन्त शिशिर हो गया । अदृश्य रूप में मानों बरफ की शिला उनके अङ्गों पर पिघलने लगी । आश्चर्य से भर कर उन्होंने मन में सोचा—'आमरण मैत्री के अतिरिक्त इस प्रकार से सुंदर उपहार का बदला क्या हो सकता है?' भोजन के अवसर पर राजा ने हंसवेग के लिए सफेद वस्त्र लपेट कर नारियल के साथ अपने लगाने से बचा हुआ चन्दन भेजा और उसके साथ ही अपने अङ्ग से छुवाए हुए परिधानीय वस्त्रयुगल शरत्कालीन तारों की आकृति वाले मोतियों से बना हुआ परिवेश नामक कटिसूत्र और बहुमूल्य जड़े हुए पद्मराग

सप्तम उच्छ्वासः ३८१ तीकृतदिवसं च तरङ्गकं नाम कर्णाभरणं प्रभूतं च भोज्यजातं प्राहिणोत् । एवंप्रायेण च क्रमेण जगाम दिवसः । ततः कटकस्थबलबहलधूलिधूसरितवपुरंशुमाली मलीमससङ्गमिव क्षालयितुमपरजलनिधिमवातरत् । आभोगातपत्रप्रदानवार्तामिव निवेद- यितुं वरुणाय वारुणीं दिशमयासीत् । मुकुलायमानसकलकमलवना प्रमुख एव बद्धसेवाञ्जलिपुटेव सद्वीपा भूरभूद्भूपतेः । भूपालानुरागमय इव निखिलजीवलोकलोकाञ्जलिबद्धबन्धुर्जगज्जग्राह संघ्यारागः । गौडा- पराधशङ्किनीव श्यामतां प्रपेदे दिक्प्राची । प्रचिततिमिरनिर्वाहा निर्वाणा- न्यनृप्रतापानलकलापेव कालिमानमतानीन्मेदिनी । मेदिनीशप्रदोषा- स्थानपुष्पनिकरमिव विकचतगररुचिरमवचकरुरुडुनिकरमविरलं ककुभः । स्कन्धावारगन्धगजमदामोदधावितस्येव मार्गो वियति विरराज रजःपा- ण्डुरैरावतस्य । कुपितनृपव्याघ्राघ्रातामुपसृष्टामित पौरुहू्तीं विहाय विहा- यस्तलमारुरोह रोहिणीरमणः । प्रयाणवार्ता इव मानिनीनां हृदयभेदिन्यो कटकं हस्त्यश्वादीनां सर्वेषां संनिवेशदेशः । तत्स्थं बलं सैन्यम् । तगरं पिण्डी- भवनम् । नृपव्याघ्रो राजशार्दूलः, हर्षः । उपसृष्टां सोपद्रवाम् । पौरुहू्तीं ऐन्द्रीम् । रोहिणीरमणश्चन्द्रः, वृषभश्च । रोहिणी गौः । उक्तं च—'माहेयी सौरभेयी गौरुस्रा की किरणों से दिन में लाला बिखेरता हुआ तरंगक नाम का कर्णाभरण एवं बहुत-सा भोजन का सामान भेजा। इस प्रकार वह दिन व्यतीत हुआ । तब सूर्य कटक की सेना से उड़ी हुई धूल से मानों धूसरित होने के कारण अपने मलिन अङ्गों को धोकर साफ करने के लिए पश्चिम समुद्र में अवतीर्ण हुआ या हर्ष को आमोग नामक छत्र के प्राप्त होने का संदेश निवेदन करने के लिए पश्चिम दिशा में वरुण के पास पहुँचा। कमलों के वन मुकुलित होने लगे, मानों राजा के सम्मुख द्वीपों के साथ पृथिवी सेवा करने के लिए अञ्जलिपुट बाँधे खड़ी हो । राजा के अनुराग से भरा हुआ संध्याराग जो सारे जीवलोक के लिए निवासी लोगों के बँधे अञ्जलिपुट का बन्धु है, जगत् में भर गया । पूर्व दिशा मानों गौड़ाधिप के अपराध से डर कर मलिन हो गई । पृथिवी पर गाढ़ा अन्धकार छा गया मानों पृथिवी ने अन्य राजाओं के प्रतापानल के बुझ जाने से उसकी कालिमा को फैला दिया हो । दिशाओं ने राजा के सायंकालीन सभा- मण्डल पर पुष्पसमूह के समान खिले हुए तगर पुष्पों की भाँति तारों को बिखेर दिया। आकाश में मानों स्कन्धावार के गन्धगजों की मदगन्ध सूँघ मुठभेड़ के लिये दौड़ने से ऐरावत का मार्ग धूल से भर गया । रोहिणीरमण (रोहिणी का पति) चन्द्रमा रूपी (रोहिणी

३८२ हर्षचरितम् ययुरिन्दुदीधितयो दश दिशः। नवनृपदण्डयात्रात्रासातुरा इव तरलित- सत्त्ववृत्तयश्चक्षुभुः पतयो वाहिनीनाम्। चिन्तेव भूभृतां हृदयानि विवेश गुहाविवराणि विमुक्तसर्वाशातिमिरसंततिः । प्रतिसामन्तचक्षुषामिव ननाश निद्रा कुमुदवनानाम् । अस्यां च वेलायां विततवितानतलवर्ती नरेन्द्रो 'यात तावत्' इति विसर्जितानुजीविनो हंसवेगमादिष्टवान्—'कथय संदेशम्' इति । प्रणम्य स कथयितुं प्रास्तावीत्—'देव ! पुरा महावराहसंपर्कसंभूतगर्भाया भगवत्या भुवा नरको नाम सूनुरसावि रसातले । वीरस्य यस्याभवन्बाल्य एव पादप्रणामप्रणयिनश्चूडामणयो लोकपालानाम् यस्य च त्रिभुवनभुजो भुजशौण्डस्य भवनकमलिनीचक्रवाकीकोपकुटिलकटाक्षेक्षितोऽपि भय- माता च शृङ्गिणी । अर्जुन्द्यन्ध्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नैचिकी ॥' इति । वृष- भश्च कुपितव्याघ्राघ्रातामत एव सोपद्रवां दिशं विहाय स्थानान्तरमारोहति । मानः प्रियाविषये, अन्यत्र,-धीरविषये । सत्त्वानि प्राणिनः, धैर्यं च सत्त्वम् । वाहिनीनां सेनानाम् , नदीनां च । आशा दिशः, आस्था च । निद्रा संकोचः, स्वापश्च । अर्थात् गौ का पति ) वृषभ क्रोधित राजा रूपा व्याघ्र से आक्रान्त पूर्व दिशा रूपा गाय को छोड़कर आकाश पर चढ़ आया । मानिनियों के हृदय को विदीर्ण करने वाली चन्द्रमा की किरणें सैनिकप्रयाण की वार्ता के समान आकाश में फैल गई । राजा की नई दण्डयात्रा के त्रास से आतुर शत्रु के सेनापतियों का धैर्य नष्ट हो गया ( समुद्र और उनके जलजन्तु खलबला उठे) । समस्त दिशाओं को छोड़ कर अन्धकारसन्तति गुहाविवरों में उस प्रकार घुस गई जैसे राजाओं के हृदय में आशा से रहित चिन्ता । शत्रु- सामन्तों की आँखों के समान ही कुमुदवनों की निद्रा न जाने कहाँ चली गई । इस समय हर्ष फैले हुए वितान के नीचे लेटे थे । उन्होंने 'जाओ' कह कर नौकरों को बाहर हटा दिया और हंसवेग को आज्ञा दी—'संदेश कहो।' उसने प्रणाम कर कहना शुरू किया—'देव, प्राचीनकाल में महावराह के सम्पर्क से गर्भिणी होकर पृथिवी ने नरक नाम का पुत्र उत्पन्न किया । वह बाल्यकाल में ही बड़ा हो गया । लोकपाल उसके पैरों पर अपनी चूड़ामणि रगड़ने लगे । भुजशाली वह त्रिभुवन पर शासन करता था और उसकी आज्ञा के बिना भवनकमलिनी के वनों में रहने वाली चक्रवाक पक्षियों के कुटिल कटाक्षों द्वारा देखे जाने पर भी एवं जिनका सारथी अरुण डर के मारे रथ को घुमा लेता था ऐसे सूर्य भी अस्त नहीं होते थे, उसी नरक ने वरुण का मानों बाहरी हृदय हो ऐसे इस छत्र को हर लिया । उसके वंश में भगदत्त, पुष्पदत्त, वज्रदत्त