हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३८१ तीकृतदिवसं च तरङ्गकं नाम कर्णाभरणं प्रभूतं च भोज्यजातं प्राहिणोत् । एवंप्रायेण च क्रमेण जगाम दिवसः । ततः कटकस्थबलबहलधूलिधूसरितवपुरंशुमाली मलीमससङ्गमिव क्षालयितुमपरजलनिधिमवातरत् । आभोगातपत्रप्रदानवार्तामिव निवेद- यितुं वरुणाय वारुणीं दिशमयासीत् । मुकुलायमानसकलकमलवना प्रमुख एव बद्धसेवाञ्जलिपुटेव सद्वीपा भूरभूद्भूपतेः । भूपालानुरागमय इव निखिलजीवलोकलोकाञ्जलिबद्धबन्धुर्जगज्जग्राह संघ्यारागः । गौडा- पराधशङ्किनीव श्यामतां प्रपेदे दिक्प्राची । प्रचिततिमिरनिर्वाहा निर्वाणा- न्यनृप्रतापानलकलापेव कालिमानमतानीन्मेदिनी । मेदिनीशप्रदोषा- स्थानपुष्पनिकरमिव विकचतगररुचिरमवचकरुरुडुनिकरमविरलं ककुभः । स्कन्धावारगन्धगजमदामोदधावितस्येव मार्गो वियति विरराज रजःपा- ण्डुरैरावतस्य । कुपितनृपव्याघ्राघ्रातामुपसृष्टामित पौरुहू्तीं विहाय विहा- यस्तलमारुरोह रोहिणीरमणः । प्रयाणवार्ता इव मानिनीनां हृदयभेदिन्यो कटकं हस्त्यश्वादीनां सर्वेषां संनिवेशदेशः । तत्स्थं बलं सैन्यम् । तगरं पिण्डी- भवनम् । नृपव्याघ्रो राजशार्दूलः, हर्षः । उपसृष्टां सोपद्रवाम् । पौरुहू्तीं ऐन्द्रीम् । रोहिणीरमणश्चन्द्रः, वृषभश्च । रोहिणी गौः । उक्तं च—'माहेयी सौरभेयी गौरुस्रा की किरणों से दिन में लाला बिखेरता हुआ तरंगक नाम का कर्णाभरण एवं बहुत-सा भोजन का सामान भेजा। इस प्रकार वह दिन व्यतीत हुआ । तब सूर्य कटक की सेना से उड़ी हुई धूल से मानों धूसरित होने के कारण अपने मलिन अङ्गों को धोकर साफ करने के लिए पश्चिम समुद्र में अवतीर्ण हुआ या हर्ष को आमोग नामक छत्र के प्राप्त होने का संदेश निवेदन करने के लिए पश्चिम दिशा में वरुण के पास पहुँचा। कमलों के वन मुकुलित होने लगे, मानों राजा के सम्मुख द्वीपों के साथ पृथिवी सेवा करने के लिए अञ्जलिपुट बाँधे खड़ी हो । राजा के अनुराग से भरा हुआ संध्याराग जो सारे जीवलोक के लिए निवासी लोगों के बँधे अञ्जलिपुट का बन्धु है, जगत् में भर गया । पूर्व दिशा मानों गौड़ाधिप के अपराध से डर कर मलिन हो गई । पृथिवी पर गाढ़ा अन्धकार छा गया मानों पृथिवी ने अन्य राजाओं के प्रतापानल के बुझ जाने से उसकी कालिमा को फैला दिया हो । दिशाओं ने राजा के सायंकालीन सभा- मण्डल पर पुष्पसमूह के समान खिले हुए तगर पुष्पों की भाँति तारों को बिखेर दिया। आकाश में मानों स्कन्धावार के गन्धगजों की मदगन्ध सूँघ मुठभेड़ के लिये दौड़ने से ऐरावत का मार्ग धूल से भर गया । रोहिणीरमण (रोहिणी का पति) चन्द्रमा रूपी (रोहिणी