भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

३८२ हर्षचरितम् ययुरिन्दुदीधितयो दश दिशः। नवनृपदण्डयात्रात्रासातुरा इव तरलित- सत्त्ववृत्तयश्चक्षुभुः पतयो वाहिनीनाम्। चिन्तेव भूभृतां हृदयानि विवेश गुहाविवराणि विमुक्तसर्वाशातिमिरसंततिः । प्रतिसामन्तचक्षुषामिव ननाश निद्रा कुमुदवनानाम् । अस्यां च वेलायां विततवितानतलवर्ती नरेन्द्रो 'यात तावत्' इति विसर्जितानुजीविनो हंसवेगमादिष्टवान्—'कथय संदेशम्' इति । प्रणम्य स कथयितुं प्रास्तावीत्—'देव ! पुरा महावराहसंपर्कसंभूतगर्भाया भगवत्या भुवा नरको नाम सूनुरसावि रसातले । वीरस्य यस्याभवन्बाल्य एव पादप्रणामप्रणयिनश्चूडामणयो लोकपालानाम् यस्य च त्रिभुवनभुजो भुजशौण्डस्य भवनकमलिनीचक्रवाकीकोपकुटिलकटाक्षेक्षितोऽपि भय- माता च शृङ्गिणी । अर्जुन्द्यन्ध्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नैचिकी ॥' इति । वृष- भश्च कुपितव्याघ्राघ्रातामत एव सोपद्रवां दिशं विहाय स्थानान्तरमारोहति । मानः प्रियाविषये, अन्यत्र,-धीरविषये । सत्त्वानि प्राणिनः, धैर्यं च सत्त्वम् । वाहिनीनां सेनानाम् , नदीनां च । आशा दिशः, आस्था च । निद्रा संकोचः, स्वापश्च । अर्थात् गौ का पति ) वृषभ क्रोधित राजा रूपा व्याघ्र से आक्रान्त पूर्व दिशा रूपा गाय को छोड़कर आकाश पर चढ़ आया । मानिनियों के हृदय को विदीर्ण करने वाली चन्द्रमा की किरणें सैनिकप्रयाण की वार्ता के समान आकाश में फैल गई । राजा की नई दण्डयात्रा के त्रास से आतुर शत्रु के सेनापतियों का धैर्य नष्ट हो गया ( समुद्र और उनके जलजन्तु खलबला उठे) । समस्त दिशाओं को छोड़ कर अन्धकारसन्तति गुहाविवरों में उस प्रकार घुस गई जैसे राजाओं के हृदय में आशा से रहित चिन्ता । शत्रु- सामन्तों की आँखों के समान ही कुमुदवनों की निद्रा न जाने कहाँ चली गई । इस समय हर्ष फैले हुए वितान के नीचे लेटे थे । उन्होंने 'जाओ' कह कर नौकरों को बाहर हटा दिया और हंसवेग को आज्ञा दी—'संदेश कहो।' उसने प्रणाम कर कहना शुरू किया—'देव, प्राचीनकाल में महावराह के सम्पर्क से गर्भिणी होकर पृथिवी ने नरक नाम का पुत्र उत्पन्न किया । वह बाल्यकाल में ही बड़ा हो गया । लोकपाल उसके पैरों पर अपनी चूड़ामणि रगड़ने लगे । भुजशाली वह त्रिभुवन पर शासन करता था और उसकी आज्ञा के बिना भवनकमलिनी के वनों में रहने वाली चक्रवाक पक्षियों के कुटिल कटाक्षों द्वारा देखे जाने पर भी एवं जिनका सारथी अरुण डर के मारे रथ को घुमा लेता था ऐसे सूर्य भी अस्त नहीं होते थे, उसी नरक ने वरुण का मानों बाहरी हृदय हो ऐसे इस छत्र को हर लिया । उसके वंश में भगदत्त, पुष्पदत्त, वज्रदत्त