हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३८३ चकितारुणपरिवर्तितरथो नाज्ञया विना रविरस्तमत्राजीत् । यश्च वरुणस्य बहिर्वृत्ति हृदयमिदमातपत्रमहार्षीत् । महात्मनस्तस्यान्वये भगदत्तपुष्प- दत्तवज्रदत्तप्रभृतिषु व्यतीतेषु बहुषु मेरूपमेषु महत्सु महीपालेषु प्रपौत्रो महाराजभूतिवर्मणः पौत्रश्चन्द्रमुखवर्मणः पुत्रो देवस्य कैलासस्थिरस्थितेः स्थितिवर्मणः सुस्थिरवर्मा नाम महाराजाधिराजो जज्ञे तेजसां राशिर्मृगाङ्क इति यं जना जगुः । योऽयमग्रजेनेवाजायत सहैवाहंकारेण । यश्च बाल एव प्रीत्या द्विजातीनप्रीत्या चारातीन्समप्रानप्रतिग्रहानग्राहयत् । यत्र चातिदुर्लभं लवणालयंसंभूतायाः परं माधुर्यमभूल्लक्ष्म्याः । तथा च यो वाहिनीनाथानां शङ्खाञ्जहार न रत्नानि, पृथिव्याः स्थैर्यं जग्राह न करम् , अवनिभृतां गौरवंमादत्त न नैष्ठुर्यम् । तस्य च सुगृहीतनाम्नो देवस्य देव्यां श्यामादेव्यां भास्करद्युतिर्भास्करवर्मापरनामा तनयः शांतनोर्भागी- रध्यां भीष्म इव कुमारः समभवत् । अयमस्य च शैशवादारभ्य संकल्पः स्थेयान्स्थाणुपादारविन्दद्वयादृते नाहमन्यं नमस्कुर्यामिति ईदृशश्चायं मनोरथस्त्रिभुवनदुर्लभस्त्रयाणामन्यतमेन संपद्यते सकलभुवनविजयेन वा मृत्युना वा यदि वा प्रचण्डप्रतापज्वलनजनितदिग्दाहेन जगत्येक- प्रतिग्रहो द्विजदीयमानोऽर्थः, सैन्यपश्चाद्भागश्च । आदि मेरुसदृश बड़े-बड़े राजा हुए। उसी परम्परा में महाराज भूतिवर्मा का प्रपौत्र, चन्द्रमुखवर्मा का पौत्र, कैलासवासी महाराज स्थितिवर्मा का पुत्र सुस्थिरवर्मा नाम का महाराजाधिराज उत्पन्न हुआ । उस तेजस्वी को लोग मृगाङ्क के नाम से गाया करते हैं । वह मानों अपने अग्रज अहंकार के साथ ही उत्पन्न हुआ । बाल्यावस्था में ही उसने प्रीतिपूर्वक दान दिए और अप्रीति से समस्त शत्रुओं को पछाड़ डाला। सारे समुद्र से उत्पन्न जिस लक्ष्मी का अत्यन्त दुर्लभ माधुर्य बढ़ कर था उसने प्रतिपक्ष सेनापतियों से (अथवा समुद्रों के) शंखों को छीन लिया रत्नों को नहीं। राजाओं ( अथवा पर्वतों) के गौरव को ले लिया, उनकी निष्ठुरता को नहीं। सुगृहीत नाम उस राजा की रानी श्यामादेवी से भास्करद्युति नामक पुत्र जिसका दूसरा नाम भास्करवर्मा है, उत्पन्न हुआ; जैसे गङ्गा से शन्तनु के पुत्र भीष्म हुए । शैशव से ही उसने यह अटल प्रतिज्ञा की थी कि मैं शिव के अतिरिक्त दूसरे किसी के चरणों में प्रणाम न करूँगा । त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसा मनोरथ तीन तरह से सिद्ध हो सकता है, त्रिभुवन पर विजय प्राप्त करने से या मृत्यु से अथवा प्रचण्ड प्रताप की अग्नि से दिग्दाह उत्पन्न करने वाले आपके समान