भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 431

३८४ हर्षचरितम् वीरेण देवोपमेन मित्रेण। मैत्री च प्रायः कार्यव्यपेक्षिणी क्षोणीभृताम्। कार्यं च कीदृशं नामं तद्भवेद्यदुपन्यस्यमानमुपनयेन्मित्रतां देवम्। देवस्य हि यशांसि संचिचीषतो बहिरङ्गभूतानि धनानि। बाहावेव च केवले निषण्णस्य शेषावयवानामपि साहायकसंपादनमनोरथो निरवकाशः किमुत बाह्यजनस्य। चतुःसागरम्रामग्रहणघस्ररस्य पृथिव्येकदेशदानो- पन्यासेनापि का तृप्तिः। अभिरूपकन्याविश्राणनविलोभनमपि लक्ष्मी- मुखारविन्ददर्शनदुर्ललितदृष्टेर्रकिंचित्करम्। एवमघटमानसकलोपायसंपा- दितपदार्थेऽस्मिन्प्रार्थनामात्रकमेव केवलमनुरुध्यमानः शृणोतु देवः। प्राग्ज्योतिषेश्वरो हि देवेन सहैकपिङ्ग इवानङ्गद्विषा, दशरथ इव गोत्र- भिदा, धनञ्जय इव पुष्कराक्षेण, वैकर्तन इव दुर्योधनेन, मलयानिल इव माधवेन, अजर्यं संगतमिच्छति। यदि च देवस्यापि मैत्रीयति हृदय- मवगच्छति च पर्यायान्तरितं दास्यमनुतिष्ठन्ति सुहृद इति ततः किमास्यते समाज्ञाप्यतामनुभवतु विष्णोर्मन्दरगिरिरिव विकटकेयूरकोटिमणिविघट्ट- नक्व णितकटक मणिशिलाशकलानि गाढापगूढानि देवस्य कामरूपा- अद्वितीय वीर की मित्रता से। राजाओं की मित्रता तो परस्पर उपकार के कार्य से होती है। कार्य वह कैसा हो, जिसे करके आपको मित्र बनाया जाय ? केवल यश के संचय की इच्छा रखने वाले आप धन को हेय समझते हैं। एक मात्र अपने भुजवीर्य पर निर्भर होकर रहने वाले आपके अन्य अङ्ग भी आपको सहायता देने की इच्छा प्रकट करते हैं तो उनकी इच्छा व्यर्थ है, ऐसी स्थिति में जो बाह्य लोग हैं तो बात ही और है। जो व्यक्ति चारों समुद्रों को एक घूँट बना लेना चाहते हैं उसके सामने धरती एक भाग रख देने से क्या सन्तुष्टि होगी ? सुन्दरी कन्या को अर्पित करने का लोभ भी उत्पन्न किया जाय तो व्यर्थ है, क्योंकि आपको दृष्टि स्वयं लक्ष्मी के मुखकमल को ही देखने वाली है। इस प्रकार किसी भी उपाय के द्वारा उपस्थित किया गया पदार्थ चाहे वह कैसा भी हो आपके लिए अनुकूल नहीं बैठता, तो केवल हमारी प्रार्थना मात्र के अनुरोध से ही देव सुनें—प्राग्ज्योतिषेश्वर देव के साथ कभी न मिटने वाली मैत्री चाहते हैं। जैसे शिव के साथ एकपिङ्ग, इन्द्र के साथ दशरथ, कृष्ण के साथ अर्जुन, दुर्योधन के साथ कर्ण, वसन्त के साथ मलयानिल ने मैत्री की है। यदि देव का हृदय मित्रता का अभिलाषी हो और यह जानता हो कि मैत्री के नाम पर मित्र लोग दासता का भी आचरण करते हैं तो बैठे रहने से क्या ? आज्ञा दीजिए। कामरूप के अधिपति कुमार की केयूर मणि से आलिङ्गन में उस प्रकार रगड़ खाएगी जैसे मन्दराचल के कटक विष्णु के केयूर से टकराए