हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षिपतिः । अस्मिन्नात्मेन्द्रनवरतविमललावण्यसौभाग्यसुधानिर्झरिणि मुख- शशिनि चिराच्चक्षुषी लालयतु प्राग्ज्योतिषेश्वरश्रीः । नाभिनन्दति चेद्देवः प्रणयमाज्ञापयतु किं कथनीयं मया स्वामिन' इति । विरतवचसि तस्मिन्भूपालः पूर्वोपलब्धैरेव गुरुभिर्गुणैरारोपितबहुमानः कुमारे सुदूरमाभोगातपत्रव्यतिकरेण तु परां कोटिमारोपिते प्रेम्णि लज्जमान इव सादरं जगाद- 'हंसवेग ! कथमिव तादृशि महात्मनि महाभिजने पुण्यराशौ गुणिनां प्राग्रहरे परोक्षसुहृदि स्निह्यति मद्विधस्या- न्यथा स्वप्नेऽपि प्रवर्तेत मनः । सकलजगदुत्तापनपटवोऽपि शिशिरायन्ते त्रिभुवननयानन्दकरे कमलाकरे करास्तिग्मतेजसः । सुबहुगुणगण- क्रीताश्च के वयं सख्यस्य । सज्जनमाधुर्याणामभृतदास्यो दश दिशः । एकान्तावदातोत्तानस्वभावसंभृतसादृश्यस्य कुमुदस्य कृते केनाभिहितः शिशिररश्मिः । श्रेयांश्च संकल्पः कुमारस्य । स्वयं बाहुशाली मयि च समालम्बितशरासने सुहृदि हरादृते कमन्यं नमस्यति । संवर्धिता मे प्रीतिरमुना संकल्पेन । अवलेपिनि पशावपि केसरिणि बहुमानो हृदयस्य
थे । प्राग्ज्योतिषेश्वर की लक्ष्मी जब तक तृप्त न हो तब तक निरन्तर लावण्य और सौभाग्य के अमृत को झरने वाले आपके मुखचन्द्र में अपने नेत्रों को लगा दें । अगर देव कुमार के प्रणय का स्वागत नहीं करते तो आज्ञा दें । मैं जाकर स्वामी से क्या कहूँगा ? उसके इस प्रकार कहने पर कुमार के सृष्ट गुणों के पहले ही मिले परिचय से हर्ष के मन में आदरभाव उत्पन्न हो गया था और आभोग नामक छत्र को भेट में देने के सम्पर्क से वे कुमार के प्रति अत्यन्त प्रेमासक्त हो चुके थे । उन्होंने लज्जित होते हुए आदरपूर्वक कहा- 'हंसवेग, इस प्रकार महान आत्मा, महाकुलीन, पुण्यराशि, गुणियों में श्रेष्ठ, परोक्ष मित्र कुमार के स्नेह दर्शाने पर मेरे जैसे के मन में स्वप्न में भी अन्यथाभाव कैसे आ सकता है ? समस्त संसार को संतप्त कर देने में समर्थ सूर्य के तेज त्रिभुवन के नेत्र को आनन्दित करने वाले पद्मसमूह में आकर ठण्डे पड़ जाते हैं । कुमार के अनेक गुणों से जब हम बिक गये तो हमें मित्रता का अधिकार क्या ? दिशाएँ सज्जनों के मधुर स्वभाव के कारण ही वेतन के बिना ही उनकी दासी बन जाती हैं । अत्यन्त स्वच्छ स्वभाव कुमुदों को, जो स्वच्छहृदय सज्जनों का सादृश्य प्राप्त करते हैं, विकसित करने के लिए चन्द्रमा से किसने सिफारिश की है । कुमार का संकल्प श्रेष्ठ है । स्वयं वे बाहुबीर्यशाली हैं । धनुष धारण करके जब मैं मित्र के रूप हूँ तो शिव के अतिरिक्त किसी अन्य के सामने क्यों झुकेंगे । मेरे इस संकल्प से प्रीति और भी बढ़ गई । पशुजाति २५ ह० च०