हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ हर्षचरितम् किं पुनः सुहृदि । तत्तथा यतेथाः यथा न चिरामयमस्मान्क्लेशयति कुमारदर्शनोत्कण्ठा' इति । हंसवेगस्तु विज्ञापयांबभूव—'देव ! किमपरमिदानीं क्लेशयत्यभि- जातमभिहितं देवेन । सेवाभीरवो हि सन्तः, तत्रापि विशेषेणायमहङ्कार- धनो वैष्णवो वंशः । आस्तां तावदस्मत्स्वामिवंशः । पश्यतु देवः पुरुषस्य हि सेवां प्रति दुर्जनन्येवातिवृद्धया दुर्गत्या वाभिमुखीक्रियमाणस्य, कुटुम्बिन्येवासंतुष्टया तृष्णया वा प्रेर्यमाणस्य, दुरपत्यैरिव यौवनजनितैर्ना- नाभिलाषिभिरसत्संकल्पैर्वाकुलीक्रियमाणस्य जरत्कुमारीमिव परमार्गण- योग्यामतिमहतीं वा अवस्थां पश्यतः, स्वगृहे दुर्बन्धुभिरिव दुःस्थितैः समग्रैर्ग्रहैर्वा ग्राह्यमाणस्याभियोगं, पुरातनैरतिदुस्त्यजैर्भृत्यैरिव मलिनैः कर्मभिर्वानुवर्त्यमानस्य, सकलशरीरसंतापकरं करीषाग्निमिव दुष्कृतिनः कृतचित्तस्य संप्रवेष्टुं राजकुलमुपहतसकलेन्द्रियशक्तेरिव मिथ्यैव हृदय- गतविषयग्रामग्रहणाभिलाषस्य, प्रथममेव तोरणतले वन्दनमालाकिस- में उत्पन्न अभिमान करने वाले सिंह के प्रति भी जब हृदय में आदर है तो मित्र के प्रति क्यों न हो ? तो तू जाकर यह प्रयत्न करना कि कुमार के दर्शन की उत्कण्ठा हमें चिरकाल तक न सताती रहे ।' हंसवेग ने निवेदन किया—'देव, दूसरा क्या कष्ट होगा ? देव ने बहुत ठीक कहा । सज्जन लोग अपनी सेवा से डरते हैं, अहंकार के धनी विष्णु ( वराह ) के वंश की तो बात ही और है । हमारे स्वामी के वंश की बात तो जाने दीजिए । देव ही देखें, दुष्ट जननी के समान अत्यन्त बढ़ी हुई ( अतिवृद्धा ) दुर्गति मनुष्य को नौकरी के लिए ढकेलती है । असन्तुष्ट तृष्णा पत्नी की भाँति उसे प्रेरित करती है । दुष्ट पुत्रों की भाँति यौवन- जनित नाना प्रकार की अभिलाषाओं से भरे हुए असत् संकल्प उसे आकुल कर डालते हैं । उस कन्या के समान, जो उम्र होने पर भी ब्याही नहीं गई ऐसी बुरी अवस्था को जिसमें दूसरों ( धनी लोगों या पति ) का अन्वेषण होता है, वह देखने लगता है । दुष्ट बान्धवों के समान सारे ग्रह उसके घर में डेरा डाल देते हैं और उसे सताने लगते हैं । पुराने हो जाने के कारण जिनसे पिण्ड छुड़ाना नहीं बनता, ऐसे भृत्यों के समान मलिन कर्म उसके पीछे पड़ जाते हैं । पाप का मारा वह सारे शरीर को संतप्त करने वाले भूसे की अग्नि के समान राजकुल में प्रवेश पाने के लिए निश्चय करता है। वह उस व्यक्ति के समान, जिसकी इन्द्रियों की सारी शक्ति ठप हो गई हो, विषयों के उपभोग की मन में झूठी साध करता है। पहले ही जब वह तोरणद्वार के