भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

सप्तम उच्छ्वासः ३८७ लयस्येव शुष्यतो द्वारक्षिभिर्निरुद्धस्य, पीडितस्य प्रविशतो द्वारे हरिण- स्येवापरैर्हन्यमानस्य, करिकर्मचर्मपुटस्येव मुहुर्मुहुः प्रतिहारमण्डलकर- प्रहारैर्निंरस्यमानस्य, निधिपादपप्ररोहस्येव द्रविणाभिलाषादधोमुखीभ- वतः, दूरममार्गणस्याप्यतिविप्रकृष्टविवृतविसर्जितस्योद्वेगं व्रजतः, अकण्ट- कस्यापि चरणतललग्नस्याकृष्य क्षेपीयः क्षिप्यमाणस्य, अमकरकेतोर- प्यकालोपसर्पणाप्रकुपितेश्वरदृष्टिदग्धस्य, प्रलयमुपगच्छतः कपेरिव कोप- निर्भत्सितस्याप्यभिन्नमुखरागस्य, ब्रह्मघ्न इव प्रतिदिवसवन्दनोद्वृत्तशिरः- कपालस्य, स्पर्शरहितस्याशुभकर्माणि निर्वहतः, त्रिशङ्कोरिवोभयलोकभ्र- हस्तिनां युद्धशिक्षार्थं चर्ममयो हस्ती । प्रतिहारमण्डलेन दौवारिकसमूहेन । प्रतिसंहारेण वेष्टनेन मण्डलं यस्य करस्य तत्प्रहारैश्च । निधिपादपप्ररोहो निधान- गृहजन्मा वृक्षाङ्कुरः । स च सर्वो निधिप्रभावादधोमुखीभावः प्रणामः । अमार्ग- णस्यायाचकस्य च अतिविप्रकृष्टैः प्राकृतैः । पूर्वं विवृतः स्वतश्च लब्धदर्शन एव विसर्जितस्यात एवोद्वेगं मन्युं व्रजतः । मार्गणः शरश्चातिविप्रकृष्टं कर्णान्ते विवृतो विसर्जित उद्धतवेगं याति । अमकरकेतोरशृङ्गारिणोऽपि । अकालेऽप्रस्ताव उपसर्पणं यस्य सः । तथा । अप्रकुपितस्येश्वरस्य हर्षस्य दृष्ट्या दग्धः । ततो विशेषणसमासः । प्रलयः प्रकृष्टो लयो भित्त्यादिश्लिष्टत्वम्, नाशश्च । कपिसदृशः कपेलोंहितमुखत्वात् । प्रतिदिवसेत्यादि । ब्रह्मघ्नो हतब्राह्मणः कपालमहरहर्वन्दते । त्रिशङ्कुर्नाम चण्डाल- भावमास्थितोऽपि याजयित्वा विश्वामित्रेण स्वर्गमारोपितः कुपितेनेन्द्रेण हुंकार- पास पहुँचता है, द्वारपाल उसे रोक देते हैं और वह बन्दनवार के पत्ते की तरह वहीं सूखता रहता है। वहाँ के दुःख सहकर किसी तरह राजकुल की ड्योढ़ी के भीतर प्रवेश भी हो गया तो दूसरे लोग उस पर टूट कर हिरन की तरह कुटियाते हैं। चमड़े के बने हुए हाथी की तरह बार-बार प्रतिहारों के घूंसे खाकर धकिया दिया जाता है। धन कमाने की इच्छा से राजकुल में गया हुआ वह ऐसे मुँह लटकाए रहता है जैसे जमीन में गड़े खजाने के ऊपर लगाए गए पौधे की डाल नीचे झुकी हो। वह चाहे कुछ भी याचना न करे, फिर भी राजकुल में दूर तक प्रविष्ट हुआ वह जोर के साथ बाहर फेंक दिया जाता है, जैसे धनुष बाण को खींच कर जोर से फेंक देता है। यद्यपि वह काँटे की तरह गड़ कर किसी को दुःख नहीं देता तथापि पैर में लगा हुआ वह निकाल कर फेंक दिया जाता है। किसी प्रकार असमय में स्वामी के पास पहुँच भी गया तो उसकी कुपित दृष्टि उसे जला कर नष्ट कर देती है, जैसे अनाड़ी कामदेव देवताओं के फेर में पड़ कर शिव के द्वारा जल गया था। विनाश के मुख में पहुँचे हुए उसे डाँट-फटकार सुनने पर