भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

३८८ हर्षचरितम् ष्टस्य नक्तंदिनमवाक्शिरसस्तिष्ठतः, वाजिन इव कवलवशेन सुखबाह्य- मात्मानं विदधानस्य, अनशनशायिन इव हृदयस्थापितजीवनाशस्य, शरीरं क्षपयतः शुन इव निजदारपराङ्मुखस्य, जघन्यकर्मलग्नमात्मानं ताडयतः, प्रेतस्येवानुचितभूमिदीयमानान्नपिण्डस्य, बलिभुज इव जिह्वा- लौल्योपयुक्तपुरुषवर्चसो वृथा विहितायुषो जीवतः, श्मशानपादपानिव पिशाचस्य दग्धभूत्या परुषीकृतान्राजवल्लभानुपसर्पतः, विपरीतजिह्वाज- नितमाधुर्यैरोष्ठमात्रप्रकटितरागै राजशुकालापैः शिशोरिव मुग्धविलोभ्य- तर्जितः । स च निपिप्सुरेव विश्वामित्रप्रभावादुभुवमनवाप्य तत्रैव पूर्वं लम्ब- मानोऽद्यापि स्थितः । कवलो ग्रासः । सुखेन बाह्यम् । बवयोरैक्यात् । सुखेभ्यो बहिर्भूतम्, कृच्छ्रेण व्याप्यं च । हृदये स्थापिता जीवने वृत्त्युपाय आशा येन, जीवस्य नाशो, जीवनाशश्च । जघन्यं निकृष्टम्, जघने भवं जघन्यं च सुतम् । अनु- चितायामशस्यायां भूमौ । चितायाः पश्चादनुचितम् । बलिभुजः काकस्य । लौल्यं चापलम्, अभिलाषश्च । उपयुक्तं व्ययीकृतम्, भुक्तं च । वर्चस्तेजः, विष्ठा च । वृथा विहितं कृतमायुर्यस्य, विध्यः पक्षिभ्यो हितमायुर्यस्य, वृथा निष्फलं जीवतः पिशाचस्य मूर्खस्य । भूतिः संपत्, भस्म च । राजानः शुका इव, राजशुकाश्च । भी वानर की तरह मुँहपर लाली बनाए रखनों पड़ती है। प्रतिदिन उसे सबके पैरों पर सिर रगड़ना पड़ता है, मानों उसे ब्रह्महत्या लगी हो। उसे कोई नहीं छूता, मानों अशौच पड़ गया हो। त्रिशंकु के समान दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर दिन-रात वह नीचे मूड़ो लटकाए रहता है। घोड़े की तरह थोड़े से टुकड़ों के लिए वह अपने सब सुख छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है। अनशन करके सोने वाले की तरह उसके हृदय में हमेशा मर जाने की इच्छा रहती है। कुत्ते के समान अपनी पत्नी से पराङ्मुख होकर वह अपने शरीर को कँपाता रहता है और नीच कर्म में प्रवृत्त अपने आपको स्वयं वह पीटता रहता है। प्रेत के समान भोजन करने के लिए जहाँ के तहाँ (अनुचित जगह में) बैठा दिया जाता है। वह कौवे की तरह जीभ के चटोरेपन में अंधड़ कर अपने बल को उपयोग में लाता है और व्यर्थ आयु गँवाते हुए जीता है। जैसे श्मशान के वृक्षों पर पिशाच मँडराता है उसी प्रकार वह नासपीटी बढ़ोत्तरी पाकर बदमिजाज हुए राजा के मुंहलगे लोगों के पास चक्कर लगाता रहता है। मीठी-मीठी बातें करने वाले और ओठ मात्र में ही राग दिखलाने वाले सुग्गे बच्चों की तरह उसे भुलावे में डाल देते हैं। मदारी के प्रभाव में पड़ कर बेताल जाते उसी प्रकार वे भी राजा के डर के मारे अपने मन से कुछ भी नहीं कर सकते। जैसे चित्रलिखित धनुष चढ़ी