भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

सप्तम उच्छ्वासः ३८१ मानस्य, वेतालस्येव नरेन्द्रप्रभावाविष्टस्य न किंचिन्नाचरतः, चित्रधनुष इवालीकगुणाध्यारोपणैकक्रियानित्यनम्रस्य निर्वाणतेजसः, संमार्जनीसमुपा- र्जितरजसोऽवकरकूटस्येव निर्माल्यवाहिनः, कफविकारिण इव दिने दिने कटुकैरुद्वेज्यमानस्य, सौगतस्येवार्थशून्यविज्ञप्तिजनितवैराग्यस्य काषाया- श्यभिलषतः, निशास्वपि मातृबलिपिण्डस्येव दिक्षु विक्षिप्यमाणस्य, अशौचगतस्येव कुशयनजनितसमधिकतरदुःखवृत्तेः, तुलायन्त्रस्येव पश्चात्कृतगौरवस्य तोयार्थमपि नमतः, अतिकृपणस्य शिरसा केवलेना- संतुष्टस्य वचसापि पादौ स्पृशतः, निर्दयवेत्रिवेत्रताडनत्रस्तयेव त्रपया त्यक्तस्य, दैन्यसंकोचितहृदयहतावकाशयेवाहोपुरुषिकया परिवर्जितस्य, कु- राजशुकभेदाः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्रविच्च । गुण उत्कर्षः, ज्या च गुणः । निर्वाणं प्रशान्तम्, निर्गतवान्तेजश्च। अवकरकूटो मार्जनीक्षिप्तो रजस्तृणादिसंघातः । उक्तं च—'संमार्जनी शोधनी स्यात्संकरोऽवकरस्तथा। क्षिप्ते' इति। अमाल्यवाहित्वेन निःश्रीकत्वमुच्यते । कटुकैः प्रतीहारैः, तीक्ष्णैश्च । अर्थशून्यया निष्फलया । विज्ञप्त्या प्रार्थनया कृतोद्वेगस्य । बौद्धानामपि बाह्यवस्तुशून्यानि विज्ञानानि । अशौचं मृतकादि । कुशयनं कुत्सितशय्या, भूमिश्च कुः । पश्चात्कृतं वर्जितम् , पृष्ठतश्च कृतम् । गौरवं महत्त्वम् , गुरुत्वं च । तोयशब्दो जलोपलक्षणार्थः । तोयं जलं च पादस्पर्शनं पथोऽपि । त्रपया लज्जया । 'आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावना- त्मनि' । स्वमात्मा, धनं च । उक्तं च—'स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं त्रिष्वात्मीये स्वोऽ- प्रत्यञ्चा से झुका हुआ भी बाण चलाने की शक्ति नहीं रखता उसी प्रकार झूठ-मूठ किसी के गुणों की प्रशंसा करते हुए अपनी नम्रता दर्शाता है और उसका तेज बुझा रहता है। झाडू से बटोर कर एकत्र किये गए कूड़े की तरह वह श्रीहीन होता है ( कभी माला नहीं धारण करता ) । कफ के रोगी की तरह उसे दिन पर दिन प्रतिहार और प्यादे घुड़कते रहते हैं। सेवा करने से टका-पैसा नहीं मिलता तो मन में वैराग्य उत्पन्न होकर बुद्ध के समान गेरुआ धारण कर लेने की इच्छा करने लगता है। मातृबलि के पिंडे की तरह रात के समय में भी बाहर फेंक दिया जाता है। अशौच में पड़े हुए की तरह वह मोटी-झोटी अपनी रहन-सहन से अनेक प्रकार के दुःख उठाता है। पीछे भार बढ़ने से तराजू जैसे झुक जाती है उसी प्रकार आत्मसम्मान को पीछे डाल कर पानी के लिए भी झुकता रहता है। अत्यन्त दीन हो जाने के कारण सिर से केवल पैर नहीं छूता, बल्कि असन्तुष्ट होकर बात-बात में पैर छूने के लिये तैयार रहता है। निष्ठुर प्रतीहारों की मार खाते-खाते वह बेहया हो जाता है। दीनता के कारण हृदय के बुझ जाने से उसकी आत्म-गौरव की भावना समाप्त हो जाती है। निन्दित कर्मों के