हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० हर्षचरितम् त्सितकर्माङ्गीकरणकुपितेयेवोन्नत्या वियुक्तस्य, धनश्रद्धया क्लेशानुपार्जयतः, स्ववृद्धिबुद्ध्यावमानं संवर्धयतो मूढस्य, सत्यपि विविधकुसुमाधिवाससुर- भिणि वने तृष्णयाञ्जलिमुपरचयतः, कुलपुत्रस्यापि कृतागस इव भीतभीतस्य समीपमुपसर्पतः, दर्शनीयस्याप्यालेख्यकुसुमस्येव निष्फलजन्मनः, विदुषोऽपि वैधैयस्येवापशब्दमुखस्य, शक्तिमतोऽपि श्वित्रिण इव संकोचितकरयुग- लस्य, समसमुत्कर्षेषु निरग्निरपच्यमानस्य, नीचसमीकरणेषु निरुच्छ्वासं म्रियमाणस्य, परिभवैस्तृणीकृतस्य, दुःखानिसेनानिर्वृतेर्ज्वलतः, भक्तस्या- प्यभक्तस्य, निरूष्मणः संतापयतो बन्धून्, विमानस्याप्यगतिकस्य, च्युत- गौरवस्याप्यधस्ताद्गच्छतः, निःसत्त्वस्यापि महामांसविक्रयं कुर्वतः, निर्म- दस्याप्यस्वतन्त्रवृत्तेः, अयोगिनोऽपि ध्यानवशीकृतात्मनः, शय्योत्थायं स्त्रियां धने' इति । अधिवासः सौगन्ध्यम्, भावना च । वनं काननम्, जलं च । तृष्णा धनस्पृहा मृगतृष्णा च । विदुषो जानानस्य, पण्डितस्य च। वैधैयस्य मूर्खस्य । अपगतशब्दं मुखं यस्य, लक्ष्यहीनश्च । शब्दोऽपशब्दः । श्वित्रं कुष्ठव्याधिभेदः । समास्तुल्यशीलाः । अनिर्वृतेरप्रतीतेः । अनिर्वृतेर्गमनत्यागाभावाच्च । भक्तस्य हितै- षिणः । अभक्तस्यालब्धसविभागस्य । विरोधः स्पष्टः सर्वत्र । ऊष्मा गत्रोऽपि । विमानस्य विगतमानस्य, व्योमयानस्य च । गतिरुपायोऽपि । गौरवमादरोऽपि । महामांसं स्वकायोऽपि । मदो गर्वः, क्लीबता च । अयोगिनो विपरीतदैववतः । दरि- ही हमेशा करते रहने से उसका अभ्युदय रुक जाता है। धन के कमाने से केवल क्लेशों का उपार्जन करता है। अपमानों को ही वह मूर्ख अपनी वृद्धि समझ लेता है। अनेक प्रकार के फूलों की गन्ध से भरे वन के होने पर भी जब देखो उसकी तृष्णाञ्जलि बनी रहती है। कुलपुत्रों के पास भी अपराधी की भाँति थर-थर काँपता रहता है। देखने योग्य होने पर भी चित्रलिखित पुष्प के समान उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। ज्ञान से भरा होने पर भी उसके मुँह से अनजान की तरह बात नहीं निकलती। शक्ति होने पर भी उसके हाथ कोढ़ी की तरह नीचे रह जाते हैं। उसके बराबर के लोग जब तरक्की पा लेते हैं तो बिना आग के भीतर ही भीतर पकने जलने लगता है। और जब मातहत के लोग बराबरी में आ जाते हैं तो साँस के न निकलने पर भी मर जाता है। पद के घटने से तिनके की तरह प्रतिष्ठा खो बैठता है। दुःख की वायु का झोंका उसे रात-दिन दहकाता रहता है। राजभक्त होने पर भी हिस्से में उसे कुछ नहीं मिलता। उसकी गरमी सब कम पड़ जाती है, पर भाई-बन्धुओं को सताता है। उसका मान नहीं रहता। फिर भी अपने पद से नहीं डिगता। उसका गौरव नहीं रह जाता और वहीं नीचे ही गिरता जाता है। उसका सत्त्व चला जाता है, फिर भी अपने