भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

सप्तम उच्छ्वासः ३६१ प्रणमतो दग्धमुण्डस्य, गोत्रविदूषकस्य नक्तंदिनं नृत्यतो मनस्विजनं हासयतः, कुलाङ्गारस्य वंशं दहतः, नृपशोस्तृणेऽपि लब्धे कन्धरानमन- मयतः, जठरपरिपूर्णमात्रप्रयोजनजन्मनो मांसपिण्डस्य गर्भरोगस्य मातुः, अपुण्यानां कर्मणामाचरणाद्भृतकस्य किं प्रायश्चित्तम्, का प्रति- पत्तिक्रिया, क्व गतस्य शान्तिः, कीदृशं जीवितम्, कः पुरुषाभिमानः, किंनामानो विलासाः, कीदृशी भोगश्रद्धा, प्रबलपङ्क इव सर्वमधस्तान्न- यति दारुणो दासशब्दः । धिक्तदुच्छ्वसितमुपयातु निधनं धनम्, अभ- वनिर्भूतेरस्तु तस्या नमो भगवद्भ्यस्तेभ्यः सुखेभ्यस्तस्यायमञ्जलिरैश्व- र्यस्य तिष्ठतु दूर एव सा श्रीः शिवं स परिच्छदः करोतु यदर्थमुत्त- द्रश्येत्यन्ये, अप्राप्तबलस्येत्यन्ये, चित्तवृत्तिनिरोधाभाववतश्च । दग्धमुण्डस्यातपहत- शिरसः, व्रतिभेदश्च दग्धमुण्डः । विदूषको नायकश्च, नर्मसुहृच्च । वंशो वेणुः । दारुणो दुःसहः, काष्ठस्य च । सर्वमस्त्विति योजना । मुखप्रियेत्यादावेवंविधः सेवकोऽपि यदि मर्त्यमध्ये गण्यते तद्राजिलोऽपि भोगी कथं न भवति । पुलाको व्युषः कलमः कथ न स्यादिति संबन्धः । तपस्वी वराकोऽपि । मुषि विपमानस्य(?) आपको बेचा करता है । वह मद से रहित होता है और अपनी वृत्ति का स्वयं मालिक नहीं होता । योगी नहीं होकर भी उसका अन्तरात्मा सदा सोच-विचार के वशीभूत रहता है । दग्धमुण्ड साधुओं की भाँति खाट से उठते ही सबको प्रणाम करने का उसका स्वभाव बन जाता है । घर के विदूषक की तरह रातदिन नाच-नाच कर दूसरों को हँसाता रहता है । कुलाङ्गार की भाँति वंश को जला डालता है । मनुष्य के रूप में पशु वह तिनके के लिए भी कन्धा झुका देता है । उसका जन्म केवल पेट का गड्ढा भरने के लिये होता है। सचमुच वह तो मांसपिण्ड के रूप में निकलता हुआ माता का गर्भ रोग है। अपुण्य कर्मों के हमेशा आचरण करने से वह मृतक कौन-सा प्रायश्चित करे ? कौन-सा उपाय करे ? कहाँ पर जाय, जिससे शान्ति मिले ? उसका जीवन कैसा ? अभिमान कैसा ? विलास कैसे ? सुख भोगने की इच्छा कैसी ? उसके नाम के साथ जुड़ा हुआ यह 'दास' शब्द कीचड़ की ढाब की भाँति सबको गड़प जाता है । उसके जीने को धिक्कार है । वह धन मिट जाय, उस वैभव का सत्यानाश हो, उन सुखों को दण्डवत् प्रणाम है, उस ऐश्वर्य को हथजोरी है, वह लक्ष्मी दूर रहे, उस टीम टाम से जान बचे, अपने को पृथिवी पर रगड़ना पड़े । राजसेवक ऐसा तपस्वी है जो क्रोधित होकर शाप नहीं दे सकता और प्रसन्न होकर