हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ हर्षचरितम् माङ्गं गां गमिष्यत्यशापानुग्रहक्षमस्तपस्वी मुखप्रियरतः क्लीबो पूतिमां- समयः कृमिरगण्यमानो नरकः, पादरजोधूसरोत्तमाङ्गो जङ्गमः पादपीठः पुंस्कोकिलः काकुकणितेषु, शिखी सुखकरकेकासु, स्थूलकूर्मः क्रोडक- षेषु, श्वा नीचचाटुकरणेषु, कृकलासः शिरोविडम्बनासु, जाहक आत्म- संकोचनेषु, वेणुर्मूर्च्छनासु, वेश्याकायः करणबन्धक्लेशेषु, पलालं सत्त्व- शालिषु, प्रतिपादकः पादसंवाहनासु, कन्दुकः करतलताडनेषु, वीणा- दण्डः कोणाभिघातेषु, वराकः सेवकोऽपि मर्त्यमध्ये राजिलोऽपि वा भोगी, पुलाकोऽपि वा कलमो, वरं क्षणमपि कृता मानवता मानवता न मतो नमतस्त्रैलोक्याधिराज्योपभोगोऽपि मनस्विनः। तदेवमभिनन्दि- सुखदायिनः रतः रक्तः। मुख आरम्भे, वदने च। प्रियं रतं मोहनं यस्य। क्लीबोऽ- शक्तः, शरण्यश्च। पूति दुर्गन्धम्। अगण्यमानो न गणनाहैः। कुत्सितो नरो नरकः, अगण्यश्च मानो यस्य सोऽगण्यमानो नरको भौमनामा। अवीच्यादिर्वा। काकुकणितम्, मधुरवचनम्। भिन्नध्वनिर्वक्त्वकथनं निर्व्यापारत्वाच्छोकाद्वा। कृकलासोऽप्यनवरतं शिर उन्नमयन्नास्ते। जाहकः आखुतुल्यः प्राणिभेदः, कूर्म इत्यन्ये। मूर्च्छना मोहः, स्वराणां विशिष्टा स्थितिश्च। करणं शरीरम्, मन्त्रो वा। कामशास्त्रोदितकरणानि। कोणो लगुडश्च। यथा। शालिषु पलालमप्रयोजनं तद्व- दसौ। राजिलो डिण्डिभाख्यो निर्विषः सर्पः। पुलाकः फलदरिद्रः। शालिः श्यामाक- प्रायः। मानवताऽहंकारिणा, मानवस्य कर्म मानवता पौरुषम्। न मतः नेष्टः, नमतः प्रणामं कुर्वतः। अनुग्रह नहीं कर सकता। केवल मुख से मीठा बात करने वाला नपुंसक है। पीव और मांस से भरा कीड़ा है। जिसकी कोई गणना नहीं ऐसा कुत्सित नर (नरक) है। दूसरों के पैरों की धूल से भरे मस्तक वाला चलता-फिरता पादपीठ है, लप्पो-चप्पो करने वाला नरकोयल है, मीठी बोल उचारने वाला मोर है, धरती पर सीना घिसने वाला कछुआ है, चापलूसी का कुत्ता है, केवल सिर हिलाने वाला गिरगिट है, अपने आपको सिकोड़कर रखने वाला चूहा है, राग अलापने वाला वेणु है, दूसरे के लिए शरीर को तोड़-मरोड़ करने में वेश्या की भाँति है। सत्त्व वाले व्यक्तियों में घास-फूस की तरह है, दाबने में पैर का बोझ उठाने वाला पंगरू का पावा है, हाथ की मार सहने में कन्दुक है और कोणाभिघात (दूसरा अर्थ—छड़ी की मार) का अभ्यस्त वीणादण्ड है। बेचारे राजसेवक को अगर मनुष्यों में गिना जाय तो राजिल (पानी वाला ढोंड़ साँप) को भी सर्प मानना पड़ेगा, पयाल की भी धान में गिनती होनी चाहिए। मनस्वी के लिए क्षण भर भी मानवता के गौरव के साथ जीना अच्छा, किन्तु मनस्वी के लिए त्रैलोक्य के राज्य का उपभोग भी