हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
३६० हर्षचरितम् त्सितकर्माङ्गीकरणकुपितेयेवोन्नत्या वियुक्तस्य, धनश्रद्धया क्लेशानुपार्जयतः, स्ववृद्धिबुद्ध्यावमानं संवर्धयतो मूढस्य, सत्यपि विविधकुसुमाधिवाससुर- भिणि वने तृष्णयाञ्जलिमुपरचयतः, कुलपुत्रस्यापि कृतागस इव भीतभीतस्य समीपमुपसर्पतः, दर्शनीयस्याप्यालेख्यकुसुमस्येव निष्फलजन्मनः, विदुषोऽपि वैधैयस्येवापशब्दमुखस्य, शक्तिमतोऽपि श्वित्रिण इव संकोचितकरयुग- लस्य, समसमुत्कर्षेषु निरग्निरपच्यमानस्य, नीचसमीकरणेषु निरुच्छ्वासं म्रियमाणस्य, परिभवैस्तृणीकृतस्य, दुःखानिसेनानिर्वृतेर्ज्वलतः, भक्तस्या- प्यभक्तस्य, निरूष्मणः संतापयतो बन्धून्, विमानस्याप्यगतिकस्य, च्युत- गौरवस्याप्यधस्ताद्गच्छतः, निःसत्त्वस्यापि महामांसविक्रयं कुर्वतः, निर्म- दस्याप्यस्वतन्त्रवृत्तेः, अयोगिनोऽपि ध्यानवशीकृतात्मनः, शय्योत्थायं स्त्रियां धने' इति । अधिवासः सौगन्ध्यम्, भावना च । वनं काननम्, जलं च । तृष्णा धनस्पृहा मृगतृष्णा च । विदुषो जानानस्य, पण्डितस्य च। वैधैयस्य मूर्खस्य । अपगतशब्दं मुखं यस्य, लक्ष्यहीनश्च । शब्दोऽपशब्दः । श्वित्रं कुष्ठव्याधिभेदः । समास्तुल्यशीलाः । अनिर्वृतेरप्रतीतेः । अनिर्वृतेर्गमनत्यागाभावाच्च । भक्तस्य हितै- षिणः । अभक्तस्यालब्धसविभागस्य । विरोधः स्पष्टः सर्वत्र । ऊष्मा गत्रोऽपि । विमानस्य विगतमानस्य, व्योमयानस्य च । गतिरुपायोऽपि । गौरवमादरोऽपि । महामांसं स्वकायोऽपि । मदो गर्वः, क्लीबता च । अयोगिनो विपरीतदैववतः । दरि- ही हमेशा करते रहने से उसका अभ्युदय रुक जाता है। धन के कमाने से केवल क्लेशों का उपार्जन करता है। अपमानों को ही वह मूर्ख अपनी वृद्धि समझ लेता है। अनेक प्रकार के फूलों की गन्ध से भरे वन के होने पर भी जब देखो उसकी तृष्णाञ्जलि बनी रहती है। कुलपुत्रों के पास भी अपराधी की भाँति थर-थर काँपता रहता है। देखने योग्य होने पर भी चित्रलिखित पुष्प के समान उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। ज्ञान से भरा होने पर भी उसके मुँह से अनजान की तरह बात नहीं निकलती। शक्ति होने पर भी उसके हाथ कोढ़ी की तरह नीचे रह जाते हैं। उसके बराबर के लोग जब तरक्की पा लेते हैं तो बिना आग के भीतर ही भीतर पकने जलने लगता है। और जब मातहत के लोग बराबरी में आ जाते हैं तो साँस के न निकलने पर भी मर जाता है। पद के घटने से तिनके की तरह प्रतिष्ठा खो बैठता है। दुःख की वायु का झोंका उसे रात-दिन दहकाता रहता है। राजभक्त होने पर भी हिस्से में उसे कुछ नहीं मिलता। उसकी गरमी सब कम पड़ जाती है, पर भाई-बन्धुओं को सताता है। उसका मान नहीं रहता। फिर भी अपने पद से नहीं डिगता। उसका गौरव नहीं रह जाता और वहीं नीचे ही गिरता जाता है। उसका सत्त्व चला जाता है, फिर भी अपने
सप्तम उच्छ्वासः ३६१ प्रणमतो दग्धमुण्डस्य, गोत्रविदूषकस्य नक्तंदिनं नृत्यतो मनस्विजनं हासयतः, कुलाङ्गारस्य वंशं दहतः, नृपशोस्तृणेऽपि लब्धे कन्धरानमन- मयतः, जठरपरिपूर्णमात्रप्रयोजनजन्मनो मांसपिण्डस्य गर्भरोगस्य मातुः, अपुण्यानां कर्मणामाचरणाद्भृतकस्य किं प्रायश्चित्तम्, का प्रति- पत्तिक्रिया, क्व गतस्य शान्तिः, कीदृशं जीवितम्, कः पुरुषाभिमानः, किंनामानो विलासाः, कीदृशी भोगश्रद्धा, प्रबलपङ्क इव सर्वमधस्तान्न- यति दारुणो दासशब्दः । धिक्तदुच्छ्वसितमुपयातु निधनं धनम्, अभ- वनिर्भूतेरस्तु तस्या नमो भगवद्भ्यस्तेभ्यः सुखेभ्यस्तस्यायमञ्जलिरैश्व- र्यस्य तिष्ठतु दूर एव सा श्रीः शिवं स परिच्छदः करोतु यदर्थमुत्त- द्रश्येत्यन्ये, अप्राप्तबलस्येत्यन्ये, चित्तवृत्तिनिरोधाभाववतश्च । दग्धमुण्डस्यातपहत- शिरसः, व्रतिभेदश्च दग्धमुण्डः । विदूषको नायकश्च, नर्मसुहृच्च । वंशो वेणुः । दारुणो दुःसहः, काष्ठस्य च । सर्वमस्त्विति योजना । मुखप्रियेत्यादावेवंविधः सेवकोऽपि यदि मर्त्यमध्ये गण्यते तद्राजिलोऽपि भोगी कथं न भवति । पुलाको व्युषः कलमः कथ न स्यादिति संबन्धः । तपस्वी वराकोऽपि । मुषि विपमानस्य(?) आपको बेचा करता है । वह मद से रहित होता है और अपनी वृत्ति का स्वयं मालिक नहीं होता । योगी नहीं होकर भी उसका अन्तरात्मा सदा सोच-विचार के वशीभूत रहता है । दग्धमुण्ड साधुओं की भाँति खाट से उठते ही सबको प्रणाम करने का उसका स्वभाव बन जाता है । घर के विदूषक की तरह रातदिन नाच-नाच कर दूसरों को हँसाता रहता है । कुलाङ्गार की भाँति वंश को जला डालता है । मनुष्य के रूप में पशु वह तिनके के लिए भी कन्धा झुका देता है । उसका जन्म केवल पेट का गड्ढा भरने के लिये होता है। सचमुच वह तो मांसपिण्ड के रूप में निकलता हुआ माता का गर्भ रोग है। अपुण्य कर्मों के हमेशा आचरण करने से वह मृतक कौन-सा प्रायश्चित करे ? कौन-सा उपाय करे ? कहाँ पर जाय, जिससे शान्ति मिले ? उसका जीवन कैसा ? अभिमान कैसा ? विलास कैसे ? सुख भोगने की इच्छा कैसी ? उसके नाम के साथ जुड़ा हुआ यह 'दास' शब्द कीचड़ की ढाब की भाँति सबको गड़प जाता है । उसके जीने को धिक्कार है । वह धन मिट जाय, उस वैभव का सत्यानाश हो, उन सुखों को दण्डवत् प्रणाम है, उस ऐश्वर्य को हथजोरी है, वह लक्ष्मी दूर रहे, उस टीम टाम से जान बचे, अपने को पृथिवी पर रगड़ना पड़े । राजसेवक ऐसा तपस्वी है जो क्रोधित होकर शाप नहीं दे सकता और प्रसन्न होकर
३६२ हर्षचरितम् माङ्गं गां गमिष्यत्यशापानुग्रहक्षमस्तपस्वी मुखप्रियरतः क्लीबो पूतिमां- समयः कृमिरगण्यमानो नरकः, पादरजोधूसरोत्तमाङ्गो जङ्गमः पादपीठः पुंस्कोकिलः काकुकणितेषु, शिखी सुखकरकेकासु, स्थूलकूर्मः क्रोडक- षेषु, श्वा नीचचाटुकरणेषु, कृकलासः शिरोविडम्बनासु, जाहक आत्म- संकोचनेषु, वेणुर्मूर्च्छनासु, वेश्याकायः करणबन्धक्लेशेषु, पलालं सत्त्व- शालिषु, प्रतिपादकः पादसंवाहनासु, कन्दुकः करतलताडनेषु, वीणा- दण्डः कोणाभिघातेषु, वराकः सेवकोऽपि मर्त्यमध्ये राजिलोऽपि वा भोगी, पुलाकोऽपि वा कलमो, वरं क्षणमपि कृता मानवता मानवता न मतो नमतस्त्रैलोक्याधिराज्योपभोगोऽपि मनस्विनः। तदेवमभिनन्दि- सुखदायिनः रतः रक्तः। मुख आरम्भे, वदने च। प्रियं रतं मोहनं यस्य। क्लीबोऽ- शक्तः, शरण्यश्च। पूति दुर्गन्धम्। अगण्यमानो न गणनाहैः। कुत्सितो नरो नरकः, अगण्यश्च मानो यस्य सोऽगण्यमानो नरको भौमनामा। अवीच्यादिर्वा। काकुकणितम्, मधुरवचनम्। भिन्नध्वनिर्वक्त्वकथनं निर्व्यापारत्वाच्छोकाद्वा। कृकलासोऽप्यनवरतं शिर उन्नमयन्नास्ते। जाहकः आखुतुल्यः प्राणिभेदः, कूर्म इत्यन्ये। मूर्च्छना मोहः, स्वराणां विशिष्टा स्थितिश्च। करणं शरीरम्, मन्त्रो वा। कामशास्त्रोदितकरणानि। कोणो लगुडश्च। यथा। शालिषु पलालमप्रयोजनं तद्व- दसौ। राजिलो डिण्डिभाख्यो निर्विषः सर्पः। पुलाकः फलदरिद्रः। शालिः श्यामाक- प्रायः। मानवताऽहंकारिणा, मानवस्य कर्म मानवता पौरुषम्। न मतः नेष्टः, नमतः प्रणामं कुर्वतः। अनुग्रह नहीं कर सकता। केवल मुख से मीठा बात करने वाला नपुंसक है। पीव और मांस से भरा कीड़ा है। जिसकी कोई गणना नहीं ऐसा कुत्सित नर (नरक) है। दूसरों के पैरों की धूल से भरे मस्तक वाला चलता-फिरता पादपीठ है, लप्पो-चप्पो करने वाला नरकोयल है, मीठी बोल उचारने वाला मोर है, धरती पर सीना घिसने वाला कछुआ है, चापलूसी का कुत्ता है, केवल सिर हिलाने वाला गिरगिट है, अपने आपको सिकोड़कर रखने वाला चूहा है, राग अलापने वाला वेणु है, दूसरे के लिए शरीर को तोड़-मरोड़ करने में वेश्या की भाँति है। सत्त्व वाले व्यक्तियों में घास-फूस की तरह है, दाबने में पैर का बोझ उठाने वाला पंगरू का पावा है, हाथ की मार सहने में कन्दुक है और कोणाभिघात (दूसरा अर्थ—छड़ी की मार) का अभ्यस्त वीणादण्ड है। बेचारे राजसेवक को अगर मनुष्यों में गिना जाय तो राजिल (पानी वाला ढोंड़ साँप) को भी सर्प मानना पड़ेगा, पयाल की भी धान में गिनती होनी चाहिए। मनस्वी के लिए क्षण भर भी मानवता के गौरव के साथ जीना अच्छा, किन्तु मनस्वी के लिए त्रैलोक्य के राज्य का उपभोग भी
सप्तम उच्छ्वासः ३६३ तास्मदीयप्रणयो देवोऽपि दिवसैः कतिपयैरेव परागतः प्राग्ज्योतिषेश्वर इति करोतु चेतसि' इत्युक्त्वा तूष्णीमभूत् । अचिराच्च नमस्कृत्य निर्जगाम । राजापि रजनीं तां कुमारदर्शनौत्सुक्यस्वीकृतहृदयः समनैषीत्। आत्मा- र्पणं हि महताममूलमन्त्रमयं वशीकरणम् । प्रभाते च प्रभूतं प्रतिप्राभृतं प्रधानप्रतिदूताधिष्ठितं दत्त्वा हंसवेगं प्राहिणोत् । आत्मनापि ततः प्रभृति प्रयाणकैरनवरतैरभ्यमित्रं प्रावर्तत । कदाचित्तु राज्यवर्धनभुजबलोपार्जित- मशेषं मालवराजसाधनमादायागतं समीप एवावासितं लेखहारकाद्भण्डि- मशृणोत् । श्रुत्वा चाभिनवीभूतभ्रातृशोकहुताशनस्तद्दर्शनकातरहृदयो बभूव मूर्च्छांन्धकारमिव विवेशातिष्ठच्च समुत्सृष्टसकलव्यापारः प्रतीहार- निवारणनिभृतनिःशब्दपरिजने निजमन्दिरे सराजकपरिवारस्तदागम- नमुदीक्षमाणो मुहूर्तम् । अथ भण्डिरेकेनैव वाजिना कतिपयकुलपुत्रपरिवृतो मलिनवासा माल्यान्योषधयः । साधनं हस्त्यादि । निभृतः सनयः । अथेत्यादि । राजद्वारं भण्डिराजगामेति संबन्धः । अच्छा नहीं, यदि उसके लिये सिर झुकाना पड़े । तो हमारे प्रणय को स्वीकार करने वाले देव भी यह समझें कि कुछ ही दिनों में प्राग्ज्योतिषेश्वर आ जाते हैं।' इतना कहकर हंसवेग चुप हो गया । थोड़ी देर बाद नमस्कार करके चलता बना । राजा ने भी उस रात को कुमार के दर्शन की उत्सुकता में व्यतीत किया । आत्म- समर्पण कर देना महापुरुषों का मूलमन्त्ररहित वशीकरण है । प्रातःकाल उन्होंने प्रधान दूत के साथ बदले में बहुत-सा उपहार देकर हंसवेग को विदा किया । स्वयं शत्रु पर चढ़ाई करने के लिए सेना का प्रयाण उस दिन से बराबर जारी रखा । एक दिन लेखहारक ने आकर यह सूचना दी कि राज्यवर्धन की सेना ने मालवराज की जिस सेना को जीत लिया था उस सबको साथ लेकर भण्डि आ रहा है और समीप ही पहुँच गया है । सुनते ही उनके हृदय में भ्रातृशोक की अग्नि फिर से उमड़ गई और भण्डी को देखने के लिये व्याकुल हो गये, मानों मूर्च्छा के अन्धकार में प्रवेश कर गये हों । सब कार्य को छोड़कर राजसमूह और अन्तःपुर के लोगों के साथ भण्डि के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए क्षण भर अपने भवन में ठहरे । प्रतीहारों के रोक लगा देने से भवन के सब परिजन इशारे से काम करते थे । कुछ समय के बाद भण्डि अकेला ही घोड़े पर सवार कुछ कुलपुत्रों को साथ किए
अष्टम उच्छ्वास: राज्यश्री की खोज, दिवाकरमित्र व उपसंहार
३६४ हर्षचरितम् रिपुशरशल्यपूरितेन निखातबहुलोहकीलकपरिकररक्षितस्फुटनेनेव हृद- येन, हृदयलग्नैः स्वामिसत्कृतैरिव श्मश्रुभिः, शुचं समुपदर्शयन्दूरीकृत- व्यायामशिथिलभुजदण्डदोलायमानमङ्गलवलयैकशेषालंकृतिरनादरोपयु- क्तताम्बूलविरलरागेण शोकदहनदह्यमानस्य हृदयस्याङ्गारेणेव, दीर्घनिः- श्वासवेगनिर्गतेनाधरेण शुष्यता स्वामिविरहविधृतजीवितापराधवैलक्ष्या- दिव, बाष्पवारिपटलेन पटेनेव प्रावृतवदनः, विशन्निव दुर्बलीभूतैः स्वाङ्गै- मपत्रपयाङ्गैरेवमग्निव च व्यर्थीभूतभुजोषमाणमायतैर्निःश्वसितैः, पातकीव, अपराधीव, द्रोहीव, मुषित इव, छलित इव, यूथपतिपतनविषण्ण इव वेगदण्डवारणः, सूर्यास्तमयनिःश्रीक इव कमलाकरः, दुर्योधननिधनदु- र्मना इव द्रौणिः, अपहृतरत्न इव सागरो राजद्वारमाजगाम । अवतीर्य च तुरङ्गमादवनतमुखो विवेश राजमन्दिरम् । दूरादेव च विमुक्ताक्रन्दः पपात पादयोः । श्मश्रुरिति । शोकवशेन ततो विच्छित्त्वाद्वा । राजद्वार पर आया । उसके कपड़े मलिन थे, उसकी छाती में शत्रु के बाणों के घाव थे । लोहे के कड़े कीलों वाले परिकर के धारण कर लेने से वह बच निकला था । स्वामी के आदर से मानों उसकी दाढ़ी छाती तक बढ़ आई थी, जिससे उसके शोक का पता चल रहा था। बहुत दिनों से व्यायाम के छूट जाने के कारण उसके हाथ पतले पड़ गए थे और उसका मंगलवलय खिसक कर नीचे कलाई में आ गया था । बिना मन के चबाए हुए पान की लाली शोक की अग्नि से जले हुए हृदय के अंगारे की भांति लग रही थी । उसका अधर लम्बी सांस के निकलते रहने से सूख रहा था, मानों स्वामी के विरह के बाद भी जीवित रहने के अपराध से लज्जित था। आँसुओं की झड़ी ऐसे लगी थी मानों उसके मुँह पर शोकपट ढँका हो । लज्जा के मारे उसके अङ्ग अपने आप में सिमटते जा रहे थे । वह लम्बी सांसों से मानों व्यर्थ पड़ी भुज की गरमी को छोड़ रहा था। वह पातकी, अप- राधी, द्रोही, लुटा हुआ, छला हुआ जैसा लग रहा था। उसकी ऐसी दीन दशा थी जैसे यूथपति के मरने पर तरुण हाथी की हो जाती है। वह उस सरोवर के समान था जो सूर्य के अस्त हो जाने से हो जाता है, जैसे दुर्योधन के मर जाने से अश्वत्थामा दुःखी हुआ उसी प्रकार वह भी राज्यवर्धन के निधन से विषादमग्न था। वह उस समुद्र की भांति था जिसमें से रत्न हर लिया गया हो । घोड़े से उतर कर वह मुँह लटकाए ही राजमंदिर के भीतर गया। दूर ही से धाड़ मार कर वह पैरों पर गिर पड़ा ।
सप्तम उच्छ्वासः ३६५ अवनिपतिरपि दृष्ट्वा तमुत्थाय प्रविरलैः पदैः प्रत्युद्गम्योत्थाप्य च गाढमुपगूह्य कण्ठे करुणमतिचिरं रुरोद । शिथिलीभूतमन्युवेगश्च पुरैव पुनरागत्य निजासने निषसाद । प्रथमप्रक्षालितमुखे च भण्डौ मुखं प्रक्षा- लयत् । समतिक्रान्ते च कियत्यपि कालकलाकलापे भ्रातृमरणवृत्तान्त- मप्राक्षीत् । अथकथयच्च यथावृत्तमखिलं भण्डिः । अथ नरपतिस्त- मुवाच—'राज्यश्रीव्यतिकरः कः ?' इति । स पुनरवादीत्—'देव ! देव- भूयं गते देवे राज्यवर्धने गुप्तनाम्ना च गृहीते कुशस्थले देवी राज्यश्रीः परिभ्रश्य बन्धनाद्विन्ध्याटवीं सपरिवारा प्रविष्टेति लोकतो वार्तामशृण- वम् । अन्वेष्टारस्तु तां प्रति प्रभूताः प्रहिता जना नाद्यापि निवर्तन्ते' इति । तच्चाकर्ण्य भूपतिरब्रवीत्—'किमन्यैरनुपदिभिः यत्र सा तत्र परित्यक्तान्यकृत्यः स्वयमेवाहं यास्यामि । भवानपि कटकमादाय प्रवर्ततां गौडाभिमुखम्।' इत्युक्त्वा चोत्थाय स्नानभुवमगात् । कारितशोकश्म- श्रुवपनकर्मणा च महाप्रतीहारभवनस्नातेन, शारीरिकवसनकुसुमाङ्गरागा- लंकारप्रेषणप्रकटितप्रसादेन भण्डिना सार्धमभुक्त, निनाय च तेनैव सह वासरम् ।
हर्ष उसे देखकर उठे और लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ उसे गले लगाया और स्वयं भी देर तक फूट-फूट कर रोते रहे । जब उनका शोक कुछ कम हुआ तब पहले की तरह आकर आसन पर बैठ गए । जब भण्डि अपना मुँह धो चुका तब उन्होंने भी धोया । कुछ देर के बाद भाई की मृत्यु का वृत्तान्त पूछा । जैसा हो चुका था भण्डि ने सब हाल कह सुनाया । तब राजा ने उससे फिर कहा—'राज्यश्री की क्या गति हुई ?' वह फिर बोला— 'देव, देव राज्य वर्धन के दिवंगत होने पर जब गुप्त नाम के व्यक्ति ने कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया तो देवी राज्यश्री किसी प्रकार बन्धन से छूट कर अपने परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई । यह मैंने लोगों के मुँह से सुना है । बहुत खोज- पड़ताल करने वाले आदमी वहाँ भेजे गए जो अभी तक नहीं लौटे ।' यह सुनकर राजा ने कहा—'औरों के ढूँढने से क्या ? जहाँ राज्य श्री है मैं वहां दूसरे सब काम छोड़ कर स्वयं जाऊँगा । तुम भी सेना लेकर गौड़ पर चढ़ाई करो।' यह कहकर वे उठे और स्नानभूमि में चले गए । भण्डि ने हर्ष के कहने पर शोक से बढ़े हुए केशों का क्षौर कराया और महाप्रतीहार-भवन में स्नान किया । हर्ष ने उसके लिए वस्त्र, पुष्प, अंगराग और आभूषण भेज कर अपना प्रसाद प्रकट किया और साथ ही भोजन किया । एवं वह दिन उसके साथ ही बिताया ।
३६६ हर्षचरितम्
अथापरेद्युरुषस्येव भण्डिर्भूतपालमुपसृत्य व्यज्ञापयत्—'पश्यतु देवः श्रीराज्यवर्धनभुजबलार्जितं साधनं सपरिबर्हं मालवराजस्य' इति । नर- पतिना स 'एवं क्रियताम्' इत्यभ्यनुज्ञातो दर्शयांबभूव । तद्यथा—अन- वरतगलितमदमदिरामोदमुखरमधुकरजूटाजटिलकरटपट्टपङ्किलगण्डान् , गण्डशैलानिव जङ्गमान् , गम्भीरगर्जितरवाञ्जलधरानिव महीमवतीर्णा- नुत्फुल्लसप्तच्छदवनामोदमुचः, शरदिवसानिव पुञ्जीभूतान् , अनेकसहस्र- संख्यान्करिणः, चारुचामीकरचित्रचामरमण्डलमनेहरांश्च हरिणरंहसो हरीन् , बालआतपविसरवर्षिणां च किरणैरनेकेन्द्रायुधीकृतदशदिशामलं- काराणां विशेषान् , विस्मयकृतः स्मरोन्मादितमालवोकुचपरिमलदुर्ललि- तांश्च निजज्योत्स्नापूरप्लावितदिगन्तानपि तारान्हारान् , उडुपतिपादसं- चयशुचीनि निजयशांसीव बालव्यजनानि, जातरूपमयनालं च निवा- मपुण्डरीकमिव श्रियः श्वेतमातपत्रम् , अप्सरस इव बहुसमररससाहसा- नुरागावतीर्णा वारविलासिनीः, सिंहासनशयनासन्दीप्रभृतीनि सद्योप- करणानि, कालायसनिगडनिश्चलीकृतचरणयुगलं च सकलं मालवराजलो-
उसके बाद दूसरे दिन पौ फटते ही भण्डि ने राजा के पास आकर निवेदन किया— 'श्री राज्यवर्धन के भुजबल से मालवराज की जो सेना साज-सामान के साथ जीती गई है उसे देव देखने की कृपा करें।' राजा ने 'ऐसा ही करो' जब यह आज्ञा दी तो उसने वह सब सामान दिखाया। हजारों की संख्या में अनेक हाथी, जिनके गण्डस्थल को हमेशा बहते हुए मदजल की मादक गंध से आकृष्ट होकर लूझते हुए भौंरे पंकिल बना रहे थे, जो चलते-फिरते गण्डशैल की भांति लग रहे थे और इस प्रकार चिग्घाड़ रहे थे मानों पृथिवी पर उतरे हुए मेघ हों, और खिले हुए तमाल वन की तरह जिनकी गंध फैल रही थी। हरिण की भांति तेज चाल वाले घोड़े सुन्दर सुनहली चौरियों से सजे थे। बहुत से अलंकार, जिनकी किरणें बालआतप के रूप में निकल रही थीं, अपनी रंग-बिरंगी प्रभा से दिशाओं में इन्द्रायुधों का निर्माण कर रहे थे। आश्चर्य करने वाले शुद्ध मोतियों से पोहे गए तारहार जिनमें काम से मतवाली मालवी स्त्रियों के कुचों के परिमल लगे हुए थे और जो अपनी ज्योत्स्ना के प्रभाव से दिशाओं को प्लावित कर रहे थे। चन्द्रमा के किरणसमूह के समान सफेद चँवर जो हर्ष के अपने यश की भांति प्रतीत हो रहे थे। सुवर्ण दण्ड वाला श्वेत छत्र, जो मानों लक्ष्मी के निवास का कमल हो। वेश्याएँ, जो मानों अनेक युद्धों के देखने के साहस और अनुराग से पृथिवी पर उतरी हुई अप्सराएँ हों। सिंहासन, शयनासन आदि राज्य का सामान पैरों में
कम्, अशेषंश्च ससंख्यालेख्यपत्रान्, सालंकारापीडपीडान् कोशकल- शान् । अथालोच्य तत्सर्वमवनिपालः स्वीकृतं यथाधिकारमादिशदध्य- क्षान् । अन्यस्मिंश्चाहनि हयैरेव स्वसारमन्वेष्टुमुच्चचाल विन्ध्याटवीमवाप च परिमितैरेव प्रयाणकैस्ताम् । अथ प्रविशन्दूरादेव दह्यमानषष्टिकतुसविसरविसारिविभावसूनां वन्यधान्यबीजधानीनां धूमेन धूसरिमाणमादधानैः, शुष्कशाखासंचयर- चितगोवाटवेष्टितविकटवटैः, व्यापादितवत्सरूपकरोषाविष्टगोपालकल्पित- व्याघ्रयन्त्रैः, अयन्त्रितवनपालहठह्रियमाणपरग्रामीणकाष्ठिककुठारैः, गहन- तरुखण्डनिर्मितचामुण्डामण्डपैर्र्वनप्रदेशैः, प्रकाश्यमानमटवीप्रायप्रान्त- तया कुटुम्बभरणाकुलैः कुद्दालप्रायकृषिभिः कृषीवलैर्बलवद्भिरुच्चभागभा- षितेन भज्यमानभूरिशालिखलक्षेत्रखण्डलकमलपावकाशैश्च कापिलै., का- लायसैरिव कृष्णमृत्तिकाकठिनैः, स्थानस्थानस्थापितस्थाणूत्थितस्थूलप- लोहे की बेड़ी पहने हुए मालव के राजा लोग। कोष से भरे हुए कलसे, जिनपर ब्यौरे की पट्टियां लगी थीं और जिनके गले में आभूषणों की बनी मालाएँ पड़ी थीं। सब सामान को देखकर हर्ष ने अपने विभिन्न अधिकारी अध्यक्षों को उसे विधिपूर्वक स्वीकार करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन घोड़ों से बहन राज्यश्री को ढूँढने के लिए प्रस्थान किया और कुछ ही पड़ावों के बाद विन्ध्याटवी में पहुँच गए। उसमें प्रवेश करते ही उन्होंने वनबस्ती के चारों ओर के वन-प्रदेश पर दृष्टिपात किया जो उसका दूर ही से परिचय दे रहे थे। वहाँ के लोग साठी चावल का भूसा जला लेते थे और उसकी फैलती हुई आग बनैले धान तक पहुँच कर वनप्रदेश को धुमैला बना रही थी। कहीं पुराने खंखाड़ बरगद के चारों ओर सूखी लकड़ियों के अम्बार लगाकर गायों का बाड़ा बनाया गया था। कहीं बाघों ने बछड़ों पर वार किया था तो उससे खीझकर ग्वालों ने बाघ को फँसाने का जाल लगा रखा था। स्वतन्त्र विचरण करने वाले वनपालों ने गाँवों से आकर लकड़ी काट ले जाने वाले लकड़हारों के कुठार जबर्दस्ती छीन लिये थे। पेड़ों के घने झुरमुट में चामुण्डा देवी का मण्डप बना हुआ था। वनग्राम के चारों ओर जङ्गल के सिवा और कुछ न था। इसलिए किसान कुटुम्ब का पेट पालने के लिये व्याकुल रहते थे और उसी चिन्ता में दुर्बल होकर जोर-जोर से आवाज करते हुए केवल कुदारी से खोदकर परती जमीन तोड़ते और खेत के टुकड़े निकाल लेते। खेत छोटे-छोटे और कहीं-कहीं पर थे। भूमि काश से भरी हुई थी। काली मिट्टी लोहे के तवे की तरह कड़ी थी। कुदारी ही उनका एक सहारा था। जगह-जगह पर काटने से पेड़ों के ठूँठ पड़े
३६८ हर्षचरितम् ङ्गवैः दुरुपगमश्यामाकप्ररूढिभरलम्बुसबहुलेः, अविरहितकोकिलाक्षक्षुपै- र्विरलविरलैः केदारैः, कृच्छ्रात्कृष्यमाणैरैनातिप्रभूतप्रवृत्तगतागतप्रहतभुव- मुपचेत्रमुपरचितैरुञ्चैर्मञ्चैश्च सूच्यमानश्वापदोपद्रवं, दिशि दिशि च प्रति- मार्गद्रुमकूतानां पथिकपादप्रस्फोटनधूलिधूसरैर्नवपल्लवैर्लाञ्छितच्छाया- नाम्, अटवीसुलभसालकुसुमस्तबकाञ्चितनवखातकूपिकोपकण्ठप्रतिष्ठित- नागस्फुटानामच्छिद्रकटकल्पितकुटीरकाणाम्, कुटिलकीटवेणीवेष्ट्यमान- शक्तुशारशरावश्रेणीश्रितानाम्, अध्वगजनजग्ध जम्बूफलास्थिशबलसमीप- भुवाम्, उद्वूलितधूलीकदम्बस्तबकप्रकरपुलकिनीनाम्, कण्टकितकर्करी- चक्राक्रान्तकाष्ठमञ्चिकामुषिततृषाम्, तंभ्यत्तलशीतलसिकतिलकलशीश- मितश्रमागाम्, आश्यानशैवलश्यामलितलिञ्जरजायमानजलजडिम्नाम्, उदकुम्भाकृष्टपाटलशर्कराशकलशिशिरीकृतदिशाम्, घटमुखघटितकटहार- पाटलपुष्पपुटानाम्, शीकरपुलकितपल्लवपूलीपाल्यमानशोप्यसरसिशिशु- थे। उनमें फिर से पत्ते निकल रहे थे। खेतों में साँवा का जङ्गल लहरा रहा था। छुईमुई भी खूब बढ़ आई थी। तालमखाने के छोटे-छोटे पौधों से भी चलने में कठिनाई होती थी। खेत बड़ी कठिनाई से जोते जाते थे। आने जाने वाले कम थे, इसलिए पगडण्डियाँ साफ दिखायी न पड़ती थीं। खेतों के पास ऊँचे बँधे हुए मचानों से यह सूचित हो रहा था कि यहाँ जङ्गली जानवर उपद्रव करते हैं। जंगल के प्रवेशमार्गों पर प्याउओं का विशेष प्रबन्ध था। पेड़ों के झुरमुट में प्याऊ के स्थान बना लिए गये थे। पथिक वहाँ आते और पल्लवों की टहनी तोड़कर पैरों की धूल झाड़कर छाया में बैठते थे। नई खोदी हुई छोटी कुइयाँ पर जङ्गली साल के फूलों के गुच्छे टांग दिए गए थे और समीप में नागफनी से घेर दिया गया था। वहीं पर प्याऊ की मड़ैया घने घास-फूस से छा ली गई थी। सत्तू खाकर पथिकों ने जो सिकोरे फेंक दिए थे उन पर जंगली मक्खियाँ भिनभिना रही थी। प्याऊ के समीप की भूमि पथिकों को खाये जामुन की गुठलियों से रङ्गविरंग की हो रही थी। कदम्बों के फूलों से लदी हुई टहनियाँ तोड़कर धूल में फेंक दी गई थीं। काठ की बढ़ौचियों पर प्यास बुझाने के लिए मिट्टी की गगरियाँ, जिन पर काँटे जैसे बुन्दकियों की सजावट बनी थी, रखी हुई थीं। बालू की ठण्डी कलसियों में पानी पड़ जाने से जब वे रिसती थीं तो उन्हें ही देखकर पथिकों की थकान दूर हो जाती थी। कुछ सिम-सिम सिरवाकों के लपेट देने से नीले रङ्ग के नादों का जल खूब ठण्डा हो गया था। जल निकाल करके जलकुंभों में लाल शर्करा रखी गयी थी, जो चारों ओर ठंडक फैला रही थी। घड़े के मुँह गेहूँ की नालियों या तिनके के ढक्कन से ढँके थे, और उनके
सप्तम उच्छ्वासः ३६६
सहकारफलजूटीजटिलस्थाणूनाम्, विश्राम्यत्कार्पटिकपेटकपरिपाटीपीय- मानपयसामटवीप्रवेशप्रपाणां शैत्येन त्याजयन्तमिव ग्रैष्ममूष्माणं क्वचि- दन्यत्र ग्राहयन्तमिवाङ्गारीयदारुसंग्रहदाहिभिः व्योकारैः, सर्वतश्च प्रातिवे- श्यविषयवासिना समासन्नग्रामगृहस्थगृहस्थापितस्थविरपरिपाल्यमानपाथे- यस्थगितेन कृतदारुणदारुव्यायामयोग्याङ्गाभ्यङ्गेन स्कन्धाध्यासितकठोर- कुठारकण्ठलम्बमानप्रातराशपुटेन पाटच्चरप्रत्यवायप्रतिपन्नपटच्चरेण काल- वेत्रकत्रिगुणप्रततिवलयपाशग्रथितग्रीवाग्रथितैः पत्रवीटावृतमुखैः, बोटकूटै- रूढवारिणा पुरःसरबलद्वलीवर्दयुगसरेण नैकटिककुटुम्बिकलोकेन काष्ठ- संग्रहार्थमटवीं प्रविशता श्वापदव्यधनव्यवधानबहलीसमारोपितकुटीकृत- कूटपाशैश्च गृहीतमृगतन्तुतन्त्रीजालवलयवागुरैः, बहिर्व्याधैर्विचरद्भिरंसा-
ऊपर जल सुवासित करने के लिए पाटल के फूल रखे गये थे । भीतर थूनियों के सिरों पर बाल सहकार के फलों की डालें झूल रहीं थीं और हरे पत्तों पर पानी का छींटा देकर उनके झुगते हुए फलों को ताजा रखा जा रहा था । झुंड के झुंड यात्री प्याऊ में आकर पानी पी रहे थे । प्रपाओं की ठण्डक से ग्रीष्म की गरमी कम पड़ रही थी । दूसरी ओर लकड़ी के ढेरों में आग लगाकर अङ्गार बनाने वाले लुहार फिर उतनी ही तपन पैदा कर रहे थे । पड़ोसी प्रदेश में रहने वाले निकटवासी कुणबी (कुटुम्बिक) जाति के लोग काष्ठ- संग्रह के लिए जंगल में आ रहे थे। निकट के गांवों में रहने वाले गृहस्थों के घर पर अपने भोजन के सामान रख आये थे और बूढ़ों को रखवाली के लिए बैठा आये थे । लकड़ियों के साथ कुल्हाड़ा भाँजने की कसरत के बर्दाश्त के लिए शरीर में तेल की मालिश कर रखी थी । उनके कन्धों पर भारी कुठार रखे थे और गले में कलेवे में पोटकी लटक- रही थी। चोरों के डर से फटे-पुराने कपड़े पहन रखे थे । उनके गले में काले बेंत की तिलड़ी माला लपेटी हुई थी और उसी से पानी की लम्बोतरी घड़ियों जिनके मुँह में डाट लगी थी, लटकी हुई थीं। उनके आगे लकड़ी लादने के लिए बैलों की जोड़ी चल रही थी। आधे ग्राम के बाहर वाले जंगल में विचर रहे थे । जंगल के खूंखार जानवरों के शिकार में घुसने के लिए टट्टियाँ लगाई थीं और शिकारी कूटपाशी की गेडुरी बनाकर साथ में लिये थे । उनके हाथ में पशुओं के नसों की डोरियों, जाल और फन्दे थे । कुछ दूसरी तरह के बहेलिये चिड़ियों फसाने वाले शाकुनिक विचर रहे थे, जो कन्धेपर बीतंसक जाल या डला लटकाये थे, जो उनके बालपाशिक आभूषण से उलझ-उलझ जाते थे । उनके हाथों में बाज, तीतर और भुजंगा आदि के पिंजड़े थे । चिड़ीमारों के लड़के बेलों पर लासा लगाकर गौरैया पकड़ने के इरादे में इधर से उधर फुदक रहे थे । चिड़ियों
१. 'पीत' इति ।
४०० हर्षचरितम् वसकवीतंसव्यालम्बमानबालपाशिकैश्च संगृहीतग्राह्रकक्रकरकपिञ्जलादि- पञ्जरकैः शाकुनिकैः, संचरद्भिश्चयुतलासकलेशालितलतावधूलद्बालम्पटानां चपेटकैः, पाशकशिणूनामटद्भिः तृणस्तम्बान्तरिततित्तिरतरलायमानकौले यककुलचाटुकारैश्चलद्विहगमृगयां मृगयुयुवभिः क्रीडद्भिः, परिणतचक्रवाक- कण्ठकषायरूचां शीधव्यानां वल्कलानां कलापान्, नातिचिरोद्धृतानां च धातुत्विषां धातकीकुसुमानां गोणीरगणिताः पिचव्यानां चातसीगण- पट्टमूलकानां पुष्कलान्संभारान्, भारांश्च मधुनो माक्षिकस्य मयूराङ्गज्- स्याक्लिष्टमधूच्छिष्टचक्रमालानां लम्बमानलामजकमुञ्जजटानामपत्वचां खदिरकाष्ठानां कुष्ठस्य कठोरकेसरिसटाभारबभ्रुणश्च रोध्रस्य भूयसो भारकान्, लोकेनादाय व्रजता प्रविचितविविधवनफलपूरितपिटकमस्त- काभिश्चाभ्यर्णग्रामगत्वरीभिस्त्वरमाणाभिर्विक्रयचिन्ताव्यग्राभिर्भ्रामेयकाभि- र्व्याप्तदिगन्तरमितस्ततश्च युक्तशूरशकुरशाकराणां पुराणपांसूत्किरकरीष- कूटवाहिनीनां धूर्गतधूलिधूसरसैरिरभसरोपस्वरसार्यमाणानां संक्रीडकटुल- मधुनः क्षौद्रस्य । मयूराङ्गजस्य बर्हिपिच्छस्य । मधूच्छिष्टं सिक्थकम् । लामज्ज केति । 'लामज्जकं लघुलयम्' इत्यमरः। उशीरभेद इत्यन्ये । बभ्रुगः कपिलस्य । रोध्रस्येति । रोध्रो लोध्रः । शाबरकः 'शिल्लकः शिल्लुकस्त्वरः । तिरीटः कानहीरश्च शिल्लो शाबरपादपः' । शकुरास्तरुगाः । शाकरा बलीवर्दाः । करीषं शुष्कगोमयम् । उक्तं च—'गोविष्ठोमयमस्त्रियाम् । तत्तु शुष्कं करीषोऽस्त्री' इति । सैरिको हालिकः । के शिकार के शौकीन नवयुवक लोग शिकारी कुत्तों को जो बीच-बीच में झाड़ी में उड़ते हुए तीतरों की फड़फड़ाहट से बेचैन हो उठते थे, पुचकार रहे थे। गाँव के लोग वन की उपज के बोझ सिर पर उठाये जा रहे थे। कोई पुराने चक्रवाक के गले की तरह लाल पीली सेंहुड़ की छाल का गट्ठा लिए था। किसी के पास तुरत तोड़े हुए गेरू की तरह लाल वर्ण वाले धाय के फूलों की बोरियाँ थीं। कई लोग रुई, अलसी, सन के मुट्ठों का बोझा लिए थे । मधुमक्खी की शहद, मोर के पिच्छ, छाल उधेड़ी हुई कत्थे की लकड़ी, जिसपर खस की जटायें लटक रही थीं, कूठ (एक पौधा) पुराने सिंह के केसर के समान पीले- पीले लोध के भार सिरों पर उठाये बोझिये जा रहे थे। गाँवई स्त्रियों ने अनेक प्रकार के जंगली फूलों को बीन-बीन कर टोकरे भर लिए थीं और उन्हें बेचने की चिन्ता में व्यग्र होकर जल्दी-जल्दी डेग रखती हुई पास के गाँवों में चली जा रही थीं। एक ओर छोटी-छोटी गाड़ियाँ इधर-उधर चली जा रही थीं। उनमें पुष्ट और तरुण बैल जुते थे । वे पुराने खाद कूड़े के ढेर ढो रही थीं। उनमें जुते हुए बैल धूल से
सप्तम उच्छ्वासः ४०१ चक्रचीत्कारिणीनां शकटश्रेणीनां संपातैः, संपाद्यमानदुर्बलोर्वीविरूक्षक्षेत्र- संस्कारमारक्षिक्षिप्तदान्तवाहकद्ण्डोड्डीयमानहरिणेलालङ्घिततुङ्गवैणववृति- भिश्च निखातगौरकरङ्ककुशङ्कितशशक शकलिततुङ्गशुङ्गैः, प्रयत्नप्रभृतवि- शङ्कटविटपैर्वाटैरेक्षवैः सुबहुभिः श्यामायमानोपकण्ठमतिविप्रकृष्टान्तरैर्मर- कतस्निग्धसुहावाटवेष्टितैः, कार्मुककर्मण्यवंशविटपसंकटैः, कण्टकितकर- ञ्जराजिदुष्प्रवेश्यैः, उरुबूकवचावङ्गकसुरमसूरणशिग्रुग्रन्थिपर्णगवेधुकागर्मु- संक्रीडत्कूजत् । वृत्तिर्वाटोपान्ते लताकृतः प्राकारमयः । करङ्कः कङ्कालः । तदुप- लक्षिताः शङ्कवः । शुङ्गोऽग्रभागः । वृत्तिरित्यन्ये । प्रभृताः पोषिताः । विशङ्कटा विस्तीर्णाः । विटपाः शाखाः । अतिविप्रकृष्टत्यादि । अटवीकुटुम्बिनां गृहैरुपेतमिति वनग्रामविशेषणम् । स्नुहा सुधावृक्षः । उक्तं च—'स्नुक्स्नुहा च सुधावृक्षः शुंभी निस्त्रिंशपत्रकः । समन्तदुग्धी गण्डोरी सेहुण्डो वज्रकन्दकः' ॥ इति । कर्मणि साधुः कर्मण्यः । करञ्जो नक्तमालः । उक्तं च—'करञ्जो नक्तमालः स्यात्प्रतीतश्विरबिल्वकः' इति । उरुबूक एरण्डः । उक्तं च—'उरुबूकस्तथैरण्डो रुबको वातनाशनः । पञ्चाङ्गुलो वर्धमानश्चित्रो गन्धर्वपात्तथा ॥' वचा उग्रगन्धा । उक्तं च—'वचोग्रगन्धा गोलोमी जटिलोग्रा सलोमशा' इति । वङ्गको हरीतकीविशेषः । सुरसो भूतघ्नी । उक्तं च—'सुरसा तुलसीद्वुः स्यादलसो बहुमञ्जरी । अपेतो राक्षसो गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः ।' इति । सूरणः कन्दविशेषः । शिग्रुः सौभाञ्जनः । उक्तं च—'साभा- ञ्जनः कृष्णगन्धा मुखभञ्जोऽथ शिग्रुकः' इति । ग्रन्थिपर्णः मुस्ताकारः सुगन्धिकन्द- विशेषः । उक्तं च—'ग्रन्थिपर्णोऽशुकं बर्हिपुष्पं स्थौणेयकुन्दुरे' इति । गवेधुका लथपथ थे और चलने के लिए ललकारे जा रहे थे । डगमग पहिये घिसटते हुये चुं-चूं कर रहे थे । जिन खेतों की उपजाऊ शक्ति कम हो गई थी, उनमें लाद कर कूड़ा-कर्कट डाले जा रहे थे । गन्नों के खूब लहलहाते हुए बहुत से खेतों के बाड़े गाँव की हरियाली बढ़ा रहे थे । खेतों के रखवाले जब गन्नों में छिपे हुये हिरनों को ताककर बेलों को हाँकने का डण्डा उनकी ओर चलाते तो हिरन छलाँग मार कर ऊंची बाँसों की बाड़ से उस पार निकल जाते थे । जंगली भैसों के कंकाल खेत में काँटे की तरह गाड़े गये थे, उनसे डरे हुए खरहे गन्ने के ऊँचे अंकुरों को ही कुतर डालते थे । गन्नों के पौधे बड़े यत्न से बढ़ाये गये थे । वनग्राम के घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर थे । उनके चारों ओर मरकत के जैसे चिकने हरे रङ्गवाली सेंहुड़ की बाड़ लगी थी । धनुष बनाने के काम में लाने योग्य बाँसों की बँसवारी पास में उग रही थी । करंजुए के कांटेदार वृक्षों की पंक्ति में रास्ता बना कर घुसना मुश्किल था । एरंड, बचा, बंगक (बैंगन), तुलसी, सूरनकन्द, मोंडिजन. गंठिनवन, गरबेरुआ और मरुश्रा धान के गुश्म घरों २६ ह० च०
४०२ हर्षचरितम् दृगुल्मगहनगृहवाटिकाैः, निखातोच्चकाष्ठारोपितकाष्ठालुकलताप्रतानविहित- च्छायैः, परिमण्डलबदरीमण्डपकतलनिखातखादिरकील बद्धवत्सरूपैः, कथमपि कुक्कुटरटितानुमीयमानसंनिवेशैरङ्गनाशस्तिस्तम्भतलविरचितप- क्षिपूपिकावापिकैर्विकीर्णबदरपाटलपटलैः, वेगुपोटदलनकलितशरमयुष्टु- तिविहितभित्तिभिः, किंशुकगोरोचनारचितमण्डलमण्डपबल्वजबद्धाङ्काररा- शिभिः, शाल्मलीफलतूलसंचयबहुलैः, संनिहितनलशालिशालूकखण्ड- कुमुदबीजवेगुतण्डुलैः, संगृहीततमालबीजैः, भस्ममलिनम्लानकाश्मर्य- कूटव्याधृतकटैराश्यानराजादनमदनफलस्फीतैर्मधूकासवमद्यप्रायैः, कुसुमभ- तृणधान्यभेदः । गर्मुङ्गतागुल्मः । ‘अप्रकाण्डे स्तम्बगुल्मौ’ इति काष्ठालुकलता अलाबुवल्ली । स्वल्पा वत्सा वत्सरूपा । संनिवेशो रचना । अगस्तिर्मुनितरुः । पक्षिपूपिका पक्षिणां वेत्रवलानि भाण्डभेदः । पोटः शकलः । किंशुकानि पलाश- वृक्षपुष्पाणि । बल्वजस्तृणभेदः । बन्धकाष्ठ इति प्रसिद्धः । शाल्मली रक्त- पुष्पा । उक्तं च—‘शाल्मली रक्तपुष्पा च कुर्कुटी स्थिरजीविता । पिच्छिला तूलिनी मोचा कण्टकाढ्या सुपूरिणी ॥’ इति । तूलं कर्पासः । नलशालिः शालिभेदः । शालूकं पद्ममूलम् । उक्तं च—‘पद्ममूलं तु शालूकं सकिलं तत्किरात- कम् । शालीनं पद्मकन्दं च जालालूकं निगद्यते ॥’ इति । काश्मर्यः कश्मीरीहीरः । ‘काश्मीरी मधुमत्यपि । श्रीपर्णी सर्वतोभद्रा गम्भीरी कृष्णमृत्तिका ॥’ इति । कूटाः कुनालानि । राजादनः कपीष्टः । उक्तं च—‘क्षीरोदस्त्व राजन्यः क्षीरमृत्स्नः कपी- नृपः । राजादनो दृढस्कन्धः कपीष्टः प्रियदर्शनः ॥’ इति । मदनो रोधः । उक्तं च— ‘मदनः शल्यको रोधो गालः पिण्डीतकः फलम् । भसरः करहाटश्च सुमनोऽति- के साथ लगी हुई बगीचियों में भरे हुए थे। गाड़ी गई ऊँची बल्लियों पर चढ़ाई हुई लौकी की बेलें फैल कर छाया दे रही थीं। बेरी की गेल में मंडपों के नीचे खैर के खूँटे गाड़कर बछड़े बांध दिए गए थे। मुर्गों की कुकड़ूँकूँ से पहचान मिलती थी कि घर कहाँ कहाँ बसे हैं। आंगन में लगे अगस्त्य वृक्ष के नीचे चिड़ियों का चुग्गा खिलाने और पानी पिलाने की हौदियाँ बनी हुई थीं और लाल बेरों की चादरसी बिछी थी। घरों की दीवारें बांस के फट्टे, नरकुल और सरकंडों को जोड़ कर बना ली गई थीं। कोयले के ढेरों पर बबइ घास के मड़वे छाए थे, जिनपर पलास के फूल और गोरोचना की सजावट थी। घरों में सेमल की रूई ढेर के ढेर पड़ी थी। नलशालिकमल की जड़, खंड शर्करा, कमलबीज, बाँस, तंडुल और तमाल के बीज आदि बटोर कर रखा लिए गए थे। चटाइयों पर गंभीरी के ढेर के ढेर सूख रहे थे और धूल पड़ने से कुछ मटमैले लग रहे थे। खिरनी और मेनफल सुखा कर रखे गए थे। महुए का आसव और चुवाया हुआ मद प्रायः हर
सप्तम उच्छ्वासः ४०३ कुम्भगण्दकुसूलैरविरहितराजमाषत्रपुषकर्कटिकाकूष्माण्डलाबुबीजैः, पोष्य- माणवनबिडालमालुधाननकुलशालिजातजातकादिभिरटवीकुटुम्बिनां गृहै- रुपेतं वनग्रामकं ददर्श । तत्रैव च तं दिवसमत्यवाहयदिति । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते छत्रलब्धिर्नाम सप्तम उच्छ्वासः ।
सुपुष्पकः ॥' इति । मधूको गुडपुष्पः । उक्तं च—'गुडपुष्पो रोध्रपुष्पो मालप्रस्थोऽथ माधवः' इति । राजमाषो निष्पावः । त्रपुसं लाडुकः । कर्कटिकादयः प्रसिद्धाः । मालुधाना मालुकावधारुयाः प्राणिभेदाः, नकुलादयश्च । इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते सप्तम उच्छ्वासः ।
घर में था । प्रत्येक घर में कुसुम्भ, कुंभ और गंडकुसूल भी थे । रवांस, खोरा, ककड़ी, कोहड़ा और लौकियों के बीजों से उनके घर भरे हुए थे । घरों में बनबिलाव, नेवले, मालुधान और शालिजात नाम के पशुओं के बच्चे पले हुए थे । इस प्रकार के वनग्राम में ही हर्ष ने उस दिन को व्यतीत किया । हर्षचरित सप्तम उच्छ्वास समाप्त
अष्टम उच्छ्वासः सहसा संपादयता मनोरथप्रार्थितानि वस्तूनि । दैवेनापि क्रियते भव्यानां पूर्वसेवेव ॥ १ ॥ विद्वज्जनसंपर्को नष्टेष्टज्ञातिदर्शनाभ्युदयः । कस्य न सुखाय भवने भवति महारत्नलाभश्च ॥ २ ॥ अथापरेद्युरुत्थाय पार्थिवस्तस्माद्ग्रामकान्निर्गत्य विवेश विन्ध्याट- वीम् । आट च तस्यामितश्चेतश्च सुबहून्दिवसान् । एकदा तु भूपतेर्भ्रमत एवाटविकसामन्तस्य शरभकेतोः सूनुर्व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि कज्जलश्या- मलश्यामलतावलयेनाधिल्लाटमुर्द्धैः कृतमौलिबन्धम्, अन्धकारिणीम- कारणभुवा भ्रुकुटिभङ्गेन त्रिशाखिन त्रियामामिव साहससहचारिणीं लला- टस्थलीं सदा समुद्वहन्तम्, अवतंसितैकशुकपक्षप्रभाहरितायमानेन पिनद्धकाचरकाचमणिकर्णिकेन श्रवणेन शोभमानम्, किंचिच्चुलुल्लस्य सहसेत्यादियुगलकेन श्रीहर्षाभ्युदयशिवाकारमित्रराज्यश्रीप्राप्त्येकावलीलाभा- न्सूचयति । भव्यानां पूर्वसेवा दैवेन शुभसंपादनेन । शुभाभ्यासभावितचिन्ता भूयोऽपि क्रियत इति प्रतिपाद्यते । एकदा त्वित्यादौ । व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि शबरयुवानमादाय भूपतेरर्थात्समी- पमाजगामेति संबन्धः । अटव्यां भव आटविकः । श्यामा गन्धप्रियङ्गुः । मौलयः केशाः । अन्धकारिणीं कृष्णाम् । त्रिशाखेन त्रिलेखेन । पिनद्धो बद्धः । काचरस्य कपिलस्य काचमणेः कर्णिका यत्र तसेन । चुल्लश्चिल्लः । उक्तं च—'स्युः क्लिन्नाक्षे बड़े लोगों के मन में जिन वस्तुओं की अभिलाषा उत्पन्न होती है, दैव उन्हें उपस्थित करने में देर नहीं लगाता, मानों वह भी पहले से उनकी सेवा करता रहता है । विद्वानों का संपर्क, भूले हुए अपने प्रिय बन्धु का दर्शन और अपने ही भवन में बहु- मूल्य रत्नों का लाभ—ये तीनों किसे सुख नहीं देते ? दूसरे दिन हर्ष उठे और उन्होंने उस वनग्राम से निकल कर विन्ध्याटवी में प्रवेश किया । बहुत दिनों तक उसी में इधर-उधर घूमते रहे । एक दिन जब राजा भटक ही रहे थे कि जंगली प्रदेशों के राजा शरभकेतु का लड़का व्याघ्रकेतु कहीं से एक शबर युवक को साथ लेकर मिलने आया । उस शबर युवक ने ललाट के ऊपर सांवली प्रियंगुलता से अपने बालों का जूड़ा बांध लिया था । बिना कारण के ही उसकी भौंहें तिरछी हो गई थीं, मानों वह साहस करके पास आई अंधेरी रात की भांति अपनी ललाटस्थली को हमेशा
अष्टम उच्छ्वासः ४०५ प्रविरलपक्ष्मणश्चक्षुषः सहजेन रागरोचिषा रसायनरसोपयुक्तं तारक्ष्वं क्षतजमिव क्षरन्तम्, अवनाटनासिकम्, चिपिटाधरम्, चिकिनचिबुकम्, अहीनहनूत्कटकपोलकूटास्थिपर्यन्तममीषदवाग्रग्रीवाबन्धम्, स्कन्नस्कन्धा- र्धभागम्, अनवरतकठिनकोदण्डकुण्डलीकरणकर्कशव्यायामविस्तारिते- नांसलेनोरसा हसन्तमिव तटशिलाप्रथिमानं विन्ध्यगिरेः, अजगरगरीयसा च भुजयुगलेन लघयन्तं तुहिनशैलशालद्रुमाणां द्राघिमाणम्, वराह- बालवलितबन्धनाभिर्नागदमनजटिकावाटिकाभिर्जटिलीकृतपृष्ठे प्रकोष्ठे प्र- तिष्ठां गतं गोदन्तमणिचित्रं त्रापुषं वलयं बिभ्राणम्, अतुन्दिलमपि तुण्डि- भम्, अहीरमणीचर्मनिर्मितपट्टिकयोश्चित्रचित्रकत्वक्कारकितपरिवारया सं- चुल्लश्चिल्लपिल्लः क्लिन्नेऽक्षिण चाप्यमी' इति । 'तरक्षुस्तु मृगादनः ।' आरण्यश्वेत्यर्थः । तस्येदं तारक्षवम् । तच्च क्वचिद्रसायनेनोपयुज्यते । अवनाटो निम्नः । चिपिटः स्थूलः ईषल्लघुश्च । चिकिनं स्थूलेषद्ध्रस्वम् । चिबुकमधराधः । उक्तं च—'अध- स्ताच्चिबुकं गण्डौ कपोलौ तत्परा हनुः' इति । अवाग्रावनता ग्रीवा कंधरा । स्कन्नः शुष्कः, लम्बमानो वा, उन्नतो वा । 'स्कन्धो भुजशिरोऽसोऽस्त्री' । अंसलेन बलवता । उरसा वक्षसा । अजगरः सर्पभेदः । द्राघिमाणं दीर्घत्वम् । वराहः सूकरः । नाग- दमनो विषहर ओषधिभेदः । जूटिका लघुमूलम् । वाटिकाः पूग्यः । गोदन्तः सर्प- भेदः । त्रपुणो विकारस्त्रापुषम् । 'त्रपुजतुनोः षुक्' । अतुन्दिलं कृशोदरम् । तुण्डिभं बृहन्नाभिकम् । 'तुन्दिवलिवटेर्भः' । स हि व्यायामवशात्क्षाममध्य उन्नतनाभिः तुण्डिभः । अहीरमणीनामा द्विवक्त्रः । चित्रकश्छायया गन्धतोऽप्यपरसर्पत्रासकः । धारण कर रहा था । उसके कान में सुग्गे के पंख का अवतंस लगा हुआ था, जो अपनी प्रभा से नीचे पाली में कच्चे शीशे के बाले को हरा बना रहा था । उसकी आँखें चिपचिपी और बरौनियों कम थीं और उनमें से स्वाभाविक लाली रसायन बनाने के उपयोग में आने वाले बाघ के रुधिर के समान मानों ढरक रही थी । नाक कुछ झुकी हुई और निचलो ओठ चिपकी हुई थी । एवं ठुड्डी कुछ छोटी थी । गालों के ऊपर की हड्डी बढ़ी हुई और गाल चौड़े थे । गर्दन एक ओर कुछ झुकी हुई थी । कन्धे का आधा भाग लटका हुआ था । वह अपनी चौड़ी छाती से जो हमेशा धनुष के खींचने के कठिन व्यायाम से मजबूत हो गई थी, विन्ध्याचल की शिलाओं की चौड़ाई को और अजगर सर्पके समान अपनी लम्बी भुजाओं से हिमालय के शालवृक्षों की लम्बाई को हँस रहा था । कलाई में सूअर के बालों में लपेटी हुई नागदमन नामक विषहर ओषधि की गुच्छियाँ बँधी थीं और गोदन्ती मणि से जड़ा हुआ
४०६ हर्षचरितम् कुब्जाजिनजालकितया शृङ्गमयमस्तृणमुष्टिभागभास्वरया पारदरसलेशलि- प्रसमस्तमस्तिकया कृपाणया करालितविशंकटकटिप्रदेशम् , प्रथमयौव- नोझिरूयमानमध्यभागभ्रष्टमांसभरिताविव स्थवीयसावूरुदण्डौ दधतम् , अच्छभल्लचर्ममयेन भल्लीप्रायप्रभूतशरभृता शबलशार्दूलचर्मपटपीडिते- नालिकुलकालकम्बललोललोम्ना पृष्ठभागभाजा भक्षाभरणेन पल्लवितमिय कार्यमुपदर्शयन्तम् , उत्तरत्रिभागोत्तंसितचाषपिच्छचारुशिखरे खदिर- जटानिर्माणे खरप्राणे प्रचुरमयूरपित्तपत्रलताचित्रितत्वचि त्वचिसारगुणे गुरुणि वामस्कन्धाध्यासितधनुषि दोषि लम्बमानेनावाक्शिरसा शितश- रकृत्तै कनलकविवरप्रवेशितेतरजङ्घजनितस्वस्तिकबन्धेन बन्धूकलोहितरु- धिरराजिरञ्जितघ्राणवर्त्मना वपुर्विततिव्यक्तविभाव्यमानकोमलक्रोडरोम- रांगे का कड़ा पड़ा था। उसका उदर छोटा किन्तु नाभी उभरी हुई थी। उसकी चौड़ी कमर में कटारी बँधी हुई थी। वह दुमुही साँप की खाल की दो पट्टियों से बनी म्यान में, जिस पर चिते के चमड़े के चकत्ते काटकर शोभा के लिए लगाए गए थे, रखी हुई थी। म्यान पर उसने औंध कर मृगचर्म लटका दिया था। कटारी की मूठ चमकदार सींग की बनाई गई थी और उसके मुँहवाल पर पारा चढ़ा हुआ था। उसकी जाँधें पहली जबानी के कारण कटिप्रदेश से खिसके हुए माँस से मानों भरकर अधिक मोटी हो गई थी। पीठ पर लटकते हुए तरकस के बोझ से वह जैसे दबता जा रहा था। उसका तरकस भालू के चमड़े का बना हुआ था। उसमें विशेष रूप से भल्लियाँ और बाण भरे हुए थे। चितकबरे बाघ के चमड़े से वह कसकर बँधा हुआ था और उसके रोयें भौंराले कम्बल की तरह लग रहे थे। बाँह के ऊपरी तिहारी भाग में चहे पक्षी के पंख सुशोभित थे। बाँह के नस इस प्रकार लग रहे थे मानों खैर की जटाएँ एक साथ बटी गई हों और उसकी भुजा में बल अधिक था। बाँस की तरह ठोस और तगड़ी उसकी बाँह पर मयूरपिच्छ से फूल-पत्तियों का गुदना गुदा था। उसके बायें कन्धे पर धनुष रखा हुआ था। खरहे की एक टाँग की लम्बी हड्डी तेज बाण की धारा से घुटने के पास काटकर दूसरे टाँग की पिंडली पहले की नळकी में पिरो देने से जो कमन्धा बन गया था उसमें अपनी बांह का अग्रभाग डालकर उसने खरहा को भुजा पर टाँग लिया था। नाक से बहते हुए लाल रक्त से सना हुआ खरहे का सिर नीचे की ओर लटक रहा था और झूलते हुए शरीर के खिंच जाने के कारण सामने की ओर पेट पर के मुलायम सफेद रोओं की धारी साफ दिखाई देती थी। धनुष के निचले कोर के निकले भाग द्वारा कण्ठ छेद कर उसमें एक तीतर लटकाया हुआ था, जिसकी चोंच के भीतर का ऊपरी तालु दिखाई पड़ रहा था। खरहे और तीतर उसके शिकार की बानगी की मूठ जान पड़ते थे। उनके दाहिने हाथ में विष से
अष्टम उच्छ्वासः ४०७ शुष्किम्ना शशेन शिताटनीशिखाप्रमथितग्रीवेण चापावृतचञ्चुत्तानताम्रता- लुना तित्तिरिणा वर्णकमुष्टिमिव मृगयाया दर्शयन्तम्, विषमविषदूषितव- दनेन च विकर्णेन कृष्णाहिनेव मूलगृहीतेन व्यग्रदक्षिणकराग्रम्, जङ्गम- मिव गिरितटतमालपादपम्, यन्त्रोल्लिखितमश्मसारस्तम्भमिव भ्रमन्तम्, अञ्जनशिलाच्छेदमिव चलन्तम्, अयःसारमिव गिरेर्विन्ध्यस्य गलन्तम्, पाकलं करिकुलानाम्, कालपाशं कुरङ्गयूथानाम्, धूमकेतुं मृगराजचक्रा- णाम्, महानवमीमहं महिषमण्डलानाम्, हृदयमिव हिंसायाः, फलमिव पापस्य, कारणमिव कलिकालस्य, कामुकमिव कालरात्रेः, शबरयुवानमा- दायाजगाम। दूरे च स्थापयित्वा विज्ञापयांबभूव—'देव ! सर्वस्यास्य विन्ध्यस्य स्वामी सर्वपल्लीपतीनां प्राग्रहरः शबरसेनापतिर्भूकम्पो नाम । तस्यायं निर्घातनामा स्वस्रीयः सकलस्यास्य विन्ध्यकान्तारारण्यस्य पर्णा- नामप्यभिज्ञः किमुत प्रदेशानाम् । एनं पृच्छतु देवो योऽग्योऽयमाज्ञां कर्तुम्।' इति कथिते च निर्घातस्तु क्षितितलनिहितमौलिः प्रणाममकरोत् । उप- निन्ये च तित्तिरिणा सह शशोपायनम् । अवनिपतिस्तु संमानयन्स्वयमेव तमप्राक्षीत्—'अङ्ग ! अभिज्ञा यूयमस्य सर्वस्योद्देशस्य ? विहारशीलाश्च दिवसष्वेतेषु भवन्तः ? सेनापतेर्वाऽन्यस्य वा तदनुजीविनः कस्यचिदुदा- रूपा नारी न गता भवेद्दर्शनगोचरम् ?' इति । बुझी हुई नोंक वाला बाण था, मानों पूँछ से पकड़ा हुआ काला नाग हो। पर्वतीय प्रदेश का वह चलता-फिरता तमालवृक्ष था। वह खराद पर चढ़ाकर बना घुमता हुआ लौह- स्तम्भ था। चलता हुआ अञ्जनशिला का टुकड़ा था। खान से ढलता हुआ विन्ध्याचल का लोहा था। वह हाथियों के लिये ज्वर, हिरनों के लिए कालपाश, सिंहों के लिए धूमकेतु, भैसों के लिए दुर्गानवमी का उत्सव (जिसमें भैंसे बलि चढ़ाए जाते हैं) था। वह साक्षात् हिंसा का हृदय, पाप का फल, कलियुग का कारण, कालरात्रि का पति जैसा लग रहा था। व्याघ्रकेतु ने उस शबर युवक को दूर ही ठहरा कर राजा से निवेदन किया—'देव, समस्त विन्ध्यक्षेत्र का स्वामी और पल्लीपतियों में श्रेष्ठ भूकम्प नाम का शबर सेनापति है। निर्घात नाम का यह उसी का भांजा है जो समस्त विन्ध्याचल के जङ्गल के पत्ते-पत्ते की खबर रखता, प्रदेशों की तो बात ही क्या ? देव इससे जो पूछें यह आज्ञापालन के योग्य है। उसके यह कहने पर निर्घात ने धरती पर सिर टेक कर प्रणाम किया और तीतर के साथ खरहे को भेंट के रूप में समीप में रख दिया। राजा ने उस भेंट
४०८ हर्षचरितम् निर्घातस्तु भूपालालापनप्रसादेनात्मानं बहुमन्यमानः प्रणाम, दर्शि- तादरं च व्यज्ञापयत्—'देव ! प्रायेणात्र हरिण्योऽपि नापरिगताः संचरन्ति सेनापतेः, कुत एव नार्यः ? नाप्येवंरूपा काचिदबला । तथापि देवादेशा- दिदानीमन्वेषणं प्रति प्रतिदिनमनन्यकृत्यैः क्रियते यत्नः । इतश्चार्धगव्यू- तिमात्र एव मुनिमहिते महति महीधरमालामूलरुहि महीरुहां षण्डेऽपि पिण्डपाती प्रभूतान्तेवासिपरिवृतः पाराशरी दिवाकरमित्रनामा गिरिनदी- माश्रित्य प्रतिवसति, स यदि·विन्देद्वार्ताम्' इति । तच्छ्रुत्वा नरपतिर- चिन्तयत्—'श्रूयते हि तत्रभवतः सुगृहीतनाम्नः स्वर्गतस्य ग्रहवर्मणो बालमित्रं मैत्रायणीयस्त्रयीं विहाय ब्राह्मणायनो विद्वानुत्पन्नसमाधिः सौगते मते युवैव काषायाणि गृहीतवान्' इति । प्रायशश्च जनस्य जनयति सुहृदपि दृष्टो भृशमाश्वासम् । अभिगमनीयाश्च गुणाः सर्वस्य । कस्य न प्रतीद्यो मुनिभावः । भगवती च वैधेयेऽपि धर्मगृहिणी गरिमाणमापाद- पाराशरी भिक्षुः । विन्देल्लभेत् । मैत्रायणीयः शाखाया अध्येता । 'ऋग्यजुः- सामनामाथ त्रयी वेदत्रयः स्मृताः' । ब्राह्मणायनो द्विजवरिष्ठः । समाधिरेका- ग्रता । अभिगमनार्हा अभिगमनीयाः । प्रतीद्यः पूज्यः । वैधेये मूर्खे । उक्तं च— 'अज्ञे मूढयथाजातमूर्खवैधेयबालिशाः' इति । का सम्मान करते हुए स्वयं पूछा—'भाई, तुम इस समस्त प्रदेश की जानकारी रखते हो ? और इन दिनों यहीं घूमते रहे हो । क्या तुम्हारे सेनापति या उसके किसी दूसरे अनुचर के देखने में एक सुन्दर स्त्री इधर आई है ?' निर्घात राजा के साथ बातचीत करने की प्रसन्नता से अपने आपको धन्य मानता हुआ प्रणाम करके आदरपूर्वक बोला—'देव, सेनापति के अनजाने में हरिणी भी जब नहीं घूमतीं तो नारियों की बात ही क्या ! इस तरह की कोई अबला इस जङ्गल में नहीं, फिर भी आपके आदेश से अब सब काम छोड़कर उसे ढूँढ़ने का प्रयत्न होगा । यहाँ से एक कोस की दूरी पर पहाड़ की जड़ में वृक्षों के घने झुरमुट में भिक्षावृत्ति से निर्वाह करने वाला, अपने अनेक शिष्यों के साथ दिवाकरमित्र नाम का पाराशरी भिक्षु गिरि नदी के किनारे रहता है । शायद उसे खबर लगी हो ।' यह सुनकर राजा ने सोचा—'मैंने भी सुना है कि आदरणीय सुगृहीतनाम स्वर्गीय गृहवर्मा के बालसखा मैत्रायणी शाखा के अध्येता ब्राह्मणश्रेष्ठ और विद्वान् जिन्होंने चित्तवृत्ति की एकाग्रता प्राप्त कर लेने से प्रव्रज्या ग्रहण कर बौद्ध भिक्षुओं के गेरुवे वस्त्र धारण कर लिये थे ।' ऐसा प्रायः देखा जाता है कि मित्र भी मिलकर हृदय में आश्वासन उत्पन्न कर देता है । सबके गुण अनुसरण के योग्य
अष्टम उच्छ्वासः ४०६ यति प्रव्रज्या, किं पुनः सकलजनमनोमुषि विदुषि जने । यतो नः कुतू- हलि हृदयमभूत्सततमस्य दर्शनं प्रति प्रासङ्गिकमेवेदमपतितमतिकल्याणं पश्यामः प्रयत्नप्रार्थितदर्शनं जनमिति । प्रकाशं चाब्रवीत्—'अङ्ग ! समुप- दिश तमुद्देशं यत्रास्ते स पिण्डपाती' इति । एवमुक्त्वा च तेनैवोपदिश्य- मानवर्त्मा प्रावर्तत गन्तुम् । अथ क्रमेण गच्छत एव तस्य अनवकेशिनः कुड्मलितकर्णिकाराः, प्रचुरचम्पकाः स्फीतफलेग्रयहः, फलभरभरितनमेरवः नीलदलनलदनारि- केलनिकराः, हरिकेसरसरलपरिकराः कोरकनिकुरम्बरोमाञ्चितकुरबकरा- जयः, रक्ताशोकपल्लवलावण्यलिप्यमानदशदिशः, प्रविकसितकेसररजो- विसरबध्यमानचारुधूसरिमाणः स्वरजः सिकतिलातलकतालाः, प्रविचलि- अथ क्रमेण गच्छत एवास्यैवंविधास्तरवो दर्शनमवतेरुरिति संबन्धः । अवकेशी निष्फलतरुः । उक्तं च—'वन्ध्योऽफलोऽवकेशी च कर्णिकारो द्रुमोत्पलः । परिष्याधः' इति पर्यायः । 'स्यादवन्ध्यः फलेग्रहिः' । नमेरुस्तरुभेदः । 'नलदः सल्लकी मांसी नारिकेलस्तु लाङ्गली' इत्यमरः (?) । हरिकेसरः । उक्तं च—'चाम्पेयः केसरो नागकेसरः काञ्चनाह्वयः' । सरला देवदारवः । कोरकः कलिका । कुरबका ये योषि- तामालिङ्गनैः पुष्यन्ति । रक्ताशोका ये सालक्तककामिनीचरणहताः फुल्लन्ति । केसरा बकुलाः । ये कान्तागण्डूषशीधुसेकेन विकसन्ति । तिलकाः क्षुरकाः । ये हैं और भिक्षु का वेष किसका पूज्य नहीं ! धर्म का घरनो भगवती प्रव्रज्या जब मूर्ख व्यक्ति में भी गौरव उत्पन्न कर देती है तो समस्त जन के चित्त को हर लेने वाले विद्वान् की क्या बात है जो हमारा हृदय उनके दर्शनों के लिए कुतूहल से भर गया है । हम प्रयत्न से दर्शन देने वाले उनको ( दिवाकरमित्र को ) प्रसङ्गतः प्राप्त अपने कल्याण के रूप में देखते हैं । उन्होंने कहा—'भाई, वे भिक्षु जहाँ हों, उस स्थान को बताओ ।' यह कहकर निर्घात के द्वारा बताए गये मार्ग पर चलने लगे । उसके साथ मार्ग में चलते हुए ही हर्ष ने फले-फूले अनेक वृक्षों पर दृष्टिपात किया । कर्णिकार कोढ़ी ले रहे थे । चम्पक फलों से लद गए थे । नमेरु फलों के भार से झुक गये थे । साँवले पत्तों वाले सल्लकी और नारियल के पेड़ झुण्ड के झुण्ड थे । नागकेसर और सरल चारों ओर छाए हुए थे, कुरबक वृक्षों की कोंदियाँ उनके रोमाञ्च की भाँति निकल रही थीं । रक्ताशोक के पल्लवों की लाली दिशाओं में जैसे लिप रही थी । खिले हुए केसरवृक्षों के पराग उड़कर वन को धूसर कर रहे थे । तिलकवृक्षों के पराग बालू के