हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ४०३ कुम्भगण्दकुसूलैरविरहितराजमाषत्रपुषकर्कटिकाकूष्माण्डलाबुबीजैः, पोष्य- माणवनबिडालमालुधाननकुलशालिजातजातकादिभिरटवीकुटुम्बिनां गृहै- रुपेतं वनग्रामकं ददर्श । तत्रैव च तं दिवसमत्यवाहयदिति । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते छत्रलब्धिर्नाम सप्तम उच्छ्वासः ।
सुपुष्पकः ॥' इति । मधूको गुडपुष्पः । उक्तं च—'गुडपुष्पो रोध्रपुष्पो मालप्रस्थोऽथ माधवः' इति । राजमाषो निष्पावः । त्रपुसं लाडुकः । कर्कटिकादयः प्रसिद्धाः । मालुधाना मालुकावधारुयाः प्राणिभेदाः, नकुलादयश्च । इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते सप्तम उच्छ्वासः ।
घर में था । प्रत्येक घर में कुसुम्भ, कुंभ और गंडकुसूल भी थे । रवांस, खोरा, ककड़ी, कोहड़ा और लौकियों के बीजों से उनके घर भरे हुए थे । घरों में बनबिलाव, नेवले, मालुधान और शालिजात नाम के पशुओं के बच्चे पले हुए थे । इस प्रकार के वनग्राम में ही हर्ष ने उस दिन को व्यतीत किया । हर्षचरित सप्तम उच्छ्वास समाप्त