भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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अष्टम उच्छ्वासः सहसा संपादयता मनोरथप्रार्थितानि वस्तूनि । दैवेनापि क्रियते भव्यानां पूर्वसेवेव ॥ १ ॥ विद्वज्जनसंपर्को नष्टेष्टज्ञातिदर्शनाभ्युदयः । कस्य न सुखाय भवने भवति महारत्नलाभश्च ॥ २ ॥ अथापरेद्युरुत्थाय पार्थिवस्तस्माद्ग्रामकान्निर्गत्य विवेश विन्ध्याट- वीम् । आट च तस्यामितश्चेतश्च सुबहून्दिवसान् । एकदा तु भूपतेर्भ्रमत एवाटविकसामन्तस्य शरभकेतोः सूनुर्व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि कज्जलश्या- मलश्यामलतावलयेनाधिल्लाटमुर्द्धैः कृतमौलिबन्धम्, अन्धकारिणीम- कारणभुवा भ्रुकुटिभङ्गेन त्रिशाखिन त्रियामामिव साहससहचारिणीं लला- टस्थलीं सदा समुद्वहन्तम्, अवतंसितैकशुकपक्षप्रभाहरितायमानेन पिनद्धकाचरकाचमणिकर्णिकेन श्रवणेन शोभमानम्, किंचिच्चुलुल्लस्य सहसेत्यादियुगलकेन श्रीहर्षाभ्युदयशिवाकारमित्रराज्यश्रीप्राप्त्येकावलीलाभा- न्सूचयति । भव्यानां पूर्वसेवा दैवेन शुभसंपादनेन । शुभाभ्यासभावितचिन्ता भूयोऽपि क्रियत इति प्रतिपाद्यते । एकदा त्वित्यादौ । व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि शबरयुवानमादाय भूपतेरर्थात्समी- पमाजगामेति संबन्धः । अटव्यां भव आटविकः । श्यामा गन्धप्रियङ्गुः । मौलयः केशाः । अन्धकारिणीं कृष्णाम् । त्रिशाखेन त्रिलेखेन । पिनद्धो बद्धः । काचरस्य कपिलस्य काचमणेः कर्णिका यत्र तसेन । चुल्लश्चिल्लः । उक्तं च—'स्युः क्लिन्नाक्षे बड़े लोगों के मन में जिन वस्तुओं की अभिलाषा उत्पन्न होती है, दैव उन्हें उपस्थित करने में देर नहीं लगाता, मानों वह भी पहले से उनकी सेवा करता रहता है । विद्वानों का संपर्क, भूले हुए अपने प्रिय बन्धु का दर्शन और अपने ही भवन में बहु- मूल्य रत्नों का लाभ—ये तीनों किसे सुख नहीं देते ? दूसरे दिन हर्ष उठे और उन्होंने उस वनग्राम से निकल कर विन्ध्याटवी में प्रवेश किया । बहुत दिनों तक उसी में इधर-उधर घूमते रहे । एक दिन जब राजा भटक ही रहे थे कि जंगली प्रदेशों के राजा शरभकेतु का लड़का व्याघ्रकेतु कहीं से एक शबर युवक को साथ लेकर मिलने आया । उस शबर युवक ने ललाट के ऊपर सांवली प्रियंगुलता से अपने बालों का जूड़ा बांध लिया था । बिना कारण के ही उसकी भौंहें तिरछी हो गई थीं, मानों वह साहस करके पास आई अंधेरी रात की भांति अपनी ललाटस्थली को हमेशा