हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४०५ प्रविरलपक्ष्मणश्चक्षुषः सहजेन रागरोचिषा रसायनरसोपयुक्तं तारक्ष्वं क्षतजमिव क्षरन्तम्, अवनाटनासिकम्, चिपिटाधरम्, चिकिनचिबुकम्, अहीनहनूत्कटकपोलकूटास्थिपर्यन्तममीषदवाग्रग्रीवाबन्धम्, स्कन्नस्कन्धा- र्धभागम्, अनवरतकठिनकोदण्डकुण्डलीकरणकर्कशव्यायामविस्तारिते- नांसलेनोरसा हसन्तमिव तटशिलाप्रथिमानं विन्ध्यगिरेः, अजगरगरीयसा च भुजयुगलेन लघयन्तं तुहिनशैलशालद्रुमाणां द्राघिमाणम्, वराह- बालवलितबन्धनाभिर्नागदमनजटिकावाटिकाभिर्जटिलीकृतपृष्ठे प्रकोष्ठे प्र- तिष्ठां गतं गोदन्तमणिचित्रं त्रापुषं वलयं बिभ्राणम्, अतुन्दिलमपि तुण्डि- भम्, अहीरमणीचर्मनिर्मितपट्टिकयोश्चित्रचित्रकत्वक्कारकितपरिवारया सं- चुल्लश्चिल्लपिल्लः क्लिन्नेऽक्षिण चाप्यमी' इति । 'तरक्षुस्तु मृगादनः ।' आरण्यश्वेत्यर्थः । तस्येदं तारक्षवम् । तच्च क्वचिद्रसायनेनोपयुज्यते । अवनाटो निम्नः । चिपिटः स्थूलः ईषल्लघुश्च । चिकिनं स्थूलेषद्ध्रस्वम् । चिबुकमधराधः । उक्तं च—'अध- स्ताच्चिबुकं गण्डौ कपोलौ तत्परा हनुः' इति । अवाग्रावनता ग्रीवा कंधरा । स्कन्नः शुष्कः, लम्बमानो वा, उन्नतो वा । 'स्कन्धो भुजशिरोऽसोऽस्त्री' । अंसलेन बलवता । उरसा वक्षसा । अजगरः सर्पभेदः । द्राघिमाणं दीर्घत्वम् । वराहः सूकरः । नाग- दमनो विषहर ओषधिभेदः । जूटिका लघुमूलम् । वाटिकाः पूग्यः । गोदन्तः सर्प- भेदः । त्रपुणो विकारस्त्रापुषम् । 'त्रपुजतुनोः षुक्' । अतुन्दिलं कृशोदरम् । तुण्डिभं बृहन्नाभिकम् । 'तुन्दिवलिवटेर्भः' । स हि व्यायामवशात्क्षाममध्य उन्नतनाभिः तुण्डिभः । अहीरमणीनामा द्विवक्त्रः । चित्रकश्छायया गन्धतोऽप्यपरसर्पत्रासकः । धारण कर रहा था । उसके कान में सुग्गे के पंख का अवतंस लगा हुआ था, जो अपनी प्रभा से नीचे पाली में कच्चे शीशे के बाले को हरा बना रहा था । उसकी आँखें चिपचिपी और बरौनियों कम थीं और उनमें से स्वाभाविक लाली रसायन बनाने के उपयोग में आने वाले बाघ के रुधिर के समान मानों ढरक रही थी । नाक कुछ झुकी हुई और निचलो ओठ चिपकी हुई थी । एवं ठुड्डी कुछ छोटी थी । गालों के ऊपर की हड्डी बढ़ी हुई और गाल चौड़े थे । गर्दन एक ओर कुछ झुकी हुई थी । कन्धे का आधा भाग लटका हुआ था । वह अपनी चौड़ी छाती से जो हमेशा धनुष के खींचने के कठिन व्यायाम से मजबूत हो गई थी, विन्ध्याचल की शिलाओं की चौड़ाई को और अजगर सर्पके समान अपनी लम्बी भुजाओं से हिमालय के शालवृक्षों की लम्बाई को हँस रहा था । कलाई में सूअर के बालों में लपेटी हुई नागदमन नामक विषहर ओषधि की गुच्छियाँ बँधी थीं और गोदन्ती मणि से जड़ा हुआ