भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 506 में से

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पृष्ठ 453

४०६ हर्षचरितम् कुब्जाजिनजालकितया शृङ्गमयमस्तृणमुष्टिभागभास्वरया पारदरसलेशलि- प्रसमस्तमस्तिकया कृपाणया करालितविशंकटकटिप्रदेशम् , प्रथमयौव- नोझिरूयमानमध्यभागभ्रष्टमांसभरिताविव स्थवीयसावूरुदण्डौ दधतम् , अच्छभल्लचर्ममयेन भल्लीप्रायप्रभूतशरभृता शबलशार्दूलचर्मपटपीडिते- नालिकुलकालकम्बललोललोम्ना पृष्ठभागभाजा भक्षाभरणेन पल्लवितमिय कार्यमुपदर्शयन्तम् , उत्तरत्रिभागोत्तंसितचाषपिच्छचारुशिखरे खदिर- जटानिर्माणे खरप्राणे प्रचुरमयूरपित्तपत्रलताचित्रितत्वचि त्वचिसारगुणे गुरुणि वामस्कन्धाध्यासितधनुषि दोषि लम्बमानेनावाक्शिरसा शितश- रकृत्तै कनलकविवरप्रवेशितेतरजङ्घजनितस्वस्तिकबन्धेन बन्धूकलोहितरु- धिरराजिरञ्जितघ्राणवर्त्मना वपुर्विततिव्यक्तविभाव्यमानकोमलक्रोडरोम- रांगे का कड़ा पड़ा था। उसका उदर छोटा किन्तु नाभी उभरी हुई थी। उसकी चौड़ी कमर में कटारी बँधी हुई थी। वह दुमुही साँप की खाल की दो पट्टियों से बनी म्यान में, जिस पर चिते के चमड़े के चकत्ते काटकर शोभा के लिए लगाए गए थे, रखी हुई थी। म्यान पर उसने औंध कर मृगचर्म लटका दिया था। कटारी की मूठ चमकदार सींग की बनाई गई थी और उसके मुँहवाल पर पारा चढ़ा हुआ था। उसकी जाँधें पहली जबानी के कारण कटिप्रदेश से खिसके हुए माँस से मानों भरकर अधिक मोटी हो गई थी। पीठ पर लटकते हुए तरकस के बोझ से वह जैसे दबता जा रहा था। उसका तरकस भालू के चमड़े का बना हुआ था। उसमें विशेष रूप से भल्लियाँ और बाण भरे हुए थे। चितकबरे बाघ के चमड़े से वह कसकर बँधा हुआ था और उसके रोयें भौंराले कम्बल की तरह लग रहे थे। बाँह के ऊपरी तिहारी भाग में चहे पक्षी के पंख सुशोभित थे। बाँह के नस इस प्रकार लग रहे थे मानों खैर की जटाएँ एक साथ बटी गई हों और उसकी भुजा में बल अधिक था। बाँस की तरह ठोस और तगड़ी उसकी बाँह पर मयूरपिच्छ से फूल-पत्तियों का गुदना गुदा था। उसके बायें कन्धे पर धनुष रखा हुआ था। खरहे की एक टाँग की लम्बी हड्डी तेज बाण की धारा से घुटने के पास काटकर दूसरे टाँग की पिंडली पहले की नळकी में पिरो देने से जो कमन्धा बन गया था उसमें अपनी बांह का अग्रभाग डालकर उसने खरहा को भुजा पर टाँग लिया था। नाक से बहते हुए लाल रक्त से सना हुआ खरहे का सिर नीचे की ओर लटक रहा था और झूलते हुए शरीर के खिंच जाने के कारण सामने की ओर पेट पर के मुलायम सफेद रोओं की धारी साफ दिखाई देती थी। धनुष के निचले कोर के निकले भाग द्वारा कण्ठ छेद कर उसमें एक तीतर लटकाया हुआ था, जिसकी चोंच के भीतर का ऊपरी तालु दिखाई पड़ रहा था। खरहे और तीतर उसके शिकार की बानगी की मूठ जान पड़ते थे। उनके दाहिने हाथ में विष से

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