भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 506 में से

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अष्टम उच्छ्वासः ४०७ शुष्किम्ना शशेन शिताटनीशिखाप्रमथितग्रीवेण चापावृतचञ्चुत्तानताम्रता- लुना तित्तिरिणा वर्णकमुष्टिमिव मृगयाया दर्शयन्तम्, विषमविषदूषितव- दनेन च विकर्णेन कृष्णाहिनेव मूलगृहीतेन व्यग्रदक्षिणकराग्रम्, जङ्गम- मिव गिरितटतमालपादपम्, यन्त्रोल्लिखितमश्मसारस्तम्भमिव भ्रमन्तम्, अञ्जनशिलाच्छेदमिव चलन्तम्, अयःसारमिव गिरेर्विन्ध्यस्य गलन्तम्, पाकलं करिकुलानाम्, कालपाशं कुरङ्गयूथानाम्, धूमकेतुं मृगराजचक्रा- णाम्, महानवमीमहं महिषमण्डलानाम्, हृदयमिव हिंसायाः, फलमिव पापस्य, कारणमिव कलिकालस्य, कामुकमिव कालरात्रेः, शबरयुवानमा- दायाजगाम। दूरे च स्थापयित्वा विज्ञापयांबभूव—'देव ! सर्वस्यास्य विन्ध्यस्य स्वामी सर्वपल्लीपतीनां प्राग्रहरः शबरसेनापतिर्भूकम्पो नाम । तस्यायं निर्घातनामा स्वस्रीयः सकलस्यास्य विन्ध्यकान्तारारण्यस्य पर्णा- नामप्यभिज्ञः किमुत प्रदेशानाम् । एनं पृच्छतु देवो योऽग्योऽयमाज्ञां कर्तुम्।' इति कथिते च निर्घातस्तु क्षितितलनिहितमौलिः प्रणाममकरोत् । उप- निन्ये च तित्तिरिणा सह शशोपायनम् । अवनिपतिस्तु संमानयन्स्वयमेव तमप्राक्षीत्—'अङ्ग ! अभिज्ञा यूयमस्य सर्वस्योद्देशस्य ? विहारशीलाश्च दिवसष्वेतेषु भवन्तः ? सेनापतेर्वाऽन्यस्य वा तदनुजीविनः कस्यचिदुदा- रूपा नारी न गता भवेद्दर्शनगोचरम् ?' इति । बुझी हुई नोंक वाला बाण था, मानों पूँछ से पकड़ा हुआ काला नाग हो। पर्वतीय प्रदेश का वह चलता-फिरता तमालवृक्ष था। वह खराद पर चढ़ाकर बना घुमता हुआ लौह- स्तम्भ था। चलता हुआ अञ्जनशिला का टुकड़ा था। खान से ढलता हुआ विन्ध्याचल का लोहा था। वह हाथियों के लिये ज्वर, हिरनों के लिए कालपाश, सिंहों के लिए धूमकेतु, भैसों के लिए दुर्गानवमी का उत्सव (जिसमें भैंसे बलि चढ़ाए जाते हैं) था। वह साक्षात् हिंसा का हृदय, पाप का फल, कलियुग का कारण, कालरात्रि का पति जैसा लग रहा था। व्याघ्रकेतु ने उस शबर युवक को दूर ही ठहरा कर राजा से निवेदन किया—'देव, समस्त विन्ध्यक्षेत्र का स्वामी और पल्लीपतियों में श्रेष्ठ भूकम्प नाम का शबर सेनापति है। निर्घात नाम का यह उसी का भांजा है जो समस्त विन्ध्याचल के जङ्गल के पत्ते-पत्ते की खबर रखता, प्रदेशों की तो बात ही क्या ? देव इससे जो पूछें यह आज्ञापालन के योग्य है। उसके यह कहने पर निर्घात ने धरती पर सिर टेक कर प्रणाम किया और तीतर के साथ खरहे को भेंट के रूप में समीप में रख दिया। राजा ने उस भेंट

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