भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

४०८ हर्षचरितम् निर्घातस्तु भूपालालापनप्रसादेनात्मानं बहुमन्यमानः प्रणाम, दर्शि- तादरं च व्यज्ञापयत्—'देव ! प्रायेणात्र हरिण्योऽपि नापरिगताः संचरन्ति सेनापतेः, कुत एव नार्यः ? नाप्येवंरूपा काचिदबला । तथापि देवादेशा- दिदानीमन्वेषणं प्रति प्रतिदिनमनन्यकृत्यैः क्रियते यत्नः । इतश्चार्धगव्यू- तिमात्र एव मुनिमहिते महति महीधरमालामूलरुहि महीरुहां षण्डेऽपि पिण्डपाती प्रभूतान्तेवासिपरिवृतः पाराशरी दिवाकरमित्रनामा गिरिनदी- माश्रित्य प्रतिवसति, स यदि·विन्देद्वार्ताम्' इति । तच्छ्रुत्वा नरपतिर- चिन्तयत्—'श्रूयते हि तत्रभवतः सुगृहीतनाम्नः स्वर्गतस्य ग्रहवर्मणो बालमित्रं मैत्रायणीयस्त्रयीं विहाय ब्राह्मणायनो विद्वानुत्पन्नसमाधिः सौगते मते युवैव काषायाणि गृहीतवान्' इति । प्रायशश्च जनस्य जनयति सुहृदपि दृष्टो भृशमाश्वासम् । अभिगमनीयाश्च गुणाः सर्वस्य । कस्य न प्रतीद्यो मुनिभावः । भगवती च वैधेयेऽपि धर्मगृहिणी गरिमाणमापाद- पाराशरी भिक्षुः । विन्देल्लभेत् । मैत्रायणीयः शाखाया अध्येता । 'ऋग्यजुः- सामनामाथ त्रयी वेदत्रयः स्मृताः' । ब्राह्मणायनो द्विजवरिष्ठः । समाधिरेका- ग्रता । अभिगमनार्हा अभिगमनीयाः । प्रतीद्यः पूज्यः । वैधेये मूर्खे । उक्तं च— 'अज्ञे मूढयथाजातमूर्खवैधेयबालिशाः' इति । का सम्मान करते हुए स्वयं पूछा—'भाई, तुम इस समस्त प्रदेश की जानकारी रखते हो ? और इन दिनों यहीं घूमते रहे हो । क्या तुम्हारे सेनापति या उसके किसी दूसरे अनुचर के देखने में एक सुन्दर स्त्री इधर आई है ?' निर्घात राजा के साथ बातचीत करने की प्रसन्नता से अपने आपको धन्य मानता हुआ प्रणाम करके आदरपूर्वक बोला—'देव, सेनापति के अनजाने में हरिणी भी जब नहीं घूमतीं तो नारियों की बात ही क्या ! इस तरह की कोई अबला इस जङ्गल में नहीं, फिर भी आपके आदेश से अब सब काम छोड़कर उसे ढूँढ़ने का प्रयत्न होगा । यहाँ से एक कोस की दूरी पर पहाड़ की जड़ में वृक्षों के घने झुरमुट में भिक्षावृत्ति से निर्वाह करने वाला, अपने अनेक शिष्यों के साथ दिवाकरमित्र नाम का पाराशरी भिक्षु गिरि नदी के किनारे रहता है । शायद उसे खबर लगी हो ।' यह सुनकर राजा ने सोचा—'मैंने भी सुना है कि आदरणीय सुगृहीतनाम स्वर्गीय गृहवर्मा के बालसखा मैत्रायणी शाखा के अध्येता ब्राह्मणश्रेष्ठ और विद्वान् जिन्होंने चित्तवृत्ति की एकाग्रता प्राप्त कर लेने से प्रव्रज्या ग्रहण कर बौद्ध भिक्षुओं के गेरुवे वस्त्र धारण कर लिये थे ।' ऐसा प्रायः देखा जाता है कि मित्र भी मिलकर हृदय में आश्वासन उत्पन्न कर देता है । सबके गुण अनुसरण के योग्य