हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
४०८ हर्षचरितम् निर्घातस्तु भूपालालापनप्रसादेनात्मानं बहुमन्यमानः प्रणाम, दर्शि- तादरं च व्यज्ञापयत्—'देव ! प्रायेणात्र हरिण्योऽपि नापरिगताः संचरन्ति सेनापतेः, कुत एव नार्यः ? नाप्येवंरूपा काचिदबला । तथापि देवादेशा- दिदानीमन्वेषणं प्रति प्रतिदिनमनन्यकृत्यैः क्रियते यत्नः । इतश्चार्धगव्यू- तिमात्र एव मुनिमहिते महति महीधरमालामूलरुहि महीरुहां षण्डेऽपि पिण्डपाती प्रभूतान्तेवासिपरिवृतः पाराशरी दिवाकरमित्रनामा गिरिनदी- माश्रित्य प्रतिवसति, स यदि·विन्देद्वार्ताम्' इति । तच्छ्रुत्वा नरपतिर- चिन्तयत्—'श्रूयते हि तत्रभवतः सुगृहीतनाम्नः स्वर्गतस्य ग्रहवर्मणो बालमित्रं मैत्रायणीयस्त्रयीं विहाय ब्राह्मणायनो विद्वानुत्पन्नसमाधिः सौगते मते युवैव काषायाणि गृहीतवान्' इति । प्रायशश्च जनस्य जनयति सुहृदपि दृष्टो भृशमाश्वासम् । अभिगमनीयाश्च गुणाः सर्वस्य । कस्य न प्रतीद्यो मुनिभावः । भगवती च वैधेयेऽपि धर्मगृहिणी गरिमाणमापाद- पाराशरी भिक्षुः । विन्देल्लभेत् । मैत्रायणीयः शाखाया अध्येता । 'ऋग्यजुः- सामनामाथ त्रयी वेदत्रयः स्मृताः' । ब्राह्मणायनो द्विजवरिष्ठः । समाधिरेका- ग्रता । अभिगमनार्हा अभिगमनीयाः । प्रतीद्यः पूज्यः । वैधेये मूर्खे । उक्तं च— 'अज्ञे मूढयथाजातमूर्खवैधेयबालिशाः' इति । का सम्मान करते हुए स्वयं पूछा—'भाई, तुम इस समस्त प्रदेश की जानकारी रखते हो ? और इन दिनों यहीं घूमते रहे हो । क्या तुम्हारे सेनापति या उसके किसी दूसरे अनुचर के देखने में एक सुन्दर स्त्री इधर आई है ?' निर्घात राजा के साथ बातचीत करने की प्रसन्नता से अपने आपको धन्य मानता हुआ प्रणाम करके आदरपूर्वक बोला—'देव, सेनापति के अनजाने में हरिणी भी जब नहीं घूमतीं तो नारियों की बात ही क्या ! इस तरह की कोई अबला इस जङ्गल में नहीं, फिर भी आपके आदेश से अब सब काम छोड़कर उसे ढूँढ़ने का प्रयत्न होगा । यहाँ से एक कोस की दूरी पर पहाड़ की जड़ में वृक्षों के घने झुरमुट में भिक्षावृत्ति से निर्वाह करने वाला, अपने अनेक शिष्यों के साथ दिवाकरमित्र नाम का पाराशरी भिक्षु गिरि नदी के किनारे रहता है । शायद उसे खबर लगी हो ।' यह सुनकर राजा ने सोचा—'मैंने भी सुना है कि आदरणीय सुगृहीतनाम स्वर्गीय गृहवर्मा के बालसखा मैत्रायणी शाखा के अध्येता ब्राह्मणश्रेष्ठ और विद्वान् जिन्होंने चित्तवृत्ति की एकाग्रता प्राप्त कर लेने से प्रव्रज्या ग्रहण कर बौद्ध भिक्षुओं के गेरुवे वस्त्र धारण कर लिये थे ।' ऐसा प्रायः देखा जाता है कि मित्र भी मिलकर हृदय में आश्वासन उत्पन्न कर देता है । सबके गुण अनुसरण के योग्य
अष्टम उच्छ्वासः ४०६ यति प्रव्रज्या, किं पुनः सकलजनमनोमुषि विदुषि जने । यतो नः कुतू- हलि हृदयमभूत्सततमस्य दर्शनं प्रति प्रासङ्गिकमेवेदमपतितमतिकल्याणं पश्यामः प्रयत्नप्रार्थितदर्शनं जनमिति । प्रकाशं चाब्रवीत्—'अङ्ग ! समुप- दिश तमुद्देशं यत्रास्ते स पिण्डपाती' इति । एवमुक्त्वा च तेनैवोपदिश्य- मानवर्त्मा प्रावर्तत गन्तुम् । अथ क्रमेण गच्छत एव तस्य अनवकेशिनः कुड्मलितकर्णिकाराः, प्रचुरचम्पकाः स्फीतफलेग्रयहः, फलभरभरितनमेरवः नीलदलनलदनारि- केलनिकराः, हरिकेसरसरलपरिकराः कोरकनिकुरम्बरोमाञ्चितकुरबकरा- जयः, रक्ताशोकपल्लवलावण्यलिप्यमानदशदिशः, प्रविकसितकेसररजो- विसरबध्यमानचारुधूसरिमाणः स्वरजः सिकतिलातलकतालाः, प्रविचलि- अथ क्रमेण गच्छत एवास्यैवंविधास्तरवो दर्शनमवतेरुरिति संबन्धः । अवकेशी निष्फलतरुः । उक्तं च—'वन्ध्योऽफलोऽवकेशी च कर्णिकारो द्रुमोत्पलः । परिष्याधः' इति पर्यायः । 'स्यादवन्ध्यः फलेग्रहिः' । नमेरुस्तरुभेदः । 'नलदः सल्लकी मांसी नारिकेलस्तु लाङ्गली' इत्यमरः (?) । हरिकेसरः । उक्तं च—'चाम्पेयः केसरो नागकेसरः काञ्चनाह्वयः' । सरला देवदारवः । कोरकः कलिका । कुरबका ये योषि- तामालिङ्गनैः पुष्यन्ति । रक्ताशोका ये सालक्तककामिनीचरणहताः फुल्लन्ति । केसरा बकुलाः । ये कान्तागण्डूषशीधुसेकेन विकसन्ति । तिलकाः क्षुरकाः । ये हैं और भिक्षु का वेष किसका पूज्य नहीं ! धर्म का घरनो भगवती प्रव्रज्या जब मूर्ख व्यक्ति में भी गौरव उत्पन्न कर देती है तो समस्त जन के चित्त को हर लेने वाले विद्वान् की क्या बात है जो हमारा हृदय उनके दर्शनों के लिए कुतूहल से भर गया है । हम प्रयत्न से दर्शन देने वाले उनको ( दिवाकरमित्र को ) प्रसङ्गतः प्राप्त अपने कल्याण के रूप में देखते हैं । उन्होंने कहा—'भाई, वे भिक्षु जहाँ हों, उस स्थान को बताओ ।' यह कहकर निर्घात के द्वारा बताए गये मार्ग पर चलने लगे । उसके साथ मार्ग में चलते हुए ही हर्ष ने फले-फूले अनेक वृक्षों पर दृष्टिपात किया । कर्णिकार कोढ़ी ले रहे थे । चम्पक फलों से लद गए थे । नमेरु फलों के भार से झुक गये थे । साँवले पत्तों वाले सल्लकी और नारियल के पेड़ झुण्ड के झुण्ड थे । नागकेसर और सरल चारों ओर छाए हुए थे, कुरबक वृक्षों की कोंदियाँ उनके रोमाञ्च की भाँति निकल रही थीं । रक्ताशोक के पल्लवों की लाली दिशाओं में जैसे लिप रही थी । खिले हुए केसरवृक्षों के पराग उड़कर वन को धूसर कर रहे थे । तिलकवृक्षों के पराग बालू के
४१० हर्षचरितम् तहिङ्गवः, प्रचुरपूगफलाः, प्रसवपूगपिङ्गलप्रियङ्गवः, परागपिञ्जरितमञ्जरी- पुञ्जायमानमधुपमञ्जुरिशञ्जानितजनमुदः, मदमलमेचकितमुचुकुन्दरस्क- न्धकाण्डकथ्यमाननिःशङ्ककरिकरटकण्डूतयः, उड्डीयमाननिःशङ्कचटुलकृ- ष्णशारशावसकलशाद्वलसुभगभूमयः, तमःकालतमालमालामीलिता- तपाः, स्तबकदन्तुरितदेवदारवः, तरलताम्बूलीस्तम्बजालकितजम्बूजम्भी- रवीथयः, कुसुमरजोधवलधूलीकदम्बचक्रचुम्बितव्योमानः, बहलमधुमो- क्षोक्षितक्षितयः, परिमलघटितघनघ्राणतृप्तयः; कतिपयदिबससूतकुकुटी- कुटीकृतकुटजकोटराः, चटकासंचार्यमाणवाचाटचाटकैरिक्रियमाणचाटवः, सहचरीचारणचञ्चरचकोरचञ्चवः, निर्भयभूरिभुरुण्डभुज्यमानपाककपिल- प्रसादिकामिनीदर्शनमात्रेण कुसुमिताः संपद्यन्ते । हिङ्गु रामठम् । उक्तं च— ‘सहस्रवेधि जतुकं बाहीकं हिङ्गु रामठम्’ इति । पूगः क्रमुकवृक्षः । प्रसवपूगाः पूग- फलसमूहाः । प्रियङ्गु श्यामलता । ‘श्यामा तु वनिताह्वया । लता गोबन्धनी गुन्द्रा प्रियङ्गुः फलिनी फली । विष्वक्सेना गन्धफली कारम्भः प्रियकश्च सः ॥’ पुञ्जमानः संहियमाणः । मुचुकुन्दः पुष्पतरुभेदः करटौ गण्डौ । तमालस्तापिच्छः । उक्तं च—‘शक्रपादपः पारिभद्रकः । भद्रदारु द्रुकिलिमं पीतदारु च दारु च । पूतिकाष्ठं च सप्त स्युर्देवदारुणि’ इति । ताम्बूली नागवल्ली । जम्बू वृक्षभेदः । जम्भीरा दन्त- शठाख्याः । उक्तं च—‘स्युर्जम्बीरे वृन्दशठजम्भजम्भीरजम्भलाः’ इति । ‘समीरणो मरुवकः प्रस्थपुष्पः फणिज्जकः । जम्भीरे’ इति । धूलीकदम्बाख्या ग्रैष्मिका वृक्ष- भेदाः । कुटजो गिरिमल्लिका । उक्तं च—‘कुटजो गिरिमल्लिका’ इति । चटकाया अपत्यानि चाटकैराः । चारणं भोजनम् । चञ्चुरा निपुणाः । भुरुण्डाः पक्षिभेदाः । समान भर गये थे । हींग हवा से हिल रहे थे । सुपारी के फल खूब लगे थे । प्रियङ्गुलतायें सुपारी के फूलों से पीली लग रही थीं । पराग से भरी पीली मञ्जरियों पर लदे हुए भौंरे की सुन्दर गुञ्जार सुनकर लोग प्रसन्न हो रहे थे । मुचुकुन्द के वृक्षों में लगे हुए मद के मलिन चित्ते स्पष्ट बता रहे थे कि हाथियों ने निःशङ्क होकर अपने कुम्भस्थल की खुजान मिटाई है । घास की हरियाली से भरी जमीन पर चञ्चल हिरन के बच्चे कुलांचे मार रहे थे । अन्धकार के समान कृष्ण वर्ण बाले तमालवृक्षों से आतप नष्ट हो गया था । देवदारु वृक्षों में गुच्छे निकल आए थे । जामुन और जम्मीरी नींबू के वृक्षों पर नागवल्ली लतायें लहरा रही थीं । धूलीकदम्बों के फूलों का पराग उड़कर आकाश में व्याप्त हो रहा था । धरती फूलों के मकरन्द से सिंच गई थी । फूलों की गन्ध नाक में भर जाती थी । कुछ ही दिनों की ब्याई हुई कुक्कुटी कुटज के कोटर में बैठी थी । गौरैया चूँ-चूँ करते हुए अपने चुङ्गकों को उड़ाना सिखा रही थी । चकोर अपनी सहचरी को चोंच से चुग्गा
अष्टम उच्छ्वासः ४११ पीलवः, सदाफलकट्फलफलविशसननिःशूकशुकशकुन्तशातितशलाटवः, शैलेयसुकुमारशिलातलसुखशयितशशशिशवः, शेफालिकाशिखाविवरवि- स्त्रब्धविवर्तमानगौधेरराशयः, निरातङ्करङ्कवः, निराकुलनकुलकुलकेलयः, कलकोकिलकुलकवलितकलिकोद्गमाः, सहकारारामरोमन्थायमानचमर- यूथाः, यथासुखनिषण्णनीलाण्डजमण्डलाः, निर्विकारवृकविलोक्यमानपो- तपीतगवयधेनवः, श्रवणहारिसनीडगिरिनितम्बनिर्भरनिनादनिद्रानन्दम- न्दायमानकरिकुलकर्णतालदुन्दुभयः, समासन्नकिन्नरीगीतरवरसमानरुरवः, प्रमुदिततरतरक्षवः, क्षतहरितहरिद्राद्रवरज्यमाननववराहपोतपोत्रवलयः, गुञ्जाकुञ्जगुञ्जज्जाहकाः, जातीफलकसम्प्रशालिजातकवलयः, दशनकुपित- पीलुफलं संसीकम् । कट्फलः श्रीपर्णान्यो वृक्षः । उक्तं च—'श्रीपर्णिका कुमुदिका कुम्भी कैडर्यकट्फलौ' इति । विशसनं भेदनम् । निःशूको निर्दयः । शलाटून्यप- क्कानि फलानि । उक्तं च—'आमे फले शलाटुः स्यात्' इति । शिलासु भवं शैलेयम् । शेफालिका लताभेदः । 'स्त्रियां गौधेरगोधारगौधेया गोधिकात्मजाः' इति । रङ्कवो मृगभेदाः । सहकार आम्रः । उक्तं च—'आम्रश्चूतो रसालोऽसौ सहकारोऽतिसौरभः' इति । रोमन्थायमाना उद्गीर्य चर्वन्तः । चमरा मृगविशेषाः । नीलाण्डजा मृगभेदाः । वृका आरण्यश्वानः । पोतः शिशुः । 'पोतः पाकोऽर्भको डिम्भः पृथुकः शावकः शिशुः' इत्यमरः । गवया गोसदृशाः प्राणिभेदाः । 'तरक्षुस्तु मृगादनः' । हरिद्रा पीतद्रुः । उक्तं च—'अथ पीतद्रुः कालेयकहरिद्रवाः । दार्वी पचंपचा दारु- हरिद्रा पर्जनीत्यपि ॥' वराहः सूकरः । पोत्रं सूकरमुखम् । गुञ्जा रक्तिका । जाहकाः दे रहा था । शुकण्ड पक्षी पके हुए लाल पीलुओं को निःशङ्क होकर खा रहे थे । तोतों के बच्चे शरीफे और कटहल के कच्चे फलों को निठुरता से कुतर कर गिरा रहे थे । पर्वत की चिकनी शिलाओं पर खरहों के बच्चे सुख से सो रहे थे । छिपकली के छोटे बच्चे शेफालिक। की जड़ों की सुराखों में घुस रहे थे । रङ्क नामक मृग निडर घूम रहे थे । नेवले आपस में निराकुल होकर कूद-फाँद कर रहे थे । कूकभरे कोकिल उत्पन्न होती हुई कोंड़ी को निगल जाते थे । चमरु हिरनों के झुण्ड आम के बगीचों में जुगाली कर रहे थे । नीलाण्डज मृग सुखपूर्वक बैठे हुए थे । दूध पीते हुए नीलगाय के बच्चों को पास में बैठे भेड़ियेकुछ कहे बिना देख रहे थे । कानों को सुख पहुँचाने वाली निकट के पर्वत के झरते हुए झरने की आवाज सुनते हुए नींद से माँते ऊँघते हुए हाथियों के कानों के फटफटाने की दुन्दुभि जैसी आवाज धीरे-धीरे कम पड़ती जा रही थी । कहीं रुरु हिरन पास ही में किन्नरियों के संगीत का आनन्द ले रहा था और तेंदुए उन्हें देखकर प्रसन्न हो रहे थे । बनैले सूअरों के बच्चों की थूथनियाँ खोदकर हल्दी के कुटकुटाने से रँग गई थी । झाऊ चूहे गुञ्जा वृक्षों
कपिपोतपेटकपाटितपाटलमुखकीटपुटकाः, लकुचलम्पटगोलाङ्गूललङ्घ्य- मानलवलयः, बद्धवालुकालवालवलयाः, कुटिलकुटावलिवलितवेगगिरिन- दिकास्रोतः, निबिडशाखाकाण्डलम्बमानकमण्डलयः, सूत्रशिक्यासक्त- रिक्तभिक्षाकपालपल्लवितलतामण्डपाः, निकटकुटीकृतपाटलमुद्राचैत्यक- मूर्तयः, चीवराम्बररागकषायोदकदूपितोद्देशाः, मेघमया इव कृतशिखण्डि- कुलकोलाहलाः, वेदमया इवापरिमितशाखाभेदगहनाः, माणिक्यमया इव महानीलतनवः, तिमिरमया इव सकलजननयनमुषः, यामुना इवो- र्ध्वीकृतमहाह्रदाः, मरकतमणिश्यामलाः क्रीडापर्वतका इव वसन्तस्य, अञ्जनाचला इव पल्लविताः, तनया इवाटवीजाता विन्ध्यस्याद्रेः, पालाला- शालिजातकाश्च प्राणिभेदाः । पाटलाः कीटाः । पुटका आलयाः । 'लकुचो लिकुचो ड्डुहुः' इत्यमरः । गोलाङ्गूलाः कृष्णमुखवानराः । लवलयो लताभेदः । कमण्डलु- र्मुनिजलभाण्डम् । शिक्यं भिक्षाभाजनम् । जालिका निकटकुटीषु कृताः । मुद्रया कृतानामल्पचैत्यानां मूर्तयो येषु । शाखा लताः, कठाद्याश्च । महानीला अत्यन्त- कृष्णाः, महानीलाश्च प्राणिभेदाः । नयनमुषो रम्यत्वात्, प्रकाशनाच्च । प्रतिप्रस्रवकाः प्रतिच्छन्दकाः । के कुंजों में गूँज रहे थे । जायफल के नीचे शालिजातक नामक पशु सोए थे । लाल ततैयों के डङ्क मारने से कुपित हुए बन्दरों ने उनके छत्तों को नोंच डाला था । लंगूर बडुआ के फल खाने के लिए लवली लताओं के इस पार से उस पार कूद रहे थे । पेड़ों के चारों ओर पानी डालने के लिए बालू के थहले बनाए गए थे । टेढ़े-मेढ़े वृक्षों के चारों ओर पहाड़ी नदियों के सोते तेजी से बह रहे थे । मुनियों ने वृक्षों की मोटी शाखाओं में कमण्डलु लटका दिए थे । लतामण्डपों में सूत की बनी हुई सिकहरों पर खाली भिक्षाकपाल रख दिए गए थे । कुटियों के समीप स्तूप या चैत्य की बनी हुई आकृतियों वाली पक्की मिट्टी की लाल मुहरें थीं । चीवर वस्त्रों के धोने से दूर तक वहाँ के जल उनके रस से दूषित हो गए थे । मेघ के सदृश उन वृक्षों पर मोर शोर मचा रहे थे । वेदों जैसी उन वृक्षों की शाखाएँ अपरिमित और गहन थीं । माणिक्य की भाँति वे वृक्ष अत्यन्त नीले (महानील, मणिविशेष ) वर्ण के थे । सारे लोगों की दृष्टि को अन्धकार के समान विफल कर देने वाले थे । महाह्रदों के रूप में मानों यमुना के बड़े-बड़े सरोवर ऊपर उठा दिए गए हों, या मानों जड़ी हुई मरकत मणियों से श्यामवर्ण के वसन्त के क्रीड़ापर्वतक हों, या काले- काले अञ्जन के पर्वत निकल आए हों, जंगलों में उत्पन्न हुए मानों विन्ध्याचल के पुत्र हों,
[Header] अष्टम उच्छ्वासः ४१३
[Top Sanskrit Text] न्धकारराशय इव भित्त्वा भुवमुत्थिताः, प्रतिप्रवेशिका इव वर्षावासरा- णाम्, अंशावतारा इव कृष्णार्धरात्रीणाम्, इन्द्रनीलमयाः प्रासादा इव वनदेवतानाम्, पुरस्ताद्दर्शनपथमवतेरुस्तरवः । ततो नरपतेरभवन्मनस्यदूरवर्तिना खलु भवितव्यं भदन्तेनेति । अवतीर्य च गिरिसरिति समुपस्पृश्य युगपद्विश्रामसमयसमुन्मुक्तहेषाघो- षबधिरीकृताटवीगहनामस्मिन्नेव प्रदेशे स्थापयित्वा वाजिसेना मवलम्ब्य च तपस्विजनदर्शनोचितं विनयं हृदयेन दक्षिणेन च हस्तेन माधवगुप्त- मंसे विरलैरेव राजभिरनुगम्यमानश्चरणाभ्यामेव प्रावर्तत गन्तुम् । अथ तेषां तरूणां मध्ये नानादेशीयैः स्थानस्थानेषु स्थाणूनाश्रितैः शिलातलेषूपविष्टैर्लताभवनान्यध्यावसद्भिररण्यानीनिकुञ्जेषु निलिनैर्विटप- च्छायासु निषण्णैस्तरुमूलानि निषेवमाणैर्वीतरागैरार्हतैर्मस्करिभिः श्वेत-
[Middle Commentary / Tika] भदन्त इति सौगतप्रतिमानां पूजावचनम् । उद्यानमित्यन्ये । अथैत्यादौ । तरूणां मध्ये दिवाकरमद्राक्षीदिति संबन्धः । नानादेशीयैर्वीतरागै- रिति चार्हतैरित्यादीनां सर्वेषां विशेषणम् । स्थाणूनाश्रितैरित्यादि तु केषाञ्चित् । 'स्थाणूरस्त्री ध्रुवः शङ्कुः' इत्यमरः । 'महारण्यमरणयानी विस्तारो विटपोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'मूलं वृद्धोऽङ्घ्रि नामकः' । अर्हन्देवता येषां ते आर्हतास्तैर्नग्नक्षपणकैः ।
[Bottom Hindi Translation] या मानो पाताल के अन्धकार पृथिवी को फोड़कर बाहर निकल गए हों, अथवा वे मानों वर्षा के दिनों के पड़ोसी हों, या कृष्णपक्ष की अर्धरात्रियों के अंशावतार हों, या इन्द्रनील मणियों के बने वनदेवताओं के प्रासाद हों । तब राजा के मन में हुआ कि अब निश्चय ही भदन्त का आश्रम यहां से दूर नहीं होना चाहिए । यह सोचकर उन्होंने गिरिनदी में उतरकर आचमन किया । उसी प्रदेश में विश्राम के लिए वाजिसेना को, जो अपनी हिनहिनाहट से जंगल को भर रही थी, ठहरा दिया । स्वयं तपस्वियों के दर्शन के उचित विनय को हृदय से धारण किया । माधवगुप्त के कन्धे पर दाहिना हाथ रख और साथ में कुछ राजाओं को ले पैदल ही चल पड़े । उन वृक्षों के बीच में शिष्यभाव से नाना देशों से आए हुए अनेक वीतराग लोगों को देखा । जगह-जगह पर उनमें कुछ लोग लकड़ी के खूठों पर बैठे थे । कुछ चट्टानों पर विराजमान थे । कुछ लताभवनों में बैठे हुए थे । कुछ जंगल के झुरमुटों में छिपकर बैठे थे । कुछ वृक्षों की छाया में जम गए थे । कुछ वृक्षों की जड़ों पर आसन जमा चुके थे । वे वीतराग आर्हत ( जैन साधु ), मस्करी ( पाशुपतमतानुयायी ), श्वेतपट ( सेवड़ा,
४१४ हर्षचरितम् पटैः पाण्डुरभिक्षुभिर्भागवतैर्वर्णिभिः केशलुञ्चकैः कापिलेजैनेर्लोकायतिकैः काणादैरौपनिषदैरैश्वरकारणिकैः कारन्धमिभिर्धर्मशास्त्रिभिः पौराणिकैः साप्ततन्तवैः शाब्दिकैः पाञ्चरात्रिकैरन्यैश्च स्वान्स्वान्सिद्धान्ताञ्छृण्व- द्भिरभिमुक्तैश्चिन्तयद्भिश्च प्रत्युच्चरद्भिश्च संशयानैश्च निश्चिन्वद्भिश्च- व्युत्पादयद्भिश्च विवदमानैश्चाभ्यस्यद्भिश्च व्याचक्षाणैश्च शिष्यतां प्रतिपन्नैर्दूरदेवावेद्यमानम्, अतिविनीतैः कपिभिरपि चैत्यकर्म कुर्वा- णैस्त्रिशरणपरैः परमोपासकैः शुकैरपि शाक्यशासनकुशलैः कोशं समुपदिशद्भिः शिक्षापदोपदेशदोषोपशमशालिनीभिः शारिकाभिरपि धर्मदेशनां दर्शयन्तीभिरनवरतश्रवणगृहीनालोकैः कौशिकैरपि मस्करिभिः परिव्राजकैः । श्वेतपटैः श्वेतोर्णाकम्बलवासोभिः, नग्नक्षपणकभेदैः । पाण्डुरभिक्षुभिस्स्त्यक्तकाषायैः । भागवतैर्विष्णुभक्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । केश- लुञ्चनैर्यथार्थनामभिः । लोकायतिकैश्चार्वाकैः । जैनैर्बौद्धैः । कापिलैः सांख्यैः । काणा- दैर्वैशेषिकतार्किकैः । औपनिषदैर्वेदान्तवादिभिः । ऐश्वरकारणिकैनैयायिकैः । कार- न्धमिभिर्धातुवादिभिः । पाषण्डभेदैरित्यन्ये । धर्मशास्त्रिभिः स्मृतिज्ञैः । शाब्दिकै- र्वैयाकरणैः । पाञ्चरात्रिकैर्वैष्णवभेदैः । सिद्धान्तानागमान् । त्रिशरणेति । त्रयो बुद्ध- धर्मसंघाः । शाक्यो बुद्धः । कोशो बौद्धसिद्धान्तो वसुबन्धुकृतः । देशना कथनम् । श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के साधु ), पाण्डुर भिक्षु ( आजीवक ), भागवत, वर्णी ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी साधु ), केशलुञ्चक ( केशों का लोच करने वाले जैन साधु ) , कापिल ( कपिल- मतानुयायी सांख्य ), जैन, लोकायतिक ( चार्वाक ), काणाद ( वैशेषिक ), औपनिषद ( उपनिषद् या वेदान्तदर्शन के ब्रह्मवादी दार्शनिक ), ऐश्वरकारणिक ( नैयायिक ), कार- न्धमी ( धातुवादी या रसायन बनाने वाले ), धर्मशास्त्री ( मन्वादि स्मृतियों के अनुयायी ), पौराणिक, साप्ततन्तव ( यज्ञवादी मीमांसक ), शाब्दिक ( शब्दब्रह्म के अनुयायी वैयाकरण दार्शनिक ), पाञ्चरात्रिक ( पञ्चरात्र संज्ञक प्राचीन वैष्णवमत के अनुयायी ) और इनके अतिरिक्त और भी लोग अपने-अपने आगमों का पूरी लगन के साथ श्रवण, मनन, आवृत्ति, संशय, निश्चय, व्युत्पत्ति, विवाद और अभ्यास के द्वारा व्याख्यान कर रहे थे । दूर ही से देखकर प्रतीत हो जाता था कि यह मदन्त का निवास है। वहां अत्यन्त विनीत शिष्य की भाँति वानर भी चैत्यवन्दनकर्म में तत्पर रहते थे, शुक पक्षी भी बुद्ध, धर्म, संघ इन तीन रत्नों की शरण में जाते थे और परम उपासक एवं शाक्यशासन में कुशल विद्वान् होकर वसुबन्धुकृत अभिधर्मकोश का उपदेश देते थे । सारिकाएं भी भगवान् बुद्ध के बताए हुए दस शीलों के शिक्षापदों के उपदेश द्वारा दोष का मार्जन करके धर्म देशना
अष्टम उच्छ्वासः ४१५ बोधिसत्त्वजातकानि जपद्भिर्जातसौगतशीलशीतलस्वभावैः शार्दूलैर- प्यमांसाशिभिरुपास्यमानम् , आसनोपान्तोपविष्टविस्रब्धानेककेसरिशाव- कतया मुनिपरमेश्वरम् , अकृत्रिम इव सिंहासने निषण्णम्, उपशममिव पिबद्भिर्वनहरिणैर्जिह्वालताभिरुपलिह्यमानपादपल्लवम् , वामकरतलनिविष्टेन नीवारमश्नता पारावतपोतकेन कर्णोत्पलेनेव प्रियां मैत्रीं प्रसादयन्तम् , इतरकरकिसलयनखमयूखलेखाभिर्जनितजनव्यामोहम् , उद्ग्रीवं मयूरं मरकतमणिकरकमिव वारिधाराभिः पूरयन्तम् , इतस्ततः पिपीलकश्रे- णीनां श्यामाकतण्डुलकणान्स्वयमेव किरन्तम् , अरुणेन चीवरपटलेन म्रदीयसा संवीतम् , बहलबालातपानुलिप्तमिव पौरंदरं दिग्भागम् , उल्लि- खितपद्मरागप्रभाप्रतिमया रक्तावदातया देहप्रभया पाटलीकृतानां काषा- यग्रहणमिव दिशामप्युपदिशन्तम् , अनौद्धत्यादधोमुखेन मन्दमुकुलित- बोधिः समाधिः । तत्प्रधानसत्त्वं बुद्धभट्टारकः । तदीयानि जातकानि जीमूतवाह- नादिजन्मकथाः । मुनिपरमेश्वरम् मुनीश्वरं बुद्धम् । अपकारिण्यभिप्रीतिमैत्री । पिपीलकः कीटभेदः । चीवरं मुनिवासः । संवीतमाच्छादितम् । उल्लिखितश्चरणो- ( धर्मोपदेश ) करती थीं। उल्लू पक्षी भी बोधिसत्त्व की जातक कहानियों को हमेशा सुन रहे थे और उनसे आलोक ग्रहण कर रहे थे। व्याघ्र भी भगवान् बुद्ध का शील पालन करते थे और उनका स्वभाव शान्त बन गया था, और कभी भी मांस का आहार नहीं करते थे । इस प्रकार वहां भदन्त की सेवा हो रही थी। उनके आसन के दोनों ओर कई सिंहशावक विस्रब्धभाव से बैठे हुए थे। ऐसा लग रहा था मानों साक्षात् मुनि परमेश्वर भगवान् बुद्ध ही सिंहासन पर विराजमान हों। वनहरिन उनके पैर चाट रहे थे, मानों उनके शमभाव का पान कर रहे हों। उनके बायें हाथ पर बैठा हुआ कबूतर का बच्चा धान कुटरा रहा था, मानों अपने-अपने कर्णोत्पल के द्वारा प्रियामैत्री-भावना का प्रसादन कर रहे थे। उनके दाहिने हाथ के नखों की किरणें लोगों को चकाचौंध में डाल देती थीं। मरकत के कमण्डलु की भाँति गर्दन ऊपर उठाए मयूर को जलधारा से नहला रहे थे। इधर उधर स्वयं जाकर चींटियों के लिए सांवा की खुद्दी छींट रहे थे। लाल और मुलायम संघाटी ओढ़े हुए थे, मानों प्रातःकाल अरुणाई से भरा पूर्व का दिग्भाग हो। खराद पर चढ़े हुए पद्मराग के समान लाल और उज्ज्वल अपनी देह की प्रभा से दिशाओं को पाटल बना रहे थे, मानों उन्हें भी काषाय वस्त्र धारण करने के लिए उपदेश कर रहे हों । थोड़े मुकुलित कुमुद की भाँति उनकी स्निग्ध, धवल और प्रसन्न आँखें अनौद्धत्य के कारण झुकी हुई थीं मानों संसारी क्षुद्र जन्तुओं के जीवन के लिए अमृत की वर्षा कर रहे थे। उनका
४१६ हर्षचरितम् कुमुदाकरेण स्निग्धधवलप्रसन्नेन चक्षुषा जनक्षुण्णक्षुद्रजन्तुजीवनार्थममृत- मिव वर्षन्तम् , सर्वशास्त्राक्षरपरमाणुभिरिव निर्मितम् , परमसौगतमप्य- बलोकितेश्वरम् , अस्खलितमपि तपसि लग्नम् , आलोकमिव यथावस्थि- तसकलपदार्थप्रकाशकं दर्शनार्थिनाम् , सुगतस्याप्यभिगमनीयम् , अवध- र्मस्याप्याराधनीयमिव, प्रसादस्यापि प्रसादनियमिव, मानस्यापि मान- नीयमिव, वन्द्यत्वस्यापि वन्दनीयमिव, आत्मनोऽपि स्पृहणीयमिव, ध्यानस्यापि ध्येयमिव, ज्ञानस्यापि ज्ञेयमिव, जन्म जपस्य, नेमिं निय- मस्य, तत्त्वं तपसः, शरीरं शौचस्य, कोशं कुशलस्य, वेश्म विश्वासस्य, सद्वृत्तं सद्वृत्ततायाः, सर्वस्वं सर्वज्ञतायाः, दाक्ष्यं दाक्षिण्यस्य, पारं परानुकम्पायाः, निर्वृतिं सुखस्य, मध्यमे वयसि वर्तमानं दिवाकरमित्रम- द्राक्षीत् । अतिप्रशान्तगम्भीराकारारोपितबहुमानश्च सादरं दूरादेव शिरसा वचसा मनसा च ववन्दे । दिवाकरमित्रस्तु मैत्रीमयः प्रकृत्या विशेषतस्तेनापरेणादृष्टपूर्वेणामानु- षलोकोचितेन सर्वाभिभाविना महानुभावामोगभाजा भ्राजिष्णुना भूपतेर- ङ्गीढः। क्षुद्राः स्वल्पाः । अवलोकितेश्वरनामा बुद्धविशेषोऽपि । अस्खलितमपीति । स्खलितो ह्यन्यत्र लग्नो भवति, सत्त्वभ्रष्टशीलस्तपःस्थश्च । दिवाकरमित्रस्तु तेन भूपतावाकारविशेषेण प्रश्रयेण च युगपच्चक्षुषि चेतसि विद्याशरीर मानों समस्त शास्त्रों के अक्षररूपी परमाणुओं से बना हुआ जान पड़ता था । परमसौगत होते हुए भी वे अवलोकितेश्वर ( एक बोधिसत्त्व ) थे । ( विरोध पक्ष में वह बौद्ध होते हुए भी ईश्वर का दर्शन करने वाला था । ) स्खलित न होते हुए भी वे तपस्या में लग्न थे । वे आलोक के समान दर्शनार्थियों के लिये ठीक-ठीक रूप में समस्त पदार्थों को प्रकाशित कर देते थे । स्वयं बुद्ध से भी वे आदर पाने योग्य थे और स्वयं धर्म से भी पूजा के योग्य थे । वे आत्मा के भी स्पृहा करने योग्य, ध्यान के भी ध्येय, ज्ञान के भी ज्ञेय, जप के जन्म, नियम के नेमि, तपस्या के तत्त्व, पवित्रता के साक्षात् शरीर, कुशल के कोश, विश्वास के गृह, सदाचार के निवास, सर्वज्ञता के सर्वस्व, दाक्षिण्य के दाक्ष्य, दूसरों पर अनुकम्पा से भरे और सुख के प्राप्तिसाधन थे, उनकी अवस्था अधेड़ थी । दिवाकर- मित्र के अति प्रशान्त और गम्भीर आकार को देखकर राजा के मन में सम्मान का भाव उत्पन्न हुआ और राजा ने दूर ही से अपने सिर से, वचन से और मन से उनकी वन्दना की । दिवाकरमित्र स्वभाव से ही मैत्रीभावना से परिपूर्ण थे, फिर भी विशेषरूप से जिसे
[Header] अष्टम उच्छ्वासः ४१७
प्राकृतेनाकारविशेषेण तेन चाभिजात्यप्रकाशकेन गरीयसा प्रश्रयेण चाह्लादितश्चक्षुषी च चेतसि च युगपदमग्रहीत् । धीरस्वभावोऽपि च संपा- दितसंभ्रमाभ्युत्थानः संकलय्य किंचिदुद्गमनकेन विलोलं विलम्बमानं वामांसाच्चीवरपटान्तमुत्क्षिप्य चानेकाभयदानदीक्षादक्षिणे दक्षिणं महा- पुरुषलक्षणलेखाप्रशस्तं स्निग्धमधुरया वाचा सगौरवमारोग्यदानेन राजा- नमनुग्रहीत् । अभ्यनन्दच्च स्वागतगिरा गुरुमिवाभ्यागतं बहु मन्यमानः स्वेनासनेनाडूध्वमत्रेति निमन्त्रयांचकार । पार्श्वस्थितं च शिष्यमब्रवीत्— ‘आयुष्मन् ! उपानय कमण्डलुना पादोदकम्’ इति । राजा त्वचिन्तयत्— ‘अलोहः खलु संयमनपाशः सौजन्यमभिजातानाम् । स्थाने खलु तत्र- भवान्गुणानुरागी ग्रहवर्मा बहुशो वर्णितवानस्य गुणान्’ इति । प्रकाशं चाबभाषे—‘भगवन् ! भवद्दर्शनपुण्यानुगृहीतस्य मम पुनरुक्त इवायमार्य- प्रयुक्तः प्रतिभात्यनुग्रहः । चक्षुःप्रमाणप्रसादस्वीकृतस्य च परकरणमिवा- च आह्लादित आनन्दितः सन्नन्वग्रहीदिति संबन्धः । महानुभावानामुत्तमानाम् । आभोगं टङ्कं भजत इत्याकारविशेषणम् । संकलय्य संयम्य । उद्गमनमुत्थापनम् । आगमनमागतम् , सुखेनागतं स्वागतम् । स्वागतप्रभार्थं गीस्तया अत्रोपविशेति । पहले नहीं देखा था, जो मनुष्य के लिए सम्भव नहीं, सबको अभिभूत कर देने वाला, महानुभावता से ओत-प्रोत, चमकीला और अग्राम्य राजा के उस आकार से और उनकी कुलीनता को व्यक्त करने वाले श्रेष्ठ विनय को देख कर उनकी आंखों में और चित्त में प्रसन्नता भर आई । गम्भीर प्रकृति के होने पर भी व्यग्रता के साथ अपने आसन से उठ कर अनेक जीवों को अभय दान की दीक्षा देने वाले उन्होंने शीघ्रता से उठने के कारण खिसक कर बायें कन्धे से लटकते हुए अपने चीवर समेट लिया और महापुरुष के लक्षणों से युक्त राजा को अपनी स्निग्ध और मधुर वाणी के गौरव के साथ आशीर्वाद देकर अनुगृहीत किया और उचित आवभगत से उनका स्वागत किया एवं गुरु के समान पधारे हुए अभ्यागत को ‘यहां विराजिए’ यह कह कर बड़े आदर के साथ निमंत्रित किया । बगल में बैठे हुए अपने एक शिष्य से बोले—‘आयुष्मन्, चरण पखारने के लिए कमण्डल का जल लाओ ।’ राजा सोचने लगे—‘सचमुच कुलीन पुरुषों का सौजन्य बिना लोहा के बना हुआ बांधने वाला पाश है । गुण के अनुरागी आदरणीय गृहवर्मा ने ठीक ही बहुत से इनके गुणों का वर्णन किया था ।’ तब उन्होंने कहा—‘भगवन्, आपने दर्शन देकर ही मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया । फिर जो आर्य के द्वारा मेरा यह सम्मान है, इससे वह अनुग्रह पुनरुक्त-सा लगता है । जब आपने मुझे नयन-प्रसाद से स्वीकृत किया तो ये २७ ह० च०
४१८ हर्षचरितम् सनादिदानोपचारचेष्टितम् । अतिभूमिर्भूमिरेवासनं भवादृशां पुरः संभा- षणासृताभिषेकप्रक्षालितसकलवपुषश्च मे प्रदेशवृत्तिः । पाद्यमप्यपार्थकम् । आसतां भवन्तो यथासुखम् । आसीनोऽहम्' इत्यभिधाय क्षितावेवोपविशत् । 'अलंकारो हि परमार्थतः प्रभवतां प्रश्रयातिशयः, रत्नादिकस्तु शिला- भारः' इत्याकलय्य पुनः पुनरभ्यर्थ्यमानोऽपि यदा न प्रत्यपद्यत पार्थिवो वचनं तदा स्वमेवासनं पुनरपि भेजे भदन्तः । भूपतिमुखनलिननिहित- निभृतनयनयुगलनिगडनिश्चलीकृतहृदयश्च स्थित्वा कांचित्कालकलां कलि- कालकल्मषकालुष्यमिव क्षालयन्नमलाभिर्दन्तमयूखमालाभिर्मूलफलाभ्यव- हारसंभवमुद्द्रमन्निव च परिमलसुभगं विकचकुसुमपटलपाण्डुरं लतावन- मवादीत्—'अद्यप्रभृति न केवलमयमनिन्द्यो वन्द्योऽपि प्रकाशितसत्सारः संसारः । किं नाम नालोक्यते जीवद्भिरद्भुतं येन रूपमचिन्तितोपनतमिदं दृक्पथमुपगतम् । एवंविधैरनुमीयन्ते जन्मान्तरावस्थितसुकृतानि हृदयो- भूमिमतिक्रान्तातिभूमिः । स्वर्गादिस्थानरूपः प्रदेशवृत्तिः एकदेशो वा । नयनयुगलमेव निगडो बन्धनशृङ्खला । निवृत्तिः चित्तविभ्रमः । आसनादि देने के उपचार मुझे पृथक् करने के समान प्रतीत होते हैं । आप जैसे लोगों के सामने भूमि पर बैठना ही परस्पर बातचीत के अमृताभिषेक से प्रक्षालित शरीर वाले मेरे लिए मर्यादा से बाहर है । चरणोदक भी व्यर्थ है । आप सुख-पूर्वक बिराजें, मैं तो बैठता ही हूँ ।' यह कह कर जमीन पर ही बैठ गए । 'परमार्थतः बड़े लोगों का अलंकार विनयातिशय है, रत्नादिक तो शिलाभार है।' यह सोचकर बार-बार आग्रह करने पर भी जब राजा ने आसन पर बैठना स्वीकार नहीं किया तब फिर भदन्त अपने ही आसन पर विराजमान हुए । कुछ समय तक राजा के मुख की ओर अविचल दृष्टि से देखते रहे, मानों उनका हृदय जंजीर में बँध कर निश्चल हो गया था । तब वे अपने निर्मल दांतों की किरणों से कलिकाल के पापजन्य कालुष्य को मानों प्रक्षालित करते हुए और फल एवं मूल के आहार करने से मुँह से परि- मल भरा, खिले हुए पुष्पों से उज्ज्वल लतावन का दृश्य उत्पन्न करते हुए वे बोले—'आज तक सज्जनों के उत्कर्ष को प्रकाश में लाने वाला यह संसार केवल अनिन्द्य ही नहीं, बल्कि वन्दनीय भी है । जीवित रहने वाले लोग कौन-सा आश्चर्य नहीं देख लेते ! उदा- हरण के रूप में बिना सोचे ही यह रूप हमारी आँखों का गोचर हो गया । हृदय के इन्हीं आनन्दों से लोग जन्मान्तर के पुण्यों का अनुमान करते हैं । हमारे इस तपस्या के क्लेश ने इस जन्म में भी असुलभदर्शन देवानांप्रिय आपके दर्शन के रूप में फल दे दिया ।
अष्टम उच्छ्वासः ४१६ त्सवैः । इहापि जन्मनि दत्तमेवास्माकममुना तपःक्लेशेन फलमसुलभद- र्शनं दर्शयता देवानांप्रियम् । आ तृप्तेरापीतममृतमीक्षणाभ्याम् । जातं निरुत्कण्ठं मानसं निवृत्तिसुखस्य । महद्भिः पुण्यैर्विना न विश्राम्यन्ति सज्जने त्वादृशि दृशः । सुदिवसः स त्वं यस्मिञ्जातोऽसि । सा सुजाता जननी या सकलजीवलोकजीवितजनकमजनयदायुष्मन्तम् । पुण्यवन्ति पुण्यान्यपि तानि येषामसि परिणामः । सुकृततपसस्ते परमाणवो ये तव परिगृहीतसर्वावयवाः । तत्सुभगं सौभाग्यमाश्रितोऽसि येन । भव्यः स पुरुषभावो भवत्यवस्थितो यः । यत्सत्यं मुमुक्षोरपि मे पुण्यभाजमालोक्य पुनः श्रद्धा जाता मनुजजन्मनि । नेच्छद्भिरप्यस्माभिर्दृष्टः कुसुमायुधः । कृतार्थमद्य चक्षुर्व॑नदेवतानाम् । अद्य सफलं जन्म पादपानां येषामसि गतो गोचरम् । अमृतमयस्य भवतो वचसां माधुर्यं कार्यमेव । अस्य त्वीदृशे शैशवे विनयस्योपाध्यायं ध्यायन्नपि न संभावयामि भुवि । सर्वथा शून्यं आसीदजाते दीर्घायुषि गुणग्रामः । धन्यः स भूभृद्यस्य वंशे मणिरिव मुक्तामयः संभूतोऽसि । एवंविधस्य च पुण्यवतः कथंचित्प्राप्तस्य केन अमृतमयस्येति यतोऽमृतमयस्त्वमतो भवद्वचसां माधुर्यं कार्यं प्रयोज्यं कारणसदृशेन कार्येण भवितव्यमित्युक्तेः । शून्यः निराश्रयः । वंशो वेणुरपि । मुक्तामयस्त्यक्तदोषः, तृप्ति पर्यन्त मेरी आँखों ने आज अमृत का पान किया । अब चित्त में निर्वाण के सुख की उत्कण्ठा नहीं रही । अगर बहुत अधिक पुण्य न हो तो आप जैसे सत्पुरुषों पर दृष्टिपात करने का अवसर नहीं मिलता । वह दिन बड़ा ही अच्छा होगा जिस दिन आपका जन्म हुआ होगा । वह जननी सच्चे अर्थ में जननी है, जिसने समस्त जीवलोक के प्राण भायु- ष्मान् को जन्म दिया । वे पुण्य भी सचमुच पुण्यवान् हैं, जिनके फलस्वरूप तुम हो । जो परमाणु तुम्हारे अङ्ग-अङ्ग के बनने में लगाए गए हैं, निश्चय ही उन्होंने खूब तपस्या की होगी । वह सौभाग्य बड़ा ही शोभन होगा, जिसके आश्रय में तुम हो । वह पौरुष बड़ा ही भव्य है जो तुममें रहता है । सचमुच मुझ मुमुक्षु की भी पुण्यवान् आपको देख- कर मनुष्य के जन्म में श्रद्धा होती है । इच्छा न रखते हुए भी हमने आज कामदेव को साक्षात् देख लिया । आज देवताओं की आँखें कृतार्थ हो गईं । आज वृक्षों का भी जन्म सफल हुआ, जिनके सामने तुम गए । अमृतमय आपकी बातों में माधुर्य का होना स्वाभा- विक है । इस प्रकार के शैशवकाल में भी इस विनय की शिक्षा देने वाले आचार्य को पृथिवी भर में ढूँढ़ कर प्राप्त करना मुश्किल है । दीर्घायु आपकी उत्पत्ति के पूर्व सर्वथा गुणों का समूह किसी काम का न था । वह राजा धन्य है जिसके वंश में मणि की भाँति आप
४२० हर्षचरितम् प्रियं समाचराम इति पारिप्लवं चेतो नः। सकलवनचरसार्थसाधारणस्य कन्दमूलफलस्य गिरिसरिदम्भसो वा के वयम्। अपरोपकरणीकृतस्तु कायकलिरयमस्माकम्। सर्वस्वमवशिष्टमिष्टातिथ्याय। स्वायत्ताश्च विद्यन्ते विद्याबिन्दवः कतिचित्। उपयोगं तु न प्रीतिर्विचारयति। यदि च नोप- रुणद्धि कंचित्कार्यलवमरक्षणीयाक्षरं वा कथनीयं तत्कथयतु भवान् स श्रोतुमभिलषति हृदयं सर्वमिदं नः। केन कृत्यातिभारेण भव्यो भूषित- वान्भूमिरिमेतामभ्रमणयोग्याम्? कियदवधिर्वाऽयं शून्याटवीपर्यटनक्लेशः कल्याणराशेः? कस्माच्च संतप्तरूपेष ते तनुरियमसंतापार्हा विभाव्यते?' इति। राजा तु सादरतरमब्रवीत्—'आर्य! दर्शितसंभ्रमेणानेन मधुरसवि- सरममृतमिव हृदयधृतिकरमनवरतं वर्षता वचसैव ते सर्वमनुष्ठितम्। धन्योऽस्मि यदेवमभ्यर्हितमनुपचरणीयमपि मान्यो मन्यते माम्। अस्य मौखिकरूपश्च। पारिप्लवं दोलाधिरूढमित्यर्थः। अनेकदुःखहेतुत्वात्। काय एव कलिः। आरक्षणीयाक्षरमिति। यदस्माकमुपरि विश्वासोऽस्तीत्यर्थः। उत्पन्न हुए हैं। हमारे मन में यह विकलता है कि इस प्रकार के पुण्यवान् आप किसी तरह पधारे हों तो हम आपके योग्य कौन-सा प्रिय करें? जो कन्द, मूल, फल और झरने के जल समस्त वनचरों के लिए सुलभ हैं, उनके देने के अधिकारी ही नहीं। केवल हमारा यह शरीर दूसरे के अधीन नहीं है। प्रिय अतिथि-सत्कार के लिए यह सर्वस्व हमारे पास बचा है। विद्या के कुछ कण ही अपने अधीन रह गए हैं। हमारी प्रीति उनका कोई उपयोग नहीं समझती। यदि कोई कार्य की बाधा न हो और बात कहने योग्य हो तो आप उसे कहें, हमारा हृदय वह सब कुछ सुनना चाहता है। भ्रमण के अयोग्य इस भूमि को भव्य आपने किस आवश्यक कार्य से आकर अलंकृत किया है? कल्याणराशि आप इस निर्जन अटवी में कब से पर्यटन का क्लेश उठा रहे हैं? सन्ताप के सहन न करने के योग्य यह आपकी देह किस कारण इस प्रकार कष्ट उठा रही है?' राजा ने आदर के साथ कहा—'आर्य, अमृत के समान निरन्तर मधुरस बरसाने वाले, मेरे प्रति आदर से भरे और हृदय को धैर्य देने वाले आपके इस वचन ने सब कुछ कर दिया। मैं धन्य हूँ कि मान्य आप उपचार के अयोग्य भी मुझे आदर के योग्य समझते हैं। इस महावन में घूमने का कारण मतिमान् आप सुनें। परिवार के सब इष्ट व्यक्तियों के नष्ट हो जाने के बाद मेरे जीवन का एकमात्र सहारा मेरी छोटी बहन बची थी, वह भी पति के वियोग से और शत्रु के द्वारा पकड़े जाने के भय से मारी-मारी किसी
च महावनभ्रमणपरिक्लेशस्य कारणमवधारयतु मतिमान् । मम हि विनष्ट- निखिलेष्टबन्धोर्जीवितानुबन्धस्य निबन्धनमेकैव यवीयसी स्वसावशेषा । सापि भर्तुर्विद्योगाद्धैरिपरिभवभयाद्भ्रमन्ती कथमपि विन्ध्यवनमिदम्, अशुभशबरबलबहुलम्, अगणितगजकुलकलिलम्, अपरिमितमृगपति- शरभभयम्, उद्दामहिषमुषितपथिकगमनम्, अतिनिशितशरकुशपरुषम्, अवटशतविषममविशत् । अतस्तामन्वेष्टुं वयमनिशं निशि निशि च सततमियामटवीमटामः । न चैनामासादयामः । कथयतु च गुरुरपि यदि कदाचित्कुतश्चिद्वने चरतः श्रुतिपथमुपगता तद्वार्ता' इति । अथ तच्छ्रुत्वा जातोद्वेग इव भदन्तः पुनरभ्यधात्—'धीमन् ! न खलु कश्चिदेवंरूपो वृत्तान्तोऽस्मानुपागतवान् । अभाजनं हि वयमीदृशानां प्रियाख्यानोपायनानां भवताम् ।' इत्येवं भाषमाण एव तस्मिन्नकस्मादा- गत्यापरः शमिनि वयसि वर्तमानः संभ्रान्तरूप इव पुरस्तादुपचिताञ्ज- लिर्जातकरुणः प्रक्षरितचक्षुर्भिक्षुरभाषत—'भगवन्भदन्त ! महत्करुणं वर्तते । बालैव च बलवद्व्यसनाभिभूता भूतपूर्वापि कल्याणरूपा स्त्री
अतिशयेनाल्पा यवीयसी कनिष्ठा । अयोगाद्विच्छेदविधिर्वैधुर्याद्विदं विन्ध्यवनम- निशं प्रविष्टेति पदयोजना । अनिशं सदा । अटवीमटामो गच्छामः ।
प्रकार इस विन्ध्यवन में आ गई, जहाँ दुराचारी शबर निवास करते हैं, असंख्य हाथियों से जो भरा है, जहाँ अनेक सिंहों और शरभों का डर बना रहता है, विकराल भैंसे राहियों को चलने नहीं देते, तीखे बाणों की तरह कुश-काँटे जहाँ बिछे हैं और सैकड़ों खाइयाँ हैं, इसलिए मैं उसे ढूँढ़ने के लिए रात-दिन इस जंगल का चप्पा-चप्पा छान रहा हूँ, पर अभी तक कोई पता नहीं मिला । यदि किसी वनचर से आपको कभी कोई समाचार मिला हो तो कृपया बतावें ।' यह सुनते ही भदन्त ने उद्विग्न मन से फिर कहा—'धीमन्, अभी तक ऐसा कोई वृत्तान्त मुझे नहीं मिला है। मैं इस प्रकार के प्रिय वृत्तान्त के उपहार आपको अर्पित करने के योग्य नहीं ।' जब वे यह कह ही रहे थे कि अकस्मात् एक अन्य भिक्षु जो शमभाव का उपासक था, सम्भ्रान्त जैसा दौड़ा-दौड़ा आया और हाथ जोड़कर करुणा से रोते हुए बोला—'भगवन्, भदन्त, अत्यन्त दुःख का विषय है। कोई एक अत्यन्त सुन्दरी बाल अवस्था की स्त्री विपत्ति में पड़ी हुई शोक के आवेश से अग्नि में जलने के लिए तैयार है । जब तक वह अपने प्राणों का परित्याग नहीं करती, कृपया चलकर उसे
४२२ हर्षचरितम् शोकावेशविवशा वैश्वानरं विशति। संभावयतु तामप्रोषितप्राणां भगवान्। अभ्युपपद्यता समुचितैः समाश्वासनैः। अनुपरतपूर्वं कृमिकीटप्रायमपि दुःखितं दयाराशेरार्यस्य गोचरगतम्' इति। राजा तु जातानुजाशङ्कः सोदर्यस्नेहाद्धान्तर्द्रुत इव दुःखेन दोदूयमान- हृदयः कथमपि गद्गदिकागृहीतकण्ठो विकलवाग्बाष्पायमाणदृष्टिः पप्रच्छ— 'पाराशरिन् ! कियद्दूरे सा योषिदेवंजातीया जीवेद्वा कालमेतावन्तमिति। पृष्टा वा त्वया भद्रे ! कासि, कस्यासि, कुतोऽसि, किमर्थं वनमिदमभ्युप- गतासि, विशसि च किंनिमित्तमनलम् ? इत्यादितश्च प्रभृति कात्स्न्र्येन कथ्यमानमिच्छामि श्रोतुं कथमार्यस्य गता दर्शनगोचरमाकारतो वा कीदृशी' इति। तथाभिहितस्तु भूभुजा भिक्षुराचचक्षे—'महाभाग ! श्रूयताम्—अहं हि प्रत्यूषस्येवाद्य वन्दित्वा भगवन्तमनेनैव नदीरोधसा सैकतसुकुमारेण यदृच्छया विहृतवानतिदूरम्। एकस्मिंश्च वनलतागहने गिरिनदीसमीप- भाजि भ्रमरीणामिव हिमहतकमलाकरकातराणां रुसितं सार्यमाणानाम- यदृच्छया स्वेच्छया सार्यमाणानां श्रुतिरीत्यास्थाप्यमानानां स्वराणां विशिष्टम-
समझायें। उचित आश्वासनों द्वारा अनुग्रह करें। मरने से पूर्व दुःख में पड़े हुए कीड़े-पतंग भी दयाराशि आर्य की करुणा के पात्र हैं।' राजा के मन में बहिन की शंका उत्पन्न हुई। स्नेह के कारण वे जैसे पिघल गए। दुःख से उनका हृदय भर गया और कण्ठ में घिग्घी आने लगी। वाणी में विकलता हो उठी और आँखें आँसू से भर आईं। तब उन्होंने पूछा—'हे पाराशरिन्, कितनी दूर पर वह स्त्री है और इतनी देर तक वह जीवित रह सकेगी ? तुमने क्या उससे पूछा है कि भद्रे, तुम कौन हो ? किसकी हो ? कहाँ की हो ? इस जंगल में किसलिए आ निकली हो ? और किस निमित्त से अग्नि में प्रवेश कर रही हो ? इस प्रकार आदि से लेकर पूरा वृत्तान्त आपके द्वारा सुनना चाहता हूँ। वह कैसे आपको दिखाई पड़ी ? और आकार से कैसी है ?' राजा के ऐसा पूछने पर भिक्षु ने उत्तर दिया—'महाभाग, सुनिए—मैं आज प्रातः भगवान् की वन्दना करके इस नदी के सैकत-सुकुमार तीर पर स्वेच्छा से घूमता हुआ बहुत दूर निकल गया। गिरि नदी के निकट एक लताओं के बने झुरमुट में मैंने बहुत-सी
अष्टम उच्छ्वासः ४२३ तितारतानवर्तिनीनां वीणातन्त्रीणामिव झंकारमेकतानं नारीणां रुदितम- धृतिकरमतिकरुणमाकर्णितवानस्मि । समुपजातकृपञ्च गतोऽस्मि तं प्रदेशम् । दृष्टवानस्मि च दृषदखण्डखण्डिताङ्गुलिगलल्लोहितेन च पाणि- प्रविष्टशरशलाकराल्यशूलसंकोचितचक्षुषा चाध्वनीनश्रमश्वयथुनिश्ञ्चल- चरणेन च स्थाणवव्रणव्यथितगुल्फबद्धभूर्जत्वचा च वातखुडखेदखञ्ज- जङ्घाजातज्वरेण च पांसुपाण्डुरपिच्छकेन च खर्जूरजूटजटार्जर्जरितजानुना च शतावरीविदारितोरुणा च विदारीदारिततनुदुकूलपल्लवेन चोत्कटवंश- विटपकण्टककोटिपाटितकञ्चुककर्पटेन च फललोभावलम्बिताग्रबदरी- लताजालकैरूत्कण्टकैरूल्लिखितसुकुमारकरोदरेण च कुरङ्गशृङ्गोत्खातैः कन्द- वस्थानमेकलोपे द्विलोपे वा । ताना मूर्च्छना वा । वर्णाः स्थायिमञ्चादारोह्यवरोहि- णश्चत्वारस्तदुपलक्षिताः । तन्त्र्यो वर्णतन्त्यः । एकतानमेकरूपम् , अनवरतं वा । दृष्टवानित्यादौ। अस्मि चैवंविधानामबलानां चक्रवालेन परिवृतां योषितं दृष्टवानिति संबन्धः । लोहितं रक्तम् । पाणिः पादाधोदेशः । 'स्थाणुरस्त्री ध्रुवः शङ्कुः ।' 'स्था- णोरिमं स्थाणवः । वातखुडो गतिप्रतिघातलक्षणो वातव्याधिः । पिच्छुकं केश- कलापः । शतावरी शतमूली । विदारी क्षीरशुक्ली । सरला देवदारवः । शोकेन स्त्रियों के रोने का शब्द सुना। जैसे कमलवन के तुषारपात के कारण नष्ट हो जाने से भ्रमरियाँ चीख पड़ी हों, अथवा जैसे अनेक वीणाओं को कोई जोर से झनझना रहा हो, रोने की वह आवाज अत्यन्त उद्विग्न करने वाली और अति करुण थी। मेरे हृदय में करुणा उत्पन्न हुई और मैं उस स्थान पर पहुँचा। उस प्रदेश में जाकर क्या देखता हूँ कि अनेक स्त्रियों से घिरी हुई एक स्त्री दुःख में पड़ी हुई अत्यन्त करुणा से विलाप कर रही है। रोती हुई उन स्त्रियों के पैर की उँगलियाँ पत्थर से ठेस लग जाने के कारण फूट गई थीं और उनसे रुधिर बह रहा था। एड़ी में जंगली काँटों के गड़ जाने की अपार वेदना से उनकी आँखें सिकुड़ गई थीं। मार्ग में चलते-चलते उनके पैर सूज गये थे और उनमें चलने की शक्ति न थी। लकड़ी की खूथों से टकरा जाने के कारण उनकी ठेहुनी में चोट आ गई थी और उन्होंने उसे भोजपत्र से बाँध रखा था। उनकी जाँघें भर आई थीं जिससे वे लँगड़ा रही थीं। इस कारण से उन्हें ज्वर भी हो आया था। उनके बाल धूल भर जाने से उजले हो गये थे। खजूर के नोकदार काँटों से कहीं-कहीं उनके पैर छिल गये थे। काँटेदार शतावरी के लग जाने से उनकी जाँघें फट गई थीं। विदारी नामक लताओं में उलझ कर उनके वस्त्रों की धज्जियाँ उड़ गई थीं। उनके कञ्चुक भी बाँस की छरहरी शाखाओं में लगकर फट गए थे। जंगल में भूख लग जाने से फल खाने के लिये झुकाई हुई बैर की काँटेदार डालों से उनके हाथ में छिल्छोहे पड़ गए थे। हिरन की सींगों
४२४ हर्षचरितम् मूलफलैः कदर्शितबाहुना ताम्बूलविरहविरसमुखखण्डितकोमलामलकीफलेन कुशकुसुमाहतलोहितानां श्वयथुमतामक्ष्णां लेपीकृतमनःशिलेन च कण्ट- कीलतालूनालकलेशेन केनचित्किसलयोपपादितवातपत्रकृत्येन केनचित्कद- लीदलव्यजनवाहिना केनचित्कमलिनीपलाशपुटगृहीताम्भसा केनचि- त्पाथेयीकृतमृणालपूलिकेन केनचिच्चीनांशुकदशाशिक्यनिहितनालिकेर- कोशफलशीकलितसरलतैलेन, कतिपयावशेषशोकविकलकलमूककुब्जवाम- नबधिरबर्बराविरलेनाबलानां चक्रवालेन परिवृताम्, आपत्कालेऽपि कुलोद्भू- तेनेवामुच्यमानां प्रभालेपिना लावण्येन, प्रतिबिम्बितैरासन्नवनलताकि- सलयैः सरसैर्दुःखक्षतैरिवान्तःपटलीक्रियमाणकायाम्, कठोरदर्भाङ्कुरक्षत- क्षारिणा क्षतजेनानुसरणालक्तकेनेव रक्तचरणाम्, उत्तालेनान्यतरनारी- धृतेनारविन्दिनीदलेन कृतच्छायमपि विच्छायं मुखमुद्वहन्तीम्, आका- .विकला विह्वलाः । कलमूकाः षण्ढकाः । एवमादयोऽन्तःपुररक्षिणः । बर्बरा द्यूत- हेक्षणाः । सरसैः प्रत्यग्रैः सान्द्रैश्च । क्षतानि व्रणाः । अरविन्दिनी पद्मिनी । छाया आतपप्रतिपक्षजातिः, छाया च कान्तिः । उक्तं च—'छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रति- से जंगली कन्दों को खोदते-खोदते उनके हाथों में छाले पड़ गए थे । पान के न मिलने के कारण उनके मुँह फीके पड़ गए थे और वे आँवले के कोमल फलों को चिंचोर कर काम चलाती थीं । कुशों के लग जाने से उनकी आँखें लाल हो गई थीं और सूजकर उबल आई थीं । उन पर उन्होंने मैनसिल का लेप चढ़ाया था । कण्टकी नामक लताओं में उलझकर उनके बाल उखड़ गए थे । कुछ ने घाम से बचने के लिए पत्रों को चुनकर छाता बना लिया था । कुछ पंखों के स्थान पर केले के पत्तों से झल रही थीं । कुछ पानी पीने के लिए कमलिनी के पत्तों को उपयोग में लाती थीं । कुछ ने खाने के लिए मृणाल की रोटियाँ बना ली थीं। अपने चीनांशुक को फाड़कर उन्होंने छींका बना लिये थे और उन पर नारियल के कुप्पों में बड़े यत्न से देवदार का तेल रख दिया था । राजमहल के कुछ बचे हुए शोकार्त गूँगे, कुबड़े, बौने, बहरे और भौंदे वहाँ उनके साथ रह गए थे । विपत्ति का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था, फिर भी उसके मुँह में झलने वाला लावण्य छोड़कर हटा नहीं, जैसे अपना ही वंशज हो । दर्पण के समान झलकते हुए अङ्गों में पड़ती हुई पास के लता-किसलयों की परछाईं ऐसी लग रही थी, मानों उसके शरीर के भीतर के उत्पन्न घाव हों । कुशों के तीखे अग्रभाग के गड़ जाने से उसके पैर आलते के समान बहते हुए रुधिर से लाल हो गए थे । नाल पकड़े कमलिनी के दल उठाये कोई अन्य स्त्री
अष्टम उच्छ्वासः ४२५ शमपि शून्यतयातिशयानाम्, मृण्मयीमिव निश्चेतनतया मरुन्मयीमिव निःश्वाससंपदा पावकमयीमिव संतापसंतानेन सलिलमयीमिवाश्रुप्रस्र- वणेन वियन्मयीमिव निरवलम्बनतया तडिन्मयीमिव परिप्लवतया शब्द- मयीमिव परिदेवितवाणीबाहुल्येन मुक्तमुक्तांशुकरत्नकुसुमकनकपत्राभरणां कल्पलतामिव महावने पतिताम्, परमेश्वरोत्तमाङ्गपातदुर्ललिताङ्गां गङ्गा- मिव गां गताम्, वनकुसुमधूलिधूसरितपादपल्लवाम्, प्रभातचन्द्रमूर्तिमिव लोकान्तरमभिलषन्तीम्, निजजलमोक्षकदर्थितदर्शिताधवलायतनेत्रशोभां मन्दाकिनीमृणालिनीमिव परिम्लायमानाम्, दुःसहविकिरणसंस्पर्शखेद- निमीलितां कुमुदिनीमिव दुःखेन दिवसं नयन्तीम्, दग्धदशाविसंवादितां बिम्बमनातपः' इति । शून्यतेन्द्रियरहितत्वमपि । संतापसंतानो दुःखपरम्परा, औष्ण्यप्रबन्धश्च । मुक्ताक्यमंशुकं मालवदेशजमुत्तरीयम् । मुक्ता मौक्तिकं च, अल्पा अंशवोऽशुकाश्च । महावनं विस्तीर्णारण्यम्, विपुलजलं च। परमेश्वरोत्तमाङ्गपातो राजशिरश्छेदो हरमूर्ध्नि पातश्च । इष्टानि ललितानीप्सितानि येषु तान्यङ्गानि यस्याः । दुर्ललितं च हेवाकः । गां गतामिति । वाहनाभावाद्भूमिमवतीर्णां च वन- कुसुमानि जलजातत्वात्कुमुदानि च, पादा रश्मयोऽपि । लोकान्तरं परलोकम्, मेरुद्वितीयपार्श्वं च । जलमश्रु च, नेत्रम् अङ्घिमूलं च । दग्धदशा दुरवस्थाः, प्लुष्ट- उसके सिर पर छाया कर रही थी। तब भी उसका मुँह छायारहित (कान्तिहीन) लग रहा था। वह अपनी शून्यता में आकाश से भी बढ़ रही थी। वह निश्चेतनता से मानों मृण्मयी, साँस पर साँस लेने से वायुमयी, लगातार सन्ताप से पावकमयी, आँसू के प्रवाह से जलमयी, निराधार हो जाने से आकाशमयी, चञ्चलता से विद्युन्मयी और करुण स्वर से रोते रहने के कारण शब्दमयी हो रही थी। मोतियों को पोहकर बना हुआ उत्तरीय रत्न, पुष्प और कनकपत्र के गहनों को छोड़ कर वह कल्पलता की भाँति उस महावन में गिर कर पड़ी हुई थी। वह शिव के मस्तक से गिरकर अस्तव्यस्त हुई गङ्गा के समान पृथिवी पर आ गई थी। उसके पैर जंगली फूलों के पराग से धूसरित हो गये थे। वह प्रभातकालीन चन्द्रमूर्ति की भाँति इस लोक से दूर हो जाना चाहती थी। आँसू पोंछते-पोंछते उसकी दीर्घ आँखों की शोभा मन्द पड़ गई थी और वह मन्दाकिनी की मृणालिनी की भाँति मुरझाती जा रही थी। वह सूर्य की दुःसह किरणों के स्पर्शजन्य खेद से मुकुलित होती हुई कुमुदिनी बड़े कष्ट से दिन बिता रही थी। जिसकी बत्ती जल चुकी, ऐसी प्रभातकालीन दीपशिखा के समान वह आश्रयहीन अत्यन्त क्षीण और फीकी पड़ी जा रही थी। वह उस हथिनी के समान थी जो अपने पार्श्ववर्ती
४२६ हर्षचरितम् प्रत्यूषप्रदीपशिखामिव क्षामक्षामां पाण्डुवपुषम्, पार्श्ववर्त्तिवारणाभियोगर- क्ष्यमाणां वनकरिणीमिव महाहदे निमग्नाम्, प्रविष्टां वनगहनं ध्यानं च, स्थितां तरुतले मरणे च पतितां धात्र्युत्सङ्गे महानर्थे च, दूरीकृतां भर्त्रा सुखेन च, विरेचितां श्रमरेणायुषा च, आकुलां केशकलापेन मरणोपा- येन च, विवर्णितामध्वधूलिभिरङ्गवेदनाभिश्च, दग्धां चण्डातपेन वैधव्येन च, धृतमुखीं पाणिना मौनेन च, गृहीतां प्रियसखीजनेन मन्युना च, तथा च भ्रष्टैर्बन्धुभिर्विलासैश्च, मुक्तेन श्रवणयुगलेनात्मना च, परित्यक्तै- र्भूषणैः सर्वारम्भैश्च, भग्नैर्बलयैर्मनोरथैश्च, चरणलग्नाभिः परिचारिकाभि- र्दर्भाङ्कुरसूचीभिश्च, हृदयविनिहितेन चक्षुषा प्रियेण च, दीर्घैः शोकश्वसितैः केशैश्च, क्षीणेन वपुषा पुण्येन च, पादयोः पतन्तीभिर्वृद्धाभिरश्रुधाराभिश्च, स्वल्पावशेषेण परिजनेन जीवितेन च, अलसामुन्मेषे, दक्षामश्रुमोक्षे, दीपशामानश्च । प्रत्यूषः कल्यम् । वारणा निषेधः, हस्ती च वारणः । महाहदे निमग्नामनुसरणार्थं पुण्यजलाशयस्नाताम्, विस्तीर्णसरस्यवसन्नां च । 'स्थितां कृतनिश्चयां च । विगतो धवो यस्यास्तद्भावो वैधव्यम् । धवो भर्ता । बन्धुभिरि- त्यादावित्थंभूतलक्षणे तृतीया । मुक्तेन निरलंकारेण । अलसां दक्षां चेत्यादौ हाथी के बलात्कार से त्राण पान के लिए किस महासरोवर में कूद पड़ी हो । वह घने जंगल और ध्यान दोनों में प्रवेश कर चुकी थी । तरुतल और मरण दोनों की ओर पहुँच चुकी थी । धाय की गोद और महान् अनर्थ दोनों में गिर पड़ी थी । पति और सुख दोनों ने उसे छोड़ दिया था । श्रमण और आयु दोनों ने उसका परित्याग कर दिया था । केशकलाप और मरण के उपाय दोनों से वह आकुल थी । मार्ग की धूल और अङ्गों की वेदना दोनों से उसका चेहरा फीका पड़ गया था । कड़ी धूप और वैधव्य दोनों ने उसे जला डाला था । हाथ और मौन दोनों ने उसके मुँह को थाम लिया था । उसकी प्रिय सखियों और शोक दोनों ने उसे पकड़ रखा था । उसके परिवार के बन्धु नहीं रहे और विलास भी समाप्त हो गया । उसके कान अलङ्कार से सूने हो गए थे और वह स्वयं अपने आपमें खोई-खोई थी । उसने गहने उतार दिये थे और सारे काम छोड़ बैठी थी । उसके हाथ का वलय और मनोरथ दोनों टूट गये थे । उसके चरणों में परिचारिकायें और कुशों की नुकीली सूइयाँ लिपटी हुई थीं । उसकी आँख हृदय और प्रिय दोनों में लगी हुई थीं । उसकी साँस और अलकें दोनों लम्बी थीं । शरीर और पुण्य दोनों क्षीण हो गए थे । बूढ़ी स्त्रियों और आँसू की धारायें दोनों उसके पैरों पर पड़ रही थीं । उसके परिजन और प्राण दोनों ही अब बहुत कम बच रहे थे । आँख खोलकर ताकने में
अष्टम उच्छ्वासः ४२७ संततां चिन्तासु, विच्छिन्नामाशासु, कृशां काये, स्थूलां श्वसिते, पूरितां दुःखेन, रिक्तां सत्त्वेन, अध्यासितामायासेन, शून्यां हृदयेन, निश्चलां निश्चयेन, चलितां धैर्यात्, अपि च वसतिं व्यसनानाम्, आधानमाधी- नाम्, अवस्थानमनवस्थानाम्, आधारमधृतीनाम्, आवासमवसादानाम्, आस्पद्मापदाम्, अभियोगमभाग्यानाम्, उद्वेगमुद्वेगानाम्, कारणं करु- णायाः, पारं परायत्तताया योषितम्। चिन्तितवानस्मि च चित्रमीदृशीम- प्याकृतिमुपतापाः स्पृशन्तीति। सा तु समीपगते मयि तदवस्थापि सब- हुमानमानतमौलिः प्रणतवती। अहं तु प्रबलकरुणाप्रेर्यमाणस्तामालपितु- कामः पुनः कृतवान्मनसि—कथमिव महानुभावामेनामामन्त्रये। ‘वत्से’ इत्यतिप्रणयः, ‘मातः’ इति चाटु, ‘भगिनि’ इत्यात्मसंभावना, ‘देवि’ इति परिजनालापः, ‘राजपुत्रि’ इत्यस्फुटम्, ‘उपासिके’ इति मनोरथः, ‘स्वामिनि’ इति भृत्यभावाभ्युपगमः, ‘भद्रे’ इतीतरस्त्रीसमुचितम्, ‘आयु- ष्मति’ इत्यवस्थायामप्रियम्, ‘कल्यांणिनि’ इति दशायां विरुद्धम्, ‘चन्द्र- विरोधो बोद्धव्यः। अनवस्थानां दुःखरूपक्रियाणाम्। अभियोगमुद्योगम्। कथ- मिवेत्यादि समानः प्रश्न इत्यर्थः। महानुभावां मनस्विनीम्। अतिप्रणयो महती अलसाती थी। आँसू ढलते जा रहे थे; चिन्ता उसे खाये जा रही थी। उसकी आशायें टूट गईं थीं। बहुत दुबली थी, भारी सांस ले रही थी, दुःख से भरी थी, सत्त्व से हीन थी, थोड़े में वह थक जाती थी, हृदय से शून्य थी। उसका निश्चय अचल था, उसे धैर्य नहीं रह गया था। वह दुःखों की वसति, मानसिक व्यथाओं का आश्रय, दुर्दशा का स्थान, अधीरता का आधार, अवसादों का निवासस्थान, आपदाओं का आस्पद, दुर्भाग्य का आक्रमणस्थान, उद्वेगों की जन्मभूमि, करुणा का कारण, एवं पराधीनता की सीमा थी। देखकर मैं सोचने लगा—'आश्चर्य की बात है कि सन्ताप ऐसी आकृति को भी नहीं छोड़ते। मैं जब उसके समीप गया तो उस अवस्था में भी उसने आदर के साथ झुककर प्रणाम किय। मैं प्रबल करुणा से प्रेरित होता हुआ उससे बातचीत करने की इच्छा से फिर मन में सोचने लगा—मैं किस शब्द से इस महानुभावा को संबोधित करूँ ! अगर 'वत्से' कहता हूँ तो अतिशय प्रणय हो जाता है। 'मातः' कहता हूँ तो चाटुकारिता व्यक्त होती है। 'बहन' कहता हूं तो आत्मगौरव जग पड़ता है। 'देवि' कहता हूं तो परिजनों जैसी बात होती है। 'राजपुत्रि' कहता हूँ तो क्या यह स्पष्ट है कि यह राजपुत्री है ? 'उपासिके' कहता हूँ तो अपने मन के अननुकूल बात होती है। 'स्वामिनि' कहता हूँ तो दास की भाँति अपने में लघुता आती है। 'भद्रे' कहता हूँ