भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 472

अष्टम उच्छ्वासः ४२५ शमपि शून्यतयातिशयानाम्, मृण्मयीमिव निश्चेतनतया मरुन्मयीमिव निःश्वाससंपदा पावकमयीमिव संतापसंतानेन सलिलमयीमिवाश्रुप्रस्र- वणेन वियन्मयीमिव निरवलम्बनतया तडिन्मयीमिव परिप्लवतया शब्द- मयीमिव परिदेवितवाणीबाहुल्येन मुक्तमुक्तांशुकरत्नकुसुमकनकपत्राभरणां कल्पलतामिव महावने पतिताम्, परमेश्वरोत्तमाङ्गपातदुर्ललिताङ्गां गङ्गा- मिव गां गताम्, वनकुसुमधूलिधूसरितपादपल्लवाम्, प्रभातचन्द्रमूर्तिमिव लोकान्तरमभिलषन्तीम्, निजजलमोक्षकदर्थितदर्शिताधवलायतनेत्रशोभां मन्दाकिनीमृणालिनीमिव परिम्लायमानाम्, दुःसहविकिरणसंस्पर्शखेद- निमीलितां कुमुदिनीमिव दुःखेन दिवसं नयन्तीम्, दग्धदशाविसंवादितां बिम्बमनातपः' इति । शून्यतेन्द्रियरहितत्वमपि । संतापसंतानो दुःखपरम्परा, औष्ण्यप्रबन्धश्च । मुक्ताक्यमंशुकं मालवदेशजमुत्तरीयम् । मुक्ता मौक्तिकं च, अल्पा अंशवोऽशुकाश्च । महावनं विस्तीर्णारण्यम्, विपुलजलं च। परमेश्वरोत्तमाङ्गपातो राजशिरश्छेदो हरमूर्ध्नि पातश्च । इष्टानि ललितानीप्सितानि येषु तान्यङ्गानि यस्याः । दुर्ललितं च हेवाकः । गां गतामिति । वाहनाभावाद्भूमिमवतीर्णां च वन- कुसुमानि जलजातत्वात्कुमुदानि च, पादा रश्मयोऽपि । लोकान्तरं परलोकम्, मेरुद्वितीयपार्श्वं च । जलमश्रु च, नेत्रम् अङ्घिमूलं च । दग्धदशा दुरवस्थाः, प्लुष्ट- उसके सिर पर छाया कर रही थी। तब भी उसका मुँह छायारहित (कान्तिहीन) लग रहा था। वह अपनी शून्यता में आकाश से भी बढ़ रही थी। वह निश्चेतनता से मानों मृण्मयी, साँस पर साँस लेने से वायुमयी, लगातार सन्ताप से पावकमयी, आँसू के प्रवाह से जलमयी, निराधार हो जाने से आकाशमयी, चञ्चलता से विद्युन्मयी और करुण स्वर से रोते रहने के कारण शब्दमयी हो रही थी। मोतियों को पोहकर बना हुआ उत्तरीय रत्न, पुष्प और कनकपत्र के गहनों को छोड़ कर वह कल्पलता की भाँति उस महावन में गिर कर पड़ी हुई थी। वह शिव के मस्तक से गिरकर अस्तव्यस्त हुई गङ्गा के समान पृथिवी पर आ गई थी। उसके पैर जंगली फूलों के पराग से धूसरित हो गये थे। वह प्रभातकालीन चन्द्रमूर्ति की भाँति इस लोक से दूर हो जाना चाहती थी। आँसू पोंछते-पोंछते उसकी दीर्घ आँखों की शोभा मन्द पड़ गई थी और वह मन्दाकिनी की मृणालिनी की भाँति मुरझाती जा रही थी। वह सूर्य की दुःसह किरणों के स्पर्शजन्य खेद से मुकुलित होती हुई कुमुदिनी बड़े कष्ट से दिन बिता रही थी। जिसकी बत्ती जल चुकी, ऐसी प्रभातकालीन दीपशिखा के समान वह आश्रयहीन अत्यन्त क्षीण और फीकी पड़ी जा रही थी। वह उस हथिनी के समान थी जो अपने पार्श्ववर्ती