हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ हर्षचरितम् मूलफलैः कदर्शितबाहुना ताम्बूलविरहविरसमुखखण्डितकोमलामलकीफलेन कुशकुसुमाहतलोहितानां श्वयथुमतामक्ष्णां लेपीकृतमनःशिलेन च कण्ट- कीलतालूनालकलेशेन केनचित्किसलयोपपादितवातपत्रकृत्येन केनचित्कद- लीदलव्यजनवाहिना केनचित्कमलिनीपलाशपुटगृहीताम्भसा केनचि- त्पाथेयीकृतमृणालपूलिकेन केनचिच्चीनांशुकदशाशिक्यनिहितनालिकेर- कोशफलशीकलितसरलतैलेन, कतिपयावशेषशोकविकलकलमूककुब्जवाम- नबधिरबर्बराविरलेनाबलानां चक्रवालेन परिवृताम्, आपत्कालेऽपि कुलोद्भू- तेनेवामुच्यमानां प्रभालेपिना लावण्येन, प्रतिबिम्बितैरासन्नवनलताकि- सलयैः सरसैर्दुःखक्षतैरिवान्तःपटलीक्रियमाणकायाम्, कठोरदर्भाङ्कुरक्षत- क्षारिणा क्षतजेनानुसरणालक्तकेनेव रक्तचरणाम्, उत्तालेनान्यतरनारी- धृतेनारविन्दिनीदलेन कृतच्छायमपि विच्छायं मुखमुद्वहन्तीम्, आका- .विकला विह्वलाः । कलमूकाः षण्ढकाः । एवमादयोऽन्तःपुररक्षिणः । बर्बरा द्यूत- हेक्षणाः । सरसैः प्रत्यग्रैः सान्द्रैश्च । क्षतानि व्रणाः । अरविन्दिनी पद्मिनी । छाया आतपप्रतिपक्षजातिः, छाया च कान्तिः । उक्तं च—'छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रति- से जंगली कन्दों को खोदते-खोदते उनके हाथों में छाले पड़ गए थे । पान के न मिलने के कारण उनके मुँह फीके पड़ गए थे और वे आँवले के कोमल फलों को चिंचोर कर काम चलाती थीं । कुशों के लग जाने से उनकी आँखें लाल हो गई थीं और सूजकर उबल आई थीं । उन पर उन्होंने मैनसिल का लेप चढ़ाया था । कण्टकी नामक लताओं में उलझकर उनके बाल उखड़ गए थे । कुछ ने घाम से बचने के लिए पत्रों को चुनकर छाता बना लिया था । कुछ पंखों के स्थान पर केले के पत्तों से झल रही थीं । कुछ पानी पीने के लिए कमलिनी के पत्तों को उपयोग में लाती थीं । कुछ ने खाने के लिए मृणाल की रोटियाँ बना ली थीं। अपने चीनांशुक को फाड़कर उन्होंने छींका बना लिये थे और उन पर नारियल के कुप्पों में बड़े यत्न से देवदार का तेल रख दिया था । राजमहल के कुछ बचे हुए शोकार्त गूँगे, कुबड़े, बौने, बहरे और भौंदे वहाँ उनके साथ रह गए थे । विपत्ति का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था, फिर भी उसके मुँह में झलने वाला लावण्य छोड़कर हटा नहीं, जैसे अपना ही वंशज हो । दर्पण के समान झलकते हुए अङ्गों में पड़ती हुई पास के लता-किसलयों की परछाईं ऐसी लग रही थी, मानों उसके शरीर के भीतर के उत्पन्न घाव हों । कुशों के तीखे अग्रभाग के गड़ जाने से उसके पैर आलते के समान बहते हुए रुधिर से लाल हो गए थे । नाल पकड़े कमलिनी के दल उठाये कोई अन्य स्त्री