भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 506 में से

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पृष्ठ 470

अष्टम उच्छ्वासः ४२३ तितारतानवर्तिनीनां वीणातन्त्रीणामिव झंकारमेकतानं नारीणां रुदितम- धृतिकरमतिकरुणमाकर्णितवानस्मि । समुपजातकृपञ्च गतोऽस्मि तं प्रदेशम् । दृष्टवानस्मि च दृषदखण्डखण्डिताङ्गुलिगलल्लोहितेन च पाणि- प्रविष्टशरशलाकराल्यशूलसंकोचितचक्षुषा चाध्वनीनश्रमश्वयथुनिश्ञ्चल- चरणेन च स्थाणवव्रणव्यथितगुल्फबद्धभूर्जत्वचा च वातखुडखेदखञ्ज- जङ्घाजातज्वरेण च पांसुपाण्डुरपिच्छकेन च खर्जूरजूटजटार्जर्जरितजानुना च शतावरीविदारितोरुणा च विदारीदारिततनुदुकूलपल्लवेन चोत्कटवंश- विटपकण्टककोटिपाटितकञ्चुककर्पटेन च फललोभावलम्बिताग्रबदरी- लताजालकैरूत्कण्टकैरूल्लिखितसुकुमारकरोदरेण च कुरङ्गशृङ्गोत्खातैः कन्द- वस्थानमेकलोपे द्विलोपे वा । ताना मूर्च्छना वा । वर्णाः स्थायिमञ्चादारोह्यवरोहि- णश्चत्वारस्तदुपलक्षिताः । तन्त्र्यो वर्णतन्त्यः । एकतानमेकरूपम् , अनवरतं वा । दृष्टवानित्यादौ। अस्मि चैवंविधानामबलानां चक्रवालेन परिवृतां योषितं दृष्टवानिति संबन्धः । लोहितं रक्तम् । पाणिः पादाधोदेशः । 'स्थाणुरस्त्री ध्रुवः शङ्कुः ।' 'स्था- णोरिमं स्थाणवः । वातखुडो गतिप्रतिघातलक्षणो वातव्याधिः । पिच्छुकं केश- कलापः । शतावरी शतमूली । विदारी क्षीरशुक्ली । सरला देवदारवः । शोकेन स्त्रियों के रोने का शब्द सुना। जैसे कमलवन के तुषारपात के कारण नष्ट हो जाने से भ्रमरियाँ चीख पड़ी हों, अथवा जैसे अनेक वीणाओं को कोई जोर से झनझना रहा हो, रोने की वह आवाज अत्यन्त उद्विग्न करने वाली और अति करुण थी। मेरे हृदय में करुणा उत्पन्न हुई और मैं उस स्थान पर पहुँचा। उस प्रदेश में जाकर क्या देखता हूँ कि अनेक स्त्रियों से घिरी हुई एक स्त्री दुःख में पड़ी हुई अत्यन्त करुणा से विलाप कर रही है। रोती हुई उन स्त्रियों के पैर की उँगलियाँ पत्थर से ठेस लग जाने के कारण फूट गई थीं और उनसे रुधिर बह रहा था। एड़ी में जंगली काँटों के गड़ जाने की अपार वेदना से उनकी आँखें सिकुड़ गई थीं। मार्ग में चलते-चलते उनके पैर सूज गये थे और उनमें चलने की शक्ति न थी। लकड़ी की खूथों से टकरा जाने के कारण उनकी ठेहुनी में चोट आ गई थी और उन्होंने उसे भोजपत्र से बाँध रखा था। उनकी जाँघें भर आई थीं जिससे वे लँगड़ा रही थीं। इस कारण से उन्हें ज्वर भी हो आया था। उनके बाल धूल भर जाने से उजले हो गये थे। खजूर के नोकदार काँटों से कहीं-कहीं उनके पैर छिल गये थे। काँटेदार शतावरी के लग जाने से उनकी जाँघें फट गई थीं। विदारी नामक लताओं में उलझ कर उनके वस्त्रों की धज्जियाँ उड़ गई थीं। उनके कञ्चुक भी बाँस की छरहरी शाखाओं में लगकर फट गए थे। जंगल में भूख लग जाने से फल खाने के लिये झुकाई हुई बैर की काँटेदार डालों से उनके हाथ में छिल्छोहे पड़ गए थे। हिरन की सींगों

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