हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ हर्षचरितम् प्रत्यूषप्रदीपशिखामिव क्षामक्षामां पाण्डुवपुषम्, पार्श्ववर्त्तिवारणाभियोगर- क्ष्यमाणां वनकरिणीमिव महाहदे निमग्नाम्, प्रविष्टां वनगहनं ध्यानं च, स्थितां तरुतले मरणे च पतितां धात्र्युत्सङ्गे महानर्थे च, दूरीकृतां भर्त्रा सुखेन च, विरेचितां श्रमरेणायुषा च, आकुलां केशकलापेन मरणोपा- येन च, विवर्णितामध्वधूलिभिरङ्गवेदनाभिश्च, दग्धां चण्डातपेन वैधव्येन च, धृतमुखीं पाणिना मौनेन च, गृहीतां प्रियसखीजनेन मन्युना च, तथा च भ्रष्टैर्बन्धुभिर्विलासैश्च, मुक्तेन श्रवणयुगलेनात्मना च, परित्यक्तै- र्भूषणैः सर्वारम्भैश्च, भग्नैर्बलयैर्मनोरथैश्च, चरणलग्नाभिः परिचारिकाभि- र्दर्भाङ्कुरसूचीभिश्च, हृदयविनिहितेन चक्षुषा प्रियेण च, दीर्घैः शोकश्वसितैः केशैश्च, क्षीणेन वपुषा पुण्येन च, पादयोः पतन्तीभिर्वृद्धाभिरश्रुधाराभिश्च, स्वल्पावशेषेण परिजनेन जीवितेन च, अलसामुन्मेषे, दक्षामश्रुमोक्षे, दीपशामानश्च । प्रत्यूषः कल्यम् । वारणा निषेधः, हस्ती च वारणः । महाहदे निमग्नामनुसरणार्थं पुण्यजलाशयस्नाताम्, विस्तीर्णसरस्यवसन्नां च । 'स्थितां कृतनिश्चयां च । विगतो धवो यस्यास्तद्भावो वैधव्यम् । धवो भर्ता । बन्धुभिरि- त्यादावित्थंभूतलक्षणे तृतीया । मुक्तेन निरलंकारेण । अलसां दक्षां चेत्यादौ हाथी के बलात्कार से त्राण पान के लिए किस महासरोवर में कूद पड़ी हो । वह घने जंगल और ध्यान दोनों में प्रवेश कर चुकी थी । तरुतल और मरण दोनों की ओर पहुँच चुकी थी । धाय की गोद और महान् अनर्थ दोनों में गिर पड़ी थी । पति और सुख दोनों ने उसे छोड़ दिया था । श्रमण और आयु दोनों ने उसका परित्याग कर दिया था । केशकलाप और मरण के उपाय दोनों से वह आकुल थी । मार्ग की धूल और अङ्गों की वेदना दोनों से उसका चेहरा फीका पड़ गया था । कड़ी धूप और वैधव्य दोनों ने उसे जला डाला था । हाथ और मौन दोनों ने उसके मुँह को थाम लिया था । उसकी प्रिय सखियों और शोक दोनों ने उसे पकड़ रखा था । उसके परिवार के बन्धु नहीं रहे और विलास भी समाप्त हो गया । उसके कान अलङ्कार से सूने हो गए थे और वह स्वयं अपने आपमें खोई-खोई थी । उसने गहने उतार दिये थे और सारे काम छोड़ बैठी थी । उसके हाथ का वलय और मनोरथ दोनों टूट गये थे । उसके चरणों में परिचारिकायें और कुशों की नुकीली सूइयाँ लिपटी हुई थीं । उसकी आँख हृदय और प्रिय दोनों में लगी हुई थीं । उसकी साँस और अलकें दोनों लम्बी थीं । शरीर और पुण्य दोनों क्षीण हो गए थे । बूढ़ी स्त्रियों और आँसू की धारायें दोनों उसके पैरों पर पड़ रही थीं । उसके परिजन और प्राण दोनों ही अब बहुत कम बच रहे थे । आँख खोलकर ताकने में