हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४२७ संततां चिन्तासु, विच्छिन्नामाशासु, कृशां काये, स्थूलां श्वसिते, पूरितां दुःखेन, रिक्तां सत्त्वेन, अध्यासितामायासेन, शून्यां हृदयेन, निश्चलां निश्चयेन, चलितां धैर्यात्, अपि च वसतिं व्यसनानाम्, आधानमाधी- नाम्, अवस्थानमनवस्थानाम्, आधारमधृतीनाम्, आवासमवसादानाम्, आस्पद्मापदाम्, अभियोगमभाग्यानाम्, उद्वेगमुद्वेगानाम्, कारणं करु- णायाः, पारं परायत्तताया योषितम्। चिन्तितवानस्मि च चित्रमीदृशीम- प्याकृतिमुपतापाः स्पृशन्तीति। सा तु समीपगते मयि तदवस्थापि सब- हुमानमानतमौलिः प्रणतवती। अहं तु प्रबलकरुणाप्रेर्यमाणस्तामालपितु- कामः पुनः कृतवान्मनसि—कथमिव महानुभावामेनामामन्त्रये। ‘वत्से’ इत्यतिप्रणयः, ‘मातः’ इति चाटु, ‘भगिनि’ इत्यात्मसंभावना, ‘देवि’ इति परिजनालापः, ‘राजपुत्रि’ इत्यस्फुटम्, ‘उपासिके’ इति मनोरथः, ‘स्वामिनि’ इति भृत्यभावाभ्युपगमः, ‘भद्रे’ इतीतरस्त्रीसमुचितम्, ‘आयु- ष्मति’ इत्यवस्थायामप्रियम्, ‘कल्यांणिनि’ इति दशायां विरुद्धम्, ‘चन्द्र- विरोधो बोद्धव्यः। अनवस्थानां दुःखरूपक्रियाणाम्। अभियोगमुद्योगम्। कथ- मिवेत्यादि समानः प्रश्न इत्यर्थः। महानुभावां मनस्विनीम्। अतिप्रणयो महती अलसाती थी। आँसू ढलते जा रहे थे; चिन्ता उसे खाये जा रही थी। उसकी आशायें टूट गईं थीं। बहुत दुबली थी, भारी सांस ले रही थी, दुःख से भरी थी, सत्त्व से हीन थी, थोड़े में वह थक जाती थी, हृदय से शून्य थी। उसका निश्चय अचल था, उसे धैर्य नहीं रह गया था। वह दुःखों की वसति, मानसिक व्यथाओं का आश्रय, दुर्दशा का स्थान, अधीरता का आधार, अवसादों का निवासस्थान, आपदाओं का आस्पद, दुर्भाग्य का आक्रमणस्थान, उद्वेगों की जन्मभूमि, करुणा का कारण, एवं पराधीनता की सीमा थी। देखकर मैं सोचने लगा—'आश्चर्य की बात है कि सन्ताप ऐसी आकृति को भी नहीं छोड़ते। मैं जब उसके समीप गया तो उस अवस्था में भी उसने आदर के साथ झुककर प्रणाम किय। मैं प्रबल करुणा से प्रेरित होता हुआ उससे बातचीत करने की इच्छा से फिर मन में सोचने लगा—मैं किस शब्द से इस महानुभावा को संबोधित करूँ ! अगर 'वत्से' कहता हूँ तो अतिशय प्रणय हो जाता है। 'मातः' कहता हूँ तो चाटुकारिता व्यक्त होती है। 'बहन' कहता हूं तो आत्मगौरव जग पड़ता है। 'देवि' कहता हूं तो परिजनों जैसी बात होती है। 'राजपुत्रि' कहता हूँ तो क्या यह स्पष्ट है कि यह राजपुत्री है ? 'उपासिके' कहता हूँ तो अपने मन के अननुकूल बात होती है। 'स्वामिनि' कहता हूँ तो दास की भाँति अपने में लघुता आती है। 'भद्रे' कहता हूँ