हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२८ हर्षचरितम् मुखि' इत्यमुनिमतम् , 'बाले' इत्यगौरवोपेतम् , 'आर्ये' इति जरारोपणम् , 'पुण्यवति' इति फलविपरीतम् , 'भवति' इति सर्वसाधारणम् । अपि च 'कासि' इत्यनभिजातम् , 'किमर्थं रोदिषि' इति दुःखकारणस्मरणकारि, “मा रोदीः' इति शोकहेतुमपनीय न शोभते, 'समाश्वसिहि' इति किमा- 'श्रित्य, 'स्वागतम्' इति यातयामम्, 'सुखमास्यते' इति मिथ्या । इत्येवं चिन्तयत्येव मयि तस्मात्त्रैणादुत्थायान्यतरा योषिदार्यरूपेव शोकविक्लवा समुपसृत्य कतिपयपलितशारं शिरो नीत्वा महीतलमतुलहृदयसंतापसूच- कैरश्रुबिन्दुभिश्चरणयुगलं दहन्ती ममातिकृपणैरक्षरैश्च हृदयमभिहितवती— 'भगवन् ! सर्वसत्त्वानुकम्पिनी प्रायः प्रव्रज्या । प्रतिपन्नदुःखक्षपणदीक्षाद- क्षाश्च भवन्ति सौगताः । करुणाकुलगृहं च भगवतः शाक्यमुनेः शासनम् । सकलजनोपकारसज्जा सज्जनता जैनी । परलोकसाधनं च धर्मो मुनीनाम् । ीतिः । अनभिजातममुचितम् । यातयामं जीर्णप्रायम् । शासनं शास्त्रम् । सज्जनता तो साधारण स्त्री के लिए उचित संबोधन हो जाता है । 'आयुष्मति' कहता हूँ तो जिस अवस्था में यह पड़ी है उसके अनुसार प्रिय बात नहीं होती । 'कल्याणिनि' कहता हूँ तो यह संबोधन इसकी दशा के विरुद्ध हो जाता है । 'चन्द्रमुखी' कहता हूँ तो मुझ भिक्षु के लिए सम्मत नहीं । 'बाले' कहता हूँ तो इसके प्रति गौरवहीनता की बात होती है । 'आर्ये' कहता हूँ तो इसको वृद्धावस्था में आरोपित करना हो जाता है । 'पुण्यवति' कहता हूँ तो क्या पुण्य का यही फल होता है ? 'भवति' कहता हूँ तो सबके लिए यह साधारण संबोधन है । और भी, 'तू कौन है' पूछना उचित नहीं लगता । 'क्यों रोती है' यह तो दुःख के कारणों की याद दिलाने वाला प्रश्न है । 'रो मत' यह प्रश्न तो शोक के कारण को बिना हटाए नहीं शोभा देता । 'धीरज धरो' यह किस बात पर कहा जाय ? 'स्वागतम्' का तो जमाना लद गया । 'क्या सुखी हो ?' यह तो सरासर झूठ हुआ । मैं ऐसा सोच ही रहा था कि उन स्त्रियों के बीच से शोक से व्याकुल एक कुलीन स्त्री मेरे निकट आ गई और अपना सिर जिसके कई बाल सफेद हो गये थे, पृथिवी पर रखकर हृदय के अतुल संताप को व्यक्त करने वाले आँसुओं से भरे चरणों को और अत्यन्त करुण अक्षरों से मेरा हृदय जलाती हुई बोली—'भगवन्, प्रव्रज्या सब जीवों पर दया करने वाली है । सौगत लोग आपत्ति में पड़े हुओं का दुःख दूर करने की दीक्षा लिये रहते हैं । भगवान् शाक्यमुनि का शासन करुणा का स्थान है । बौद्ध साधु सब लोगों के उपकार के लिए तत्पर रहते हैं । मुनियों द्वारा अभिहित धर्म उत्कृष्ट लोक में पहुँचने का साधन है । लोगों का कहना है कि दूसरों की प्राणरक्षा से बढ़कर संसार में कोई पुण्य