भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

प्राणरक्षणाच्च न परं पुण्यजातं जगति गीयते जनेन । अनुकम्पाभूमयः प्रकृत्यैव युवतयः किं पुनर्विपद्मभिभूताः । साधुजनश्च सिद्धक्षेत्रमार्त्तवच- साम् । यत इयं नः स्वामिनी मरणेन पितुरभावेन भर्तुः प्रवासेन च भ्रातुः भ्रंशेन च शेषस्य बान्धववर्गस्यातिमृदुहृदयत्यानपत्यतया च निर- वलम्बना, परिभवेन च नीचारातिकृतेन, प्रकृतिमन्स्विनी अमुना च महाटवीपर्यटनक्लेशेन कदर्थितसौकुमार्या, दग्धदैवदत्तैरेवंविधैर्बहुभिरुप- र्युपरि व्यसनैर्विह्वलीकृतहृदया, दारुणं दुःखमपारयन्ती सोढुं निवारयन्त- मनाक्रान्तपूर्वं स्वप्नेऽप्यवगणय्य गुरुजनमनुनयन्तीरखण्डितप्रणया नर्म- स्वपि समवधीर्य प्रियसखीर्विज्ञापयन्तमशरणमनाथमश्रुव्याकुलनयनमप- रिभूतपूर्वं मनसापि परिभूय भृत्यवर्गमग्निं प्रविशति । परित्रायताम् । आर्योऽपि तावदसह्यशोकापनयनोपायोपदेशनिपुणां व्यापारयतु वाणी- मस्याम्' इति चातिकृपणं व्याहरन्तीमहुत्थाप्योद्विग्नतरः शनैरभिहित- वान्—'आर्ये ! यथा कथयसि तथा। अस्मद्गिरामगोचरोऽयमस्याः पुण्या- साधुजनसमूहः । सिद्धक्षेत्रं सिद्धायतनम् । यत इत्यादि । यत इयं नः स्वामिन्यग्निं नहीं है। स्वभाव ही से युवतियाँ अनुकम्पा के पात्र हैं। और अगर विपत्तियों से वे अभिभूत हो गईं तो कहना ही क्या ? साधु लोग तो दुखियों की वाणी के सिद्धायतन हैं। यह स्वभाव से ही मनस्विनी हमारी स्वामिनी पिता के मरण, स्वामी के विनाश, भाई के प्रवास और अन्य सब बन्धुओं के बिछुड़ जाने से और हृदय के अत्यन्त मृदु एवं पुत्र के न होने से अनाथ हुई नीच शत्रु द्वारा किए गए पराभव के कारण अग्नि में प्रवेश कर रही है। इस घोर जंगल में भटकने के क्लेश ने इसके सौकुमार्य को दूषित कर डाला है। जले दैव ने इस प्रकार बहुत से दुःख जो इस पर उड़ेल दिए हैं, उनसे यह व्याकुल हो उठी है। यह अब अपने दारुण दुख को सहने में असमर्थ हो रही है। जिन गुरुजनों की बात का स्वप्न में भी उल्लङ्घन इसने नहीं किया था, अग्निप्रवेश से निवारण करते हुए उन्हीं की बात नहीं सुन रही है। हँसी-मजाक के खेलों में भी जिनसे अपना प्रेमभाव बनाए रही, अनुनय करती हुई उन प्रिय सखियों की बात भी नहीं मान रही है। जिन परिचारकों को उसने कभी भी डांट नहीं सुनाई, अशरण और अनाथ होकर आँसू से भरे प्रार्थना करते हुए उन्हें भी फटकार देती है। इसे बचाइए। आर्य भी इसके असह्य शोक को दूर करने के उपायों का उपदेश करते हुए इसे समझाइए।' इस प्रकार अत्यन्त दीन भाव से कहती हुई उस स्त्री से दुखी मैं उठकर धीरे से बोला—'आर्ये, जो तुम कहती हो