भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

४३० हर्षचरितम् शयायाः शोकः । शक्यते चेन्मुहूर्त्तमात्रमपि त्रातुमुपरिष्टान्न व्यर्थेयमभ्य- र्थना भविष्यति । मम हि गुरुरपर इव भगवान्सुगतः समीपगत एव । कथिते मयास्मिन्वदन्ते नियतमागमिष्यति परमदयालुः । 'दुःखान्धकार- पटलभिदुरैश्च सौगतैः सुभाषितैः स्वकीयैश्च दर्शितनिदर्शनैर्नानागमगुरु- भिर्गिरां कौशलैः कुशलशीलामेनां प्रबोधपदवीमारोपयिष्यति' इति । तच्च श्रुत्वा 'त्वरतामार्यः' इत्यभिदधाना सा पुनरपि पादयोः पतितवती । सोऽहमुपगत्य त्वरमाणो व्यतिकरमिममधृतिकरमशरणकृपणबहुयुवति- मरणमतिकरुणमत्रभवते गुरवे निवेदितवान्' इति । अथ भूपूस्तैक्ष्णवं समवधार्य तद्भाषितमश्रुमिश्रितमश्रुतेऽपि स्वसुर्नाम्नि निश्श्रीकृतमना मन्युना सर्वाकारसंवादिन्या दशयैव दूरीकृतसंदेहो दग्ध इव सोदर्यावस्थाश्रवणेन श्रवणयोः श्रमणाचार्यमुवाच- 'आर्य ! नियतं सैवेयमनार्यस्यास्य जनस्यातिकठिनहृदयस्यातिनृशंसस्य मन्दभाग्यस्य भगिनी भागधेयैरेतामवस्थां नीता निष्कारणवैरिमिर्रराकी विदीर्यमाणं मे प्रविशति तदार्योऽपि तावदस्यां वाणीं व्यापारयत्विति संबन्धः । निदर्शनं दृष्टान्तः । निम्नं संकुचच्छक्ति । सो ठीक है; किन्तु मेरे समझाने से इस पुण्य-आशय वाली का शोक कम न होगा। मुहूर्त्त भर भी तुम इसे रोक सको तो यह प्रार्थना व्यर्थ न होगी, क्योंकि दूसरे भगवान् बुद्ध के समान मेरे गुरु यहाँ से समीप ही रहते हैं। मैं इस वृत्तान्त को कहूँगा तो निश्चय ही परम दयालु वे आकर दुःखान्धकार के निवारण में समर्थ भगवान बुद्ध के अनेक सुभाषितों से और दृष्टान्तों से भरी अनेक आगमों से गौरवशालिनी अपनी वाणी से कुशलशीलवालो इसे प्रबोधित करेंगे।' यह सुनकर 'आर्य शीघ्रता करें' यह कहती हुई वह मेरे चरणों में गिर गई। सो मैंने शीघ्रता से आकर धीरज को तोड़ने वाले अनाथ, दीन, दुखिया अनेक युवतियों के मरने के इस अत्यन्त करुण समाचार को श्रीचरणों में सुना दिया।' राजा भिक्षु की आँसू से मिली हुई बात सुनते ही राज्यश्री का नाम न कहे जाने पर भी शोक से आक्रान्त होकर सब प्रकार की बातों से मेल खाने वाली उस दशा से ही तुरन्त समझ गये और अपनी बहन को इस दशा के सुनने से जैसे जल गए । तब उन्होंने श्रमणाचार्य दिवाकरमित्र से कान में कहा-'आर्य ! फटा जाता हुआ मेरा हृदय यह निवेदन कर रहा है कि अनार्य अति कठिन हृदय वाले अतिकूट मन्दभाग्य इस जन की (मेरी) वही वह बेचारी अकारण शत्रु भाग्य की मारी बहिन राज्यश्री है जो इस अवस्था