भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 461

४१४ हर्षचरितम् पटैः पाण्डुरभिक्षुभिर्भागवतैर्वर्णिभिः केशलुञ्चकैः कापिलेजैनेर्लोकायतिकैः काणादैरौपनिषदैरैश्वरकारणिकैः कारन्धमिभिर्धर्मशास्त्रिभिः पौराणिकैः साप्ततन्तवैः शाब्दिकैः पाञ्चरात्रिकैरन्यैश्च स्वान्स्वान्सिद्धान्ताञ्छृण्व- द्भिरभिमुक्तैश्चिन्तयद्भिश्च प्रत्युच्चरद्भिश्च संशयानैश्च निश्चिन्वद्भिश्च- व्युत्पादयद्भिश्च विवदमानैश्चाभ्यस्यद्भिश्च व्याचक्षाणैश्च शिष्यतां प्रतिपन्नैर्दूरदेवावेद्यमानम्, अतिविनीतैः कपिभिरपि चैत्यकर्म कुर्वा- णैस्त्रिशरणपरैः परमोपासकैः शुकैरपि शाक्यशासनकुशलैः कोशं समुपदिशद्भिः शिक्षापदोपदेशदोषोपशमशालिनीभिः शारिकाभिरपि धर्मदेशनां दर्शयन्तीभिरनवरतश्रवणगृहीनालोकैः कौशिकैरपि मस्करिभिः परिव्राजकैः । श्वेतपटैः श्वेतोर्णाकम्बलवासोभिः, नग्नक्षपणकभेदैः । पाण्डुरभिक्षुभिस्स्त्यक्तकाषायैः । भागवतैर्विष्णुभक्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । केश- लुञ्चनैर्यथार्थनामभिः । लोकायतिकैश्चार्वाकैः । जैनैर्बौद्धैः । कापिलैः सांख्यैः । काणा- दैर्वैशेषिकतार्किकैः । औपनिषदैर्वेदान्तवादिभिः । ऐश्वरकारणिकैनैयायिकैः । कार- न्धमिभिर्धातुवादिभिः । पाषण्डभेदैरित्यन्ये । धर्मशास्त्रिभिः स्मृतिज्ञैः । शाब्दिकै- र्वैयाकरणैः । पाञ्चरात्रिकैर्वैष्णवभेदैः । सिद्धान्तानागमान् । त्रिशरणेति । त्रयो बुद्ध- धर्मसंघाः । शाक्यो बुद्धः । कोशो बौद्धसिद्धान्तो वसुबन्धुकृतः । देशना कथनम् । श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के साधु ), पाण्डुर भिक्षु ( आजीवक ), भागवत, वर्णी ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी साधु ), केशलुञ्चक ( केशों का लोच करने वाले जैन साधु ) , कापिल ( कपिल- मतानुयायी सांख्य ), जैन, लोकायतिक ( चार्वाक ), काणाद ( वैशेषिक ), औपनिषद ( उपनिषद् या वेदान्तदर्शन के ब्रह्मवादी दार्शनिक ), ऐश्वरकारणिक ( नैयायिक ), कार- न्धमी ( धातुवादी या रसायन बनाने वाले ), धर्मशास्त्री ( मन्वादि स्मृतियों के अनुयायी ), पौराणिक, साप्ततन्तव ( यज्ञवादी मीमांसक ), शाब्दिक ( शब्दब्रह्म के अनुयायी वैयाकरण दार्शनिक ), पाञ्चरात्रिक ( पञ्चरात्र संज्ञक प्राचीन वैष्णवमत के अनुयायी ) और इनके अतिरिक्त और भी लोग अपने-अपने आगमों का पूरी लगन के साथ श्रवण, मनन, आवृत्ति, संशय, निश्चय, व्युत्पत्ति, विवाद और अभ्यास के द्वारा व्याख्यान कर रहे थे । दूर ही से देखकर प्रतीत हो जाता था कि यह मदन्त का निवास है। वहां अत्यन्त विनीत शिष्य की भाँति वानर भी चैत्यवन्दनकर्म में तत्पर रहते थे, शुक पक्षी भी बुद्ध, धर्म, संघ इन तीन रत्नों की शरण में जाते थे और परम उपासक एवं शाक्यशासन में कुशल विद्वान् होकर वसुबन्धुकृत अभिधर्मकोश का उपदेश देते थे । सारिकाएं भी भगवान् बुद्ध के बताए हुए दस शीलों के शिक्षापदों के उपदेश द्वारा दोष का मार्जन करके धर्म देशना