भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 506 में से

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पृष्ठ 460

[Header] अष्टम उच्छ्वासः ४१३

[Top Sanskrit Text] न्धकारराशय इव भित्त्वा भुवमुत्थिताः, प्रतिप्रवेशिका इव वर्षावासरा- णाम्, अंशावतारा इव कृष्णार्धरात्रीणाम्, इन्द्रनीलमयाः प्रासादा इव वनदेवतानाम्, पुरस्ताद्दर्शनपथमवतेरुस्तरवः । ततो नरपतेरभवन्मनस्यदूरवर्तिना खलु भवितव्यं भदन्तेनेति । अवतीर्य च गिरिसरिति समुपस्पृश्य युगपद्विश्रामसमयसमुन्मुक्तहेषाघो- षबधिरीकृताटवीगहनामस्मिन्नेव प्रदेशे स्थापयित्वा वाजिसेना मवलम्ब्य च तपस्विजनदर्शनोचितं विनयं हृदयेन दक्षिणेन च हस्तेन माधवगुप्त- मंसे विरलैरेव राजभिरनुगम्यमानश्चरणाभ्यामेव प्रावर्तत गन्तुम् । अथ तेषां तरूणां मध्ये नानादेशीयैः स्थानस्थानेषु स्थाणूनाश्रितैः शिलातलेषूपविष्टैर्लताभवनान्यध्यावसद्भिररण्यानीनिकुञ्जेषु निलिनैर्विटप- च्छायासु निषण्णैस्तरुमूलानि निषेवमाणैर्वीतरागैरार्हतैर्मस्करिभिः श्वेत-

[Middle Commentary / Tika] भदन्त इति सौगतप्रतिमानां पूजावचनम् । उद्यानमित्यन्ये । अथैत्यादौ । तरूणां मध्ये दिवाकरमद्राक्षीदिति संबन्धः । नानादेशीयैर्वीतरागै- रिति चार्हतैरित्यादीनां सर्वेषां विशेषणम् । स्थाणूनाश्रितैरित्यादि तु केषाञ्चित् । 'स्थाणूरस्त्री ध्रुवः शङ्कुः' इत्यमरः । 'महारण्यमरणयानी विस्तारो विटपोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'मूलं वृद्धोऽङ्घ्रि नामकः' । अर्हन्देवता येषां ते आर्हतास्तैर्नग्नक्षपणकैः ।

[Bottom Hindi Translation] या मानो पाताल के अन्धकार पृथिवी को फोड़कर बाहर निकल गए हों, अथवा वे मानों वर्षा के दिनों के पड़ोसी हों, या कृष्णपक्ष की अर्धरात्रियों के अंशावतार हों, या इन्द्रनील मणियों के बने वनदेवताओं के प्रासाद हों । तब राजा के मन में हुआ कि अब निश्चय ही भदन्त का आश्रम यहां से दूर नहीं होना चाहिए । यह सोचकर उन्होंने गिरिनदी में उतरकर आचमन किया । उसी प्रदेश में विश्राम के लिए वाजिसेना को, जो अपनी हिनहिनाहट से जंगल को भर रही थी, ठहरा दिया । स्वयं तपस्वियों के दर्शन के उचित विनय को हृदय से धारण किया । माधवगुप्त के कन्धे पर दाहिना हाथ रख और साथ में कुछ राजाओं को ले पैदल ही चल पड़े । उन वृक्षों के बीच में शिष्यभाव से नाना देशों से आए हुए अनेक वीतराग लोगों को देखा । जगह-जगह पर उनमें कुछ लोग लकड़ी के खूठों पर बैठे थे । कुछ चट्टानों पर विराजमान थे । कुछ लताभवनों में बैठे हुए थे । कुछ जंगल के झुरमुटों में छिपकर बैठे थे । कुछ वृक्षों की छाया में जम गए थे । कुछ वृक्षों की जड़ों पर आसन जमा चुके थे । वे वीतराग आर्हत ( जैन साधु ), मस्करी ( पाशुपतमतानुयायी ), श्वेतपट ( सेवड़ा,