भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 506 में से

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पृष्ठ 459

कपिपोतपेटकपाटितपाटलमुखकीटपुटकाः, लकुचलम्पटगोलाङ्गूललङ्घ्य- मानलवलयः, बद्धवालुकालवालवलयाः, कुटिलकुटावलिवलितवेगगिरिन- दिकास्रोतः, निबिडशाखाकाण्डलम्बमानकमण्डलयः, सूत्रशिक्यासक्त- रिक्तभिक्षाकपालपल्लवितलतामण्डपाः, निकटकुटीकृतपाटलमुद्राचैत्यक- मूर्तयः, चीवराम्बररागकषायोदकदूपितोद्देशाः, मेघमया इव कृतशिखण्डि- कुलकोलाहलाः, वेदमया इवापरिमितशाखाभेदगहनाः, माणिक्यमया इव महानीलतनवः, तिमिरमया इव सकलजननयनमुषः, यामुना इवो- र्ध्वीकृतमहाह्रदाः, मरकतमणिश्यामलाः क्रीडापर्वतका इव वसन्तस्य, अञ्जनाचला इव पल्लविताः, तनया इवाटवीजाता विन्ध्यस्याद्रेः, पालाला- शालिजातकाश्च प्राणिभेदाः । पाटलाः कीटाः । पुटका आलयाः । 'लकुचो लिकुचो ड्डुहुः' इत्यमरः । गोलाङ्गूलाः कृष्णमुखवानराः । लवलयो लताभेदः । कमण्डलु- र्मुनिजलभाण्डम् । शिक्यं भिक्षाभाजनम् । जालिका निकटकुटीषु कृताः । मुद्रया कृतानामल्पचैत्यानां मूर्तयो येषु । शाखा लताः, कठाद्याश्च । महानीला अत्यन्त- कृष्णाः, महानीलाश्च प्राणिभेदाः । नयनमुषो रम्यत्वात्, प्रकाशनाच्च । प्रतिप्रस्रवकाः प्रतिच्छन्दकाः । के कुंजों में गूँज रहे थे । जायफल के नीचे शालिजातक नामक पशु सोए थे । लाल ततैयों के डङ्क मारने से कुपित हुए बन्दरों ने उनके छत्तों को नोंच डाला था । लंगूर बडुआ के फल खाने के लिए लवली लताओं के इस पार से उस पार कूद रहे थे । पेड़ों के चारों ओर पानी डालने के लिए बालू के थहले बनाए गए थे । टेढ़े-मेढ़े वृक्षों के चारों ओर पहाड़ी नदियों के सोते तेजी से बह रहे थे । मुनियों ने वृक्षों की मोटी शाखाओं में कमण्डलु लटका दिए थे । लतामण्डपों में सूत की बनी हुई सिकहरों पर खाली भिक्षाकपाल रख दिए गए थे । कुटियों के समीप स्तूप या चैत्य की बनी हुई आकृतियों वाली पक्की मिट्टी की लाल मुहरें थीं । चीवर वस्त्रों के धोने से दूर तक वहाँ के जल उनके रस से दूषित हो गए थे । मेघ के सदृश उन वृक्षों पर मोर शोर मचा रहे थे । वेदों जैसी उन वृक्षों की शाखाएँ अपरिमित और गहन थीं । माणिक्य की भाँति वे वृक्ष अत्यन्त नीले (महानील, मणिविशेष ) वर्ण के थे । सारे लोगों की दृष्टि को अन्धकार के समान विफल कर देने वाले थे । महाह्रदों के रूप में मानों यमुना के बड़े-बड़े सरोवर ऊपर उठा दिए गए हों, या मानों जड़ी हुई मरकत मणियों से श्यामवर्ण के वसन्त के क्रीड़ापर्वतक हों, या काले- काले अञ्जन के पर्वत निकल आए हों, जंगलों में उत्पन्न हुए मानों विन्ध्याचल के पुत्र हों,