हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 458, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४११ पीलवः, सदाफलकट्फलफलविशसननिःशूकशुकशकुन्तशातितशलाटवः, शैलेयसुकुमारशिलातलसुखशयितशशशिशवः, शेफालिकाशिखाविवरवि- स्त्रब्धविवर्तमानगौधेरराशयः, निरातङ्करङ्कवः, निराकुलनकुलकुलकेलयः, कलकोकिलकुलकवलितकलिकोद्गमाः, सहकारारामरोमन्थायमानचमर- यूथाः, यथासुखनिषण्णनीलाण्डजमण्डलाः, निर्विकारवृकविलोक्यमानपो- तपीतगवयधेनवः, श्रवणहारिसनीडगिरिनितम्बनिर्भरनिनादनिद्रानन्दम- न्दायमानकरिकुलकर्णतालदुन्दुभयः, समासन्नकिन्नरीगीतरवरसमानरुरवः, प्रमुदिततरतरक्षवः, क्षतहरितहरिद्राद्रवरज्यमाननववराहपोतपोत्रवलयः, गुञ्जाकुञ्जगुञ्जज्जाहकाः, जातीफलकसम्प्रशालिजातकवलयः, दशनकुपित- पीलुफलं संसीकम् । कट्फलः श्रीपर्णान्यो वृक्षः । उक्तं च—'श्रीपर्णिका कुमुदिका कुम्भी कैडर्यकट्फलौ' इति । विशसनं भेदनम् । निःशूको निर्दयः । शलाटून्यप- क्कानि फलानि । उक्तं च—'आमे फले शलाटुः स्यात्' इति । शिलासु भवं शैलेयम् । शेफालिका लताभेदः । 'स्त्रियां गौधेरगोधारगौधेया गोधिकात्मजाः' इति । रङ्कवो मृगभेदाः । सहकार आम्रः । उक्तं च—'आम्रश्चूतो रसालोऽसौ सहकारोऽतिसौरभः' इति । रोमन्थायमाना उद्गीर्य चर्वन्तः । चमरा मृगविशेषाः । नीलाण्डजा मृगभेदाः । वृका आरण्यश्वानः । पोतः शिशुः । 'पोतः पाकोऽर्भको डिम्भः पृथुकः शावकः शिशुः' इत्यमरः । गवया गोसदृशाः प्राणिभेदाः । 'तरक्षुस्तु मृगादनः' । हरिद्रा पीतद्रुः । उक्तं च—'अथ पीतद्रुः कालेयकहरिद्रवाः । दार्वी पचंपचा दारु- हरिद्रा पर्जनीत्यपि ॥' वराहः सूकरः । पोत्रं सूकरमुखम् । गुञ्जा रक्तिका । जाहकाः दे रहा था । शुकण्ड पक्षी पके हुए लाल पीलुओं को निःशङ्क होकर खा रहे थे । तोतों के बच्चे शरीफे और कटहल के कच्चे फलों को निठुरता से कुतर कर गिरा रहे थे । पर्वत की चिकनी शिलाओं पर खरहों के बच्चे सुख से सो रहे थे । छिपकली के छोटे बच्चे शेफालिक। की जड़ों की सुराखों में घुस रहे थे । रङ्क नामक मृग निडर घूम रहे थे । नेवले आपस में निराकुल होकर कूद-फाँद कर रहे थे । कूकभरे कोकिल उत्पन्न होती हुई कोंड़ी को निगल जाते थे । चमरु हिरनों के झुण्ड आम के बगीचों में जुगाली कर रहे थे । नीलाण्डज मृग सुखपूर्वक बैठे हुए थे । दूध पीते हुए नीलगाय के बच्चों को पास में बैठे भेड़ियेकुछ कहे बिना देख रहे थे । कानों को सुख पहुँचाने वाली निकट के पर्वत के झरते हुए झरने की आवाज सुनते हुए नींद से माँते ऊँघते हुए हाथियों के कानों के फटफटाने की दुन्दुभि जैसी आवाज धीरे-धीरे कम पड़ती जा रही थी । कहीं रुरु हिरन पास ही में किन्नरियों के संगीत का आनन्द ले रहा था और तेंदुए उन्हें देखकर प्रसन्न हो रहे थे । बनैले सूअरों के बच्चों की थूथनियाँ खोदकर हल्दी के कुटकुटाने से रँग गई थी । झाऊ चूहे गुञ्जा वृक्षों